सम्वेदना के स्वर

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सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Thursday, July 29, 2010

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कौन हैं हम ?

अदा जी ने, अपनी ताजा पोस्ट में, अपने ब्राह्मण होने पर प्रश्न चिह्न लगाया है. उनकी बात से सहमत होते हुए, हमारा भी मानना है कि जन्म के आधार पर इस तरह के विभाजन अब प्रासंगिक नहीं हैं. हाँ, आध्यात्मिक या चेतना के विकास के सन्दर्भ में इस विभाजन का एक दूसरा आयाम भी है.

ओशो कहते हैं कि जहां तक मनु स्मृति मे वर्णित चार वर्णों की व्यवस्था का प्रश्न है, समाज को इस प्रकार की व्यवस्था में बाँटना बड़ा ही वैज्ञानिक प्रयोग था. यदि मनुष्यों के व्यक्तित्व के प्रकार की दृष्टि से देखें, तो पूरी समष्टि में चार तरह के ही व्यक्तित्व हैं शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण.

शूद्र : शुद्र उसे कह सकते हैं जो आलस्य से भरा है, जिसे कुछ भी करने की इच्छा नहीं है. भोजन मिल जाये, वस्त्र उप्लब्ध हो जायें, बस वही पर्याप्त है, जीने के लिए. वह जी लेगा.

वैश्य : दूसरा वर्ग वैश्य है, जिसके लिये जीवन लग जाये, परंतु हर हाल में धन एकत्र करना है, पद पाना है. तिजोरी भरने के वह सब उपाय करता है, चाहे सब कुछ खो जाये, आत्मा नष्ट हो जाये, सम्वेदनायें मर जायें! पर उसे चिन्ता है, तो बस धन की, बैंक बैलेंस की.

क्षत्रिय : तीसरा क्षत्रिय वर्ग है. इसकी ज़िन्दगी में अंह्कार के सिवा कुछ नहीं है. किसी भी तरह यह साबित करना कि “मैं ही सब कुछ हूं”. बस इसी बात पर ज़ोर है इसका. धन जाये, पद जाये, जीवन जाये, सब कुछ दांव पर लगा देगा यह परंतु दुनिया को दिखा देगा कि “मै कुछ हूं”.

ब्राह्मण : ब्राह्मण वह है जो सिर्फ ब्रह्म की तलाश में है और कह्ता है कि संसार में सब व्यर्थ की आपाधापी है. न तो आलस्य का जीवन अर्थपूर्ण है, क्योंकि वो प्रमाद है; न धन के पीछे की दौड़ अर्थपूर्ण है, क्योंकि वो कहीं भी नहीं ले जाती है; न अहंकारपूर्ण जीवन अर्थपूर्ण है, क्योंकि जगत के अनंत विस्तार में हमारा अस्तित्व ही क्या है ? हम कौन हैं? कहां से आये हैं ? कहां जायेंगे ? जीवन के इन मूल प्रश्नों के साथ आत्म-साक्षात्कार की यात्रा मे उतर जाना ही ब्राह्मण होना है.

अब स्वयम ही जाँचें हम ; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र - क्या हैं हम?



60 comments:

मनोज कुमार said...

मूल्य निर्णय न देकर आलोचनात्मक ब्याख्यान अच्छा लगा।

Apanatva said...

sochatee hoo aham se poora chutkara mile insaniyat atithee nahee par apanee bun har saans ke sath sath rahe fir shayad ise yogy ho jaaoo ki vishleshan kar aapne aapko kisee ek srenee me khada kar sakoo...........

Apanatva said...
This comment has been removed by the author.
kshama said...

Padhke lag raha hai,mai to pakkee shoodr hun!
Waise jahan moolyankan na ho ki,yah achha yah bura,aisa lekhan bahut achha lagta hai,jo aapka hai.

shikha varshney said...

अरे इस थ्योरी से हम तो व्यक्तित्व हीन हो गए :)
बहुत अच्छी पोस्ट.

Mukesh Kumar Sinha said...

kshama jee ke baat se agree hooon.........mujhe bhi kshhudra me rakha jaye........:)

waise aapke classification me dumm hai...........sir!!

सुज्ञ said...

क्षमा करें,पर सही बात तो सम्वेदना रहित प्रस्तूत कर दिया।
देख लिजिये शिखा जी स्वयं को किसी भी मनोदशा में नहिं पाती, लगभग सभी का यही मंतव्य होगा।

kunwarji's said...

:)

kunwar ji,

Sonal Rastogi said...

vichaar kar rahi hoon...

वाणी गीत said...

समय- समय पर सारे ही गुण मिल जायेंगे ...
क्षत्रिय के सिवा ..!

सत्‍य गौतम said...

घर बनाना शुरू करने से पहले वास्‍तुशास्त्र के अनुसार नियमों का पालन करना चाहिए, 'समरांगण सूत्रधार वास्‍तुशास्‍त्र' में महाराजा भोजदेव ने लिखा है कि शुद्रों के लिए 3 तल वाला भ्‍ावन कल्‍याणकारी होता है, इस से बढ कर यदि शुद्र का भवन होगा तो उस के कुल का नाश हो जाएगा
'सार्ध त्रिभूमिशूद्राणां
वेश्‍म कुर्याद् विभूतये,
अतोधिकतरं यत् स्‍यात्
तत्‍करोति कुलक्षयम'
('समरांगण सूत्र 35/ 21)

rashmi ravija said...

बहुत ही विचारणीय पोस्ट....पर किसी भी श्रेणी में पूरी तरह समाहित होना कठिन है...

'अदा' said...

सर्वप्रथम..आपका हृदय से आभार इस प्रविष्ठी के लिए...
आपके मूल्यांकन से ऐसा प्रतीत हुआ कि ये सभी गुण सब में मिलते हैं...बस काल और परिस्थिति पर निर्भर करते हुए.....
सही मायने में, ये मानवीय गुण हैं ....किसी भी क्षण कोई भी सिर उठा जाए...और सच पूछा जाए..इन्हीं से तो एक व्यक्तित्व का निर्माण होता है...
मैं तो यही कहूँगी...सब कुछ हूँ....हाँ 'क्षत्रीय' वाली बात अभी तक नहीं हुई...तो इसका अर्थ यह भी नहीं कि दावा कर दूँ कि यह नहीं होगा...
कौन जाने कब, कहाँ, कैसे और क्यूँ क्या कर बैठूं....!
बहुत अच्छी प्रस्तुति...
आभार..!!

Arvind Mishra said...

ब्राह्मण ब्रह्मा नहीं ब्रह्म की खोज में रहता है -ब्रह्म मतलब चरम सत्य ,अंतिम अभीष्ट ,परमात्मा मोक्ष धाम ,-मगर ब्रह्मा नहीं!

सम्वेदना के स्वर said...

@अरविंद मिश्रः
पंडित जी!आभार,यह टाइपिंग की त्रुटि थी...किंतु भूल सुधार के लिए धन्यवाद!

Apanatva said...

comment deleted ......?

अनामिका की सदायें ...... said...

आप की रचना 30 जुलाई, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
http://charchamanch.blogspot.com

आभार

अनामिका

प्रवीण पाण्डेय said...

सहमत। यह सदैव रहेगा पर लोग गलत उपयोग करेंगे। स्वयं को वह सिद्ध करना जो नहीं है, सबसे जघन्य मानसिक अपराध है।

मो सम कौन ? said...

आपके द्वारा दी गई व्याख्या के अनुसार कभी क्षत्रिय और कभी शूद्र।

सत्य गौतम said...

हमारे देश में 10 लाख मंदिर हैं जो अरबों-खरबों के सोने चांदी और अनेक आभूषणों से भरे पड़े हैं। यदि विश्व में सोने के तख्त पर कोई व्यक्ति बैठता है तो वह एक व्यक्ति भारत का गुरू शंकराचार्य ही है। कुछ समय पूर्व अभी एक शंकराचार्य की मृत्यु हुई थी तो उसका शव भी सोने के तख्त पर लिटाया गया था। भारत में 5 प्रतिशत उच्च जातीय हिन्दू जमींदार हैं जिनमें एक-एक के पास 10-10 हजार एकड़ भूमि के फ़ार्म हैं। इन जमींदारों के पास भी अरबों-खरबों की सम्पत्ति है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

100% क्षत्रिय इस परिभाषा के हिसाब से .

दीपक 'मशाल' said...

इस तरह दुनिया में ब्राह्मण तो कोई नहीं दिखता.. हाँ मैं जरूर शूद्र हूँ ये पता चल गया.. :)

Anonymous said...

मेरे विचार से आपने काफी गलत और नकारात्मक व्याख्या की है। शायद मैकाले की शिक्षा पद्धति हमें यही सिखाती है।
मैं कोई विशेषज्ञ तो नही हूं फिर भी वर्णों पर अपने विचार रखना चाहूंगा।
ब्राह्मण: वह जो ब्रह्म को जाने, समाज को दिशा दे, लोगों को सही रास्ते पर रखे। विभिन्न वर्णों की जिम्मेदारियां भी तय करना इन्ही के जिम्मे था। जब कभी देश का राजा गलत काम करने लगता था तब यही ब्राह्मण लोग उसे हटाकर दूसरे को गद्दी पर बैठा देते थे।
क्षत्रिय: जो क्षय यानि कि नुकसान को रोकने का काम करे। जैसे कि राजा, सैनिक इत्यादि।
वैश्य: इनका काम शूद्रों द्वारा उत्पादित माल का व्यापार करना होता था। अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा।
शूद्र: (इन्हे आपने आलसी कहकर इनकी आपने बहुत गलत व्याख्या की है) ये वर्ग सबसे अधिक मेहनती और ज्ञान विज्ञान में प्रवीण होता था। चाहे शल्य क्रिया हो, या तरह तरह के यंत्र बनाना। ये सभी कार्य शूद्र लोग करते थे। राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान से पता चलता है कि कई कार्य जैसे कि ईमारतें, स्टील या अन्य धातुएं, चिकित्सा आदि से जुड़े कई कार्यों में यही लोग लगे हुए थे।
>> जो शूद्र आलसी है, कुछ नही जानता वह शूद्र नही है
>> जो वैश्य व्यापार के नाम पर हेराफेरी और मिलावट जैसे कार्य करता है वह वैश्य नही है
>> जो क्षत्रिय अहंकारी है और कमजोंरों की रक्षा करने की बजाय अत्याचार करता है वह क्षत्रिय नही है
>> जो ब्राह्मण ब्रह्म तो क्या साधारण नीतियां और नैतिकता भी नही जानता है और रासलीला में व्यस्त रहता है, वह ब्राह्मण नही है

वर्तमान समय के अनुसार देखा जाए तो उदाहरण लेकर समझाता हूं। एक अस्पताल के डाक्टर समेत पूरे कर्मचारी शूद्र हैं। अस्पताल का मालिक जो कि उनके कार्यों का व्यापार कर रहा है वह वैश्य है। नेता, पुलिस और सेना क्षत्रिय और विभिन्न धर्मगुरू ब्राह्मण हैं।

Anonymous said...

मेरे विचार से आपने काफी गलत और नकारात्मक व्याख्या की है। शायद मैकाले की शिक्षा पद्धति हमें यही सिखाती है।
मैं कोई विशेषज्ञ तो नही हूं फिर भी वर्णों पर अपने विचार रखना चाहूंगा।
ब्राह्मण: वह जो ब्रह्म को जाने, समाज को दिशा दे, लोगों को सही रास्ते पर रखे। विभिन्न वर्णों की जिम्मेदारियां भी तय करना इन्ही के जिम्मे था। जब कभी देश का राजा गलत काम करने लगता था तब यही ब्राह्मण लोग उसे हटाकर दूसरे को गद्दी पर बैठा देते थे।
क्षत्रिय: जो क्षय यानि कि नुकसान को रोकने का काम करे। जैसे कि राजा, सैनिक इत्यादि।
वैश्य: इनका काम शूद्रों द्वारा उत्पादित माल का व्यापार करना होता था। अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा।
शूद्र: (इन्हे आपने आलसी कहकर इनकी आपने बहुत गलत व्याख्या की है) ये वर्ग सबसे अधिक मेहनती और ज्ञान विज्ञान में प्रवीण होता था। चाहे शल्य क्रिया हो, या तरह तरह के यंत्र बनाना। ये सभी कार्य शूद्र लोग करते थे। राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान से पता चलता है कि कई कार्य जैसे कि ईमारतें, स्टील या अन्य धातुएं, चिकित्सा आदि से जुड़े कई कार्यों में यही लोग लगे हुए थे।
>> जो शूद्र आलसी है, कुछ नही जानता वह शूद्र नही है
>> जो वैश्य व्यापार के नाम पर हेराफेरी और मिलावट जैसे कार्य करता है वह वैश्य नही है
>> जो क्षत्रिय अहंकारी है और कमजोंरों की रक्षा करने की बजाय अत्याचार करता है वह क्षत्रिय नही है
>> जो ब्राह्मण ब्रह्म तो क्या साधारण नीतियां और नैतिकता भी नही जानता है और रासलीला में व्यस्त रहता है, वह ब्राह्मण नही है

वर्तमान समय के अनुसार देखा जाए तो उदाहरण लेकर समझाता हूं। एक अस्पताल के डाक्टर समेत पूरे कर्मचारी शूद्र हैं। अस्पताल का मालिक जो कि उनके कार्यों का व्यापार कर रहा है वह वैश्य है। नेता, पुलिस और सेना क्षत्रिय और विभिन्न धर्मगुरू ब्राह्मण हैं।

राष्ट्रवादी said...

मेरे विचार से आपने काफी गलत और नकारात्मक व्याख्या की है। शायद मैकाले की शिक्षा पद्धति हमें यही सिखाती है।
मैं कोई विशेषज्ञ तो नही हूं फिर भी वर्णों पर अपने विचार रखना चाहूंगा।
ब्राह्मण: वह जो ब्रह्म को जाने, समाज को दिशा दे, लोगों को सही रास्ते पर रखे। विभिन्न वर्णों की जिम्मेदारियां भी तय करना इन्ही के जिम्मे था। जब कभी देश का राजा गलत काम करने लगता था तब यही ब्राह्मण लोग उसे हटाकर दूसरे को गद्दी पर बैठा देते थे।
क्षत्रिय: जो क्षय यानि कि नुकसान को रोकने का काम करे। जैसे कि राजा, सैनिक इत्यादि।
वैश्य: इनका काम शूद्रों द्वारा उत्पादित माल का व्यापार करना होता था। अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा।
शूद्र: (इन्हे आपने आलसी कहकर इनकी आपने बहुत गलत व्याख्या की है) ये वर्ग सबसे अधिक मेहनती और ज्ञान विज्ञान में प्रवीण होता था। चाहे शल्य क्रिया हो, या तरह तरह के यंत्र बनाना। ये सभी कार्य शूद्र लोग करते थे। राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान से पता चलता है कि कई कार्य जैसे कि ईमारतें, स्टील या अन्य धातुएं, चिकित्सा आदि से जुड़े कई कार्यों में यही लोग लगे हुए थे।
>> जो शूद्र आलसी है, कुछ नही जानता वह शूद्र नही है
>> जो वैश्य व्यापार के नाम पर हेराफेरी और मिलावट जैसे कार्य करता है वह वैश्य नही है
>> जो क्षत्रिय अहंकारी है और कमजोंरों की रक्षा करने की बजाय अत्याचार करता है वह क्षत्रिय नही है
>> जो ब्राह्मण ब्रह्म तो क्या साधारण नीतियां और नैतिकता भी नही जानता है और रासलीला में व्यस्त रहता है, वह ब्राह्मण नही है

वर्तमान समय के अनुसार देखा जाए तो उदाहरण लेकर समझाता हूं। एक अस्पताल के डाक्टर समेत पूरे कर्मचारी शूद्र हैं। अस्पताल का मालिक जो कि उनके कार्यों का व्यापार कर रहा है वह वैश्य है। नेता, पुलिस और सेना क्षत्रिय और विभिन्न धर्मगुरू ब्राह्मण हैं।

Anonymous said...

मेरे विचार से आपने काफी गलत और नकारात्मक व्याख्या की है। शायद मैकाले की शिक्षा पद्धति हमें यही सिखाती है।
मैं कोई विशेषज्ञ तो नही हूं फिर भी वर्णों पर अपने विचार रखना चाहूंगा।
ब्राह्मण: वह जो ब्रह्म को जाने, समाज को दिशा दे, लोगों को सही रास्ते पर रखे। विभिन्न वर्णों की जिम्मेदारियां भी तय करना इन्ही के जिम्मे था। जब कभी देश का राजा गलत काम करने लगता था तब यही ब्राह्मण लोग उसे हटाकर दूसरे को गद्दी पर बैठा देते थे।
क्षत्रिय: जो क्षय यानि कि नुकसान को रोकने का काम करे। जैसे कि राजा, सैनिक इत्यादि।
वैश्य: इनका काम शूद्रों द्वारा उत्पादित माल का व्यापार करना होता था। अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा।
शूद्र: (इन्हे आपने आलसी कहकर इनकी आपने बहुत गलत व्याख्या की है) ये वर्ग सबसे अधिक मेहनती और ज्ञान विज्ञान में प्रवीण होता था। चाहे शल्य क्रिया हो, या तरह तरह के यंत्र बनाना। ये सभी कार्य शूद्र लोग करते थे। राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान से पता चलता है कि कई कार्य जैसे कि ईमारतें, स्टील या अन्य धातुएं, चिकित्सा आदि से जुड़े कई कार्यों में यही लोग लगे हुए थे।
>> जो शूद्र आलसी है, कुछ नही जानता वह शूद्र नही है
>> जो वैश्य व्यापार के नाम पर हेराफेरी और मिलावट जैसे कार्य करता है वह वैश्य नही है
>> जो क्षत्रिय अहंकारी है और कमजोंरों की रक्षा करने की बजाय अत्याचार करता है वह क्षत्रिय नही है
>> जो ब्राह्मण ब्रह्म तो क्या साधारण नीतियां और नैतिकता भी नही जानता है और रासलीला में व्यस्त रहता है, वह ब्राह्मण नही है

वर्तमान समय के अनुसार देखा जाए तो उदाहरण लेकर समझाता हूं। एक अस्पताल के डाक्टर समेत पूरे कर्मचारी शूद्र हैं। अस्पताल का मालिक जो कि उनके कार्यों का व्यापार कर रहा है वह वैश्य है। नेता, पुलिस और सेना क्षत्रिय और विभिन्न धर्मगुरू ब्राह्मण हैं।

सम्वेदना के स्वर said...

@ Anonymous दो बार
@ राष्ट्रवादीः
आपके उद्गार का हम स्वागत करते हैं...आपने उन पुरानी दीमक लगी व्यवस्था का उल्लेख किया है और स्वयम् उन विचारों को ही खंडित किया है. आप हमारी पोस्ट तक पहुँचे ही नहीं. आपने व्यक्ति विशेष अथवा वर्ग विशेष की चर्चा और व्याख्या की है. किंतु हमने तो अपनी पोस्ट में कहीं भी इस बात का वर्णन नहीं किया है. यह पूरी व्याख्या व्यक्तित्व की है, पुनः सुनें, व्यक्तित्व की है. और यह व्यक्तित्व समाज के किसी वर्ग एवम् समुदाय के व्यक्ति में हो सकते हैं. आपसे पूर्व जो टिप्पणियाँ लोगों ने दी हैं उन्होंने भी व्यक्तित्व के संदर्भ में ही स्वयम् का मूल्यांकन किया है और अपनी बात कही है.
एक बार पुनः पढें और निर्णय पर पुनर्विचार करें.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कर्मों के अनुसार वर्गीकरण अच्छा लगा ...

डा० अमर कुमार said...


शायद मुझे यह पोस्ट पढ़ने में कुछ देर हो गयी..
राजनैतिक हितों के बँदरबाँट में जातिगत परितुष्टि का पोषण, शोषित एवँ कुलीनता के अनौचित्य , तदोपराँत ऎसे वर्ग विभाजन अब कितने प्रासँगिक रह गये हैं ? यह मैं भी ठीक से नहीं जानता ( और जानने की इच्छा भी नहीं है )
अतएव इस बहस में न पड़ते हुये ...
श्रमजीवी भवेत शूद्रः धनजीवी कृषी वणिक
बलजीवी भवेत क्षत्री बुद्धिजीवी हि ब्राह्मण:

या फिर..
अन्नशाकप्रियः शूद्रः वैश्यो दुग्धदधिप्रियः
मतस्यमांसप्रियः क्षत्री ब्राह्मणो मधुरप्रियः


अलबता इस शीर्षक के बूते मुझे यहाँ तक खींच तो लाये..
अब बताइये हम कहाँ पर फिट होते हैं, या फिर किसको ललकारने जायें ?

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

janm ke adhar par hue vibhajan se badhiya to ye vibhajan hai ....aur poori tarah tarkik bhi hai .... :) main to poori tarah sehmat hun ...waise mere dada ji mujhe shoodra hi kahte hain ... :)

सतीश सक्सेना said...

@संवेदना...
दुर्भाग्य से यहाँ गहराई से पढने वालों की बेहद कमी है ...लिखी पोस्ट सरसरी निगाह से पढ़ी जाती है उद्देश्य होता है कोई गलती पकड़ कर उसपर प्रतिक्रिया देना और अपनी वर्चस्वता प्रमाणित करना चाहे उस विषय के जानकार हों या न हों !

कुछ कायर व्यक्ति जो अपना सही पता कभी नहीं बताते सिर्फ अपने क्षद्म नाम से, मन में बचपन से भरी कडवाहट, आज के स्वस्थ वातावरण में भी छोड़ते रहते हैं ! ऐसे लोगों का कार्य लोगों को अपनी और आकर्षित करना मात्र होता है वे अपने आपको अपने विषय विशेष का एकमात्र प्रवक्ता ..प्रचारक कहते हैं ! लगता है कि अगर यह न होंगे तो शायद यह वर्ग विशेष तड़प तड़प कर दम ही तोड़ देगा !

नफ़रत फ़ैलाने वालों को इससे कुछ सरोकार नहीं कि वे भूत काल की गन्दगी अपने उस घर में आज विखेर रहे हैं जिसमें उनकी मासूम संताने रहती हैं ! इन मासूमों के दिल में यह ५० वर्ष पुराना जहर घोल कर यह लोग सभ्यता और देश के प्रति अपराधी है ! ऐसे लोगों की इस नफ़रत में जीते रहना ही नियति है !

बेहतर होगा कि हम इन्हें महत्व और जवाब न दें ...
ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे !

Mithilesh dubey said...

जाती की आवश्यकता हमारे समाज को पहले भी थी और अब भी हैं और आगे भी रहेगी , जाती व्यस्था पूरी तरह से वर्णाश्रम पर निर्धारित है , । किसी भी राष्ट्र,समाज या परिवार ,को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ नियम या व्यवस्थाये परिवार समाज या राष्ट्र के लोगो द्वारा निर्धारित की जाती है जो लचीली और लोचवान होती है- जो समय के साथ परिवर्तित होती रहती है, इनका मकसद केवल व्यवस्था कायम करना होता है बंधन बनाना नहीं ठीक उसी तरह की व्यवस्था जाति व्यवस्था भी है इसे एक परिवार से शुरू करते है हम सभी जानते है कि भारतीय परिवार व्यवस्था विश्व की शीर्ष परिवार व्यवस्था है अब एक परिवार को ठीक और सुचारू रूप से चलाने के लिए परिवार के प्रतेक सदस्य का कार्य निर्धारित होता है जो परिवार के मुखिया के द्वारा उसकी योग्यता के हिसाब से उसे दिया जाता है जैसे प्रत्येक घर में कोई बुजुर्ग व्यक्ति (दादा या दादी जो भी हो )जिन्हें जीवन का गहन अनुभव होता है वे अपने अनुभव परिवार के सभी सदस्यों के साथ बाटते है अतः वो ब्रह्मण का कार्य करते है दूसरी श्रेणी में वो लोग आते है जो अनुभव में अभी पूर्ण रूप से नहीं पगे है परन्तु बलिस्ट और जोशीले है अतः वो परिवार की मान्यताओं की रक्षा के लिए नियुक्त होते है और उनके मन में परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति कर्तव्य बोध होता है और वो परिवार के प्रत्येक सदस्य के पालन पोषण के लिए जिम्मेदार भी होते है ऐसे सदस्य दूसरी श्रेणी में आते है इनमे (पिता या चाचा आदि ) इन्हें क्षत्रिय कह सकते है तीसरी श्रेणी में घर की महिलाए आती है जिनके हाथो में प्रबंधन का काम होता है अन्न भण्डारण का काम होता है वस्तु के विनमय(पास पड़ोस से वस्तुओ के आदान प्रदान की जिम्मेदारी ) का काम होता है और परिवार के अर्थ को भी नियंत्रित करती है इन्हें हम वैश कह सकते है , चौथी श्रेणी में घर के बच्चे या द्वितीय श्रेणी की महिलाए (पुत्र बधुये)और पुत्र और पौत्र इत्यादि जिनके जिम्मे घर की साफ़ सफाई और उपरोक्त तीनो श्रेणी के सदस्यों की आज्ञा पालन का कार्य आता है उन्हें हम शुद्र कह सकते है अब घर में चारो वर्णों के होते हुए भी घर का क्या कोई सदस्य आपस में वैर करता है सभी मिल जुल के रहते है और सबको समान अधिकार प्राप्त है और उनके कार्य क्षेत्र योग्यता के अनुसार परिवर्तित भी होते रहते है- या हम यूँ कह सकते है जाति योग्यता के हिसाब से बदलती भी रहती है जो बच्चे अभी शुद्र है वो बड़े हो कर क्षत्रिय या ब्रह्मण बन सकते है ठीक इसी तरह समाज में भी जाति व्यवस्था (वर्णाश्रम व्यवस्था )को हम देख सकते है समाज का वो वर्ग जो बुद्धि जीवी है तीव्र ज्ञान रखता है (अध्यापक ,वैज्ञानिक डॉ ,,ज्योत्षी )ब्राहमण है----- दूसरा वर्ग जो समाज की स्तिथि और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है (राजनेता सैनिक और पत्रकार आदि ) क्षत्रिय है तिसरा बर्ग जो समाज की अर्थ व्यस्था और उपभोगीता के लिए जिम्मेदार है (व्यपारी ) उन्हें हम वैश कह सकते है चतुर्थ वर्ग उन लोगो का है जो समाज के मेहनतकस लोग (सभी प्रकार के श्रमिक किशान इत्यादी )है जो समाज की जड़ का पर्याय है जिनके बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है उन्हें हम शुद्र कह सकते है अब कौन व्यक्ति इस वर्ण व्यवस्था पर उंगली उठायेगा और कहेगा की ये गलत है, फिर वर्णव्यवस्था की बुराई क्यूँ ? बुराई वहा से सुरु होती है -----जब ये वर्ण व्यवस्था कर्म के हिसाब से ना हो कर जन्म के हिसाब से हो जाती .

Mithilesh dubey said...
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Mithilesh dubey said...

श्रणु यक्ष कुतं तात् ,न स्वध्यायोन न श्रतम |
कारणम् हि द्विजत्वे च व्रतमेव न संशयः ||
(महाभारत वन पर्व )
अर्थात :कोई केवल वेद पाठन या कुल में जन्म लेने से ब्राह्मण नहीं बनता बल्कि अपने कर्मो से ब्राह्मण बनता है
इतना ही नहीं हमारे धार्मिक ग्रन्थ भरे पड़े है उन उदाहरणों से जिनसे यह सिद्ध होता है की जाति जन्म से नहीं कर्म से होती है और योग्यता बर्धन के साथ जाती बदली भी जा सकती है ,, और ये भी हो सकता है की माता पिता दोनों ब्राहमण हो और पुत्र शुद्र हो जाए या फिर इसका उल्टा हो (अर्थात माता पिता दोनों शुद्र हो और पुत्र ब्राहमण या क्षत्रिय ये उसकी योग्यता पर निर्भर है कुछ उदहारण देखते है ,,,,
अत्री मुनि (ब्राहमण )की दस पत्निया भद्रा अभद्रा आदि जो की रजा भाद्र्श्वराज (जो की क्षत्रिय थे ) की कन्याये थी और उन कन्याओं की माँ अप्सरा (नर्तकी )थी ,, दतात्रेय दुर्वाषा अत्री मुनि के पुत्र थे जो की ब्राह्मण हुए ||
(लिंग पुराण अध्याय ६३ )
अब आप कहेगे की जाती तो पिता से निर्धारित होती है अगर पिता ब्रह्मण है तो पुत्र तो स्वभाविक रूप से ब्रह्मण होगे ही ,,,नहीं नहीं ऐसा नहीं है वो अपनी योग्यता से ब्राह्मण हुए थे आगे देखे ,,,
१-मातंग ऋषि जो की ब्रह्मण थे ,, एक ब्राह्मणी के गर्भ से चांडाल नाई के द्बारा उत्पन्न हुए थे ||
(महाभारत अनुपर्व अध्याय २२ )
२-ऋषभ देव राजा नाभि (जो कि क्षत्रिय ) के पुत्र थे इनसे सौ पुत्र हुय्र जिनमे से इक्यासी ब्राह्मण हुए
(देवी भागवत स्कन्द ४ )
३-राजा नीव (क्षत्रिय )ने शुक्र (ब्राह्मण ) कि कन्या से विवाह किया इनके कुल में मुदगल ,अवनीर, व्रह्द्र्थ ,काम्पिल्य और संजय हुए मुदगल से ब्राह्मणों का मौदगल्य गोत्र चला
(भागवत स्कंध ९ अध्याय २१ )

इतना ही नहीं मै अन्य अनेक और उदहारण जिनसे ये सिद्ध होता है कि जाति जन्म से नहीं कर्म से निर्धारित होती थी , ये उदहारण ये भी सिद्ध करते है कि विजातीय विवाह प्रचलित थे और मान्य थे एक और उदाहरण महा ऋषि काक्षिवान का
महाऋषि काक्षिवान (ब्राह्मण ) के पिता दीर्घतमा क्षत्रिय थे और ये उनके द्बारा एक शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न

Mithilesh dubey said...

भगवान् मनु जिन्हें कथित प्रगति वादी वर्णाश्रम व्यवस्था के लिए पानी पी पी कर कोसते है , ने मनु स्म्रति में स्पस्ट कहा है कि जाति कर्म से निर्धारित होती है जन्म से नहीं और क्रम के अनुसार जाति बदली भी जा सकती है ,,
भगवान् मनु कहते है ,,,
शुद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैती शूद्र्ताम |
क्षत्रिय यज्जन में वन्तु विधाद्वैश्याप्तथैव च//|
(मनु स्मरति अध्याय १० श्लोक ६५ )
अर्थात : शुद्र ब्राह्मणता को प्राप्त होता है , और ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त होता है इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश कुल में जन्म्लेने बालो को जानो |
इससे स्पस्ट है कि जाति जन्म से नहीं थी योग्य शूद्र ब्राह्मण हो सकता था और अयोग्य ब्राह्मण शूद्र ,, इतना ही नहीं भगवान् मनु ने कर्म पर बहुत जोर दिया है वे कहते है अपनी अपनी जाति बनाये रखने के लिए या जाति को उच्च बनाने के लिए विहित कर्मो का करना आवश्यक है इस श्लोक में --
भगवान् मनु कहते है--

योSनधीत्य द्विजो वेद मन्यन्त्र कुरुते श्रमम|
स जीवन्नेव शुद्र्त्वमाशु गच्छति सन्वया ||
(मनु स्म्रति अध्याय २१ श्लोक १६८ )
अर्थात : जो द्विज वेद को छोड़ कर अन्यंत्र टक्करे मारता है वह जीता हुआ सपरिवार शूद्र्त्व को प्राप्त होता है |
इतना ही नहीं वर्णाश्रम व्यवस्था बनाये रखना राज धर्म होता था और उनकी शुद्धता और स्पष्टता का भी आकलन होता था योगता में गिरने पर उच्च जाति छीन ली जाति थी , और योग्य होने पर जाति प्रदान भी कि जाती थी,,,,
न तिष्ठति तू यः पूर्व नोपास्ते यास्तु पश्चिमाम |
स शूद्रव्र्द्वहिस्काय्य्र : सर्वस्माद्रद्विज कर्मणा ||
(मनु स्मरति अध्याय २२ श्लोक १०३ )
अर्थात : जो मनुष्य प्रातः वा सायं संध्या नहीं करता वह शूद्र है और उसे समस्त द्विज कर्मो से बाहर कर देना चाहिए


इतना ही नहीं उस समय के अनेक अन्य निति कारो ने भी इसी चीज कि व्याख्या अपने अपने निति शास्त्रों में कीअगर सभी का उदारहण लेने बैठ गए तो बात बहुत लम्बी खिच जाए गी वैसे पर्याप्त तथ्य तो हम दे ही चुके है जो तर्क शील व्यक्ति की जिज्ञासा शांत करने के लिए काफी है और कुतर्की को हजार तर्क भी अगर और दूँ तो ना काफी है फिर दोवैराग अन्य निति कारो की स्म्र्तिया (निति ग्रन्थ ,कानून की पुस्तके ) तो देख ही लूँ
देखिये कर्म की व्याख्या करते हुए भगवान् पराशर क्या कहते है ----
अग्निकाययित्परिभ्रस्टा : सध्योपासन : वर्जिता |
वेदं चैवसधियान :सर्वे ते वृषला स्मर्ता||
(पराशर स्म्रति अध्याय १२ श्लोक २९)
अर्थात :हवन वा संध्या से रहित वेदों को न पढने वाला ब्राह्मण , ब्राह्मण नहीं शूद्र है|
बिलकुल यही बात शंख स्म्रति भी दोहराती है देखे ---
व्रत्या शूद्रसमास्तावद्विजेयास्ते विच्क्षणे |
याव द्वेदे न जायन्ते द्विजा जेयास्त्वा परम |
(शंख स्म्रति अध्याय १ श्लोक ८ )

soni garg said...

आपने जो ओशो पद्दति के अनुसार व्यक्तियों को चार भागो में बांटा है वो सही है या गलत मुझे पता नहीं इन चीजों का ज्ञान अभी तो मेरे पास नहीं है और वैसे भी सभी का अपना अपना नजरिया होता है इस तरह की चीजों में, ..... तो कुछ खास तो कह नहीं सकती हाँ लेकिन इतना ज़रूर कहूँगी की वैसे तो वेश्य वर्ग की हूँ अगर नाम के अनुसार देखा जाये तो लेकिन हूँ थोड़ी आलसी तो आप मुझे किस केटेगिरी में रखेंगे ??? बाकी वर्गों के बारे में तो नहीं लेकिन वैश्य वर्ग के बारे में जो परिभाषा दी है वो कुछ हद तक ठीक है !

सम्वेदना के स्वर said...

@ड़ा. अमर कुमार जी
@मिथिलेश दुबे जी
@सोनी गर्ग जी

एक बार फिर इस पोस्ट पर हमारी पहले दी गई टिप्पणी को उद्धृत करते हुए हमें कहना है कि यह अदा जी की पोस्ट पर हमारे कमेंट का विस्तार भर है. अदा जी की तरह हमारा भी मानना है कि “जन्म के आधार पर” इस तरह के विभाजन अब प्रासंगिक नहीं हैं.

हाँ, “आध्यात्मिक यात्रा” या “चेतना के विकास” के सन्दर्भ में पोस्ट में वर्ण व्यवस्था के विभाजन को “व्यक्तित्व के प्रकार” की दृष्टि से देखा गया है. यह किसी वेद-उपनिषद की बात नहीं, ओशो का मनोवैज्ञानिक दृष्टिबोध है.

अत: उस प्राचीन वर्ण व्यव्स्था के “पक्ष” या “विपक्ष” में होने का कोई सवाल ही नहीं है. यह एक सर्वथा अनूठी व्याख्या है.

एक बात और, जन्म से हम अपना व्यक्तित्व लेकर पैदा नहीं होते (नहीं तो फिर वही पुरातन बात हो जायेगी) व्यक्तित्व एक गत्यात्मक चीज़ है! हम हर पल बदलते हैं, शायद नदी की तरह. देश, काल और परिस्थिति पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है. वर्णित व्यक्तित्व के यह सभी प्रकार कुछ न कुछ मात्रा में हमारे भीतर होते ही हैं, कोई अधिक मात्रा में कोई कम!

अंत में इतना ही कि भारतीय मन “वर्ण व्यव्स्था” में 5000 वर्षों से संस्कारित है, इस कारण वो बरबस अप्रासंगिक हो चुकी उस वर्ण-व्यव्स्था को छोड़ ही नहीं पाता है और उसी पुरानी ढपली को बजाये जाता है.

@ ड़ा. अमर कुमार जी:
आपको किस श्रेणी में रखना है? तो हम तो आपको विद्वानों की श्रेणी में रखते हैं. वैसे इस पोस्ट में हर व्यक्ति स्वतंत्र है स्वयम् का मूल्यांकन करने को. कोई बात निर्णयात्मक कही ही नहीं गयी है यहाँ.

@ मिथिलेश दुबे जी:
वैदिक साहित्य का उल्लेख करते हुए आपका कहना भी हमें अच्छा लगा कि यह व्यवस्था जन्म पर नहीं, अपितु कर्म पर आधारित थी. दरअसल उस देश, काल और परिस्थिति में यह एक होरिज़ोंटल विभाजन था, जिसमें कोई भी कर्म न तो छोटा था न बड़ा. लेकिन कालांतर में जब श्रम का यह विभाजन वर्टिकल हो गया तब यह सारी व्यवस्था सड़ने लगी.

@ सोनी गर्ग जी:
इस पोस्ट में हर व्यक्ति स्वतंत्र है स्वयम् का मूल्यांकन करने को. कोई बात निर्णयात्मक कही ही नही गयी यहाँ.

Parul said...

main bhi confused hoon..par post bahut rochak hai :)..

बेचैन आत्मा said...

उम्दा पोस्ट. अच्छे कमेंट.

राजेश उत्‍साही said...

चैतन्‍य जी हम तो केवल मानव मात्र हैं। ज्‍यादा खोदेंगे तो हम जात के लेखक और गौत्र के सम्‍पादक हैं।
बहरहाल यह विमर्श अच्‍छा लगा। पर एक बात बताइए कि आपके टिप्‍पणी बाक्‍स में यह क्‍या समस्‍या है कि एक ही व्‍यक्ति की 20 टिप्‍पणियां आ जाती हैं। बेहतर होगा आप माडरेटर का उपयोग करें।

kshama said...

चाँद की दुल्हन
जड़े हुए तारों की सुरमयी चादर ओढे
घूंघट में शर्माती
झुक कर आई यहाँ पर.
बर्फ के उजले बालों वाले पेड़ों और पर्बत से
मिलकर,
पैर को छूकर
लेने को आशीष बुज़ुर्गों का धरती पर.
Nihayat khoobsoorat tippanee likhi aapne! Kya anootha khayal hai!

psingh said...

sudar prayas kathor prahar
samaj par abahr

दिगम्बर नासवा said...

विचारणीय पोस्ट है ... दरअसल अगर हम इंसान ही बन सकें तो ज़्यादा अच्छा होगा ...

Namaskar Meditation said...
This comment has been removed by the author.
Namaskar Meditation said...

ब्राह्मण
ब्राह्मण को मोक्ष का पुरुषार्थ करना चाहिए .
ब्राह्मण को संन्यास आश्रम का पालन करना चाहिए .
ब्राह्मण को हर कार्य अहंकारपूर्वक करना चाहिए .
ब्राह्मण को भेद नीति का प्रयोग करना चाहिए .
ब्राह्मण को मस्तिष्क का उपयोग करना चाहिए .
ब्राह्मण का शत्रु मोह है .
ब्राह्मण को सबसे अहंकार होता है .

क्षत्रिय
क्षत्रिय को काम का पुरुषार्थ करना चाहिए .
क्षत्रिय को वानप्रस्थ आश्रम का पालन करना चाहिए .
क्षत्रिय को हर कार्य चित्त लगाकर करना चाहिए .
क्षत्रिय को दण्ड नीति का प्रयोग करना चाहिए .
क्षत्रिय को हाथ का उपयोग करना चाहिए .
क्षत्रिय का शत्रु लोभ है .
क्षत्रिय को सबसे द्वेष होता है .

वैश्य
वैश्य को अर्थ का पुरुषार्थ करना चाहिए .
वैश्य को गृहस्थ आश्रम का पालन करना चाहिए .
वैश्य को हर कार्य बुद्धिपूर्वक करना चाहिए .
वैश्य को अर्थ नीति का प्रयोग करना चाहिए .
वैश्य को पेट का उपयोग करना चाहिए .
वैश्य का शत्रु क्रोध है .
वैश्य को सबसे राग होता है .

शूद्र
शूद्र को धर्म का पुरुषार्थ करना चाहिए .
शूद्र को ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करना चाहिए .
शूद्र को हर कार्य मन लगा कर करना चाहिए .
शूद्र को साम नीति का प्रयोग करना चाहिए .
शूद्र को पैर का उपयोग करना चाहिए .
शूद्र का शत्रु काम है .
शूद्र सबसे ईर्ष्या करता है .

Namaskar Meditation said...

शुद्र
जो हर काम उदर यानी पेट के लिए करता है वह शुद्र |
शुद्र का मकसद बस इतना होता है की पेट भरने तक का कमा लूं |

वैश्य
जो हर काम ऐश करने के लिए करता है वह वैश्य |
वैश्य का तो पेट भरा होता है | तभी वह सेठ कहलाता है |
वही सेठ अपने कामये धन से जब ऐश करता है |
यानी वैश्यालय केवल वैश्य लोगों के लिए ही बने हैं |
वो वहां पर जाते हैं और पैसे देकर ऐश करते हैं इसलिए वैश्य कहलाते हैं |

क्षत्रिय
जो हर काम अपने क्षत्र को और विस्तारित करने के लिए करता है वह क्षत्रिय |
क्षत्र यानी छाता |
कभी भी देखा हो तो राजा हमेशा छाते में चलता है |
और इसी छाते का वह विस्तार करता है |
की मेरा छाता इतना बड़ा है |
इसलिए कहते हैं कि छा गए गुरु |
यह भी कहा जाता है कि आपकी छत्र-छाया में रहते हैं |

ब्राह्मण
जो हर काम ब्रह्म यानी परमात्मा की प्राप्ति के लिए करता है वह ब्राह्मण |

Hey iswar tu kahan hai... said...

भाई ! मै अपने आप को कैसे .समझाऊ मै तो इस वर्ण व्यवस्था का मारा हुआ ...अछूत हूँ ! आप जैसे बड़े बड़े लोग ही .इस तरह बांते कर सकते है...मै अपने को क्या कहूँ !! आज भी मेरे लोग मेरे गाव में ...आप हिन्दुओ के मंदिर में नहीं घुस सकते..! वहां रामायण नहीं बाच सकते....मुझे कब मोक्ष मिलेगा.......

prabhat said...

sir mujhe aap kis category me rakhenge, i like good food, beautiful women, jaroori pade to thoda padh lena aur kam kar lena (beman se) taki kahi thaga nahi paun, itna milne ke baad na mujhe ramayn, mandir kuch bhi accha nahi lagta hai. main samajhta hun ye sab apna time pass karne ka tarika hai, it is ur choice, my choice is good or not. comment on it.

Jai Sharma said...

मोक्ष पाना हे। तो ऐसे संत की सेवा करो जहा पर सनातन धर्म का परचार प्रसार होता हो।
चारो वर्ण की सेवा होती हो उनके आश्रम में वो ही आपके जीवन को मोक्ष दिला सकते हे।
और श्री गुरु देव दत्त ये जप रोजाना अखण्ड करो।
सोते खाते कुछ भी कर्म करते समय आप ये जप करो।
देंखो फिर क्या क्या नजर आता हे।

Aamir Hussain said...

I'm confused but it's interesting.........

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