सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Monday, August 30, 2010

ईवीएम का तोड़? “भारतीय जुगाड़ टेक्नोलॉजी”

“तमाम गवाहों के बयानात, वकीलों की दलील और पेश किए गए सबूतों की रोशनी में अदालत इस नतीजे पर पहुँची है कि श्री फलाँ चंद पर लगाए गए तमाम इल्ज़ामात बेबुनियाद हैं, लिहाजा अदालत श्री फलाँ चंद को बाइज़्ज़त बरी करती है और पुलिस को ये हुक़्म देती है कि नए सिरे से खून की तफ़्तीश करे और असली क़ातिल के ख़िलाफ मुक़द्दमा दाख़िल करे.”

पता नहीं कब से ये सारे डायलॉग हम फिल्मों में सुनते आ रहे हैं और शायद वास्तविकता में भी ऐसा ही कुछ हो रहा होगा हमारी अदालतों में. लेकिन एक बात बरसों से सालती आ रही है मन को कि श्री फलाँ चंद तो बरी हो गए पर उस बेचारे मक़्तूल के असली क़ातिल का पता चला क्या?

ऐसा ही एक मुक़दमा सिर उठाए हमारी अदालत में घूम रहा है इन दिनों. मुक़दमा है एक सरकरी मशीन की चोरी का. वो मशीन जिसपर दारोमदार है हमारी जम्हूरियत का. और मुल्ज़िम है एक इंसान हैदराबाद का रहने वाला नाम है श्री हरि प्रसाद. मुल्ज़िम पर ये इल्ज़ाम है कि उसने सरकारी मशीन चुराई है. और ये बात तब सामने आई जब उस बेचारे ने अदालत के सामने यह बताने की कोशिश की कि यह मशीन हमारी जम्हूरियत की इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ करती है या कर सकती है. अब जम्हूरियत की ऐसी की तैसी. इस मुल्क़ में कोई औरत अपने ऊपर हुए ज़िना बल जब्र यानि बलात्कार का मुक़दमा दायर करे तो सारे वकील अपने मोवक्किल को बचाने के लिए उस औरत को बदचलन, बाज़ारू और तवायफ तक कहने से नहीं हिचकते. और अगर उसकी हिमायत करने कोई हमदर्द चश्मदीद बनकर आ गया, तो फिर उसे उसका दलाल बता देंगे.

ऐसे में कौन सुनता उस बेचारे हरि प्रसाद की. बता दिया गया उसे दलाल और डाल दिया गया सींखचों के पीछे. ऐसे आदमी का बाहर रहना जम्हूरियत के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा था और बात सुने बिना क़ैद कर लेना, हमारी अज़ीम रवायत का हिस्सा है.

अगर यह मान भी लिया जाए कि उसने चोरी कि है तो इस चोरी का पता तब लगा जब वो ख़ुद मशीन लेकर अदालत के सामने पहुँचा. उस दिन भी नहीं, उसके कई दिनों बाद. कमाल है जिस शख्स को उस मशीन के हिफ़ाज़त का ज़िम्मा सौंपा गया था, क्या कोई बता सकता है कि वो जनाब इस वक़्त कहाँ ऐश फरमा रहे हैं!!

पहले जब श्री हरि प्रसाद ने वो मशीन जिसे ईवीएम कहते हैं अदालत को दिखाई और बाक़ायदा सबके सामने यह बताना चाहा, कि इस मशीन का ग़लत इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए एक ख़तरा साबित हो सकता है और अगर इसका सही इस्तेमाल करना हो तो इसकी ये ख़ामियाँ दूर करनी ही चाहिए. कम से कम सरकार की ये ज़िम्मेवारी बनती है अवाम की तरफ कि वो उनको यह बताए कि हमारे चुनावी सिस्टम बिल्कुल दुरुस्त और बेदाग़ हैं और हर वो सवाल जो इस पर उठाए जा सकते हैं, उनके जवाब देने चाहिए. ऐसा तो कभी नहीं सुना कि बोलने वाले की ज़ुबान काट दी जाए.

अदालत ने कहा कि यह मामला इलेक्शन कमीशन का है और सिरे से ख़ारिज कर दिया. इलेक्शन कमीशन ने कहा कि इस मशीन को खोलना या इसके साथ छेड़छाड़ करना पेटेंट क़ानून के तहत आता है और बगैर किसी एक्स्पर्ट कमेटी की इज़ाज़त के ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी है. अब ये सवाल दीगर है कि ऐसी मशीन का साफ्ट्वेयर पर क्या किसी एक्स्पर्ट कमेटी ने सनदी मुहर लगाई थी? अगर हाँ, तो बताया जाये उसका नाम, अता पता और फिर तो सारी बातचीत उन्हीं से करनी मुनासिब होगी.

बहरहाल सवाल अभी भी वहीं क़ायमहै कि आप उस मशीन के साथ जो करें वो ठीक, दूसरा करे तो छेड़छाड़. लिहाज़ा उस बेचारे की बात सुनी ही नहीं गई. और फिर कुछ दिनों बाद उसके ख़िलाफ मशीन चुराने का इल्ज़ाम आयद करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन वो अफसर सिर ऊँचा किए घूम रहा है, जिसके पास से वो चोरी हुआ.

पिछले दिनों न्यूज़ एक्स चैनेल ने इसपर एक बहुत अच्छी बहस करवाई, जिसमें शिरकत की तुषार गाँधी, महेश जेठमलानी, जी वी एल नरसिम्ह राव और हरि प्रसाद के एक मित्र ने. सबों ने मिलकर इस बात के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद की. बताया कि प्रसाद के साथ ज़यादती हुई है और उससे भी ज़्यादा लोकतंत्र के साथ.

इसी कार्यक्रम में किसी ने आंध्र प्रदेश के तेलांगाना में हुए एक मज़ेदार वाक़ये का ज़िक्र किया. यहाँ लोक सभा चुनावों से नाराज़ और सरकारी रुख़ से खार खाए लोगों ने अपील की कि इस मशीन के ज़रिए वो चुनाव नहीं होने देना चाहते हैं. पर हुक़ूमत आमादा थी कि बस यही मशीनें बुनियाद रखेंगी एक मज़बूत लोकतंत्र की. अवाम ने एक नया तरीका निकाला. काँटे को काँटे से निकालने का. हर कॉन्स्टीच्युएंसी से 64 से ज़्यादा उम्मीदवार खड़े हो गए. नतीजतन, मशीन फ़ेल. क्योंकि मशीन की हद है कि वो 64 से ज़्यादा उम्मीदवारों का हिसाब नहीं रख सकती. हरि प्रसाद के एक दोस्त ने इस कार्यक्रम में कहा कि इस मशीन का यह “जुगाड़ सिस्टम” यानि 64 से ज़्यादा उम्मीदवारों के मैदान में होने पर मशीन को बेकार करने वाला फॉर्मूला आने वाले बिहार, बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव में कई जगह इस्तेमाल में लाया जाने वाला है.

सबसे अच्छी बात जो महेश जेठमलानी ने कही वो यह थी कि काग़ज़ी बैलट में बूथ लूटना जैसी घटनाएँ आँखों से दिखती है और अवाम को यह पता चलता है कि फ़लाँ आदमी ने फलाँ जगह, फ़लाँ पार्टी के लिए ग़लत रास्ते अख़्तियार किए, बूथ लूटे या बोगस वोट दिए. लेकिन इस छिपी हुई चोरी को क्या कहेंगे आप जो किसी एक दूर दराज जगह पर बैठकर एक रिमोट कंट्रोल के जरिए की जाए. यह तो मलाई के अंदर ब्लॉटिंग पेपर मिलाकर, फ़ाइव स्टार होटल में एक हेल्दी डिश कहकर परोसने जैसा है.

एक और चैनल “टाइम्स नाउ” की चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता जी ने इस मामले पर किसी भी बहस को लोकतंत्र को बदनाम करने का तमाशा बताया और महेश जेठमलानी को बोलने तक नहीं दिया. इस लिहाज़ से देखे तो हमें “टाइम्स नाउ” पर होने वाली सभी चर्चाओं को तमाशा की कहना होगा.

एक बड़े ही मशहूर चैनेल के भीष्म पितामाह सरीखे जर्नलिस्ट ने भी इस मशीन पर एक प्रोग्राम दिखाया और आख़िर में कहा कि उन्होंने यह मशीन देखी है और उनके हिसाब से वह 100% दुरुस्त और पुख़्ता है. अब कोई उनसे पूछे कि जनाब उसकी तकनीकी बारीकी बताएँगे आप? या हरि प्रसाद के साथ उनको बिठाकर दोनों का इम्तिहान ले लेते हैं.

ख़ैर, एक कहानी सुनिए. एक राजा को सुबह कहीं सफर पर जाते देख उसके पहरेदार ने कहा कि हूज़ूर कल रात ख़्वाब में मैंने देखा है कि रास्ते में कोई पुल टूट गया है और आपकी जान को ख़तरा है. जाँच में उसकी बात पक्की पाई गई. राजा ने उस पहरेदार को जान बचाने के लिए ईनाम दिया और काम पर सोने (सोते हुए सपना देखा था उसने) की वज़ह से नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया.

अगर ये वाक़या आजकल का होता तो वज़ीरों की सलाह पर राजा ने उस शख़्स को क़ैद करने का हुक़्म दे दिया होता. उसपर इल्ज़ाम लगता कि वो नौकरी के वक़्त सो रहा था और उसके रिश्तेदार राजा के क़त्ल की साज़िश कर रहे थे. कहा जाता कि बात खुल चुकी थी, इसलिए पहरेदार ने क़िस्सा बनाया कि उसे ख़्वाब में वो सब दिखाई दिया जिसको बताकर वो राजा की जान बचाने का नाटक कर रहा था. और बिना उसकी दलील सुने और बिना तफ्तीश के बेचारा उमर क़ैद झेल रहा होता.



Friday, August 27, 2010

राबिया की कुरान

राबिया नाम की एक फकीर औरत हुई। कुरान में कहीं एक वचन है कि शैतान को घृणा करो। उसने वह वचन काट दिया। एक दूसरा हसन नाम का फकीर उसके घर मेहमान था, उसने कहा, यह कुरान किसने खराब कर दिया, अपवित्र कर दिया?क्योंकि धर्मग्रंथों में संशोधन नहीं किया जा सकता,उनमें सुधार नहीं किया जा सकता। किसी धर्मग्रंथ में कोई सुधार नहीं किया जा सकता। वे अंतिम किताबे हैं। उनके आगे कोई सुधार की गुंजाइश नहीं है। उस हसन ने कहा,यह किस पागल ने किताब खराब कर दी? इस पवित्र ग्रंथ में किसने लकीर काट दी।
राबिया ने कहा, मुझी को काटनी पड़ी है।
तुम कैसी पागल हो गई हो? बुढ़ापे में दिमाग खराब हो गया है? जीवन भर कुरान पढ़ी, जीवन भर धर्मग्रंथ पढ़े, नमाज को मस्जिद गई। यह बुढ़ापे में क्या हुआ?
उसने कहा,इसके सिवाय कोई रास्ता न रहा कि इसको काटकर कुरान को पवित्र कर दूँ।
वह बहुत हैरान हुआ कि तुम कैसी पागल हो ?कुरान को भी अभी पवित्र होना है, तुम्हारे द्वारा।
राबिया ने कहा, जब मैं प्रेम से भर गई तो मैंने अपने भीतर बहुत खोजा, वहां मुझे कहीं घृणा नहीं मिलती है। अगर शैतान मेरे सामने खड़ा हो जाए तो भी मैं प्रेम करने के लिए मजबूर हूँ। क्योंकि घृणा करने के लिए घृणा होनी भी तो चाहिए। सवाल यही काफी नहीं है कि शैतान खड़ा है, उसको दान दो, लेकिन देने के लिए भी तो कुछ होना चाहिए। और अगर देने के लिए नहीं है तो गरीब आदमी को दान भी कैसे देंगे?तो उसने कहा, शैतान भला मेरे सामने खड़ा हो, मैं तो असमर्थ हूँ, मैं तो प्रेम ही दे सकती हूँ। प्रेम ही मेरे पास है। और परमात्मा भी खड़ा हो तो भी प्रेम ही दे सकती हूँ। और उसने कहा,अब तो बड़ी कठिनाई में पड़ गई हूँ कि पहचान भी नहीँ पाऊंगी कि कौन शैतान है,कौन परमात्मा है। क्योंकि प्रेम पहचान नहीं पाता और फर्क नहीं करता। इसलिए मैंने यह पंक्ति काट दी है और ग्रंथ को पवित्र कर दिया है।
- ओशो की पुस्तक “गिरह हमारा सुन्न में”  के “नई संस्कृति का  जन्म” प्रवचन का अंश

Wednesday, August 25, 2010

पीपली लाइव के नारी पात्र [समापन किस्त]

पीपली लाइव की कोई भी समीक्षा उसके सभी आयामों को छू नहीं सकती। हमने अब तक फिल्म को ग्रामीण परिवेश, राजनीतिक परिदृश्य और मीडिया की पृष्ठभूमि में मूल्यांकित करने की कोशिश की है । लेकिन हमसे जो कुछ छूट गया वो दर्शक की सम्वेदना पर निर्भर करता। आज इस समीक्षा के समापन अंक में हम इतना ही कहना चाहेंगे कि हर भारतीय को यह फिल्म जरुर देखनी चाहिए, जिससे न केवल उसकी दबी हुई भावनाओं का रेचन होगा बल्कि उसे जिंदगी के बहुआयामी पक्ष को समझने में भी मदद मिलेगी।

इस पूरी फिल्म में सिर्फ तीन ही नारी पात्र है. पहली एक न्यूज़ चैनल की रिपोर्टर – नंदिता, दूसरी नत्था की पत्नी – धनिया और तीसरी बुधिया और नत्था की माँ! जहां नंदिता आज की इन्डियन कॅरियर ओरिएंटेड महिला को रेप्रेसेंट करती है, वहीं नत्था की पत्नी एक देसी भारतीय महिला का प्रतिनिधित्व कर रही है.

नंदिता मलिक

मनोजः नंदिता मल्लिक आधुनिक शहरी नारी का प्रतिनिधित्व करती है। वह व्यवसायिकता और अपने व्यवसाय में सबसे आगे बने रहने के सारे हथकंडे अपनाती दिखाई देती है।

सोनीः ये वो महिला है जिसकी संवेदनाएँ, अपने ऊंचाई छूते कॅरियर में मर गयी है! पूरी फिल्म में नंदिता ने वही किया जो आज की मीडिया कर रही है! ये शहरी महिला का वो किरदार है जिसे अपने काम के सामने ना तो किसी के दुःख नज़र आए, ना किसी का दर्द. इसकी नज़र है, तो सिर्फ अपने चैनल की टीआरपी पर और अपनी परफोर्मेंस पर! इस कॅरियर वुमेन ने अपने प्रतिद्वंदी चैनल को टक्कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बस लीड लेने के लिए, ये कई तरह के हथकंडे अपनाती नज़र आई ! जिस लोकल न्यूज़ रिपोर्टर को शायद ये अपने सामने देखना भी ना चाहे उसी राकेश के साथ ये न्यूज़ बनाने निकल पड़ी!

चैतन्यः अगर नंदिता को देखें तो, वह एक ईनामी टीवी एंकर हैं! उनके लिये मेहनत और काम का मतलब है, प्राइम टाइम पर चलने वाली न्यूज़ स्टोरी, बाइट्स, बैकग्राउंड म्यूज़िक, और कैमरे से लिये चित्र. इनसब को कुछ ऐसे पेश कर देना कि सारी “आई-बाल्स्” बस उसे ही मिलें. महंगी नौकरी और सत्ता से नज़दीकी सम्बन्ध के कारण वह इंडिया की प्रगति से गदगद है, दिखावे के जीवन में, सम्वेदनाएँ ऐसी भोथरी कि भूख, गरीबी, बेरोज़गारी जैसे शब्द, टीवी डिबेट में प्रतिद्वन्दी को पछाड़ने के खूबसूरत हथियार हैं या टीवी डाक्यूमैंटरी के विषय! लेकिन बाबज़ूद इसके, पुरुष को उन्हीं के खेल में मात देने का एक जज़्बा भी उसके पूरे व्यक्तित्व का हिस्सा है. मैं व्यक्तिगत रूप से इसे आधुनिक नारी की, पुरुष के प्रभाव से मुक्त होने की प्रक्रिया का एक संक्रमण काल ही मानता हूं, जन्मों जन्मों की परतंत्रता के कारण, अभी उसका रुख प्रतिक्रियावादी है, लेकिन जब यह सहज होगा और नारीत्व इसमें से झरेगा तो बहुत अनूठी सम्भावानायें मिलेंगी. देखियेगा! दो या तीन पीढ़ी की आर्थिक स्वतंत्रता पूरी नारी जाति का इतिहास बदल देगी.

अम्मा

सोनीः ये वो महिला है जिसे अपने बेटे की आत्महत्या की खबर सुनकर भी कोई अफ़सोस नहीं होता! इसकी बहु सही ही कहती है की सारी कमाई इसके इलाज़ में लग गयी घर क़र्ज़ में डूब गया लेकिन ये माँ भी जानती है की उसका बेटा आत्महत्या कर ही नहीं सकता, बल्कि उसने तो एक जगह कहा भी है की अगर यमदूत भी उसे लेने आए तो भी नत्था नहीं जायेगा ! शायद इसलिए ये भी अपनी बहु की ही तरह पूरी अपने घर में लगे मेले को मूक दर्शक बनी देखती रही ! लेकिन इसने इस मेले का जम कर फायदा उठाया सभी से बीडी मांग कर ! फिल्म के आखिर में जब नत्था गायब हुआ तब भी इस महिला के चेहरे पर कोई अफ़सोस छलकता नज़र नहीं आया ! पूरी फिल्म में इसने सास होने का बखूबी फ़र्ज़ अदा किया है अपनी बहु को बेहिसाब गलिया दे कर ! फिल्म के अंत में भी इसका कहना यही था की जो हुआ उसकी बहु की वजह से हुआ ! ये थी एक देसी भारतीय सास!

चैतन्यः चारपाई पर पड़ी नत्था-बुधिया की माँ का किरदार बहुत रोचक अभिवक्ति है, एक ग्रामीण औरत और उसके अभिशप्त बुढापे की. गरीबी की मार बिना आवाज़ उसकी कमर तोड़ गयी और परिवार को कर्ज़ के बोझ में डाल वह हमेशा के लिये बिस्तर से जा लगी. फिर भी ज़माने की हर शै पर उसकी नज़र है यह अलग बात है कि बोलने के सिवा वो कुछ नहीं कर सकती अब, कमज़ोर नज़र बहुत दूर तक नहीं देख सकती इस कारण हर समस्या का कारण उसके लिये बहु ही है, जब भी मुहँ खोलती है एक भद्दी गाली ही निकालती है. वास्तव में उसका गुस्सा कभी न सुलझने वाले हालात पर तो है ही, खुद की बेबसी पर भी है. ग्रामीण भारत में पैदा होने की बेबसी.

मनोजः नत्था की अम्मा, जो पूरी फिल्म में चारपाई पर ही दिखाई देती है, जिसकी बिमारी के चलते नत्था और बुधिया को कर्ज से दबना पड़ा । धनिया इसके लिए सास को जिम्मेवार मानती है और सास बहु में इसके लिए बहस भी होती है ; तो वहीं सास अपनी सारी बेबसी और लाचारी का जिम्मा बहू के सिर मँढ़ती दिखाई देती है। मीडिया के साथ जबरदस्ती तैयार की गई उसके साथ बातचीत में व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी दिखाई देता है। सास के मुख से फिल्म में जो संवाद कहलवाए गए हैं, वह हमारी बेड़ियों के सूचक हैं; अभाव और तंगहाली में जी रहे परिवारों के रोजमर्रा जीवन का दर्पण है.

धनिया

मनोजः फिल्म में नारी का रूप परम्परागत भारतीय नारी से बदला-बदला सा है । फिल्म के आरम्भ में ही नायक नत्था की पत्नी धनिया के तेज और तर्रार तेवर देखने को मिलते हैं, जब नत्था और उसका अविवाहित बड़ा भाई बुधिया बैंक से यह खबर लेकर लौटते हैं कि उनकी जमीन नीलाम हो जाएगी, क्योंकि वे ऋण चुकाने में असमर्थ हैं । यहाँ मुझे डॉ. हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के कुछ अंश स्मरण हो आए हैं कि पुरुष के ऐसे काम धंधे को नारी समर्थन कम ही मिलता है, जिससे चार पैसे की आमदनी न हो । पुरुष भावना पर जी सकता है, नारी नहीं धनिया में घर चलाने में आधुनिक नारी की मानसिकता दिखाई पड़ती है और इसके लिए वह अपना आक्रोश मीडिया कर्मियों के साथ भी बहुत ही तेज-तर्रार ढ़ंग से रखती है। फिल्म में कहीं भी नारी को रोता हुआ नहीं दिखाया गया है, वहाँ भी नहीं जब कि रोना एक स्वाभाविक क्रिया हो सकता था अर्थात नत्था के मरने की खबर पर भी. धनिया परंपरागत स्त्रियों की तरह चारदीवारी में कैद नहीं है. वह बोलना जानती है तो वहीं अकर्मण्य भी नहीं है । घर से बाहर जाकर मेहनत कर पैसा कमा अपने पति और जेठ से कहीं आगे दिखाई पड़ती है ।पैसे की ताकत को वह बखूबी समझती है । जेठ के साथ कठोर से कठोर व्यवहार करते हुए भी पति की मृत्यु के बाद वह उसके प्रति नरम पड़ जाती है, यह कहीं न कहीं आज भी स्त्री की पुरुष पर निर्भरता को दर्शाता है ।

सोनीः यह एक ऐसी महिला है जो चाहे तो अपने घर में लगे मेले को एक झटके में ख़त्म कर सकती है और उसके आगे नंदिता जैसी महिला भी एक बार शायद टिक ना पाए! लेकिन उसके हाथ अपने परिवार के सामने बँधे नज़र आते है, खास तौर पर अपनी सास के सामने! जो हर छोटी बड़ी बात के लिए अपनी बहु पर पुरानी फ़िल्मी गालियों की बौछार करती हुई नज़र आती है ! नत्था की पत्नी को शायद यह भी विश्वास था कि नत्था आत्महत्या नहीं करेगा, इसलिए शुरुआत को छोड़ कर, पूरी फिल्म में उसे अपने पति की चिंता करते हुए कहीं नहीं दिखाया गया. वो अपने घर में लगे मेले के दौरान भी अपने घरेलू कामो में व्यस्त ही नज़र आई! हाँ उसने कई बार बुधिया की चालाकियो का जवाब ज़रूर देने की कोशिश की लेकिन हर बार असफल रही!

चैतन्यः इंडिया की नंदिता के समकक्ष है, भारत की धनिया, नत्था की पत्नी, घर की धुरी जिसकी चाक से सारा कुटुम्ब बँधा है. गरीबी-गुरबत से जूझने का अटूट हौसला है उसमें. अकेले अपनी लडाई लड़ तो रही है, पर उसके पास विकल्प बहुत सीमित हैं. यही कारण है कि नत्था की मृत्यु के बाद वो अपने जेठ बुधिया के प्रति नरम हो जाती है, एक अदद पुरुष की छाया की दरकार उसे, कुछ नहीं तो सामाजिक सुरक्षा देती है. इस मज़बूरी को वह गहराई से समझती है. बाज़ार को भगवान मानने वाले आज के इस युग में, धनिया का भविष्य, नंदिता भी हो सकता है यदि इंडिया का थोड़ा “भगवान” (बाज़ार) उसके भी हाथ आ जाये, वरना वह भी अम्मा की तरह खटिया की तोडेगी !

तकनीकी पहलू

सलिल : फिल्म की निदेशिका अनुषा रिज़वी और सहयोगी उनके पति महमूद फारूकी का समाचार चैनेल में काम करने का अनुभव फिल्म में फ्रेम दर फ्रेम दिखाई देता है. ख़ास तौर पर मीडिया की गतिविधियों का फिल्मांकन इतनी विश्वसनीयता से किया गया है कि दर्शक मीडिया के दोगलेपन पर कभी स्तब्ध रह जाता है और कभी उपहास उड़ाता है. और इसका श्रेय पूरी तरह अनुषा को और उसकी ईमानदार अभिव्यक्ति को जाता है.

अनुषा के अतिरिक्त, फिल्म के सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में स्व. हबीब तनवीर की छवि दिखती है. जिन्होंने हबीब तनवीर के मंचित नाटक देखे हैं, वो इस पूरी फिल्म को रंगमंच पर घटित होता अनुभव करते हैं. यहाँ फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने, हबीब तनवीर साहब की पवित्रता को बनाए रखा है.सारे कलाकार इतने स्वाभाविक प्रतीत होते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि वे अभिनय कर रहे हैं. सम्वादों की भाषा और उनका निर्वाह कहीं बनावटी नहीं दिखता है.

फिल्म के गीत संगीत के विषय में कुछ भी कहना पर्याप्त नहीं होगा. हबीब तनवीर के नाटकों की तरह गाने फिल्म का हिस्सा न होते हुए भी फिल्म का अविभाज्य अंग बन जाते हैं. गीत और संगीत स्थानीय कलाकारों द्वारा लोक संगीत पर आधारित है. जहाँ "महँगाई डायन" सामयिक व्यंग्य प्रस्तुत करता है, वहीं "चोला माटी का " कबीर के "साधो ये मुर्दों का गाँव" की याद दिलाता है.

फिल्म के सम्वादों में गालियों का प्रयोग दिखता है, शायद इसी कारण इसे ए सर्टिफिकेट मिला है. लेकिन यहाँ मैं पुनः डॉ. राही मासूम रज़ा के साथ खड़ा हूँ, क्योंकि फिल्म में पहली बार गाली बके जाने पर खिसियानी हँसी गूँजती है, किंतु पुनरावृत्ति होने पर सन्नाट. दर्शक गालियों को वैसे ही स्वीकारते हैं जैसे आम तौर पर गली, मुहल्लों और सड़कों पर. जहाँ सारा समाज ही ए सर्टीफिकेट का हक़दार हो वहाँ,इस फिल्म के सेंसर सर्टिफिकेट की परवाह किए बग़ैर कम उम्र बच्चे भी अभिभावक के साथ दिखते हैं.

कुल मिलाकर यह समीक्षा लिखकर भी हम यह नहीं कह सकते कि यह संपूर्ण हुई. एक फिल्म जिसने हमें झकझोरा, हमारी बात की तस्दीक की, उसके लिए हमारा इतना लिखना एक वकालत है उस भारत की जिसके लिए इण्डिया से कोई सोच उपजी है, भले ही यह भी अंत में आर्थिक सोच हो,किंतु फिलहाल दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है.

Monday, August 23, 2010

पीपली [लाइव]: भारतीय राजनीति पर एक शोधपत्र

पचास और साठ के दशक में, राजकपूर, सुनील दत्त आदि को लेकर बनी फिल्मों में रूसी साम्यवाद और नेहरु के औद्यौगीकरण का मेल साफ पकड़ में आता था. फिल्में एक सपना छोड़ जाती थीं, नये भारत के निर्माण का. उसके बाद के तीन दशकों की फिल्में देखे तो इंदिरा गाँधी के समय की “आँधी”, इमरजेंसी में लोकतांत्रिक संस्थाओं के बिखराव और सत्ता के चन्द हाथों मे सिमटनें की खबर देती है. फिर “आज का एमएलए रामअवतार”, “इंकलाब” से लेकर “गंगाजल” सरीखी फिल्मों ने भ्रष्ट हो चले राजनैतिक तंत्र को गोली से उड़ा देने का सतही तरीका पेश किया. जहाँ अभी हाल में आई फिल्म “राजनीति” ने सत्ता की तरफ खड़े होकर सत्ता का चेहरा दिखाया, वहीं पीपली लाइव नें ग्रामीण भारत की तरफ खड़े होकर सत्ता का और भी भयानक चेहरा दिखाया है और इस मायने में फिल्म एक संपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करने में सफल होती है.

सलिलः गंदी राजनीति करने वाले, मुद्दों की राजनीति नहीं करते. उनके लिए आवश्यक है कि हर मुद्दे को राजनैतिक रंग दे दिया जाए. और इस फिल्म में इसे भरपूर दिखाया गया है.

सोनीः बिल्कुल सही! जैसे ही नत्था के आत्महत्या करने की ख़बर राजनेताओं के कानों में पड़ी, उनके कान खड़े हो गए. उन्हें राजनीति करने का मौका जो मिल गया और ये मौका मिलते ही सभी अपने अपने स्तर पर शुरू हो गये राजनीति की रोटियां सेंकने! गाँव के लोकल नेता से लेकर मुख्यमंत्री तक, सभी नत्था की आत्महत्या की कहानी का फायदा उठाने लगे !

मनोजः फिल्म हमारी राजनैतिक व्यवस्था में लगी दीमक का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। वास्तविक मुद्दों से हटकर अनपढ़ और अशिक्षित लोगों को मूर्ख बनाने वाली बातों को हवा देकर, येन-केन-प्रकारेण उनके वोट हासिल करने के जितने ढ़ंग अपनाए जा सकते हैं, उन्हें अपना कर, सत्ता के गलियारों में बने हुए हमारे राजनेताओं के कारनामों को फिल्म को आगे बढ़ाने और देश के आम नागरिक की समस्या के प्रति उनकी सम्वेदनहीनता को मुखर करने के लिए किया गया है ।

चैतन्यः भारतीय राजनीति का घिनौना चेहरा फिल्म के हर दृश्य में बिखरा मिलता है. फिल्म देखकर यह अहसास और भी बढ़ जाता है कि राजनीति हमारी ज़िन्दगी पर किस तरह से हावी है. ग्रामीण भारत जो पूरी तरह से हाशिये पर जी रहा है उसके मुँह का निवाला भी देश और प्रदेश की राजनैतिक चालों पर निर्भर है.

मनोजः पीपली लाइव राजनीति के दाँव-पेंच को प्रदर्शित करती है । नेताओं के दोहरे चेहरे और समस्या के समाधान की बजाय उसमें वोट की राजनीति देखना, जातिवाद को बढ़ावा देना और तो और यदि इसके लिए किसी की आत्महत्या भी सहारा बने तो उसे प्रश्रय देना इस फिल्म के प्लाट के अहम हिस्से हैं ।

सोनीः नत्था की आत्महत्या की खबर सुनते है गाँव के सत्ता पक्ष के नेता को चिंता सताने लगी क्योकि उसको इसमें अपने वोट नज़र आ रहे थे और वो पहुँच गया नत्था के घर धमकी भरे अंदाज़ में कह दिया बुधिया को की अगर नत्था नहीं मारा तो वो उसे मार देगा! अपनी अपनी कुर्सी बचाने के लिए सभी जुगत में लगे रहे और एक लाल बहादुर(हैंडपंप) भेज दिया नत्था के घर ताकि वो अपना इरादा बदल दे. वहीं जब ये खबर विपक्ष के लोकल नेता पप्पू लाल को मिली तो उन्होंने तो पूरा ट्विस्ट दे दिया इस कहानी को. उसने इसमें जाति को जोड़ कर राजनीति शुरू की और नत्था को गिफ्ट में टीवी दिया फूलों का हार पहनाया और बड़े ही विश्वास से कहा की नत्था ज़रूर मरेगा ! क्योंकि उसे अपनी जाति के वोट जो चाइये थे. बस एक के बाद एक घटिया राजनीति शुरू होती गयी! सभी के लिए नत्था वोट इकट्ठा करने का जरिया बन गया और सभी को गाँव के इलेक्शन का रुख बदलता हुआ नज़र आने लगा!

चैतन्यः भारतीय राजनीतिक तन्त्र का सड़ाध मारता मलबा, इस फिल्म में जगह जगह पड़ा मिलता है. फिर वो चाहे आत्म हत्या के नाम पर मिलता मुआवज़ा हो, सरकारी अनुदान के रूप में “लाल बहादुर” नलकूप हो, महात्मा गांधी से इन्दिरा गांधी तक के नाम से चलने वाली योजनाओं की मृग मारीचिका हो या राज्य और केन्द्र सरकारों की खीचतान.

मनोजः केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच होने वाली खींचतान और मुद्दों पर असहमति के स्वर के पीछे चल रही घटिया राजनीति को बिना किसी आवरण के दिखाने की कोशिश हुई है।ग़रीबों के हित में चलने वाली योजनाओं का क्रियान्वयन, हमारे शासन तन्त्र में किस प्रकार होता है, इसका व्यवहारिक चित्रण हुआ है । सरकारी योजनाएँ कैसे भ्रष्टाचार का शिकार होती हैं, निर्देशक ने इन सभी का समावेश फिल्म में कर दिया है ।

सोनीः इस पूरे मामले में विधायिका अपने हाथ बांधे हुए सिर्फ एक ही डायलॉग बोलती रही कि "we are waiting for the High court's order ." वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री को दोष देने में लगे हैं. विडम्बना ये कि नत्था जैसों के लिए सरकार के पास कोई योजना थी भी नहीं! जितनी भी योजनाएँ थीं, उसमे नत्था किसी भी केटेगरी में नहीं आता था! मंत्री ने खीज कर कहा कि कोई योजना ही बना दो क्योंकि वो कैसे भी इस सबसे अपना पीछा छुड़ाना चाहता था ! हालाँकि आखिर में एक नत्था कार्ड बनाया भी गया लेकिन उसका फायदा नत्था को ही नहीं मिला!

सलिलः यहाँ एक ओर विधायिका शतरंजी चालों में लिप्त ग्रामीणों के मोहरों से विरोधी को परास्त करने की साज़िश में मग्न दिखाई गई है, जहाँ ज़मीनी समस्याएँ सुलझाने के लिए नहीं, उलझाने और उलझाए रखने के लिए होती हैं. दूसरी ओर बेबस कार्यपालिका, स्थानीय स्तर पर नेताओं के पान की पीक का उगालदान बनी घूमती है, केंद्रीय स्तर पर हर समस्या का निदान विधायिका या न्यायपालिका पर डालकर दार्जिलिंग चाय की चुस्की लेती है और कुछ करने का जोश लिए एक नौजवान को वही विरासत सौंपती है.

अंत में:

चैतन्यः मुझे यह भी खूब जंचा कि आज की भारतीय राजनीति की तरह यह फिल्म भी कोई समाधान प्रस्तुत करते हुए नहीं दिखती है. क्योकिं कोई समाधान है भी नहीं दूर दूर तक. देश के राजनीतिबाजों में अभी इस बात का ही एका नहीं है कि आखिर इस देश की समस्याएँ हैं क्या? एक पुरानी ग्रामीण कहावत है कि “कोई नृप होउ, हमें का हानि” लेकिन लोकतंत्र के इस आज के खेल में नृप पर बहुत कुछ निर्भर करता है, फिल्म देखकर यह अहसास और बढ़ जाता है.

मनोजः फिल्म कोई समाधान तो नहीं सुझाती , लेकिन इस फिल्म के माध्यम से आम नागरिक इतना जरूर समझ सकता है कि उसकी समस्या को समझने वाला आज कोई भी नहीं है, न प्रशासन, न राज्य सरकार, न केन्द्र सरकार। बस सबको मतलब है तो उसके वोटों से...चुनाव के बाद कोई मरे या नारकीय जीवन जीए इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

सोनीः सभी ने इस नत्था के केस में अपनी अपनी दुकान चलाई किसी ने भी ना तो उसे बचाने की कोशिश की और ना ही किसी तरह की मदद की पेशकश की. बस शुरू से लेकर आखिर तक क्या नेता और क्या मंत्री सभी इस खबर में अपने अपने हाथ सेंकते नज़र आए और आखिर में जब नत्था की खबर का चूल्हा बुझ गया, तो सभी निकल पड़े दूसरे चूल्हे की तलाश में, जहाँ अपनी रोटियाँ सेंकी जा सके.

सलिलः ‘राग दरबारी’ और ‘ऐनिमल फार्म’ की श्रृंखला में यह फिल्म भी राजनीति की एक घिनौनी तस्वीर प्रस्तुत करती है. स्थानीय स्तर पर विरोधी राजनैतिक दल से समझौता करना, समस्या को न सुलझाते हुए उसको जातीय रंग देकर अपना उल्लू सीधा करना, हमेशा जीतने वाले दल के साथ चलना और रास्ते में जो भी आए उसे अपहरण एवम् हत्या द्वारा हटा देना, विरोधियों के ख़िलाफ भ्रष्टाचार के कच्चे चिट्ठे को ठंडे बस्ते में डालकर, महौल गर्म होने पर इस्तेमाल करना, कभी कर्ज़ा दिलवाकर वोट लेना और कभी माफी दिलवाकर, समाज को बाँटकर लूटने के लिए कई योजनाएँ चलाना या न चलने वाली योजनाओं की घोषणा करना आदि सब कुछ है इस फिल्म में.
                                                                                                                 [समापन किस्त बुधवार को]
सम्वेदना के स्वर पर पीपली [लाइव]

Saturday, August 21, 2010

पीपली [लाइव]: मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन

अपनी इस श्रृंखला में नारी चरित्रों पर चर्चा के लिए हमने किसी महिला ब्लॉगर को आमंत्रित करने की सोची. जो नाम सबसे पहले दिमाग़ में आया वो था सोनी गर्ग का.. तीखा बोल. जब उन्होंने हमारा कॉनसेप्ट सुना तो बाकी की सारी कड़ियों से जुड़ने की पेशकश की. और आज इस चर्चा में शामिल हैं सोनी गर्ग.

पूरी फिल्म में मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन किया गया है और जमकर छाया हुआ है. अनुशा ने अपने मीडिया अनुभव का भरपूर इस्तेमाल किया है. मीडिया कर्मियों के जार्गन से लेकर, कार्यशैली, गलाकाट स्पर्धा, नैतिकता का निम्नतम स्तर, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा, मुद्दों का दिवालियापन, टीआरपी की होड़, अपने काम से अधिक दूसरा क्या कर रहा है उसपर नज़र, ख़बरों की मैंयूफैक्चरिंग, राजनीतिज्ञों से साँठ गाँठ और जनता की आवाज़ बनने का दिखावा. पूरी फिल्म एक मीडियाकर्मी के कैमेरे से लिखी दास्तान लगती है.

चैतन्यः देश के घटिया टेलिविज़न मीडिया पर जबर्दस्त प्रहार किये हैं इस फिल्म ने, प्रख्यात महिला पत्रकार जो सत्ता के बेहद करीब हैं, पहले तो यह कहकर गाँव की खबरों को तरजीह देने से मना कर देती हैं कि “दिस इज़ नाट माइ फोर्टे” और अगले ही पल टीआरपी की होड़ में कूद पड़ती है, पीपली की एडवंचर ट्रिप पर!
सलिलः इसके पीछे छिपी मानसिकता तो देखिए. इनके हिसाब से गाँव की ख़बरों मे ख़बर बनने जैसी कोई बात ही नहीं है. भले ही ख़बर किसी किसान की आत्महत्या जैसे सम्वेदनशील मुद्दे से जुड़ी हो. क्योंकि इन बातों में इनको कोई थ्रिल नहीं दिखाई देता.
सोनीः बल्कि मैं तो कहूँगी कि एक जोरदार चाँटा जड़ा है इस फिल्म ने उन मिडिया वालों पर जो ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते है ! फिल्म के एक सीन में जब भारत लाइव का एक रिपोर्टर बताता है कि सैफ ने एक लड़की को ‘किस’ किया है तो फ़ौरन उस पर ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने के लिए उस लड़की का इंटरव्यू लेने की बात होती है, न मिले तो उसकी माँ के इंटरव्यू की तैयारी ताकि डिफेन्स में सैफ सामने आए और फिर करीना और फिर कोई और. फिर जाकर एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ बन सके!
मनोजः मीडिया के हथकण्डों को बड़ी ही बारीकी से दिखाया गया है इस फिल्म में । कैसे स्ट्रिंगर से न्यूज उठाई जाती है, कैसे उसे अगड़ी खबर (लीड न्यूज) बनाने की होड़ लगी रहती है, कैसे बाइट्स बनाई जाती हैं, कैसे फुटेज़ तैयार की जाती हैं और कैसे कोई न्यूज़ साधारण होते हुए भी राष्ट्रीय महत्व की बन जाती है. साथ ही कैसे कोई संवेदनशील मुद्दा व विषय भी मीडिया के कैमरे से बचा रहता है, क्योंकि उसमें कोई सनसनी नहीं है, जैसा की सलिल जी ने कहा।… कोई दृश्य जो आप लोगों को याद रह गया हो, या जिसकी आप चर्चा करना चाहेंगे!

चैतन्यः फिल्म के वह सीन बेहतरीन थे, जिसमें लोकल प्रिंट मिडिया के पत्रकार राकेश में वह सम्वेदनशीलता कुनमुनाती दिखायी पड़ती है, परंतु फिल्म साथ-साथ इसका भी एहसास कराती जाती है कि “लोकल प्रिंट मिडिया का पत्रकार, कितनी हसरत भरी निगाह से टेलिविज़न चैनलों के चाकलेटी चेहरों को देखता है! एक अदद माईक और सैटेलाइट छतरी की छाँव के लिये रिरियाता फिरता है वो टेलिविज़न चैनल की तुर्रम खां पत्रकार “नंदिता जी” के पीछे. मैड़म! उसे प्रोफेशनल आउटलुक का जो मतलब समझाती हैं जिसका लब्बो-लुआब हमने तो ऐसे लिया कि, खबर बनाओ, प्राइम टाइम की आंच पर जोर-शोर से पकाओ, बेचो और जेब में माल डालकर दूसरी खबर पकड़ो..आखिर नम्बर वन चैनल और “इनामी जर्नलिस्ट” जो बनना है!
सलिलः राकेश प्रिंट मीडिया का वह मध्यमवर्गीय पत्रकार है जो दिखता तो है ज़मीनी मुद्दों और सरोकारों से जुड़ा, पर सपने देखता है एलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चमक दमक के. लेकिन उसे उसकी जीवित सम्वेदनाओं के कारण अनफ़िट दिखाया गया है. और अंत में उसकी मौत पत्रकारिता की मौत का प्रतीक प्रस्तुत करती है.
सोनीः हालाँकि इस टीआरपी की रेस में एक और रेस भी देखने को मिली, जो थी चैनल के रिपोर्टरों के बीच में ! जहां हर एक रिपोर्टर दूसरे रिपोर्टर को पछाड कर अपनी न्यूज़ आगे करना चाहता है ! जिससे की टीवी पर उसकी न्यूज़ को ज्यादा से ज्यादा फुटेज मिले! इस फिल्म में "भारत लाइव" के "दीपक" तो फिल्म के अंत तक खुद को अपने न्यूज़ चैनल में उम्दा रिपोर्टर दिखाने की कोशिश में लगे रहे ! उनका एक डायलोग है फिल्म के अंत में "भईया न्यूज़ को उतना खिचो जितना उसमे दम है" और फिल्म की शुरुआत में उनके अनुसार इस नत्था की न्यूज़ में दम नहीं था !
मनोजः सही कहा... मीडियाकर्मी नंदिता मलिक, जो एक स्ट्रिंगर के हवाले से आई खबर को राष्ट्रीय मह्त्व का बनाने के लिए नत्था की आत्महत्या के लाइव प्रसारण के लिए सोचती है और राकेश से संपर्क कर पीपली पहुँच जाती है । इस की सूचना विरोधी चैनलों को लगते ही पीपली गाँव मीडिया कर्मियों का गढ़ बन जाता है और फिर शुरु होता है समाचार गढ़े जाने का सिलसिला। समाचार गढ़ने के इस सत्य को फिल्म ने उजागर कर मिडिया कर्मियों की संवेदनहीनता को बखूबी चित्रित किया है और जब नत्था की तथाकथित आत्महत्या का लाइव प्रसारण थमता है, तो किस कदर गाँव में अपने पीछे गंदगी के ढ़ेर छोड़ चले जाते हैं, फिर किसी नई लीड के चक्कर में । फिल्म में आज के निजी मिडिया चैनल्स की कार्यपद्धति पर सटीक व्यंग्य है।

चैतन्यः मुझे तो फिल्म में कोई व्यंग्य नहीं लगा बल्कि ऐसा ही लगा जैसे कोई वास्तविक न्यूज़ टेलिविज़न देख रहा हूं. कोई नत्था के कपड़ों को लेकर अपनी एक्स्क्लूसिव रिपोर्ट दे रहा था तो कोई नत्था के मल-मूत्र की मनोवैज्ञानिक चर्चा कर रहा था. कोई महिलाओं को एकत्र कर, उनसे भूत-पिशाचों के स्वांग करवा कर एक्स्क्लूसिव रिपोर्ट तैयार कर रहा है.
सलिलः हा! हा!! हा!!! ये तो मीडिया का दिवालियापन है.
सोनीः फिल्म की ब्रेकिंग न्यूज़ थी "नत्था आत्महत्या करने वाला है" अब सिर्फ इस एक लाइन को तो पूरी फिल्म में किसी चालीसा की तरह जपा नहीं जा सकता था, इसलिए नए नए मसाले डाले गए! मसलन नत्था से जुड़े हर शख्स को ज़बर्दस्ती दिखाया गया. उसके बचपन के साथी जिनके साथ वो चिलम पीता था! नत्था की जोरू, जिससे जब भी किसी रिपोर्टर ने बात करनी चाही तो उसने उसे तबियत से हड़का दिया! नत्था की माँ जिसे अपने कैमरे में कैद करने से पहले रिपोर्टर को उसे बीडी पिलानी पड़ती थी! ये सब वो मसाले थे जो खुद भी नत्था के साथ हीरो बन गए ! या यूँ कहें कि जिन्होंने नत्था की न्यूज़ को बढाने में मदद की! और तो और फिल्म के आखिर में जब नत्था गायब हुआ तो उसका मल भी दर्शकों को दिखाया गया!
मनोजः चलो व्यंग्य न सही पर इस बात का तो पता ही चलता है कि हमारे चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल्स के पास खबरों कि कितनी कमी है, और इस बात का हास्यास्पद खुलासा तब होता है जब नत्था के गायब होने पर मीडिया कर्मियों को उसके मल-मूत्र का विश्लेषण करने की नौबत आ जाती है।नत्था के ग़ायब होने पर जो एस.एम.एस. पोल करवाई गई उसके नतीजे या जवाबके ऑप्शन याद हैं किसी को..
सोनीः नत्था गायब हुआ है या मर गया है, और जो सबसे अनोखा कारण जो लगभग हर बेवकूफी भरी खबर में सामने आता है वो था इसमें अमेरिका का हाथ होना. ये थे इन चैनल वालों के बुद्धि प्रदर्शन! लेकिन जो सबसे बड़ी कमअक्ली का प्रदर्शन था वो ये की जब नत्था की तथाकथित लाश मिली तब उस लाश के हाथ के ब्रेसलेट पर किसी कैमरे की नज़र नहीं पड़ी! ये थी वो समझदार(?) मीडिया!

आख़िरी मे:

सलिलः मुझे तो लगा कि मैं आज तक मंच पर समाचार देखता था, लेकिन नेपथ्य का दृश्य कितना घिनौना है यह इस फिल्म में दिखाई दिया.
सोनीः नत्था के न्यूज़ में आते ही चैनल वालों ने जो मेला नत्था के घर पर लगाया उससे उस घर की प्राइवेसी ख़त्म हो गयी! और ये खीझ नत्था की जोरू ने कई बार दिखाई! जब मीडिया ने एस.एम.एस. पोल द्वारा लोगों की राय दिखा दी, तो एक सबसे बड़ी कमी जो रही वो थी सट्टेबाजी की, वो भी दिखा ही देते! अक्सर ऐसी खबरों पर सट्टा जल्दी लगता है!
मनोज: पर हकीकत तो यही है कि जहाँ सम्वेदनाएँ जड़ हो चुकी हों और पैसा ही मूलभूत सत्य हो गया हो, वहाँ कुछ किया भी जाए तो क्या?
चैतन्य: दरअसल मीडिया है कहाँ? जो दिखता है वह व्यावसायिक प्रतिष्ठानों या सत्ता के दलालों की दुकानें भर है. फिक्की-केपीएमजी की 2008 की एक रिपोर्ट के अनुसार रु.240.50 बिलियन का बाज़ार है, भारतीय टेलीविज़न मीडिया और यह लगभग 14% सालाना रफ्तार से बड़ रहा है. बहसबाजों के इस हूजूम में यह फिल्म भी अगर माल कमा कर निकल जाये और किसी के कान पर जूं तक न रेंगे, तो यकीन जानिए कि भारतीय समाज का बन्ध्याकरण हो चुका है.

यह फिल्म कई मायनों में रामगोपाल वर्मा की फिल्म “रण”या आर.वाल्की की फिल्म “पा”में टेलीविज़न मीडिया के चित्रण को पीछे छोड़ती लगती है.फिल्म में व्यंग्य को ढाल बनाकर मीडिया को जिस तरह लतियाया गया है,वो अनुशा रिज़वी के लिये ही नहीं हम सभी के लिये भी कैथार्टिक अनुभव था.
(अगला अंक मंगलवार सुबहः पीपली लाइव एक राजनैतिक दस्तावेज़)

सम्वेदना के स्वर पर पीपली लाइवः
 1. मदारी
 2. ख़बरों का आतंक
 3. ढोंगी बाबा, लालची मीडिया और लाचार जनता
 4. चौथे खम्बे में लगी दीमक भाग 1
 5. चौथे खम्बे में लगी दीमक भाग 2
 6. मुर्ग़ा लड़ाई
 7. किरण खेर
 8. एसएमएस की खोलो पोल
 9. चौथे खम्बे की ढपोरशंखी
10. धोनी की शादी में दीवाना मीडिया

Thursday, August 19, 2010

पीपली [लाइव]

बताया जाता है कि यह फिल्म अनुशा रिज़वी ने 2004 में लिखी थी, जब वो NDTV के लिए काम करती थीं. उनकी स्क्रिप्ट ‘द फॉलेन’ आमिर ख़ान को बहुत पसंद आई, मगर वो तब मंगल पाण्डे के निर्माण में व्यस्त थे.इसलिए यह फिल्म उस समय टल गई. छः वर्षों का अंतराल फिल्म को और सामयिक बना गया है, क्योंकि जो समस्याएँ या विचार इस फिल्म के माध्यम से रखे गए हैं, वो आज बड़ी शिद्दत से समाज में महसूस किए जा रहे हैं. यह फिल्म आपसे बात करती है, मगर भाषण नहीं देती. समस्याएँ दिखाती है, मगर हल नहीं सुझाती, क्योंकि हल सुझाना फिल्मकार का काम नहीं. और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी है.


फिल्म के प्रोमोज़ देखकर हमने यानि चैतन्य,सलिल और मनोज ने एक बार फिर एक साथ यह फिल्म देखने का मन बनाया ताकि फिल्म राजनीति पर की गई हमारी परिचर्चा की तर्ज़ पर, इस फिल्म की भी समीक्षा की जाए. फिल्म ग्रामीण भारत का आईना, एक राजनैतिक दस्तावेज़ या फिर कुकुरमुत्ते की तरह फैलती सैटेलाईट छतरी तले मीडिया का मल उत्सर्जन कहा जा सकता है. किंतु इन सबसे आगे जाकर यह फिल्म एक दस्तावेज़ है, एक जाँच समिति की रिपोर्ट की तरह, जिसके मुखिया हैं आमिर ख़ान.

भारत डेड - इण्डिया अलाइवः

सलिलः नत्था और बुधिया दो भाई, कभी गाँजा, कभी कच्ची शराब के नशे में, अपनी बेरोज़गारी की ज़िंदगी और गिरवी रखी ज़मीन, तीन बच्चों की परवरिश और अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह चुराते, पूरे ग्रामीण परिवेश का प्रतिनिधित्व करते हैं.

चैतन्यः ग्रामीण परिवेश नहीं सलिल भाई, भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. फिल्म भारत और इंडिया के विभाजन को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है.और इस फिल्म में यह विभाजन भी खुल कर दिखाई भी देता है. नत्था और बुधिया का पीपली गाँव दिमाग के एक हिस्से में ठहर सा जाता है, भारत बनकर. उसके उलट इंडिया अपने अभिजात्य से भरपूर दार्जिलिंग चाय की चुस्कियाँ लगाता, निश्चिन्त सा लगता यह कहता लगता है कि “आल इज़ वैल!”

मनोजः आप दोनों की बातों के अतिरिक्त भी एक अलग पहलू मुझे दिखा. फिल्म देखते हुए मुझे प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास याद आने लगे । विशेषत: कफन कहानी ।आश्चर्य तो तब होता है कि प्रेमचंद के साहित्य में तो 20 वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में किसान और गरीबों की दशा का यथार्थपरक चित्रण मिलता है, लेकिन आज 21वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भी किसान और गाँवों में बसने वाले किसानों की दशा में कोई अंतर नहीं आया है ।

सलिलः बिल्कुल सही. दरसल भारत की ज़मीनी समस्या ही इस फिल्म की बुनियाद है. ज़मीनें गिरवी, कर्ज़ चुकाने को आय का साधन नहीं. और सरकार अपना दायित्व कृषि मंत्रालय और नौकरशाह पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेती है.

मनोजः आज भारत में प्रति वर्ष कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि पर करीब पंद्रह हज़ार करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन किसान की दशा दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है । उसमें कोई अंतर नहीं आया। फिल्म में इन सभी मुद्दों के लिए जिम्मेवार तत्वों जैसे वोट की राजनीति, सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता आदि का बेहतरीन चित्रण हुआ है.

चैतन्यः फिल्म कई बार यह बात उभारनें में कामयाब होती है कि भारत की 70% आबादी किस क़दर बदतर हालात में गुजर बसर कर रही है. एक पात्र खीझ कर कहता है “बीज और खाद के लिये विदेशी कम्पनियों पर निर्भर हैं और वर्षा के लिये इन्द्र देवता पर.” और वो बीज भी आयातित जिसका ठेका कृषि मंत्री के विदेशी मित्र के पास है.

मनोजः 20वीं शताब्दी का किसान साहूकार के कर्ज से दबा था, तो 21वीं सदी का किसान बैंक के कर्ज से । कर्ज से मुक्ति के लिए किसान किस तरह से भूमिहीन होता है और मुआवजे के रूप में एक लाख रुपए हासिल करने के लिए नत्था को उसका बड़ा भाई बुधिया आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है, ताकि एवज में उसके बच्चों का भविष्य संवर सके ।

सलिलः जब खेती कर नहीं सकता किसान. तो ऐसे में कोई भी आस, दो पैसे की, उन्हें कुछ भी करने को सहर्ष तैयार कर लेती है, यहाँ तक कि आत्महत्या भी, क्योंकि ऐसा उन्होंने सुन रखा है कि इससे उन्हें एक लाख रुपये मिलेंगे. यह एक लाख रुपये उनके सपने पूरे कर सकता है, यह सोच उनकी आँखों में चमक पैदा करती है, लेकिन इसके लिए उसे जान देनी होगी, इस बात से वह चमक ज़रा भी धुंधली नहीं होती. अब इससे मार्मिक घटना तो कभी देखी भी नहीं.

चैतन्यः अरे मार्मिक और करूणा वाली बात छोड़ो सलिल भाई. भारत की दुर्दशा का इससे सटीक चित्रण और क्या होगा कि इंडिया का एक टेलीविज़न पत्रकार अपने कैमरामैन को डाटतें हुये सुबह शौच को जाते हुए ग्रामीणों की तसवीरें खीचनें के लिये उकसाते हुए कहता है कि “अबे, खींच इनकी तस्वीरें, 70% भारत इसी तरह खुले में टट्टी करने जाता है.”

सलिलः नत्था और बुधिया तो हो गए मुख्य चरित्र, लेकिन वह किसान अपनी अलग पहचान रखता है जो चुपचाप बंजर,पथरीली ज़मीन पर फावड़ा चलाता रहता है और वहीं दम तोड़ देता है. सम्वेदनहीनता की हद देखिए कि किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता.

चैतन्यः लोगों की भावनाएँ भी गाँव की ज़मीन की तरह बंजर हो चुकी हैं. और वो फिल्म में एकदम साफ साफ फिल्माया गया है.

मनोज: एक किसान मिट्टी खोदता रहता है, मानो उसका जीवन बस इसी काम के लिए बना है, जीवन के दूसरे रंग और विषय भी हैं, इस सबसे बेखबर वह मिट्टी खोदता रहता है और उसी गड्ढे में दम तोड़ देता है । मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में ही समा जाना, कितना नियतिवादी था वह। किसी को इसकी कोई परवाह नहीं । बस उसके मरने से रिपोर्टर राकेश कुछ द्रवित होता है ।

सलिलः नत्था द्वारा आत्महत्या की बात पर गाँव में लगे मेले से कई बेरोज़गारों को कमाने का अवसर मिलता है और वो यह भूल जाते हैं कि यह मेला किसी की मौत का जश्न मनाने के लिए लगा है. आपको क्या लगता है कि निर्देशक ने कहीं स्पष्ट किया है कि यह भारत और इण्डिया की लड़ाई का क्या नतीजा हो सकता है?

चैतन्यः भारत और इंडिया कि इस लड़ाई का अंजाम क्या हो रहा है उसकी मिसाल है फिल्म का अंतिम दृष्य जिसमें धूल मिट्टी से सना-पुता, नत्था गुड़गाँव की किसी बहुमंज़िला इमारत में नींव खोदते हुए जब थक कर वहीं मिट्टी के ढेर पर बैठ जाता है तो उसकी बेबस आंखे बींध जाती हैं भीतर तक, और यदि आपके अन्दर अभी भी कुछ मनुष्यत्व बचा है तो एक बेचैन कर देनी वाली हूक सी उठती है, मन में भीतर कहीं.

मनोज: भारत की तस्वीर धुंधली है पीपली की तरह, वहीं इंडिया की तस्वीर चुंधिया देने वाली रोशनी में नहाई हुई सी, गुड़गाँव की शीशे वाली बिल्डिंग के जैसी। इंडिया भारत की इस धुंधली तसवीर से पैसा कमाता है और खुद वातानुकूलित भवनों में ऐश्वर्य के सुख भोगता है ।

सलिलः अंत में किसान का गाँव से शहर की ओर पलायन. कब से सुनते आए हैं कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है, यह फिल्म बताती है कि गाँव में बस आत्माएँ ही बसती हैं. भटकती आत्माएँ!! फिल्म ने अंत में सरकारी आँकड़े दिखाए हैं कि पिछले दशक में 80 लाख किसान गाँव से पलायन कर चुके हैं.

चैतन्यः कामनवैल्थ खेल करा कर देश के हुक्मरान देश की जो तस्वीर बदलनें का दावा कर रहें हैं उनपर गोबर की वर्षा कर रही है यह फिल्म पीपली लाइव.

(समीक्षा का अगला अंकः पीपली लाइव में मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन
शनिवार सुबह)

                          सम्वेदना के स्वर पर पीपली लाईवः

                         3. BPL बनाम IPL

Tuesday, August 17, 2010

कुछ और चाँद!!

आज 18 अगस्त को, गुलज़ार साहब का जन्मदिन हैं,  हैप्पी बर्थ-डे सर!
MATCH
जाने कब हैं मैच की सब तारीख़ें पक्की
जाने किसके बीच मैच खेला जाएगा
टॉस किया है किसने ये आकाश की जानिब चाँद का सिक्का
गिरे ज़मीं पर तभी तो कुछ मालूम पड़ेगा!

KEY- HOLE
रात के स्याह अंधेरों के पीछे क्या है
इक दूर तलक ख़ामोश ख़लाओं के उस पार कहीं
दरवाज़ा है अंधियारे का, चट्ख़नी लगाकर बंद किया.
की होल पे आज इस चाँद के आँख जमाकर देखो
हमसा कोई दिखता है उस पार कहीं?

DOWRY
ब्याह बेटी का रचाने,
या अदा करने को कर्जा कोई
रात इस आसमाँ के गुल्लक में
चाँद के सिक्के जमा करती है
और फिर दिन के निकलते ही वो
भाग जाती है परबतों के परे.
कितना ग़ुस्सैल है सूरज
वो छीन लेगा सब.


video


OPENER
बीच समंदर प्यासा कोई
ऐसे ही मैं
हाथ में लेकर कोक की बोतल
ढूंड रहा था
कोई ओपनर मिल जाये तो बोतल खोलूं
कोक हलक में डाल के अपनी प्यास बुझाऊँ.
टेढा चाँद जो देखा मैंने दूर फ़लक पर
उससे ही फिर कोक की बोतल खोल के मैंने
तपती गर्मी से कल रात थी प्यास बुझाई.

BRIDE
रात की दुल्हन,
रोटी बेलने बैठी जब ससुराल में तब तो
आड़ी तिरछी, आधी चौथाई सी
और टेढ़ी मेढी सी
जितनी रोटियाँ बेलीं उसने, सब बेकार.
पंदरह दिन की एक मुसलसल प्रैक्टिस के फिर बाद ही जाकर
चाँद की पूरी गोल सी रोटी बेल सकी वो.

(विडियो साभारः कोकाकोला विज्ञापन, नेट पर प्राप्त)

Saturday, August 14, 2010

स्वतंत्रता दिवस की डिस्काउंट सेल?

पत्नी ने आज सुबह ही निश्चित तौर पर यह घोषणा कर दी कि इस बार 15अगस्त “रविवार” को है. (रविवार पर ज़ोर देने का मतलब छुटटी का दिन) इसलिए हर साल की तरह 15 अगस्त को हम सब आपके साथ आपके आफिस ध्वजारोहण समारोह में नहीं जायेंगे, बल्कि “बिग बाज़ार” की मेगा डिस्काउंट सेल से, वो सभी चीज़े लेकर आयेंगे जिनके प्रस्ताव साल भर आपके समक्ष प्रस्तुत किए जाते रहे हैं. परिवार की संसद में उन सभी सामानों की खरीद पर आम सहमति भी बनी. परंतु सरकारी योजनाओं की तरह, तात्कालिक व्यस्तताओं का बहाना बनाकर, उन सभी को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया.

बेटी ने मुझे मेरे अल्पमत में आने का अह्सास कराते हुए,माँ के पक्ष में अपना मत डालते हुए कहा, याद है पापा! पिछली बार रिपब्लिक डे पर जब हम बिग बाज़ार गये थे तो इतनी अधिक भीड़ हो चुकी थी कि एंट्री अगले तीन घंटे के लिये बन्द कर दी गई थी और हम लोग बस मॉल में ही घूम फिर कर लौट आये थे. इस बार कोई रिस्क नहीं लिया जा सकता, बस!” और ये ‘बस’ का हथौड़ा काफी था यह समझाने के लिए कि फैसला सुना दिया गया है.

खैर! इस बातचीत में बेटी ने इंडिपैन्डैंस डे और रिपब्लिक डे का जो घालमेल कर दिया था, उसने मुझे एक बीती बात याद दिला दी. बात तब की है, जब राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद, पहली बार लाल किले से 15 अगस्त का भाषण दिया था और पूरे भाषण में वह बार-बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के बजाए गणतंत्र दिवस ही कहते रहे. देश के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार से हुई इस भूल को लेकर तब मैं अपनी कक्षा के मित्रों से हफ्तों बहस करता रहा था.

लेकिन अब सोचता हूँ कि बेकार ही थी वो बहस, कम से आज के समय में तो बिल्कुल बेमानी! 15 अगस्त हो या 26 जनवरी, ये दिन आज बस इसीलिए याद किए जाते हैं क्योंकि ये छुट्टी के दिन हैं, राष्ट्रीय छुट्टी के दिन. और अगर भूल से वह दिन रविवार का हो गया,जैसा कि इस साल, तो कई लोग तो कोसते हुए भी मिल जाते हैं, कि छुट्टी मारी गयी.

देखा जाये तो, जो आज़ादी हमने पाई है, उसमें आजादी का ले दे कर आज एक ही मतलब रह गया है – “आर्थिक आजादी”. अर्थशास्त्री कहते हैं “बाज़ार” भगवान है! वो सब कुछ संतुलित कर देता है, देर-सबेर बाज़ार की शक्तियाँ सबके साथ न्याय करती हैं. अबतक बेवकूफ भारतीय यही समझते रहे कि उनकी किस्मत विधाता लिखता है, इस बात से अनजान कि 21वीं सदी का भगवान तो बाज़ार है और यह “बाज़ार” ही तो है जो डिसाइड करता है, हम सबकी हैसियत.

मुझे अपनी हालत अब बहुत दयनीय सी लगने लगी, यह सोच कर कि बाज़ारवाद के इस अश्वमेघ-यज्ञ द्वारा, देश को सम्पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता दिलवाने का जो महति प्रयास “मुख्य पुरोहित मनमोहन सिंह” कर रहे हैं, उसकी एक आहुति ने मेरे पूरे परिवार को चुपचाप अपनी गिरफ्त में ले लिया और हम यहाँ “सम्वेदना के स्वर” पर भारत-इंडिया का फलसफा ही बाँचते रह गये! चिराग तले अन्धेरा वाली उक्ति याद हो आयी और मन बहुत विचलित सा हो गया. सोचने लगा कि कहीं कोई जोश ही नहीं रहा स्वतंत्रता दिवस का.

इसके उलट दूसरा नज़ारा “वेलेंटाइन डे” का है. देश के कालिजों और विश्वविद्यालयों में युवा वर्ग को “वेलेंटाइन डे” का कितना बेताबी से इंतज़ार करता रहता है. सेलेब्रेशन का आलम ये कि इस दिन बाज़ार से सारे गुलाब के फूल नदारद.और तो और बड़े बुजुर्ग भी इस दिन का नाम लेकर चुटकियाते देखे जाते हैं. तो क्या “वेलेंटाइन डे” से भी गयी गुजरी बात है, स्वतंत्रता दिवस?

लगता तो यही है कि अब स्वतंत्रता दिवस की पहचान बिग बाज़ार की डिस्काउंट सेल से ही होगी? सच भी है! कॉमनवेल्थ खेलों का भ्रष्टाचार हो, अवैध खनन में लुटती देश की सम्पदा हो, नरेगा-मरेगा के घोटाले हों या विदेशी कम्पनियों का बेहतर रिटर्न के लालच में देश में हो रहा निवेश हो. कुल मिलाकर देश की डिस्काउंट सेल ही तो लगी है...हर रोज़, हर ओर...

आइये स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर महा-डिस्काउंट-सेल का आनन्द लें, इस मनमोहनी बिग बाज़ार में...गणतंत्र दिवस! नहीं नहीं !! स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!!

Tuesday, August 10, 2010

एक और भूली बिसरी ग़ज़ल

हमारी एक भूली बिसरी ग़ज़ल की अगली कड़ी के रूप में यह ग़ज़ल आपकी नज़र.
एक बार पुनः समर्पित है यह गज़ल जनाब तुफ़ैल चतुर्वेदी को,जिनकी प्रेरणा से इस ग़ज़ल का जन्म हुआ.


बीमार से मिलने कोई बीमार तो आए,
अच्छा भला नहीं, न सही, यार तो आए.

ता-उम्र सो सका न मैं बिस्तर पे गुलों के,
अब नींद आ रही है, कोई ख़ार तो आए.

सूती के सिले कपड़ों में कितनी हसीन थी,
ख़्वाहिश है, वो रेशम कभी उतार तो आए.

ईमान अपना बेचने निकला है वो घर से
बाज़ार मिल गया है, ख़रीदार तो आए.

ठंडे घरों में करता पसीने का वो हिसाब,
तपती सड़क पे लम्हा इक गुज़ार तो आए.

मेहमान बनके आई थी जो, बस के रह गई
अल्लाह! ये ख़िज़ाँ टले, बहार तो आए.

दहशत के खेल में हुई क़ुरबान ज़िंदगी
जल्लाद कई, कोई जाँनिसार तो आए.

कब से खड़े हैं राह में ‘सम्वेदना के स्वर’
दिल से जो सुन सके, कोई दिलदार तो आए.

Saturday, August 7, 2010

हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई??

कितनी आसानी से आए दिन, बहुसंख्यक शब्द का प्रयोग, हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये किया जाता है और अल्प संख्यक शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर मुस्लिम धर्म को मानने वालों के लिये किया जाता है! यह प्रयोग यही दिखाता है कि धार्मिक पहचान हमारे मन-मस्तिष्क में कितनी गहरी पैठी हुई है. वरना हम कहते धार्मिक बहुसंख्यक या धार्मिक अल्पसंख्यक.

मनीषियों का तर्क है कि "यह मत भूलिए कि हम हिन्दू हैं और हम हर धर्म का आदर करते हैं और यह सहिष्णुता ही हमारी पहचान है जो हमें औरों से अलग पहचान देती है!"

बस यही मनोविज्ञान हमारी समस्या है, हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का फलसफा समझाने वाले अंत में अपने तथाकथित धर्म की विशिष्टता बताने का मोह नहीं छोड़ पाते. यही बात किसी मुस्लिम धर्म को मानने वाले ने कही होती तो इस तरह होती शायद, "यह मत भूलिए कि हम मुस्लिम हैं और कुरान पाक मानवता का पाठ पढ़ाती है, हमारी यही बात हमें औरों से अलग पहचान देती है !"

एकता और भाईचारे की बात करते हुए कितनी खूबसूरती से अलग हो गये दोनों.

इस विषय में ओशो के विचार बिल्कुल व्यावहारिक हैं,और समस्या के मूल पर आघात करते हैं. तनिक ध्यान से सुनें, ओशो कहते हैं:

"हिन्दू मुस्लिम को भाई-भाई समझाने से यह धार्मिक भेदभाव समाप्त नहीं होंगे. ऐसा करने से कुछ फायदा तो हुआ नहीं है, वरन नुकसान अधिक हुआ है.

अगर हिदुस्तान के समझदार नेता हिन्दु और मुसलमान को भाई–भाई होना न समझाते तो शायद पार्टीशन न होता. उसके कारण हैं! जब हमने पचास साल तक निरंतर कहा कि हिन्दु-मुसलमान भाई-भाई हैं. फिर भी हिन्दु-मुसलमान साथ-साथ रहने को राजी नहीं हुए तो भाई-भाई के तर्क ने लोगों को ख्याल दिया कि अगर दो भाई साथ न रह सकें, तो सम्पत्ति का बटंवारा कर लेना चाहिये. पार्टीशन, दो भाईयों के बीच झगड़े का आखिरी निबटारा है.

अगर गांधी जी ने हिन्दुस्तान को मुसलमान-हिन्दु के भाई-भाई की शिक्षा न दी होती, तो पार्टीशन का लॉज़िक ख्याल में भी नहीं आ सकता था. असल में बँटवारा सदा, दो भाईयों के बीच होता है. पार्टीशन होने के पहले दोनों भाई हैं, इसकी हवा पैदा होनी जरुरी थी. एक दफा यह ख्याल पैदा हो गया कि दोनों सगे भाई हैं और साथ रहने को मजबूर हैं, तो स्वाभाविक लॉजिकल कनक्लूज़न, जो तार्किक निष्कर्ष था वह हुआ कि फिर ठीक है, बँटवारा कर लें. जैसे दो भाई लड़ते हैं और बटंवारा कर लेते हैं. वैसे ही फिर गांधी जी को या किसी और को कहने का उपाय न रहा कि बँटवारा न होने देंगे.

हम कभी नहीं कहते कि ईसाई ईसाई भाई भाई हैं. हम ये क्यों कहते हैं कि मुसलमान–हिन्दु भाई-भाई हैं. यह “भाई-भाई” का कहना जो है, खतरे की सूचना है. इससे पता चलना शुरु हो गया कि झगड़ा खड़ा है.... "

इसका हल है कि हम प्रेम करें. प्रेम का पाठ पढ़ाएँ, प्रेम का पाठ पढ़ें. क्योंकि, प्रेम शुरु पहले हो जाता है, पता पीछे चलता है - कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान है. और जब एक बार प्रेम शुरु हो जाए तो हिन्दू-मुसलमान दो कौड़ी की बातें हैं. उनको आसानी से फेंका जा सकता है. जहा प्रेम नहीं है वहीं इन बातों का मतलब है.

Thursday, August 5, 2010

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो पर हमारी पहली पोस्ट हमने शुरूआती के दौर में लिखी थी.उसे पसंद भी किया गया. उसी कड़ी में एक और पोस्ट एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत है.
आज आधुनिक कविता में कितने प्रयोग हो रहे हैं,कविता के फॉर्मेट से लेकर भाषाई प्रयोग तक. गुलज़ार साहब ने अपनी एक नज़्मों की सीरीज़ के उंवान ही अंगरेज़ी में दे रखे हैं. उनका कहना है कि फिल्मों की भाषा अंगरेज़ी होने की वज़ह से उनके सोच की भाषा भी अंगरेज़ी हो गई है, लिहाजा कुछ ख़याल वो उसी ज़ुबान में सोचते हैं. और फिर अंगरेज़ी के कई लफ्ज़ उन्होंने अपनी शायरी में यों पिरो दिए हैं कि कोई जो दूसरा लिखे तो दूसरा ही लगे.
लेकिन दो अलग अलग भाषाओं को मिलाकर, एक ही बहर में रखते हुए, किसी ने शायरी करने का हौसला दिखाया है तो वो हैं अमीर खुसरो. मैं साहित्य का विद्यार्थी नहीं, इसलिए मैंने नहीं देखा यह प्रयोग कहीं भी. अमीर खुसरो ने लिखा – फ़ारसी और हिंदवी को मिलाकर. क़ाफ़िया, रदीफ़ और बहर की रुकावट के परे.
आज अपने कान को हाथ लगाते हुए और उस महन आत्मा से माफ़ी की दरख़्वास्त करते हुए, मैंने भी एक मामूली सी कोशिश की है कि उस शायरी को अपने अल्फ़ाज़ का जामा पहना सकूँ.
इसे तर्जुमा न समझकर उस अज़ीम शायर को मेरी श्रद्धांजलि समझें:



ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
दुराये नैना बनाये बतियां
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां

मेरी बदहाली से क्यों तुम बेखबर रहते हो यार
क्यों चुराते हो नज़र और क्यों बनाते बात हो
अब सबर भी हद से बाहर हो गया है मेरी जान
अपनी छाती से लगा लो तब ही कोई बात हो.
%%%
शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां

हिज्र की रातें तो ज़ुल्फों से भी काली आज हैं
दिन विसाल-ए-यार का है ज़िंदगी सा मुख्तसर
देख ना पाऊँ जो अपने प्यारे से मह्बूब को
कैसे काटूँ काले डँसते लम्हे सारी रात भर.
%%%
यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं,
किसे पडी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां

आज दिल पे हाय दो आँखों ने जादू डालकर
सैकड़ों धोखे दिए और लूट ले गये सारा चैन
फिक्र किसको है मेरी, कोई तो जाकर कह भी दे
मेरे उस मह्बूब को, मेरे तड़पते दिल के बैन.
%%%
चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान
हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां

शमाँ सा जलता हुआ, हैरान ज़र्रे की तरह
मैं भटकता हूँ यहाँ पर इश्क में जलता हुआ
नींद आँखों मे नहीं और खो गया है सारा चैन
तुम नहीं आए, तुम्हारा खत भी ना आया मुआ.

%%%

बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, गरीब खुसरौ
सपेट मन के, वराये राखूं
जो जाये पांव, पिया के खटियां

उस विसाल-ए-यार के एक रोज़ की खातिर सनम
जिसने खुसरो को लुभाया है न जाने कितने साल
दिल को अपने क़ाबू में रखा है इस उम्मीद  पे
पाँव में जाऊँगा उनकी सेज पर, होगा विसाल.

Tuesday, August 3, 2010

सुरेश चिपलूनकर की ईवीएम घोटाला पोस्ट पर एक ब्लॉग चर्चा :

अभी पीछे सुरेश चिपलूनकर जी की एक पोस्ट पढकर पिछले लोक सभा चुनाव परिणामों पर हमारी चर्चा दुबारा से सिर उठाने लगी. मैं और सलिल भाई तो चर्चा कर ही रहे थे कि मनोज भारती जी भी इसमें शामिल हो गए. इन ईवीएम को लेकर कई शंकाएँ हम सबके मन में थीं. अब जो बातों ने सिलसिला पकड़ा तो फिर दूर तक चला ये दौर. आइए आप भी शामिल होइए इस बहस में:

मनोजः 2009 लोकसभा के चुनाव परिणामों और पहले की भविष्यवाणियों में कोई तालमेल नहीं था. अब ऐसे में हारने वाली पार्टी तो कहेगी ही कि ये सब ग़लत हुआ है, जैसा हर बार होता है.

चैतन्यः याद है, पिछले लोकसभा चुनाव के आश्चर्यजनक परिणामों ने सभी चुनावी सर्वेक्षणों और भविष्यवाणियों को धाराशायी कर दिया. सर्वेक्षण और भविष्यवाणियाँ गलत हो सकती हैं. परन्तु इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर, सन्देह बरकरार है. सुरेश चिपलूनकर जी की ताजा पोस्ट और चुनावी पंडित जी.वी.एल. नरसिम्ह राव की किताब “डेमोक्रेसी एट रिस्क” बहुत गम्भीर सवाल खड़े करती है.

सलिलः लेकिन दुनिया में और भी देश हैं जो इस मशीन का इस्तेमाल कर रहे हैं. वहाँ क्यों नहीं उठी ऐसी बात?

चैतन्यः मुझे नहीं पता कि दुनिया में और किस देश में यह मशीन इस्तेमाल की जाती है. हाँ, विश्व के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण लोकतंत्र अमरिका तथा इंगलैंड आज भी पेपर वोटिंग में ही विश्वास रहते हैं तथा विकसित देश होने के बावज़ूद ईवीएम के इस्तेमाल से बचते रहे हैं. हालैंड तथा कनाडा जैसे देशों ने ईवीएम का प्रारम्भ मे प्रयोग किया परंतु बाद में विवादों के चलते इनका प्रयोग त्याग दिया गया.

मनोजः भारत में बूथ कैप्चरिंग, बोगस वोटिंग बात आम है, ऐसा हमेशा होता रहा है.

चैतन्यः आप ठीक कह रहे हैं. हमारे चुनावों की यह परम्परा रही है. दरअसल भारतीय राजनीति सत्तारुढ दल को बहुत अधिक ताकत दे देती है. ऐसे में किसी पार्टी विशेष द्वारा ईवीएम के गलत इस्तेमाल से इंकार नहीं किया जा सकता. इस व्यवस्था का फूल-प्रूफ और पारदर्शी होना नितांत आवश्यक है.

सलिलः वो कैसे?

चैतन्यः एक थ्योरी के अनुसार रिमोट कंट्रोल से ईवीएम डाटा चुराया जा सकता है तथा फिर उस डाटा को अपने अनुसार संशोधित करके, पुन: मशीन में लोड किया जा सकता है. मोबाइल फोन में ब्लूटूथ टैक्नोलोजी का प्रयोग करने वाले इस तरह की सम्भावानाओं से भलीभांति परिचित होंगे.

मनोजः क्या बात करते हैं आप, चैतन्य जी! कहाँ मोबाईल फोन और कहाँ ईवीएम!

चैतन्यः इसे आप वैज्ञानिक धांधली कह सकते हैं. इस अवधारणा के अनुसार मशीन के माइक्रोचिप में एम्बेडेड ट्रान्समीटर और रिसीवर लगाकर प्रत्येक माइक्रोचिप को रिमोट एक्सेस से सक्रिय किया जा सकता है. एक माइक्रोचिप में लाखों छोटे सर्किट होते हैं और इन सर्किट्स के बीच एम्बेडिड सर्किट को इस तरह फिट कर देना या उसका दोहरा उपयोगी होना बहुत ही आसान है, जिसका कभी भी पता ही नहीं चल सकता.

सलिलः एक मिनट... आपकी बात समझ में आ रही है. लेकिन किसी बाहरी सर्किट को मशीन में लगाना और पता न चलना …ज़रा और खुलकर बताइए.

चैतन्यः सुनने में मुश्किल लग सकता है, पर है बिलकुल आसान. यह एम्बेडिड सर्किट एक निश्चित फ्रीक्वेंसी पर तथा एक निश्चित निर्देश के बाद ही सक्रिय और निष्क्रिय होते हैं. यदि इसका ज्ञान नहीं है तो इनको कभी भी पहचाना नहीं जा सकता.

सलिलः एक उदाहरण देकर समझा सकते हैं यह हेरफेर की प्रक्रिया!

चैतन्यः एक ईवीएम 4500 वोटों को रिकार्ड करने में सक्षम बतायी जाती है और आमतौर पर एक पोलिंग बूथ पर लगभग 1500 वोट होते हैं. अब माना कि एक पोलिंग बूथ पर 50 प्रतिशत वोट पड़े तो कुल 750 वोट हुए.

मनोजः यह तो सीधा गणित है... इसमें हेराफेरी कहाँ हुई...

चैतन्यः सुनिए तो सही… इलेक्ट्रॉनिक हैकिंग के माध्यम से यदि मात्र 50 वोट प्रति ईवीएम किसी एक पार्टी के पक्ष में डाल दिये जायें तो शाहरुख खान की कसम, इस धांधली का पता लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जायेगा.

सलिलः हा,हा! इस तरह कितने वोटों का फेरबदल किया जा सकता है?

चैतन्यः इस तरह एक चुनाव क्षेत्र में लगभग 45000 वोटों की हेराफेरी की जा सकती है. मज़ेदार बात यह है कि प्रति ईवीएम 50 वोटों का हेरफेर भी किसी एक पार्टी से न करके विभिन्न पार्टीयों से कुल 50 वोट लेकर किसी एक पार्टी विशेष के खाते में डाल कर भी किया जा सकता है.

सलिलः अब सवाल यह उठता है कि यह धांधली इतने बड़े स्तर पर कैसे की जा सकती जबकि चुनाव प्रक्रिया में इतने सारे लोग संलग्न होते हैं?

चैतन्यः धांधली इतनी मुश्किल भी नहीं जितनी प्रतीत होती है. इसे प्रामाणिकता देने के लिये पोलिंग बूथ पर वोट डालने से लेकर ईवीएम के उपयुक्त सुरक्षा में चाकचौबन्द करने तक पूरे कर्मकांड किये जा सकते है. क्योंकि असली खेल तो सबसे आखिर में खेला जा सकता है.

मनोजः वो कैसे!!

चैतन्यः इसके लिए नई दिल्ली या न्यूयार्क के किसी वातानुकूलित कमरे में बैठी हैकिंग टीम, उपग्रह द्वारा एक निश्चित फ्रीक्वेंसी तथा कमांड के साथ, एक सिगनल प्रेषित करती है जो माइक्रोचिप को रिसीविंग मोड में ले आता है. आपके मोबाइल के सिम कार्ड की तरह प्रत्येक माइक्रोचिप का एक विशिष्ट आईडी होता है, जिससे उसकी पहचान होती है. बाद में माइक्रोचिप से सारा डाटा हैकिंग टीम अपने कम्पूटर पर लोड कर लेती है. इस डाटा को पार्टी विशेष के पक्ष में संशोधित कर, फिर से ईवीएम में लोड किया जा सकता है. बस हो गया चुनाव!! चैनलों पर अपने अपने पंडित बैठा कर जैसी चाहें समीक्षा करवा लीजिये.

मनोजः मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा!

चैतन्यः कहते हैं कि, यह वैज्ञानिक धांधली इतनी सटीक हो सकती है कि एक-एक वोट का हिसाब अपनी सुविधा अनुसार किया जा सकता है. चुनावों को विवाद से बचाने के लिये विरोधी पक्ष के हितों का भी ध्यान रखा जा सकता है. अपनी पुरानी पोस्ट में सुरेश चिपलूनकर जी ने तो एक पूरा पैटर्न बताया है हारने वालों का.

सलिल : लेकिन लोकसभा के बाद के चुनाव तो फिर पुराने पैटर्न पर ही थे. अभी तेलांगना में टी.आर.एस की जीत भी तो हुयी.

चैतन्यः निहित स्वार्थ की थ्योरी तो यही कहती है कि अगर हो सकता है तो यह सब खेल विश्वस्नीयता के आवरण में ही हो सकता है. यानि बहुत सारे चुनावों के बीच बस एक गड़बड़-झाले वाला चुनाव, बस वही चुनाव जिससे सब कंट्रोल में रहता है.

सलिलः मुझे तो यही सोचकर आश्चर्य होता है कि वह देश जिसमें 77 प्रतिशत जनता बीस रुपये रोज़ पर जिन्दा है वहाँ बेहद गरीब और अशिक्षित मतदाताओं से इलेक्ट्रॉनिक वोट डलवाना ही सबसे बड़े सवाल खड़े करता है.

मनोजः मुझे तो लगने लगा है कि भारतीय बाजारों को विदेशी नियंत्रण में रखने के लिये, देश की राजनीति में खासे निहित स्वार्थ हैं, ऐसे में किसी विशेष पार्टी के सत्तारुढ होने में ईवीएम के गलत इस्तेमाल से इंकार नहीं किया जा सकता.

सलिलः लेकिन कोई तो तरीका होगा जिससे इस पूरे एपिसोड को पारदर्शी बनाया जा सके?

चैतन्यः मैं तो अपनी बुद्धि के अनुसार सुझाव दे सकता हूँ. प्रत्येक ईवीएम मशीन का, कुछ नहीं तो पेन ड्राइव या पोर्टेबल डिस्क ड्राइव में कोई पैसिव बैकअप भी होना चाहिये, जिसे अलग से रखा जाये और विवाद की स्थिति में उसके डाटा और मूल ईवीएम के डाटा का मिलान किया जाये. वोटर नम्बर के साथ प्रत्येक मत को रजिस्टर किया जाये, और चुनाव के बाद यह सभी डाटा इनटरनैट पर उप्लब्ध रहे ताकि अपना पासवर्ड डालकर कोई भी ताकीद कर सके कि उसका वोट कहाँ गया?

मनोजः ये आधी अधूरी व्यव्स्था ही शक डालती है!!

हमारी वार्त्ता तो यहाँ ख़त्म हो गई, लेकिन इस मुद्दे पर हर स्तर पर वार्त्ता की आवश्यकता है. कब तक यह ज़िम्मेदारी सिर्फ सुरेश चिपलूनकर सरीखे लोग ही उठाते रहेंगे. और तब जबकि ख़ुद निर्वाचन आयोग ही इन बातों को नकारने की बात से बचता रहा है.

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