सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Thursday, November 4, 2010

शुभ दीपावली !

हमेशा से रहा है बैर
अच्छे और बुरे का
उजले काले का
अंधेरे और उजाले का
हमेशा से रहा है बैर, देखो!

है अंधेरे की शिकायत रोशनी से
वो डराता है उसे.
रहने नहीं देता उसे कोने में भी
चुपचाप साये में घनी तन्हाई के.
यह भी शिकायत है कि
हरदम मुँह चिढ़ाकर
कर दिया दुश्वार है उसका निकलना.

पर उजाले ने बड़ी मासूमियत से दी सफ़ाई
क्यूँ भला ऐसा करूँगा मैं
मुझे क्या फ़ायदा है ऐसा करने में
ये सब बातें, सभी इलज़ाम मुझपर
बेवज़ह, बेकार, बेबुनियाद हैं सब.
है भरोसा अपनी सच्चाई पे अंधेरे को तो फिर
उसको बुलवाकर,
कहो आँखों में आँखें डालकर मेरी
कहे इलज़ाम सारे सच हैं जो मुझपर लगाए हैं
अंधेरे ने.
मगर मुझको पता है
है कहाँ हिम्मत भला उसमें
कि मेरे सामने आए
कहे सबसे कि सब इलज़ाम सच हैं
उसने जो मुझपर लगाए हैं.

अंधेरा नहीं पाया
उजाला मुस्कुराया
रख गया नन्हा सा इक दीपक वहाँ
जो दे रहा तन्हाँ चुनौती
उस अंधेरे को
जो फैला था जगत में, दस दिशाओं में.

चलो मिलकर
मनाएँ आज हम त्यौहार दीपों का
मिटा दें वो अंधेरा,
जो भरा अंतस में है अपने
मिटाकर उस अंधेरे को ही
होगी सार्थक दीवाली और ये पर्व दीपों का.

Monday, November 1, 2010

डंकाधिपति ओ-रामा की अवध यात्रा और दीवाली !


{ इस नाटिका के समस्त पात्र स्थान एव घटनायें काल्पनिक हैं, इसका किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है, यदि ऐसा होता है तो उसे मात्र सयोगं ही समझा जाये। हमारा उद्धेश्य सिर्फ और सिर्फ स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना है}   

पौराणिक कथाओं से अपने इतिहास को जोड़ने वाली अवध-नगरी में पिछले कई माह से चल रही स्वागत की तैयारियाँ अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर रहीं हैं। डंका नगरी से आने वाले चक्रवर्ती सम्राट ओ-रामा के लिये अवध को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है, तरह तरह के आयोजनों की योजनायें हैं, जिन्हें संस्तुति के लिये डंका नगरी को भेजा गया है।

इसी सन्दर्भ में आज अवध-नगरी के राजमहल में एक विशेष सभा का आयोजन किया गया है, जिसमें राजदरबार द्वारा स्वागत समारोह की तैयारियों की समीक्षा की जा रही है. (उल्लेखनीय है कि अवध-नगरी की पंचायत द्वारा दिये गये एक निर्णय के बाद यह राजमहल खड़ाऊँ नरेश के लिए अब मात्र एक तिहाई हिस्से में सिमट कर रह गया है, क्योंकि इसके एक तिहाई हिस्से में दूसरे तरह की प्रार्थनायें होती हैं और शेष एक तिहाई हिस्से में कुश्ती की प्रतियोगिताओं के आयोजन का प्रबन्ध है)

दृश्य 1 :
(पात्र : खड़ाऊ नरेश (मन भरत), राजमाता कैकयी, सुरक्षा मंत्री- लुंगीभरम् , राजकोषाध्यक्ष- बाबू मोशाय. स्थानः राजदरबार . सभा प्रारम्भ करने के लिए खड़ाऊँ नरेश बार राजमाता कैकेयी की ओर देखते हैं, किंतु अनुमति न पाकर चुपचाप गद्दी पर बैठ जाते हैं. कुछ समय पश्चात)

राजमाता : मन-भारत, शुरु हो जाओ पुत्र!
 मन भरत : राजमाता की जय! हे माते! डंकेश्वर के स्वागत की तैयारियों के लिये गठित मंत्री समूह ने सूचित किया है कि सभी तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी हैं। तैयारी की सूचना और विवरण डंका नगरी को भेजा जा चुका है और वह लोग भी संतुष्ट हैं।
 राजमाता : वत्स! अब सुरक्षा के विषय में पूछो!
मन भरत : हाँ, अब आप बताएँ, लुंगीभरम्! सुरक्षा का प्रबंध कैसा है!
लुंगीभरम् : राजमाता की जय ! जैसी की हमारी परम्परा है, हम अवध नगरी की सुरक्षा के सभी उच्चस्तरीय प्रबन्ध डंका नगरी की सहमति से ही करते हैं. इस बार चुँकि डंकाधिपति स्वयम पधार रहें हैं, तो हमने उनके ठहरने का प्रबन्ध दक्षिण-पश्चिम के मम्बापुर क्षेत्र की सर्वश्रेष्ठ सराय में कराया है. डंकाधिपति का पुष्पक विमान भी वहीं उतरेगा। हमारी सुरक्षा अचूक और अभेद्य है।
राजमाता : वत्स! इससे पहले कि वो सो जाए इस कोषाध्यक्ष से पूछो कि धन की कोई समस्या तो नहीं!
मन भरत : हाँ, अब आप बताएँ, बाबू मोशाय! धन की कोई समस्या तो नहीं.
बाबू मोशाय (थके हुए स्वर में) : राजमाता की जय ! इस सारे आयोजन में धन की कोई कमी न हो इसके सभी प्रबंध किये जा चुके हैं। नगर सेठों को इस आयोजन के बाद डंका नगरी से होने वाले व्यापारिक लाभ की प्रबल आशा है। इस सभा में आने से पहले मैं नगर सेठ सुकेश से विस्तृत व्यापारिक चर्चा करके आया हूँ।
राजमाता: ठीक है! मन भारत, देखना इस बार आयोजन में वो सब न हो जो पिछले “क्रीड़ा-समारोह” के आयोजन में तुम लोगों ने किया था।
(बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये राजमाता अपने अंत:पुर में चली जाती हैं, सारे सभासद तब तक खड़े रहते हैं जब तक राजमाता मंच से प्रस्थान नहीं कर जातीं.)

दृश्य 2 :
 (पात्र : सुरक्षा मंत्री-लुंगीभरम् , गुप्तचर सेवा प्रमुख–चरणदास.  स्थानः लुंगीभरम् का कार्यालय. चरणदास लुंगीभरम् के आगमन पर भूमि पर साष्टांग लेट जाता है.)

लुंगीभरम् (कड़क लहजे में) : चरणदास! दण्डवत होना छोड़ो और सुरक्षा की सूचना दो।
चरणदास : महोदय! सब कुछ दुरुस्त है। हाँ, सर्पपुर के तथाकथित राष्ट्रवादियों ने एक झूठा समाचार फैलाया है।
लुंगीभरम् : क्या किया है उन्होंने अब?
चरणदास : महोदय, सर्पपुर वाले, अवध की भोली भाली जनता को यह कहकर भरमा रहे हैं कि हमारे राज अतिथि वास्तव में डंकेश्वर ओ-रामा नहीं वरन ओ-रावना है, जो एक मायावी है। इसी मायावी ने असली ओ-रामा को कैद किया हुआ है और अब स्वयम ओ-रामा के वेश में विश्वभ्रमण कर सबको उनके देश को स्वर्ण नगरी बना देने का लालच दे रहा है।
लुंगीभरम् : कोई भी इस प्रकार मिथ्या समाचार फैलाता दिखे तो डाल दो कारावास में और परिस्थिति शांतिपूर्ण बनाओ। अवध में वैसे भी मिथ्याचारियों कि बहुतायत होती जा रही है.
चरणदास : किंतु महाराज, किस दोष में ऐसे लोगों को कारावास दिया जाए.
लुंगीभरम् : अब यह भी मुझे ही बताना पड़ेगा। कुछ भी दोष लगाओ।बस वो कारावास में होने चाहिये.
(चरणदास एक कुटिल मुस्कान बिखेरता प्रस्थान कर जाता है और लुंगीभरम् चिंतित मुद्र में सिर झुकाए हाथ पीछे बाँधे दूसरी ओर से प्रस्थान करता है.)

दृश्य 3 :
(पात्र : डंका नगरी के चक्रवर्ती सम्राट ओ-रामा और अवध का समस्त राज दरबार और गणमान्य व्यक्ति. स्थानः राजप्रासाद का विशाल प्रांगण.)

सारी अवध नगरी में त्यौहार का वातावरण सा बन गया है. सारी जनता सजधज कर नवीन एवम रंगीन वस्त्र धारण कर राज अतिथि डंकाधिपति ओरामा के स्वागत में एकत्र है. अपार जनसमूह एक मानव बाढ़ सदृश दृश्य उपस्थित कर रहा है, जैसे जनता रूपी सरिता अपने समस्त तटबंध को तोड़कर इस विशाल प्रांगण में बह रही है.

रह रहकर डंकेश्वर महाराज ओरामा की जयघोष भी सुनाई पड़ जाती है और ऐसा प्रतीत होता है मानो इस जयघोष से स्वर्ग स्थित देवराज इंद्र का भी सिंहासन डोलने लगेगा. भीड़ में गुप्तचर प्रमुख चरणदास एक हाथ में रेशमी थैली लिए जनसाधारण के मध्य भीड़ का बोध कराता है. वैसी ही रेशमी थैली लिये कई और व्यक्ति जो सम्भवतः गुप्तचर विभाग से सम्बंध रखते होंगे, भी भीड़ में फैले हैं. चरणदास तथा अन्य व्यक्ति रह रहकर थैली से कुछ स्वर्ण मुद्राएँ निकालकर आस पास खड़ी जनता में वितरित कर रहे हैं.जिस व्यक्ति के हाथ में मुद्राएँ आती हैं वह उच्चस्वर में डंकेश्वर ओरामा की जय का उद्घोष करता है और समस्त जनता उसके पीछे पीछे यही दोहराती है.

मंच पर राजमाता कैकेयी डंकाधिपति के साथ बैठी हैं और अन्य सभासद तथा खड़ाऊँ नरेश मनभरत  दूसरी पंक्ति में विराजमान हैं. साथ ही कुछ और गणमान्य नागरिक मंच की शोभा बढा रहे हैं,जिनकी अगुआई प्रसिद्ध व्यापारी नवयुवक सुकेश कर रहे हैं और पेट की गोलाई से यह भी प्रतीत होता है कि उनके साथ अन्य व्यापारी मण्डल के सदस्य हैं.

सभी गण्मान्य नागरिकों के हाथ में भिक्षापात्र सा एक पात्र दिखाई देता है.
डंकाधिपति चक्रवर्ती सम्राट ओ-रामा की आरती उतारने के बाद, सुन्दर अवध-बालायें स्वागत गान गानें लगती है :-

अंगना पधारो हे ओरामा, प्रभु तुम हमरे अंगना में आज पधारो.
कब से खड़े हैं हम स्वागत में तुमरे, सज गई है नगरी अबधिया
दीपक में तेल नाहिं बलब जलाए हैं, पानी से बनी है ये बिजुरिया.
परमानु बिजली कब लईहो ओरामा तुम, खुसहाल हुइहै ई देस
तुमही से रोसनी है, तुमही से जगमग, राजा हैं भिखारियों के भेस.
आओ देखो अबध नगरिया का हाल तुम, महल में कइसे रहोगे
तीन टुकरो भये महल के हमरे जो, तुम कईसे कस्ट सहोगे.
सरजु के तीर तो बिरान भयो बस तुम मान लो ई पंचन की राय
तुमरे निवास बदे देखो खाली कर दी है हमने ये मम्बापुर सराय.
आस के पड़ोस के सब राक्षस आतंकियों ने जीना कर रखा है मोहाल
राजकोष खोल दिया, और है बिछा देखो सैनिकों मसीनों का ये जाल.
कोष खाली हो गया तो चिंता नहीं है हमें, हमपे है किरपा तुम्हारो
अंगना पधारो हे ओरामा प्रभु तुम हमरे अंगना में आज पधारो.

इधर उधर की औपचारिकताओं के बाद, चक्रवर्ती सम्राट ओ-रामा का समापन भाषण :

मेरे प्यारे अवधवासियों !

आपका कंट्री का ट्रैडिशन रहा है कि बाहर से आकर बिज़नेस करने वाला को आप ईस्ट इण्डिया कंपनी का टाईम से एनकरेज करता है. हम भी अपको एक मौका देता है. आप न्यूक्लियर पावर का मतलब जमीन का अंदर क्रैकर्स जलाने को समझता है. हम आपको बताएगा कि इस पावर से आप बिजली बना सकता है. आपका कंट्री में टी20, डे नाइट ओडीआई, कॉमनवेल्थ गेम्स, ओलिम्पिक, एशियाड जैसा गेम्स होता है, जिसका वास्ते आपको बिजली चाहिए. हमरा कंट्री आपको विश्वास दिलाता है कि हम आपको युरेनियम का सप्लाई करेगा और पावर हाउस लगाकर देगा.
(भीड़ में चरणदास फिर मुद्राएँ वितरित करता है और ओरामा की जय के नारे सुनाई देने लगते हैं)

आप हमको अपना कंट्री में मिलिटरी बेस बनाने देगा तो हम आपका कंट्री का दुश्मन राक्षस से आपको सिक्योरिटी देगा. जैसा हमने इराक्षस देश के साथ किया. हमारा देश तो बेगिनिंग से भाई चारा का नारा और शांति का नारा लगाता आया है. हम आपका देश में भी शांति लाएगा.

हमारा कंट्री को गोल्डेन कंट्री बोलता है. हमारा साथ तुमारा कंट्री भी सोना का हो जाएगा. हम इधर में नया बिज़्नेस लाएगा, उसमें हम अपना मनी लगाएगा और तुमारा लोग को काम भी देगा. तुमारा कंट्री सोना का देस हो जाएगा.

अबी हमारा जाने का टाइम हो गया है. हम मनभरत को बोला है कि अपना राजमाता से पूछकर हमको जब बोलेगा हम डील के लिए रेडी है.

(राजमाता के संकेत पर मनभरत खड़ा होकर ओरामा के सम्मुख झुककर अभिवादन करता है. ओरामा बिना उसको देखे कुछ संधिपत्र निकालता है जिनपर मनभरत अपनी मुद्रा अंकित कर देता है. पार्श्व में ओरामा की जयकार के मध्य मंच से सभी गणमान्य व्यक्तियों का प्रस्थान.)

Friday, October 29, 2010

क्या अंक ज्योतिष झूठ है ?


इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस तरह घर-घर अपनी पैठ बना ली है, उसका एक दुष्प्रभाव यह हुआ कि मदारी ज्योतिषियों की संख्या बढ़ी है। आप कोई भी चैनल देखें, इन मदारी ज्योतिषियों की एक पूरी जमात अपने लैपटॉप पर त्वरित समाधान बाँचती नज़र आयेगी।

उपभोक्तावाद की इस रेलमपेल में कहीं तिलक चुटियाधारी खाँटी पंडित जी दिखते हैं, तो कहीं टाई-सूट में सजे फ़र्राटा अंग्रेज़ी बोलने वाले एस्ट्रोलोजर। इन सबके बीच एक प्रचलित विद्या है अंक ज्योतिष। इस प्रचलित अंक ज्योतिष में व्यक्ति की जन्मतिथि (ईसवी कलेंडर के अनुसार) के अंकों को जोड़कर एक मूलांक बना दिया जाता है और फिर उसे आधार बनाकर अधकचरा भविष्य बाँच दिया जाता है। इसी तरह अंग्रेजी के अक्ष्ररों (ए, बी, सी, डी आदि) को एक एक अंक दिया है. और लोगों के नाम के अंग्रेजी अक्षरों के अंकों के योग से उसका मूलांक निकाला जाता है. फिर उसी आधार पर उसका भी भविष्य बाँच दिया जाता है।

आइये सबसे पहले देखें कि अंक ज्योतिष का आधार क्या है ? और यह कितना वैज्ञानिक हैः

1. वैदिक ज्योतिष, जो महर्षि पराशर, जैमनी, कृष्णमूर्ति आदि की उत्कृष्ट परम्परा पर आधारित है, उसमें जातक के जन्म की तिथि, समय और स्थान को लेकर, एक वैज्ञानिक तरीके से जन्म के समय, आकाश में ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति का निर्धारण कर समय का आकलन किया जाता है। तत्पश्चात ज्योतिष के शास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर फलित कहा जाता है। ज्योतिषीय गणनाएँ पूर्णतः खगोलीय सिद्धांतों पर आधारित होती हैं, फिर भले ही फलित ज्योतिष को अवैज्ञानिक कहा जाये।

इसके विपरीत अंक ज्योतिष ईसवी कलेंडर की तिथि के अनुसार चलता है जिसका एक सौर वर्ष मापने के अलावा कोई सार्वभौमिक आधार नहीं है। समय के अनंत प्रवाह में ईसवी कलेंडर मात्र 20 शताब्दी पुराना है। जिसमें अचानक एक दिन को 1 जनवरी लेकर वर्ष की शुरुआत कर दी गयी और शुरु हो गया 1 से 9 अंकों की श्रेणी में जातक को बाँटने का सिलसिला।

2. यह सर्वविदित है कि इतिहास की धारा में अनेक सभ्यताओं तथा राजाओं ने अपने अपने कलेंडर विकसित किये जिन सबके वर्ष और तिथियों में कोई तालमेल नहीं है। तब सवाल यह उठता कि अंक ज्योतिष का आधार ईसवी कलेन्डर ही क्यों?

3. इसका एक कारण शायद यह हो सकता है कि अंग्रेज़ों ने चुँकि विश्व के एक बड़े हिस्से पर राज किया, इसलिये ईसवी कलेंडर का प्रचलन बढ़ गया। यहाँ तक कि विभिन्न गिरजाघरों ने इस कैलेंडर के दिनों की मान्यताओं पर प्रश्न चिह्न लगाए हैं. और तो और, जो सबसे अवैज्ञानिक बात इसकी सार्वभौमिकता को चुनौती देती है, वो यह है कि भिन्न भिन्न देशों ने इस कैलेंडर को भिन्न भिन समय पर अपनाया.

4. ईसवी कलेंडर की शुरुआत 1 ए.डी. से होती है जो 1बी.सी. के समाप्त होने के तुरत बाद आ जाता है, यह तथ्य मज़ेदार है, क्योंकि इस बीच किसी ज़ीरो वर्ष का प्रावधान नहीं है। देखा जाये तो ईसवी कलेंडर की तिथियाँ, मूलत: सौर वर्ष को मापने का एक मोटा मोटा तरीका भर है।

जब हम ईसवी कलेंडर के विकास पर दृष्टि डालतें हैं तो पाते हैं कि कलेंडर के बारह महीनों के दिन समान नहीं हैं और इनमें अंतर होने का कारण भी स्पष्ट नहीं है. यदि इस कलेंडर का इतिहास देखें तो इतनी उथल पुथल है कि इसकी सारी वैज्ञानिक मान्यताएँ समाप्त हो जाती हैं. इस कलेंडर पर कई राजघरानों का भी प्रभाव रहा, जैसे जुलियस और ऑगस्टस सीज़र. 13 वीं सदी के इतिहासकार जोहान्नेस द सैक्रोबॉस्को का कहना है कि कलेंडर के शुरुआती दिनों में अगस्त में 30 व जुलाई में 31 दिन हुआ करते थे। बाद में ऑगस्टस नाम के राजा ने (जिसके नाम पर अगस्त माह का नाम पड़ा) इस पर आपत्ति जतायी कि जुलाई (जो ज्यूलियस नाम के राजा के नाम पर था) में 31 दिन हैं, तो अगस्त में भी 31 दिन होने चाहिये. इस कारण फरवरी (जिसमें लीप वर्ष में 30 व अन्य वर्षॉं में 29 दिन होते थे) से एक दिन निकालकर अगस्त में डाल दिया गया। अब क्या वे अंक ज्योतिषी कृपा कर यह बताएँगे कि दिनों को आगे पीछे करने से कालांतर में तो सभी अंक बदल गये, तो इनका परिमार्जन क्या और कैसे किया गया?

5. सारी सृष्टि एक चक्र में चलती है सारे अंक एक चक्र में चलते हैं जैसे 1 से 9 के बाद पुन: 1 (10=1+0=1) आता है. ईसवी कलेंडर के आधार पर अंक ज्योतिष में अजब तमाशा होता है जैसे 30 जून (मूलांक 3) के बाद 1 जुलाई (मूलांक 1) आता है। इसी तरह 28 फरवरी (2+8=10=1) के बाद 1 मार्च (1 अंक) आता है।

6. नाम के अक्षरों के आधार पर की जाने वाली भविष्यवाणियाँ अंगरेज़ी (आजकल हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को भी) के अक्षरों के अंकों को जोड़कर की जाती हैं. अब यह तो सर्वविदित है कि नाम के हिज्जे उस भाषा का अंग है जो जातक के देश या प्रदेश में बोली जाती है और जो साधारणतः निर्विवाद होता है. जैसे ही इसका अंगरेज़ी लिप्यांतरण किया जाता है, वैसे ही विरोध प्रारम्भ हो जाता है. ऐसे में सारे अंक बिगड़ सकते हैं और साथ ही जातक का भविष्य भी !? इसी अधूरे ज्ञान का सहारा लेकर आजकल लोग इन ज्योतोषियों की सलाह पर अपने नाम की हिज्जे बदलने लगे हैं.

अंक ज्योतिष के यह अंतविरोध, इसके पूरे विज्ञान को तथाकथित की श्रेणी में ले आते हैं। एक सवाल यह भी रह जाता है कि क्या पूरी मानव सभ्यता को मात्र 9 प्रकार के व्यक्तियों में बांट कर इस प्रकार का सरलीकृत भविष्य बाँचा जा सकता है? ऐसे में इस नितांत अवैज्ञानिक सिद्धांत को, ज्योतिष के नाम पर चलाने के इस करतब को क्या कहेंगे आप?

पुनश्च : उपरोक्त विचार मात्र अंक-ज्योतिष के विषय में हैं। ज्योतिष शास्त्र के विषय में नहीं क्योंकि उसके सिद्धांत और पद्धतियाँ, खगोल शास्त्र पर आधारित हैं और कई अर्थो में वैज्ञानिकता लिये हैं। ज्योतिष शास्त्र में अभी और गहन शोध होने बाकी हैं और उसे शायद इस तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता।

Monday, October 25, 2010

रंग-बिरंगे दोहे


ख़ाली डिब्बा टीन का, उसमें पहिये चार
हल्का फुल्का आदमी, अहंकार का भार.


लड़के की हो नौकरी, बंगला, पैसा, कार
देते नाम विवाह का, करते देहव्यापार.

हल्ला गुल्ला शोर कर, कुर्सी पर चढ़ जाएँ,
लोगों पर शासन करें और सेवक कहलाएँ.


अपनी अपनी सोच है, अपना अपना काम
मिट्टी की इस देह का, बारिश को है सलाम.


एक अनोखा खेल है, जीवन जिसका नाम,
मरने वाली देह करे, पुख़्ता सब इंतज़ाम.


पाना, खोना, छोड़ना, एक अबूझा खेल
छटपट करती आत्मा, देह बनी अब जेल.

Saturday, October 23, 2010

लोकतंत्र के थर्मामीटर ईवीएम पर एक और सवालिया निशान?


पिछले दिनों  ईवीएम के दुरुपयोग के सन्दर्भ में  नेट पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर हमने दो बार चर्चा की, यहाँ और यहाँ . इसके अलावा, गाहे-बगाहे इस विषय पर मीडिया में कई खबरें आती रहीं। ईवीएम में विवादास्पद सुरक्षा खामियों को उजागर करने वाले हरि प्रसाद के जेल जाने की खबरों के बीच यह भी सुनने को मिला की चुनाव आयोग ने इन मशीनों को फूल-प्रूफ बताया है।
 
इस बीच आज सुबह देश के दो प्रमुख समचार पत्रों में ईवीएम के सन्दर्भ में प्रकाशित दो अलग अलग खबरों ने एक बार फिर चौंका दिया। यह दो बड़ी ख़बरें इस प्रकार हैं :-  

कॉन्ग्रेस ने गुजरात राज्य निर्वाचन आयोग से यह यह शिकायत की है कि म्युनिसिपल चुनावों  में भाजपा ने ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की है ताकि चुनाव परिणामों को प्रभावित किया जा सके.
विश्वस्त सूत्रों से पता चला है, कि भाजपा फिर आज होने वाले तालुक्का/ ज़िला पंचायत चुनाव परिणामों में हेर फेर करने की चेष्टा कर रही है. इस हेरा फेरी के लिए ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करने हेतु भाजपा ने लैपटॉप से लैस कई टेक्नोक्रैट वहाँ भेजे हैं.गुजरात कॉन्ग्रेस के सचिव गिरीश परमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त को दिए एक ज्ञापन में कहा.
परमार ने कहा, “चुँकि EPROM (Erasable Programmable Read-only Memory) को आसानी से ब्लू टुथ तकनीक अथवा एक पोर्ट सीरियल डाटा केबल से प्रभावित किया जा सकता है, अतः 100 मीटर की परिधि में कोई भी लैपटॉप या कम्प्यूटर को ले जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये.
आज कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता मोहन प्रकाश ने अपनी पार्टी के इसयू टर्नपर बचाव की मुद्रा में यह कहा कि भाजपा का आरोपबिना साक्ष्य के नकारात्मक” (Negative without evidence) था, जबकि कॉन्ग्रेस के पास साक्ष्य मौजूद हैं. प्रकाश के अनुसार, एक चुनाव बूथ पर भाजपा के पक्ष में 111 वोट दर्ज़ हुये इस ईवीएम में, जबकि वहाँ मात्र 44 लोगों ने मतदान किया. एक अन्य बूथ पर, जब एक मतदाता ने मतदान के लिए बटन दबाया तो एक अन्य उम्मीदवार के सामने की बत्ती जल गई.
भाजपा ने इसी माह हुए स्थानीय निकाय के चुनाव में सभी दलों का सफाया कर दिया था. आज वहाँ पंचायत और नगर निगम के चुनाव हुए.

और दूसरी दैनिक जागरण सेः

वाशिंगटन। भारतीय शोधकर्ता हरि कृष्णा प्रसाद वेमुरू को भारत में इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीन [ईवीएम] में खामी का दावा करने पर भले ही जेल जाना पड़ा लेकिन अमेरिका में इसके लिए उन्हें एक प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा जाएगा। सैन फ्रांसिस्को स्थित शीर्ष नागरिक स्वतंत्रता संगठन 'इलेक्टॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन' ने हरि कृष्णा को वर्ष 2010 का पायनियर अवार्ड देने की घोषणा की है।
संगठन के एक बयान में कहा गया है, 'हरि कृष्णा प्रसाद वेमुरू एक भारतीय  शोधार्थी हैं जिन्होंने हाल ही में ईवीएम में सुरक्षा खामियों को उजागर किया था। भारतीय चुनाव प्रणाली में इस्तेमाल हो रही ईवीएम की पहली स्वतंत्र सुरक्षा समीक्षा के लिए उन्हें जेल की सजा काटनी पड़ी। उन्हें बार-बार पूछताछ का सामना करना पड़ा और राजनीतिक उत्पीड़न का शिकार बनाया गया।' यह पुरस्कार 1992 से दिया जा रहा है। हरि कृष्णा के साथ इस साल यह पुरस्कार पारदर्शिता कार्यकर्ता स्टीफन आफ्टरगुड, ब्लॉगर पामेला जोंस और जेम्स बॉयल को भी मिलेगा। इन सभी को 8 नवंबर को सैन फ्रांसिस्को में एक समारोह में यह पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।


चुनाव प्रक्रिया किसी भी लोकतंत्र के लिये थर्मामीटर का काम करती है, जिससे जन-अपेक्षाओं के तापमान का पता चलता है। इस प्रक्रिया से देश की पंचायत (संसद) चुनी जाती है और फिर  देश के संसाधनों को इसके हवाले कर दिया जाता है, इस आशा में कि यह इन संसाधनों के समुचित दोहन से प्रत्येक देशवासी को लाभ मिलेगा।

परंतु यदि थर्मामीटर की गुणवत्ता ही संदेहास्पद हो तो मामला गम्भीर हो जाता है. बीमार को सिंहासन और भले चंगे को बीमार घोषित कर दिया जाता है।  

लोकतंत्र के इस थर्मामीटर, ईवीएम की कार्य कुशलता पर इस बार जो सवाल  खड़े किए गये हैं वो बहुत महत्वपूर्ण इस कारण हो जाते  हैं क्योकिं सत्तारुढ दल ने भी माना है कि ईवीएम में गड़बड़ झाला है। आप क्या कहतें है ?

Tuesday, October 19, 2010

पीपली [लाइव] - दौलत डायन खाए जात हैं!

हमारी फ़िल्मी दुनिया को गुरुदत्त साहब ने कागज़ के फूल कहा था. और यह बात गलत तो कतई नहीं थी. यह वही दुनिया है, जहाँ एक ओर कुंदन लाल सहगल को सिर पर बिठाया गया और दुसरी तरफ उनकी ज़िंदगी अंगरेज़ी शराब की बोतल में कच्ची शराब पीकर ग़र्क हो गई. भारत भूषण, मीना कुमारी, गीता दत्त, नादिरा, परवीन बाबी और न जाने कितने ऐसे कलाकार जिन्हें लोगों ने पलकों पर उठाया और उनका अंत हुआ गुमनामी और शराब के अंधेरे में.

वो सच, वो भाईचारा, वो एकता और वो ख़ुलूस जो यह फिल्मी दुनिया हर मौक़ों पर दिखाती और जताती है, वास्तव में सिर्फ खोखलापन है. सचमुच कागज़ के फूल. ख़ूबसूरत बेइंतिहाँ, मगर ख़ुशबू नदारद. एक ऐसा ही फूल हमारे सामने पेश हुआ था कुछ महीने पहले. हमने उसकी चर्चा भी की, कई ब्लॉग्स पर उसके बारे में लिखा भी गया. अख़बारों ने तारीफ के पुल बाँध दिये. यह फूल था पीपली लाइव.

रविवार को इंडियन एक्स्प्रेस में इसकी निदेशिका और सह निर्देशक अनुषा रिज़वी और महमूद फ़ारूक़ी का इण्टरव्यू पढा और पढने के बाद मन ख़राब हो गया. एक बार फिर भारत छला गया इण्डिया के हाथों. हालाँकि इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं, लेकिन अफसोस तो होता ही है. फ़िल्म 36 चौरंगी लेन की मिसेज स्टोनहैम की पीड़ा आज महसूस हुई, ऐसा ही लगा होगा उन्हें जब वो बच्चे जिन्हें वो प्यार करने लगी थी, दरसल उनके प्यार का नाजायज़ फायदा उठाकर उनके घर को अपनी ऐशगाह बनाए बैठे थे.
                                                  महमूद फ़ारूक़ी और अनुषा रिज़वी

पीपली लाइव को सबने वास्तविकता से लबरेज़, मीडिया पर करारा व्यंग्य करती, गाँव की पीड़ा दर्शाती और वर्त्तमान भारत का एक दर्पण कहा. लेकिन ख़ुद इसके निदेशक दल का यह मानना है कि उन्होंने ख़ुद ही अपने आप को इस फ़िल्म से अलग कर लिया था. महमूद बताते हैं कि हम तो बिना किसी कॉन्ट्रैक्ट के फ़िल्म बनाने में जुट गये थे. हमारा मक़सद तो करोड़ रुपये कि कमाई नहीं था हम तो सीधी सादी दिल्ली युनिवर्सिटी की मानसिकता से निकले थे.

हालाँकि ख़ुद वो भी मानते हैं कि यह कोई अफसोस करने की बात नहीं है, क्योंकि एक पूँजीवादी फिल्मी दुनिया में इस तरह की बातें आम हैं. आमिर ख़ान पर पाँच एपिसोड की एक सीरीज़ बनाकर सारे समाचार मनोरंजन चैनेल में बाँट दी जाती है. वे सारे चैनेल बारी बारी से यह सब मुफ्त दिखाते रहते हैं. हमें उनके हाथ बंदर बनना मज़ूर नहीं था, लिहाजा हम अलग हो गए.

इनके अफसोस की वज़ह बहुत हद तक जायज़ भी है. ये कहते हैं कि इस फिल्म के लिये हमें अपनी तरफ से कई लोगों का आभार व्यक्त करना था,लेकिन हमें ऐसा करने से मना कर दिया गया और बताया गया कि किसको क्रेडिट देना है यह प्रोड्यूसर का ज़िम्मा है यानि आमिर ख़ान साहब का. और कई ऐसे लोग छूटे रह गए जिन्हें उनके सहयोग के लिये धन्यवाद देना चाहिये था.

फिल्म का गीत और एकमात्र गीत जिसने सफलता देखी वह था महंगाई डायन. यह गीत सीधा सीधा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य था. बताते हैं कि जब उन्होंने कई स्थानीय लोकगीत सुने तो यह गीत इतना पसंद आया कि उन्होंने इसके लिए अलग से जगह बनाई फिल्म में. इस गीत का यह असर था कि देश के प्रमुख विरोधी दल ने इसे सरकार के विरुद्ध इस्तेमाल करने की इजाज़त माँगी जिसे आमीर ख़ान ने मना कर दिया.

और अब किसी अज्ञात कारणों से यह गीत फिल्म के एलबम से निकाल दिया गया है. उसकी जगह एक रीमिक्स गाना पाया जाता है. उस गाने से आत्मा गायब है, जो आपके दिलोदिमाग़ तक पहुँचती है. बात भी सही है सरकार से टक्कर लेना आसान काम नहीं है. इस गाने को सीडी से हटाने के पीछे कारण यह बताया गया कि यह गाना बेकार है और पब्लिक इससे बोर होगी.

बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत इस फिल्म को ग्रामीण क्षेत्रों में रिलीज़ नहीं किया गया. व्यापार का गणित बिल्कुल सीधा और सरल है. गोरखपुर के एक थियेटर और दिल्ली के मल्टीप्लेक्स की उगाही के बीच बहुत बड़ा अर्थशास्त्र है. इसलिए एक फिल्म जिन लोगों की व्यथा को दर्शाती है, वह उन तक नहीं पहुँचती. पहुँचनी चाहिये भी नहीं, क्योंकि यह एक ऐसी समस्या है जिसपर अंगरेज़ी में विचार किया जाना चाहिये, पेप्सी के घूँट और पॉप कॉर्न के स्वाद के बीच वेरी सैड, पिटी, रियलिस्टिक जैसे शब्दों और अभिव्यक्तियों के साथ.

जब आमीर ख़ान किसी फिल्म में अभिनय करते हैं तो वह आमीर ख़ान की फिल्म होती है, जब निर्देशन करते हैं तब भी वो आमीर ख़ान की फिल्म होती है और जब उन्होंने प्रोड्यूस की तब भी फिल्म उन्हीं की रहने वाली थी. और अब तो यह फिल्म ऑस्कर के लिये नामित हो चुकी है, लिहाज़ा अगर इसे ऑस्कर मिल भी जाता है तो यह आमीर ख़ान की फिल्म ही कही जाएगी.

आज एक बहुत पुरानी बात याद आ गई जिसे लोगों ने सत्यजीत राय जैसे महान फ़िल्मकार के साथ चिपका रखा है कि उन्होंने पॉथेर पांचाली के माध्यम से भारतवर्ष की ग़रीबी को विदेशों में भुनाया और शोहरत पाई. आज वह आलोचक वर्ग कहाँ है जो अनुषा और महमूद की इस बात को ख़ुद उनकी ज़ुबानी सुनकर आमीर ख़ान के लिये भी वही कहने को तैयार है?

पुनश्चः इण्डियन एक्स्प्रेस ने यह ख़बर दी है कि ऑस्कर में पीपली (लाइव) की आधिकारिक प्रविष्टि से निदेशक जोड़ी ने ख़ुद को बाहर कर लिया है. आमीर ख़ान से इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने किसी भी प्रतिक्रिया से मना कर दिया.

Friday, October 15, 2010

खेल खत्म, पैसा हज़म ?

कल की शाम तो कामनवैल्थ खेलों का समापन देखते बीती. 60,000 दर्शकों से भरे नेहरु स्टेडियम की भव्यता में, 40 करोड़ का गुब्बारा पायाति जी से हुये पिछले वार्तालाप के बाद कुछ देर तो चुभा, पर जब बॉलीवुडी मनोरंजन शुरु हो गया तो हमारे टेलीविज़न की आवाज़ भी थोड़ी तेज़ हो गयी! कार्यक्रम के अंत मे घर में सभी की प्रतिक्रिया यही थी कि यह 26 जनवरी के रंगारंग कार्यक्रम सरीखा बेहतरीन नाइट शो था.

जहां तक ग्यारह दिनों के इन खेलों का प्रश्न है, भारतीय खिलाड़ियों ने विशेष रूप से निशानेबाजी, पहलवानी और मुक्केबाजी में कीर्तिमान स्थापित किये. सबसे सुखद रहा दशकों बाद एथेलेटिक्स में पदक हासिल करना। निश्चित तौर पर हर पदक नें खिलाड़ियों के मनोबल को उपर उठाया है और देश में क्रिकेट से इतर खेलों के महत्व को बढाया है। हालाँकि व्यवस्था द्वारा इस सफल आयोजन का श्रेय लेने की होड़ शुरु हो चुकी है, परन्तु इस पर मशहूर पत्रकार एम जे अकबर की बात से सहमत हुए बिना नहीं रहा जा सकता कि “चीन में हर पदक विजेता के पीछे पूरी सरकारी मशनरी का योगदान होता है. दूसरी ओर भारत के हर पदक के पीछे व्येक्तिगत सोच और प्रतिभा है. सच कहा जाए, तो भारत में मशीनरी कभी काम नहीं करती है.”

इसी तरह कुल मिले 101 पदकों में भी सम्पूर्ण भारत में हो रही किसी खेल क्रांति की झलक नहीं मिलती है। भारत को मिले 38 स्वर्ण पदकों में अकेले हरियाणा के ही 15 स्वर्ण पदक हैं। कल्पना करें कि यदि हरियाणा एक देश होता तो इन पदकों के आधार पर इन खेलों में उसका पाचवां स्थान होता! हरियाणा के पहलवानों और मुक्केबाजों नें अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनायी है, जिसके लिये वो बधाई के पात्र हैं। स्मरण रहे कि यह करिश्मा और कारनामा उस हरियाणा ने किया है जिसकी जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का मात्र 2% है।

मानव विकास पैमाने पर स्वर्ण पदक तालिका का विश्लेष्ण करें तो निम्न तस्वीर उभर कर आती है :
खेलों में बहुत से विश्व विजेताओं का न आना शिद्दत से महसूस किया गया. इस परिप्रेक्ष्य में खिलाड़ियों की असली परीक्षा अगले माह चीन में होने वालें एशियाई खेलों में मिलने वाले पदकों से होगी और फिर 2012 का लन्दन ओलिम्पिक तो खेलों का असली मक्का होगा ही!

बहरहाल इस सबके बीच खर्चे पानी वाली बात तो रह ही गयी 70,000 करोड़ रुपये का हिसाब किताब?

एन. डी. टी. वी की एक खबर के अनुसार “कॉमनवेल्थ खेल खत्म हो गए हैं और अब बारी है खेलों की आड़ में हुए महाघोटाले की जांच की। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग कॉमनवेल्थ खेलों पर हुए खर्च की जांच शुक्रवार से शुरू कर देगा... हालांकि कैग ने कॉमनवेल्थ खेलों के खातों की जांच का काम अगस्त में शुरू किया था, लेकिन इसे सितंबर के आखिर में रोक दिया था और कहा था कि खेल खत्म होने पर इस पर दोबारा काम शुरू होगा... दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़ा मुख्य विवाद ठेकों को लेकर है, जिसमें भाई−भतीजावाद और किराये पर लिए गए उपकरणों के लिए काफी ज्यादा पैसे देने के आरोप लगे हैं।“

प्रबन्धन कौशल में माहिर सत्ताधीशों द्वारा इस जांच प्रक्रिया का समापन किस कुशलता से किया जाता है वह देखने का विषय़ होगा! जानकार लोगों का अनुमान है कि इस जाँच-पड़ताल के खेल में हमारा स्वर्ण पदक कहीं नहीं गया। बहरहाल मदारी के खेल की तरह क्या यही समझा जाये कि “खेल खतम पैसा हज़म??”

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