हमेशा से रहा है बैर
अच्छे और बुरे का
उजले काले का
अंधेरे और उजाले का
हमेशा से रहा है बैर, देखो!
है अंधेरे की शिकायत रोशनी से
वो डराता है उसे.
रहने नहीं देता उसे कोने में भी
चुपचाप साये में घनी तन्हाई के.
यह भी शिकायत है कि
हरदम मुँह चिढ़ाकर
कर दिया दुश्वार है उसका निकलना.
पर उजाले ने बड़ी मासूमियत से दी सफ़ाई
क्यूँ भला ऐसा करूँगा मैं
मुझे क्या फ़ायदा है ऐसा करने में
ये सब बातें, सभी इलज़ाम मुझपर
बेवज़ह, बेकार, बेबुनियाद हैं सब.
है भरोसा अपनी सच्चाई पे अंधेरे को तो फिर
उसको बुलवाकर,
कहो आँखों में आँखें डालकर मेरी
कहे इलज़ाम सारे सच हैं जो मुझपर लगाए हैं
अंधेरे ने.
मगर मुझको पता है
है कहाँ हिम्मत भला उसमें
कि मेरे सामने आए
कहे सबसे कि सब इलज़ाम सच हैं
उसने जो मुझपर लगाए हैं.
अंधेरा आ नहीं पाया
उजाला मुस्कुराया
रख गया नन्हा सा इक दीपक वहाँ
जो दे रहा तन्हाँ चुनौती
उस अंधेरे को
जो फैला था जगत में, दस दिशाओं में.
चलो मिलकर
मनाएँ आज हम त्यौहार दीपों का
मिटा दें वो अंधेरा,
जो भरा अंतस में है अपने
मिटाकर उस अंधेरे को ही
होगी सार्थक दीवाली और ये पर्व दीपों का.

