सम्वेदना के स्वर

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Saturday, June 11, 2011

देश को चाहिये - बाबा रामदेव भी! अन्ना हज़ारे भी !

चार जून की रात, दिल्ली के रामलीला मैदान में जो हुआ, उसे देखकर आप अपने भारतीय होने पर शर्मिन्दा हों या न हों, बेशर्म व्यवस्था तनिक भी शर्मसार नहीं है. इसके उलट, जो कुछ भी उस रात हुआ, बेहयाई से उसे सही साबित करने में लगी है। बिका हुआ इलेक्ट्रानिक मीडिया पूँछ हिलाता हुआ व्यवस्था से यह सवाल भी नहीं कर पा रहा है कि गुर्जरों द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर पूरी उत्तर रेलेवे को ठप्प किए जाने के बावजूद भी जिनकी नींद नहीं खुली, एयर इंडिया पर गम्भीर घोटालों के आरोप के बाद भी पायलटों की हडताल जो नहीं खत्म करवा सकी; उसे आखिर किस बात का डर था जो आधी रात को हज़ारों भूखे-प्यासे, निह्त्थे, अहिंसक अनशनकारियों, सोती हुई महिलाओं और बच्चों पर लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले छोडने जैसा कदम उठाना पड़ा।

शुरुआती झटके से एक बार तो मीडिया भी सकते में आ गया; लेकिन अचानक स्वामीभक्ति ने अंगडाई ली और “हो रहा भारत निर्माण” की हड्डियां चबाने को मिलीं तो सारे एलेक्ट्रानिक मीडिया अलग अलग मोर्चे पर डट गए किसी ने इसे भगवा आतंकवाद घोषित कर दिया, किसी ने आर.एस.एस./बी.जे.पी. से तार जोड़े, किसी किसी ने तो काले धन के खिलाफ इस मुहिम को अन्ना हज़ारे बनाम बाबा रामदेव की लड़ाई का रूप तक दे डाला. कुल मिलाकर आका का हुक्म तामील करने लगे.

हालिया घटनाओं के इस परिप्रेक्ष्य में, हमें लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में देश को अन्ना हज़ारे भी चाहिये और बाबा रामदेव भी। वह इसलिये कि यह दोनों जन इंडिया और भारत का अलग अलग प्रतिनिधित्त्व करते हैं।

बाबा रामदेव :

1. बाबा रामदेव को ठग कहने वालों से सीधा सवाल यही है कि यदि बाबा ठग होता तो (कु)व्यवस्था के पोषकों से समझौता करके 1100 करोड़ और हासिल कर लेता। उनकी इस तरह मुखालफत नहीं करता, जिसे आप साँप के बिल में हाथ डाल देने या कुल्हाड़ी पर पैर मारने जैसा दुस्साहस कह सकते हैं।

2. बाबा रामदेव की भाषा गंवार देहाती भारत की भाषा है, जो अंग्रेजीदां इंडिया और उसके भोंपू मीडिया की समझ से परे है. बाबा रामदेव उस भारत का प्रतिनिधित्त्व कर रहा है जिसके सारे संसाधन लूटे जा चुके हैं, अंग्रेजी की समझ और सोच वाले जब उसे बीपीएल परिवार कहकर भीख का प्रबन्ध करने का वादा करते है, तो वह अपमानित महसूस करता है।

3. बाबा रामदेव के इस देहाती भारत का गुस्सा अनियंत्रित है. जब वह गुस्से में फौज़ बनाने की बात कहता है तो इन्डियन व्यवस्था देशद्रोह का आरोप लगाकर उसकी मिट्टी पलीद करने पर तुल जाती है. उसकी मजबूरी यह है कि देहाती भारत की समस्याओं की पैरवी के लिये कोइ नामी वकील उसके पास नहीं हैं,उसकी बात नीम की गोली सी कड़वी है। उस पर चीनी की चादर डालना उसे नहीं आता।

4. बाबा रामदेव देहाती भारत के भगवा कपड़ो के राजनीतिक समीकरण को नहीं समझ पाता। 5000 साल की उसकी मां भारती के बदले, 63 साल के राष्ट्रपिता का सौदा वह नहीं कर पाता है तो व्यव्स्था उसे साम्प्रदायिक कहकर खारिज़ कर देती है।

 
अन्ना हज़ारे :

1. अन्ना हज़ारे सुविधाभोगी, नौकरीपेशा और इस लूट से लाभान्वित उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो एक हाथ में आइसक्रीम और दूसरे हाथ में कैंडिल लेकर पीस-मार्च करते हैं। कमाल तो यह है कि इस अंग्रेजीदाँ वर्ग को भी लगता है कि वह ठगा गया है. क्योकि इतनी बड़ी लूट में उसके हाथ तो सिर्फ मूंगफली ही लगी हैं।

2. अन्ना हज़ारे व्यवस्था के खिलाफ इस तरह की लड़ाईयां पहले भी लड़ चुके हैं। उन्हें पता है कि बात कितनी कहनी है और कहां तक ले जानी है। बीजेपी शासन के भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस का इस्तेमाल और कांग्रेस शासन के करप्शन के खिलाफ बीजेपी-शिव सेना का इस्तेमाल वह महाराष्ट्र में कई बार कर चुके हैं।

3. अन्ना मीडिया की पसन्द हैं, क्योकि उनके साथ ग्लैमर है सहयोगी किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल, भूषण पिता-पुत्र आदि का. ये लोंग उसी व्यवस्था से आते हैं और फर्राटा अंग्रेजी बोल सकते हैं और तर्क संगत वक्तव्य दे सकते हैं। और सोने पर सुहागा ये कि अन्ना के सहयोगियों को व्यवस्था की रग-रग की पहचान है. यही कारण है कि छ्द्म सीडी हमले को शान्ति भूषण न सिर्फ झेल गए बल्कि उसका मुंह तोड़ जवाब भी दिया. किन्तु ऐसे किसी भी हमले पर बाबा रामदेव तो खेत रहेंगें ।

4. अन्ना के लोग वह राष्ट्रवादी हैं जो इत्तेफाकन हिन्दू हैं। जबकि बाबा रामदेव के कपड़ो का रंग “हिन्दू राष्ट्रवादी” होनें की गाली सरीखा है. यह भी एक कारण है कि इंडिया के प्रतिनिधि अन्ना और उनकी टीम हो सकती है।

बहरहाल, जिस तरह भारत और इंडिया दोनों इस देश की बुनियादी सच्चाई है, वहीं बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे दोनों इस देश को राष्ट्र का दरजा दिलाने की मुहिम मे लगे ही हैं। अब सुपरहीरो अमिताभ बच्चन हों या राजेश खन्ना हों, जिसे जो पसन्द हो चुन ले। सवाल और मुद्दे दोनों के एक ही हैं। काली व्यवस्था खत्म करो. गिरवी तन्त्र से इस देश को निजात दिलाओ।

तमाम तर्कों और आंदोलनों का एक क्षण में पटाक्षेप हो जाये, यदि सरकार काले धन के पोषकों के नाम घोषित कर दे और इस धन को वापस लाने के लिये सिर्फ सकारात्मक कोशिश करती हुयी दिखायी देने लगे, हम दोहराना चाहते हैं कि सिर्फ सकारात्मक कोशिश करती हुयी दिखायी देने लगे.

लेकिन क्या सरकार ऐसा कर पाएगी ?

बस इसी “लेकिन” ने आज अन्ना हज़ारे , बाबा रामदेव को इंडिया और भारत का हीरों बना कर, जन-आक्रोश को उबाल पर ला खड़ा किया है।

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