अपनी बेटी को स्कूल का होमवर्क करवाने बैठा. विषय था, चाँद पर उतरने वाले पहले अंतरिक्ष यात्रियों का वृत्तांत. नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन के नाम यूँ तो बचपन से ही हमें रटाये गये थे, परंतु इस बार उनका नाम बोलने में ज़ुबान लड़खड़ा रही थी. मैं अपने आप में उलझा था कि यह सही है या ग़लत, सच है या झूठ? तब लगा कि जब मैं खुद ही इस बात पर विश्वास नहीं करता, तो अपनी बच्ची से क्या कहूं? अगली पीढ़ी तक यह “मिथ्या ज्ञान” पहुचाने में सहभागी बनूँ या इसका दूसरा पक्ष भी उससे कहूँ?
कॉलेज के दिनों में इस बात को लेकर दोस्तों के बीच अक्सर यह विवाद होता था कि दरअसल “चाँद पर कोई अभी तक गया ही नहीं है” और चाँद पर उतरने की ख़बर तब के सोवियत संघ को पछाड़ देने की एक और अमेरिकी चाल भर है. पक्ष और विपक्ष में दिये गये तर्कों और सारी बहस के बाद सुई इस सवाल पर अटक जाती कि मान भी लें कि अमरीका के पास 1969 में इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी थी, तो उसके बाद के सारे अपोलो अभियान 1969 से 1972 के बीच होकर क्यों समाप्त हो गए? उसके बाद कोई बड़ा अभियान क्यों नहीं हुआ, आदमी को चाँद पर भेजने का? और अगर हुआ भी तो सुनने में क्यों नहीं आया. एवरेस्ट विजय की कहानियाँ तो अखबारों में आती रहती है, फिर चाँद तो एवरेस्ट से भी ऊँचा है! बस, इस सवाल पर आकर सारी बहस समाप्त हो जाती थी.
आज उस तथाकथित घटना को लगभग चार दशक बीत चुके हैं, अमरीका ने शटल बनाए हैं जो अंतरिक्ष में बार बार आ-जा सकते हैं, लेकिन चाँद पर इस बीच आदमी भेजने का कोई दूसरा (और ऐसे में पहला भी) अभियान आज तक नहीं हुआ और न कोई निकट भविष्य में बताया जाता है. अमरिका के अलावा किसी और देश ने भी हिम्मत नहीं की है. भला क्यों ?
चन्द्र विजय के अमेरिकी प्रोपेगंडा के कुछ कथित कारण यह कहे जातें हैं :
1. वियतनाम युद्द से अमेरिकी जनता का ध्यान हटानाः बताने की ज़रूरत नहीं कि ठीक इसी समय, अमेरिका ने वियतनाम से अपनी सेना हटाने का निर्णय लिया था, जो अमेरिकी पराजय का ज़बर्दस्त प्रतीक था. अप्रैल 1969 में इस युद्ध में मरने वाले अमरीकी सैनिकों की संख्या कोरिया युद्ध में मरने वालों की संख्या (33629) से कहीं ज़्यादा थी. 8 जून 1969 को अमेरीकी झंडा उतार कर वियतनाम से सेना वापस बुलाने का फ़ैसला और 21 जुलाई को 1969 को चाँद पर झंडा फहराने का अमेरिकी प्रोपेगंडा, दरसल उस पराजय को पार्श्व में रखकर अमेरिकन सर्वोपरि की अवधारणा को जीवित रखने का काम किया.
2. शीत युद्द : तब के कम्युनिस्ट देशों के नेता सोवियत संघ और पूंजीवादी देशों के नेता अमेरिका के बीच हर क्षेत्र में प्रतिद्वन्दिता का माहौल था. चाँद पर अपने देश का झंडा फहरानें का ख्याल रूमानी है और जो यह काम कर लेता वो निश्चय ही जनकल्पनाओं में हीरो हो ही जाने वाला था. गलत या सही, ऐसा हुआ भी! उस समय के लोगों से जब इस विषय पर मैंने उनके अनुभव पूछे तब यही अहसास हुआ कि दुनिया के कोने कोने में चाँद की मिट्टी आदि का भरपूर प्रदर्शन हुआ था. एक अमेरिकी जूनून पैदा हो गया था, पूरी दुनिया में.
3. राजनैतिक अर्थशास्त्र : एक आकलन के अनुसार नासा ने उस समय करीब 40 बिलियन डालर की धनराशि इस अभियान पर खर्च की थी. इस का एक छोटा सा हिस्सा इस छद्म खेल को हकीकत बताने में खर्च हुआ. छ्द्म खेल मतलब इस पूरी फिल्म की शूटिंग में, जो बताया जाता है कि नासा के एक गुप्त फिल्म स्टुडिओ में हुई,जो नेवादा के रेगिस्तान में स्थित है. बाकी के डॉलर कहाँ गए..बस गप.. गपा.. गप!!!
4. जोखिम: चार दशक पहले के कम्प्यूटर क्या थे जरा स्मरण कीजिये? क्या टेक्नोलॉजी थी, ज़रा कल्पना कीजिये. उस समय आदमी को चाँद पर भेजने में आज से भी अधिक जोखिम था. मेरा इंजीनियर मन यह सोच कर ही हैरत में पड़ जाता है कि 41 साल पहले कैसे सम्भव होगा कि पहले कोई यान पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को भेदे, फिर अंतरिक्ष में चाँद की कक्षा में प्रवेश करे, फिर चाँद के चक्कर लगता हुआ वह यान वहीं रहे और एक छोटा यान चन्द्र्मा पर दो यात्रियों के साथ उतार दे. और थोड़ी तफरीह आदि करके वह यात्री पुन; चाँद के गुरुत्वाकर्षण को भेद कर मुख्य यान में आ जायें. वह मुख्य यान अंतरिक्ष में विचरण कर पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करे और वापस अमेरिकी धरती पर लौट आये. मुझे याद आयी कल्पना चावला जो बस कुछ बरस पहले अमेरिकी शटल के पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही भस्म हो जाने के कारण मारी गयीं थीं. वो तो बस अंतरिक्ष में विचरण करने ही गयीं थीं चाँद जैसी दुर्गम जगह पर नहीं.
चन्द्र यात्री की इस तस्वीर में एक यात्री तो हैल्मैट के शीशे पर है दूसरा वह है जो यह हैल्मैट पहनें है, फिर वो तीसरा कौन है जिसने यह तस्वीर उतारी है? (उनका कहना है कि चाँद पर दो लोग ही उतरे थे) एक बार गूगल पर सर्च कीजिये आपको इस विषय पर और भी रोचक जानकारियाँ मिल जाएंगी.
मैं कम्यूनिस्ट नहीं हूं परन्तु राजनीति को जानने समझने के चक्कर में, दुनिया भर में चल रही अमेरिकी चालबाज़ियाँ देख रहा हूं. आजकल हमारे देश ने जो अमेरिका होने की धुन पकड़ रखी है, वह देखकर एक भय सा लगता है.
क्या कहते हैं आप? चंदा मामा की इस झूठी कहानी के बाद, अंकल सैम की उंगली पकड़कर कितनी दूर चल सकेंगे हम? और हाँ चले भी तो कहां जायेंगे? कहाँ पहुँचेंगे?

