हरिशंकर परसाई जी ने अपनी एक व्यंग्य रचना में लिखा था कि राम नाम सत्य है यह उक्ति ऐसी है जिसकी सत्यता पर कोई प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकता. किंतु यह बात किसी के विवाह के अवसर पर बोलकर देखो तो लोग बिना पीटे नहीं छोड़ेंगे. अरे भाई क्यों पीटना उस बेचारे को, उसने सच ही तो कहा है कि एक राम का नाम ही सत्य है. और अगर ग़लती से आप कहीं उनके समर्थन में खड़े हुए नहीं कि आप भी पिटे. अब जो आकट्य सत्य है उसके लिये भी लोग स्थान, काल और परिस्थिति की भ्रांतियाँ फैलाये बैठे हैं. कमबख़्त सच ना हो गया कोई विज्ञान का सिद्धांत हो गया कि एन.टी.पी. (नॉर्मल टेम्परेचर प्रेशर) पर ही सही माना जाएगा.
दुनिया बड़ी विचित्र है. अब वो साधु और बिच्छू वाली कहानी तो आप सब ने सुनी होगी. दुबारा नहीं जा रहे हम सुनाने. लेकिन एक संदेह है. ज़रा बताइये कि कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी, यह मुहावरा साधु के लिये इस्तेमाल किया जाना चाहिये या बिच्छू के लिये? सब के सब कहेंगे बिच्छू के लिये. क्योंकि यह मुहावरा हमेशा टेढ़े लोगों के लिये ही प्रयोग किया जाता रहा है. इसका अर्थ है कि टेढ़े लोग कभी सीधे नहीं हो सकते. इसलिये बिच्छू पर ही लागू होती है यह कहावत, साधु पर हो ही नहीं सकती.
पर हमारे विचार से इसका सीधा सरल अर्थ यह है कि इंसान अपनी आदत से बाज नहीं आता है. कुत्ते की दुम को नलकी में डालकर चालीस साल ज़मीन में गाड़ दो, जब निकालो नलकी टेढ़ी मिलेगी, पर दुम सीधी नहीं. मगर यही बात तो अच्छे कर्मों वाले व्यक्तियों पर भी लागू होती हैं. साधुओं की भी आदत कहाँ बदलने वाली, बिच्छू के डंक के विष से मर ही जाएँ तभी शायद उसको डूबने से बचाने का प्रयास त्यागेंगे. सोचिये बिच्छुओं की जमात क्या कहती होगी उनके बारे में. यही न कि पता नहीं ये साधु किस मिट्टी का बना है. कुत्ते की दुम है कभी सीधा नहीं हो सकता.
हमारे एक कॉमन मित्र थे (ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे, अभी भी स्वस्थ हैं, पर मित्र नहीं हैं अब). बेचारे बड़े सज्जन व्यक्ति. उनकी सज्जनता का लोहा सारा मुहल्ला मानता है. गली, मुहल्ले, नुक्कड़ पर कोई भी निरीह जीव कष्ट में दिखा नहीं कि वे द्रवित हो जाते हैं और उसकी पूरी सेवा का प्रबंध करते हैं. सिर्फ यही नहीं इस कार्य में तो वे इंसानों और पशुओं के साथ समान व्यवहार करते हैं. किसी के लिए किसी प्रकार की सहायता को वो हमेशा तत्पर रहते हैं. इतना ही नहीं, सड़क पर दो बंदे लड़ रहे हों तो वहाँ वो बीच बचाव करते दिखेंगे, भले इसमें ख़ुद उनको चोटें आ जाएँ, लेकिन उनके प्रयास में कोई कमी नहीं आएगी. उल्टा हर कोई उनको कह जाता है कि सब कुछ सीखा तुमने, ना सीखी होशियारी.
हमारे पास वो अक्सर बैठा करते थे. और जैसा कि हर बात की शुरुआत के लिये ज़रूरी है, हम पूछ ही बैठते कि और क्या ख़बर है. बस यह हमारे श्रीमुख से निकला अंतिम वाक्य होता. क्योंकि उसके बाद वो खुलकर अपने किसी ताज़ातरीन नेकी की चर्चा छेड़ देते. किसको हस्पताल पहुँचाया, किसकी पिटाई हो रही थी तो झगड़ा निपटाया. कई बार कहा उनसे कि आप ये सब करते हैं तो आख़िर क्या मिलता है आपको. उल्टे कई लोग तो अपकी हँसी उड़ाते नज़र आते हैं.
मगर वो भी अपनी धुन के पक्के थे. लोग लाख कुछ कहें, उनका एक ही मूलमंत्र है कि पीठ पीछे या खुले आम की जाने वाली बुराइयाँ कोई इंसान के बदन से चिपक थोड़े न जाती है. बल्कि इसी बहाने लोग याद तो रखते हैं. मगर कभी कभी बेचारे बड़े मायूस भी हो जाते. कहते बड़ा दुःख होता है लोगों की बातों से, लेकिन आदत से मजबूर नेकी का कीड़ा ज़िंदा भी तो नहीं रहने देता. सच कहा जाए तो उनके अंदर कोई बुरी लत नहीं, मगर सबसे बुरी लत यही है कि नेकी नहीं छूटती उनसे. जितनी नेकियाँ उतनी नेकियों की कहानियाँ. और ज़्यादातर कहानियाँ उनकी ख़ुद की फैलाई हुई. उनका मानना था कि कम से कम उनकी नेकियों के बहाने लोग उनको अच्छे आदमी के रूप में याद रखें और उनकी तारीफ करें.
लेकिन अचानक हमारी मामूली सी बात पर उन्होंने हमसे नाता तोड़ लिया. कारण सिर्फ इतना कि उनके किसी किस्से पर अभिभूत होकर हमने बड़े भावविह्वल होकर कह दिया कि आप कुत्ते की दुम हैं सुधरेंगे नहीं. बस इत्ती सी बात पर वो बुरा मान गए!