३० अगस्त को जिसका जन्मदिन हो, वो सिर्फ इस डर से कि केक पर लगी मोमबत्तियों से आँखें जलती हैं, अपनी आँखें बंद कर लेगा हफ्ता भर पहले ही... असंभव. आदमी इतना भी डरपोक होता है कहीं. खास कर वो शख्स जिसकी उपस्थिति अपने आप में जीवन होती थी, जो सारी उम्र मौत को मुंह चिढाता रहा और आखिर मौत ने चिढकर कहा, “चल मेरे साथ! तेरी देखा-देखी लोग मुझसे उलझने लगे हैं.” और कल वो शख्स चल दिया एक अनंत यात्रा पर.
आज सुबह-सुबह संजय अनेजा (मो सम कौन) जी का फोन आया कि सलिल भैया आपको पता चला, डॉक्टर अमर कुमार नहीं रहे!” और मेरे हाथ पैर ठन्डे हो गए. डॉक्टर साहब के घर फोन की घंटी बजती रही, कोइ जवाब नहीं. तो बड़े भाई सतीश सक्सेना जी से कन्फर्म किया. हाथ पैर ठन्डे हो गए. चैतन्य को कहा तो उन्हें भी यकीन नहीं हुआ. वो इंसान जो मौत का मजाक उडाता था, जिसने कभी मौत से हार नहीं मानी, वो ऐसे खामोश कैसे हो सकता है. इतनी जल्दी साइन आउट... गलत बात है
डॉक्टर साहब! आपकी इटैलिक्स में लिखी टिप्पणियाँ, आपकी मोडरेशन के खिलाफ चुटकियाँ, आपकी शास्त्रों में पगी उक्तियाँ सब इतनी जल्दी चुक जायेंगी, हो ही नहीं सकता. इतनी सचाई इंसान में कि उम्र का फर्क बीच में नहीं आता. आख़िरी बार उनसे बात हुई अभी एकाध महीने पहले. एक पोस्ट पर उनकी टिप्पणी के सम्बन्ध में. उनकी टिप्पणी पहली बार कुछ पूर्वाग्रह से ग्रसित लगी, या फिर प्रेरित. मैंने उनको फोन किया और हकीकत बताई. उनका उत्तर यही था कि मुझे ये नहीं पता था और तुरत उन्होंने अपनी टिप्पणी हटा ली.
आज उनकी पुरानी मेल देख रहा था तो कितनी बार हंसी आयी और कितनी बार मन भर आया. नए साल पर उनको शुभकामनाएं भेजीं तो उनका जवाब देखिये:
प्रिय सलिल जी,वर्ष के अवसान पर लेखा जोखा बनाने बैठा तो सर्वप्रथम 10 मित्रों में आपको भी पाया, अहो भाग्य !आपके पुण्यकर्मों से मैं ठीक हूँ रेडियोथैरेपी का झमेला अभी चलता रहेगा एवँ कुछ शारिरिक अशक्तता है !शेष कुशल है, मेरी ओर से नववर्ष शुभकामनायें स्वीकार करें ।आपका अग्रजअमर
मैंने कहा:
डॉक्टर साहब,
एंजेल साबित हुए आप कि आपकी लिस्ट में मेरा नाम भी है..दशाब्दी का अवसान समस्त समस्याओं का अवसान सिद्ध हो आपके लिए.. नव दशाब्दि की पूर्व संध्या पर आपके चरण स्पर्श कर आशीष चाहता हूँ और परमपिता से यही प्रार्थना है कि आपको स्वास्थ्य प्रदान करे..
झमेला कोई भी हो आपसे नहीं लड़ सकता..
समस्त परिजनों को भी हमारा मंगल सन्देश पहुंचे!
सलिल
और उनके जन्मदिन पर मेरी बधाई का जवाब उन्होंने जिस अंदाज़ में दिया वो बस उन्हीं की जुबानी सुनिए जो सबूत है उनकी जिंदादिली का:
दुर, लोग सब एतना न मोमबत्ती खोंस दिया था कि फुँकते फुँकते अँखवा के आगे अन्हार छा गया,तनि सँभरे त देखते हैं केकवे गायब । आऽ त हमहूँ आपके कैटगरी में हैं.. जी ।मुला आप पहली बेर त मुँ खोले हैं त हमहू इसको खाली नहिं रहने देंगे,अपना ठेकाना बताइयेगा त तनि ?देखिये पान्छौ दिन में कैडभरी का डेब्बा पहुँचता है, कि नहीं ।हम दत्तात्रेय जी को आदर्श मानते हैं, सामने आने वाला सभी जड़ चेतन को गुरु मानते हैं,सो हमको अप्रेन्टीस गुरु बूझिये.. गुरुदेव का डिग्री मत दीजिये ।सलिल जी आप सब की शुभकामनायें ही मेरे टिके रहने का सँबल है ।अब आपको धन्यवादो देना है, का ? त उहो ले लीजिये, मुला किरपा बनाये रखीए ।सादर - अमर
हमारी और से उस महान आत्मा को श्रद्धांजलि. कहने को बहुत कुछ है, मगर अभी तो बस इतना ही:
न हाथ थाम सके, ना पकड़ सके दामन,
बहुत करीब से उठकर चला गया कोइ!