सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Friday, January 7, 2011

नरेगा की भीख बनाम विकसित राष्ट्र “इन्डिया”

आजकल प्रचार तंत्रों में सरकार द्वारा इस बात को जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि नरेगा योजना के द्वारा आम आदमी के जीवन में भी खास आदमियों जैसी समृद्दि लायी जा रही है!! अगर वास्तव में यह ऐसी चमत्कारी योजना है तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर यह “नरेगा” है क्या? राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (National Rural Employment Guarantee Act) अर्थात् नरेगा. मनमोहन सरकार का एक मनमोहनी कार्यक्रम, जिसका मकसद है, ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों की आजीविका सुरक्षा को बढाना. इसके तहत हर घर के एक वयस्क सदस्य को, सरकार द्वारा, कम से कम 100 दिनों का निश्चित रोजगार दिए जाने की गारंटी दावा है। यह रोजगार शारीरिक श्रम के संदर्भ में है और उस वयस्क व्यक्ति को प्रदान किया जाना है जो इसके लिए राज़ी हो। नरेगा का दूसरा लक्ष्य टिकाऊ परिसम्पत्तियों का सृजन कर ग्रामीण निर्धनों की आजीविका के आधार को सुदृढ़ बनाना भी बताया जाता है। योजना को एक अप्रैल 2008 से देश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार दे दिया गया है।


उपरोक्त परिपेक्ष्य में जब हमने कुछ सरकारी आँकड़ों को खंगाला, तो जो तस्वीर उभर कर आई, वो कुछ इस तरह है:


आइए अब बच्चों वाले गणित के ऐकिक नियम (युनिटरी मेथड) के अनुसार प्रति निर्धन व्यक्ति को मिलने वाली आय का आकलन करें:


एक बार फिर उपरोक्त तालिका के आकड़े पर नज़र डालें तो विश्वास नहीं होता कि कुल 29694.00 करोड़ रुपए, 42 करोड़ जनता की मज़दूरी पर ख़र्च करने हों, तो प्रत्येक मज़दूर को जो राशि प्राप्त होगी वह है
` 29694 करोड़ / 42 करोड़ = `  707.00

अब बताइये जरा कि नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या? 707 रुपये प्रति वर्ष यानि 1 रुपये 93 पैसे प्रति दिन. दिल्ली के किसी भी सिगनल पर भीख माँगने वाला भिखारी इससे अधिक की कमाई कर लेता है और किसी मंदिर या मस्जिद के बाहर बैठने वाला भिखारी इससे कहीं अधिक कमाता है. शायद आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि मुम्बई की लोकल ट्रेनों में भीख माँगने वालों की कमाई कितनी है.

लेकिन इज़्ज़त से मज़दूरी करने वाले को मिलने वाले `1.93 क्या भीख नहीं है?

Tuesday, December 7, 2010

स्नूज़ केबिन में “इंडिया” और करवटें बदलता “भारत”

मात्र रुपये तीन सौ पचहत्तर प्रति घण्टा
मीन्स थ्री सेवेंटि फाइव बक्स अन आवर ओनली!!
हैरी बड़ा हैप्पी हुआ इण्डिया में फ़ाइनली
आई जी आई एयर्पोर्ट के टर्मिनल थ्री पर
इनौग्यूरेट हुआ स्नूज़ केबिन
ग्रेट यार!
ईट वाज़ सो बोरिंग इसके बिन.
ईज़ी बेड, डीवीडी प्लेयर
वाई फ़ाई और टेबुल चेयर
सारी फ़ैसिलिटि एन्जॉय करो पर्सनली
और रेण्ट
थ्री सेवेंटी फ़ाइव बक्स ओनली

उधर
भारत के सुलतानपुर में
पेट का मारा हरिया
नम आँखों से तकता है
खाली हंडिया
और नीम के पेड़ के नीचे
बदलता करवट
उँगलियों पर कैसे रहा है गिन
और हलकान है यह सोचकर
कि पूरे हुए रोज़गार के सौ दिन
साल के बाकी दो सौ पैसठ दिन
वो कैसे कमाएगा
ख़ुद तो हवा खाकर पानी पी लेगा
लेकिन दो नन्हे बच्चों को
बिना रोटी कैसे सुलाएगा


(राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) मनमोहन सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसे जोर शोर से प्रचारित करके बार बार यह बताने की कोशिश की जाती है कि आम आदमी के जीवन में भी खास आदमीयों जैसी समृद्दि लायी जा रही है। नरेगा का मकसद, ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों की आजीविका सुरक्षा को बढाना बताया जाता है और इसके तहत हर घर के एक वयस्क सदस्य को एक वित्त वर्ष में कम से कम 100 दिनों का रोजगार दिए जाने की गारंटी देने का दावा है।)

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