सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-र-त बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Thursday, September 16, 2010

बच्चों से बातें करना


बच्चों से बातें करना
वेद पुराण उपनिषद का पढ़ना.
दिल की कहना दिल की सुनना
उन्मुक्त निडर नदिया सा बहना.
दुनिया को पैरों में रखना
पैरों को सर पर रख लेना,
सर को फिर ज़मीन पर रख कर
एक कलाबाज़ी खा जाना.
गोल गोल दुनिया के चक्कर

उनसे सदा सहज ही बचकर
अपनी दुनिया अलग बसाना
बच्चों ने बचपन से जाना.
ज़रा ग़ौर से देखें हम जो
बच्चों की नन्हीं दुनिया को
सहज भाव से भरी हुई है.
प्रेम सहज है, क्रोध सहज है
जीवन का हर छन्द सहज है
प्रीत का एक धागा ऐसा है
रोते रोते वो हँस पड़ता.

बच्चों के भावों में खोजें
एक अलौकिक ज्ञान मिलेगा
कर्ता-कर्म का द्वंद्व न होगा
पल पल का विस्तार मिलेगा.
हम सब भी तो बच्चे ही थे
इसी भाव में रचे बसे थे
फिर हमको क्या हो जाता है
वो बच्चा क्यों खो जाता है.
तत्व प्रश्न जीवन का यह है
इसका उत्तर कठिन है मिलना

बच्चों से बातें करना
वेद पुराण उपनिषद का पढ़ना.

Friday, July 16, 2010

दिल तो बच्चा है, जी!!


शर्म से लाल हुई जाती है, और गुस्से में,
लाल पीली हुई जाती है ये जानम मेरी.

कैसे गिरगिट से मैंने प्यार किया!



दिल ने ये मान लिया है कि बस मेरी हो तुम
तुमसे मिलना नहीं मुमकिन, दिमाग़ कहता है

ऑक्टोपस कहाँ जाकर बैठे!



चुप तुम भी थीं, चुप मैं भी था, दोनों चुप थे.
झगड़ा था, और खामोशी की शर्त लगी थी

उफ, कितनी बातें करती हैं आँखें तेरी!





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