कितनी आसानी से आए दिन, बहुसंख्यक शब्द का प्रयोग, हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये किया जाता है और अल्प संख्यक शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर मुस्लिम धर्म को मानने वालों के लिये किया जाता है! यह प्रयोग यही दिखाता है कि धार्मिक पहचान हमारे मन-मस्तिष्क में कितनी गहरी पैठी हुई है. वरना हम कहते धार्मिक बहुसंख्यक या धार्मिक अल्पसंख्यक.
मनीषियों का तर्क है कि "यह मत भूलिए कि हम हिन्दू हैं और हम हर धर्म का आदर करते हैं और यह सहिष्णुता ही हमारी पहचान है जो हमें औरों से अलग पहचान देती है!"
बस यही मनोविज्ञान हमारी समस्या है, हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का फलसफा समझाने वाले अंत में अपने तथाकथित धर्म की विशिष्टता बताने का मोह नहीं छोड़ पाते. यही बात किसी मुस्लिम धर्म को मानने वाले ने कही होती तो इस तरह होती शायद, "यह मत भूलिए कि हम मुस्लिम हैं और कुरान पाक मानवता का पाठ पढ़ाती है, हमारी यही बात हमें औरों से अलग पहचान देती है !"
एकता और भाईचारे की बात करते हुए कितनी खूबसूरती से अलग हो गये दोनों.
इस विषय में ओशो के विचार बिल्कुल व्यावहारिक हैं,और समस्या के मूल पर आघात करते हैं. तनिक ध्यान से सुनें, ओशो कहते हैं:
"हिन्दू मुस्लिम को भाई-भाई समझाने से यह धार्मिक भेदभाव समाप्त नहीं होंगे. ऐसा करने से कुछ फायदा तो हुआ नहीं है, वरन नुकसान अधिक हुआ है.
अगर हिदुस्तान के समझदार नेता हिन्दु और मुसलमान को भाई–भाई होना न समझाते तो शायद पार्टीशन न होता. उसके कारण हैं! जब हमने पचास साल तक निरंतर कहा कि हिन्दु-मुसलमान भाई-भाई हैं. फिर भी हिन्दु-मुसलमान साथ-साथ रहने को राजी नहीं हुए तो भाई-भाई के तर्क ने लोगों को ख्याल दिया कि अगर दो भाई साथ न रह सकें, तो सम्पत्ति का बटंवारा कर लेना चाहिये. पार्टीशन, दो भाईयों के बीच झगड़े का आखिरी निबटारा है.
अगर गांधी जी ने हिन्दुस्तान को मुसलमान-हिन्दु के भाई-भाई की शिक्षा न दी होती, तो पार्टीशन का लॉज़िक ख्याल में भी नहीं आ सकता था. असल में बँटवारा सदा, दो भाईयों के बीच होता है. पार्टीशन होने के पहले दोनों भाई हैं, इसकी हवा पैदा होनी जरुरी थी. एक दफा यह ख्याल पैदा हो गया कि दोनों सगे भाई हैं और साथ रहने को मजबूर हैं, तो स्वाभाविक लॉजिकल कनक्लूज़न, जो तार्किक निष्कर्ष था वह हुआ कि फिर ठीक है, बँटवारा कर लें. जैसे दो भाई लड़ते हैं और बटंवारा कर लेते हैं. वैसे ही फिर गांधी जी को या किसी और को कहने का उपाय न रहा कि बँटवारा न होने देंगे.
हम कभी नहीं कहते कि ईसाई ईसाई भाई भाई हैं. हम ये क्यों कहते हैं कि मुसलमान–हिन्दु भाई-भाई हैं. यह “भाई-भाई” का कहना जो है, खतरे की सूचना है. इससे पता चलना शुरु हो गया कि झगड़ा खड़ा है.... "
इसका हल है कि हम प्रेम करें. प्रेम का पाठ पढ़ाएँ, प्रेम का पाठ पढ़ें. क्योंकि, प्रेम शुरु पहले हो जाता है, पता पीछे चलता है - कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान है. और जब एक बार प्रेम शुरु हो जाए तो हिन्दू-मुसलमान दो कौड़ी की बातें हैं. उनको आसानी से फेंका जा सकता है. जहा प्रेम नहीं है वहीं इन बातों का मतलब है.