कई सरकारी दफ्तरों में महात्मा गाँधी का यह अनमोल वचन, एक ख़ूबसूरत फ्रेम में जड़ा दीवार से लटकता नज़र आता हैं कि “जब भी तुम कोई योजना या कार्य का शुभारम्भ करते हो तो सबसे पहले देश के सबसे निर्धन नागरिक का चेहरा याद करो और चिंतन करो कि इस योजना या कार्य से उसका क्या भला हो सकता है”.
गाँधी जी की तस्वीर की तरह यह वचन भी अब शायद फ्रेम में फ्रीज़ होकर रह गया है यही कारण है कि आजादी के पिछले साठ सालों में एक ऐसा सुविधाभोगी समाज प्रबल हो कर उभरा है जिसे गरीबी, भूख और भ्रष्टाचार की बातें नकारात्मक या व्यव्स्था विरोधी लगती हैं। सरकारी आकड़ों की घुट्टी उसे अब इतनी सुहाती है कि उन सरकारी आंकड़ों की पोल खोलता कोई भी आंकड़ा उसे या तो आँकड़ों की बाजीगरी लगता है या फिर “ऐसा करके क्या हासिल हो जायेगा” यह कहकर वह भ्रष्टतंत्र के पक्ष में खड़ा होने से भी नहीं कतराता।
इस भ्रष्टतंत्र की रोज़गार योजनाओं के प्रति अपने इसी संतोषी नज़रिये के कारण जब वह वर्ग यह कहता है कि “चलो भाई कुछ लोगों को तो सुविधा और रोज़गार मिल ही रहा है ना” तब यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि यह भ्रष्टाकचार का सरलीकरण नहीं तो और क्या है? याद करें श्रीमान राजीव गाँधी का यह कथन कि सरकार से चला 1 रुपया जनता तक जब पहुचता है तो 15 पैसे हो जाता है या फिर श्रीमती इन्दिरा गाँधी का वह ऐतिहासिक कथन कि “भ्रष्टाचार एक ग्लोबल समस्या है!”
क्या यह इसी मानसिकता का परिणाम नहीं है कि आज भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा भर ही नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार ही व्यवस्था बन गया है।
एक ओर तो देश की व्यवस्था जब प्रतिशत में यह बताती है कि विकास दर, मुद्रास्फ़ीति, जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय वगैरह क्या है और दूसरी ओर गरीबी, भूख और भ्रष्टाचार जस के तस बने रहते हैं. तब तो कोई इन्हें आँकड़ों की बाजीगरी नहीं कहता? “सम्वेदना के स्वर” पर हम अक्सर आँकड़ों की पृष्ठभूमि का सच टटोलने की कोशिश करते हैं। ऐसे में जो आँकड़े और विश्लेषण हमने प्रस्तुत किए हैं, भले ही किसी को आँकड़ों की बाजीगरी लगे, लेकिन हम तो आम आदमी की तरह कुछ तथ्यों के साथ बस चौथी पाँचवीं कक्षा का गणित ही उसमें लगाते हैं. जैसे पिछली पोस्ट में।
इस बार सिर्फ प्रस्तुत हैं मात्र तथ्य :
• देश की बीमारी का इलाज़ करने वाले “डॉक्टरों” में अभी इस बात पर ही सहमति नहीं है कि वास्तव में 80 करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं या 42 करोड़?
• उपरोक्त आंकड़े क्रमश: अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी और सुरेश तेन्दुलकर कमेटी ने दिये हैं, दोनों ही आंकड़ों से व्यवस्था की विसंगतियाँ ही उजागर होती हैं।
• ओबामा के यह कहने से की भारत एक विकसित देश है, हम बहुत खुश होते हैं। परंतु जब विक्कीलीक्स में वही अमेरिका भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र के स्थायी सदस्य होने की बात पर भारत की हसीं उड़ाता है तो हम उस बात की उपेक्षा कर देते हैं।
• सरकारी आँकडों के अनुसार पिछले 10 वर्षॉं में 2 लाख किसानों ने इस देश में आत्महत्या की है! एनडीटीवी जैसा सरकारी टेलीविज़न चैनल तक यह आंकड़ा देता है कि 2009 में सिर्फ महाराष्ट्र में 19,000 से अधिक किसानों ने आत्म हत्या कर ली है।
• मुम्बई के धारावी इलाके में मात्र 175 हेक्टेयर जमीन के टुकड़े पर 6 लाख लोग ठूसें हुये हैं।
• एक रिपोर्ट के अनुसार तो जिन जिन गाँवों में नरेगा स्कीम सफल हुई है, उन उन गाँवों के सरपंच के घर के आगे एक-एक सियासी झंड़ा लगी एसयूवी गाड़ी खड़ी पायी गयी है।
दुष्यंत कुमार के शेर सुनकर तालियाँ बजाते, वाह वाह करते लोग बड़े जोश में एलान कर देते हैं अपने सीने में जलती आग का या हाथ में लिये उस पत्थर का जिससे आकाश में सुराख़ करने का जोश लिये फिरते हैं वो. मगर जब कोई इबारत उनको ऐसा करने को उकसाती है तो दुबक जाते हैं कोड ऑफ कंडक्ट की दीवार के पीछे. प्यार, भाईचारा, समानता, मित्रता, सहृदयता, सहिष्णुता की बातें क्या सिर्फ हिंदू मुस्लिम पर लागू होती हैं, सामाजिक अस्पृश्यता पर नहीं!
रेशमी ज़ुल्फें, नशीली आँखें, प्रेम की पराकाष्ठा, विरह की वेदना, चाँद की सुंदरता पर सब मुग्ध हो जाते हैं, मगर मजलूम के आँसुओं से साफ बचकर निकल जाते हैं तटस्थता का रोना रोकर.
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध!