सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Showing posts with label शोधपत्र. Show all posts
Showing posts with label शोधपत्र. Show all posts

Monday, August 23, 2010

पीपली [लाइव]: भारतीय राजनीति पर एक शोधपत्र

पचास और साठ के दशक में, राजकपूर, सुनील दत्त आदि को लेकर बनी फिल्मों में रूसी साम्यवाद और नेहरु के औद्यौगीकरण का मेल साफ पकड़ में आता था. फिल्में एक सपना छोड़ जाती थीं, नये भारत के निर्माण का. उसके बाद के तीन दशकों की फिल्में देखे तो इंदिरा गाँधी के समय की “आँधी”, इमरजेंसी में लोकतांत्रिक संस्थाओं के बिखराव और सत्ता के चन्द हाथों मे सिमटनें की खबर देती है. फिर “आज का एमएलए रामअवतार”, “इंकलाब” से लेकर “गंगाजल” सरीखी फिल्मों ने भ्रष्ट हो चले राजनैतिक तंत्र को गोली से उड़ा देने का सतही तरीका पेश किया. जहाँ अभी हाल में आई फिल्म “राजनीति” ने सत्ता की तरफ खड़े होकर सत्ता का चेहरा दिखाया, वहीं पीपली लाइव नें ग्रामीण भारत की तरफ खड़े होकर सत्ता का और भी भयानक चेहरा दिखाया है और इस मायने में फिल्म एक संपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करने में सफल होती है.

सलिलः गंदी राजनीति करने वाले, मुद्दों की राजनीति नहीं करते. उनके लिए आवश्यक है कि हर मुद्दे को राजनैतिक रंग दे दिया जाए. और इस फिल्म में इसे भरपूर दिखाया गया है.

सोनीः बिल्कुल सही! जैसे ही नत्था के आत्महत्या करने की ख़बर राजनेताओं के कानों में पड़ी, उनके कान खड़े हो गए. उन्हें राजनीति करने का मौका जो मिल गया और ये मौका मिलते ही सभी अपने अपने स्तर पर शुरू हो गये राजनीति की रोटियां सेंकने! गाँव के लोकल नेता से लेकर मुख्यमंत्री तक, सभी नत्था की आत्महत्या की कहानी का फायदा उठाने लगे !

मनोजः फिल्म हमारी राजनैतिक व्यवस्था में लगी दीमक का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। वास्तविक मुद्दों से हटकर अनपढ़ और अशिक्षित लोगों को मूर्ख बनाने वाली बातों को हवा देकर, येन-केन-प्रकारेण उनके वोट हासिल करने के जितने ढ़ंग अपनाए जा सकते हैं, उन्हें अपना कर, सत्ता के गलियारों में बने हुए हमारे राजनेताओं के कारनामों को फिल्म को आगे बढ़ाने और देश के आम नागरिक की समस्या के प्रति उनकी सम्वेदनहीनता को मुखर करने के लिए किया गया है ।

चैतन्यः भारतीय राजनीति का घिनौना चेहरा फिल्म के हर दृश्य में बिखरा मिलता है. फिल्म देखकर यह अहसास और भी बढ़ जाता है कि राजनीति हमारी ज़िन्दगी पर किस तरह से हावी है. ग्रामीण भारत जो पूरी तरह से हाशिये पर जी रहा है उसके मुँह का निवाला भी देश और प्रदेश की राजनैतिक चालों पर निर्भर है.

मनोजः पीपली लाइव राजनीति के दाँव-पेंच को प्रदर्शित करती है । नेताओं के दोहरे चेहरे और समस्या के समाधान की बजाय उसमें वोट की राजनीति देखना, जातिवाद को बढ़ावा देना और तो और यदि इसके लिए किसी की आत्महत्या भी सहारा बने तो उसे प्रश्रय देना इस फिल्म के प्लाट के अहम हिस्से हैं ।

सोनीः नत्था की आत्महत्या की खबर सुनते है गाँव के सत्ता पक्ष के नेता को चिंता सताने लगी क्योकि उसको इसमें अपने वोट नज़र आ रहे थे और वो पहुँच गया नत्था के घर धमकी भरे अंदाज़ में कह दिया बुधिया को की अगर नत्था नहीं मारा तो वो उसे मार देगा! अपनी अपनी कुर्सी बचाने के लिए सभी जुगत में लगे रहे और एक लाल बहादुर(हैंडपंप) भेज दिया नत्था के घर ताकि वो अपना इरादा बदल दे. वहीं जब ये खबर विपक्ष के लोकल नेता पप्पू लाल को मिली तो उन्होंने तो पूरा ट्विस्ट दे दिया इस कहानी को. उसने इसमें जाति को जोड़ कर राजनीति शुरू की और नत्था को गिफ्ट में टीवी दिया फूलों का हार पहनाया और बड़े ही विश्वास से कहा की नत्था ज़रूर मरेगा ! क्योंकि उसे अपनी जाति के वोट जो चाइये थे. बस एक के बाद एक घटिया राजनीति शुरू होती गयी! सभी के लिए नत्था वोट इकट्ठा करने का जरिया बन गया और सभी को गाँव के इलेक्शन का रुख बदलता हुआ नज़र आने लगा!

चैतन्यः भारतीय राजनीतिक तन्त्र का सड़ाध मारता मलबा, इस फिल्म में जगह जगह पड़ा मिलता है. फिर वो चाहे आत्म हत्या के नाम पर मिलता मुआवज़ा हो, सरकारी अनुदान के रूप में “लाल बहादुर” नलकूप हो, महात्मा गांधी से इन्दिरा गांधी तक के नाम से चलने वाली योजनाओं की मृग मारीचिका हो या राज्य और केन्द्र सरकारों की खीचतान.

मनोजः केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच होने वाली खींचतान और मुद्दों पर असहमति के स्वर के पीछे चल रही घटिया राजनीति को बिना किसी आवरण के दिखाने की कोशिश हुई है।ग़रीबों के हित में चलने वाली योजनाओं का क्रियान्वयन, हमारे शासन तन्त्र में किस प्रकार होता है, इसका व्यवहारिक चित्रण हुआ है । सरकारी योजनाएँ कैसे भ्रष्टाचार का शिकार होती हैं, निर्देशक ने इन सभी का समावेश फिल्म में कर दिया है ।

सोनीः इस पूरे मामले में विधायिका अपने हाथ बांधे हुए सिर्फ एक ही डायलॉग बोलती रही कि "we are waiting for the High court's order ." वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री को दोष देने में लगे हैं. विडम्बना ये कि नत्था जैसों के लिए सरकार के पास कोई योजना थी भी नहीं! जितनी भी योजनाएँ थीं, उसमे नत्था किसी भी केटेगरी में नहीं आता था! मंत्री ने खीज कर कहा कि कोई योजना ही बना दो क्योंकि वो कैसे भी इस सबसे अपना पीछा छुड़ाना चाहता था ! हालाँकि आखिर में एक नत्था कार्ड बनाया भी गया लेकिन उसका फायदा नत्था को ही नहीं मिला!

सलिलः यहाँ एक ओर विधायिका शतरंजी चालों में लिप्त ग्रामीणों के मोहरों से विरोधी को परास्त करने की साज़िश में मग्न दिखाई गई है, जहाँ ज़मीनी समस्याएँ सुलझाने के लिए नहीं, उलझाने और उलझाए रखने के लिए होती हैं. दूसरी ओर बेबस कार्यपालिका, स्थानीय स्तर पर नेताओं के पान की पीक का उगालदान बनी घूमती है, केंद्रीय स्तर पर हर समस्या का निदान विधायिका या न्यायपालिका पर डालकर दार्जिलिंग चाय की चुस्की लेती है और कुछ करने का जोश लिए एक नौजवान को वही विरासत सौंपती है.

अंत में:

चैतन्यः मुझे यह भी खूब जंचा कि आज की भारतीय राजनीति की तरह यह फिल्म भी कोई समाधान प्रस्तुत करते हुए नहीं दिखती है. क्योकिं कोई समाधान है भी नहीं दूर दूर तक. देश के राजनीतिबाजों में अभी इस बात का ही एका नहीं है कि आखिर इस देश की समस्याएँ हैं क्या? एक पुरानी ग्रामीण कहावत है कि “कोई नृप होउ, हमें का हानि” लेकिन लोकतंत्र के इस आज के खेल में नृप पर बहुत कुछ निर्भर करता है, फिल्म देखकर यह अहसास और बढ़ जाता है.

मनोजः फिल्म कोई समाधान तो नहीं सुझाती , लेकिन इस फिल्म के माध्यम से आम नागरिक इतना जरूर समझ सकता है कि उसकी समस्या को समझने वाला आज कोई भी नहीं है, न प्रशासन, न राज्य सरकार, न केन्द्र सरकार। बस सबको मतलब है तो उसके वोटों से...चुनाव के बाद कोई मरे या नारकीय जीवन जीए इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

सोनीः सभी ने इस नत्था के केस में अपनी अपनी दुकान चलाई किसी ने भी ना तो उसे बचाने की कोशिश की और ना ही किसी तरह की मदद की पेशकश की. बस शुरू से लेकर आखिर तक क्या नेता और क्या मंत्री सभी इस खबर में अपने अपने हाथ सेंकते नज़र आए और आखिर में जब नत्था की खबर का चूल्हा बुझ गया, तो सभी निकल पड़े दूसरे चूल्हे की तलाश में, जहाँ अपनी रोटियाँ सेंकी जा सके.

सलिलः ‘राग दरबारी’ और ‘ऐनिमल फार्म’ की श्रृंखला में यह फिल्म भी राजनीति की एक घिनौनी तस्वीर प्रस्तुत करती है. स्थानीय स्तर पर विरोधी राजनैतिक दल से समझौता करना, समस्या को न सुलझाते हुए उसको जातीय रंग देकर अपना उल्लू सीधा करना, हमेशा जीतने वाले दल के साथ चलना और रास्ते में जो भी आए उसे अपहरण एवम् हत्या द्वारा हटा देना, विरोधियों के ख़िलाफ भ्रष्टाचार के कच्चे चिट्ठे को ठंडे बस्ते में डालकर, महौल गर्म होने पर इस्तेमाल करना, कभी कर्ज़ा दिलवाकर वोट लेना और कभी माफी दिलवाकर, समाज को बाँटकर लूटने के लिए कई योजनाएँ चलाना या न चलने वाली योजनाओं की घोषणा करना आदि सब कुछ है इस फिल्म में.
                                                                                                                 [समापन किस्त बुधवार को]
सम्वेदना के स्वर पर पीपली [लाइव]

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...