पत्नी ने आज सुबह ही निश्चित तौर पर यह घोषणा कर दी कि इस बार 15अगस्त “रविवार” को है. (रविवार पर ज़ोर देने का मतलब छुटटी का दिन) इसलिए हर साल की तरह 15 अगस्त को हम सब आपके साथ आपके आफिस ध्वजारोहण समारोह में नहीं जायेंगे, बल्कि “बिग बाज़ार” की मेगा डिस्काउंट सेल से, वो सभी चीज़े लेकर आयेंगे जिनके प्रस्ताव साल भर आपके समक्ष प्रस्तुत किए जाते रहे हैं. परिवार की संसद में उन सभी सामानों की खरीद पर आम सहमति भी बनी. परंतु सरकारी योजनाओं की तरह, तात्कालिक व्यस्तताओं का बहाना बनाकर, उन सभी को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया.
बेटी ने मुझे मेरे अल्पमत में आने का अह्सास कराते हुए,माँ के पक्ष में अपना मत डालते हुए कहा, याद है पापा! पिछली बार रिपब्लिक डे पर जब हम बिग बाज़ार गये थे तो इतनी अधिक भीड़ हो चुकी थी कि एंट्री अगले तीन घंटे के लिये बन्द कर दी गई थी और हम लोग बस मॉल में ही घूम फिर कर लौट आये थे. इस बार कोई रिस्क नहीं लिया जा सकता, बस!” और ये ‘बस’ का हथौड़ा काफी था यह समझाने के लिए कि फैसला सुना दिया गया है.
खैर! इस बातचीत में बेटी ने इंडिपैन्डैंस डे और रिपब्लिक डे का जो घालमेल कर दिया था, उसने मुझे एक बीती बात याद दिला दी. बात तब की है, जब राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद, पहली बार लाल किले से 15 अगस्त का भाषण दिया था और पूरे भाषण में वह बार-बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के बजाए गणतंत्र दिवस ही कहते रहे. देश के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार से हुई इस भूल को लेकर तब मैं अपनी कक्षा के मित्रों से हफ्तों बहस करता रहा था.
लेकिन अब सोचता हूँ कि बेकार ही थी वो बहस, कम से आज के समय में तो बिल्कुल बेमानी! 15 अगस्त हो या 26 जनवरी, ये दिन आज बस इसीलिए याद किए जाते हैं क्योंकि ये छुट्टी के दिन हैं, राष्ट्रीय छुट्टी के दिन. और अगर भूल से वह दिन रविवार का हो गया,जैसा कि इस साल, तो कई लोग तो कोसते हुए भी मिल जाते हैं, कि छुट्टी मारी गयी.
देखा जाये तो, जो आज़ादी हमने पाई है, उसमें आजादी का ले दे कर आज एक ही मतलब रह गया है – “आर्थिक आजादी”. अर्थशास्त्री कहते हैं “बाज़ार” भगवान है! वो सब कुछ संतुलित कर देता है, देर-सबेर बाज़ार की शक्तियाँ सबके साथ न्याय करती हैं. अबतक बेवकूफ भारतीय यही समझते रहे कि उनकी किस्मत विधाता लिखता है, इस बात से अनजान कि 21वीं सदी का भगवान तो बाज़ार है और यह “बाज़ार” ही तो है जो डिसाइड करता है, हम सबकी हैसियत.
मुझे अपनी हालत अब बहुत दयनीय सी लगने लगी, यह सोच कर कि बाज़ारवाद के इस अश्वमेघ-यज्ञ द्वारा, देश को सम्पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता दिलवाने का जो महति प्रयास “मुख्य पुरोहित मनमोहन सिंह” कर रहे हैं, उसकी एक आहुति ने मेरे पूरे परिवार को चुपचाप अपनी गिरफ्त में ले लिया और हम यहाँ “सम्वेदना के स्वर” पर भारत-इंडिया का फलसफा ही बाँचते रह गये! चिराग तले अन्धेरा वाली उक्ति याद हो आयी और मन बहुत विचलित सा हो गया. सोचने लगा कि कहीं कोई जोश ही नहीं रहा स्वतंत्रता दिवस का.
इसके उलट दूसरा नज़ारा “वेलेंटाइन डे” का है. देश के कालिजों और विश्वविद्यालयों में युवा वर्ग को “वेलेंटाइन डे” का कितना बेताबी से इंतज़ार करता रहता है. सेलेब्रेशन का आलम ये कि इस दिन बाज़ार से सारे गुलाब के फूल नदारद.और तो और बड़े बुजुर्ग भी इस दिन का नाम लेकर चुटकियाते देखे जाते हैं. तो क्या “वेलेंटाइन डे” से भी गयी गुजरी बात है, स्वतंत्रता दिवस?
लगता तो यही है कि अब स्वतंत्रता दिवस की पहचान बिग बाज़ार की डिस्काउंट सेल से ही होगी? सच भी है! कॉमनवेल्थ खेलों का भ्रष्टाचार हो, अवैध खनन में लुटती देश की सम्पदा हो, नरेगा-मरेगा के घोटाले हों या विदेशी कम्पनियों का बेहतर रिटर्न के लालच में देश में हो रहा निवेश हो. कुल मिलाकर देश की डिस्काउंट सेल ही तो लगी है...हर रोज़, हर ओर...
आइये स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर महा-डिस्काउंट-सेल का आनन्द लें, इस मनमोहनी बिग बाज़ार में...गणतंत्र दिवस! नहीं नहीं !! स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!!
