आज देश में लोकतंत्र का चौथा खम्बा श्वानों के लिए ही खुशी का कारण रह गया है. और उनकी गिरवी रखी कलम की जो धूम इन दिनों मची है, उससे तो यही लगता है कि उन्होंने अब कलम सिर्फ नाड़ा डालने के लिए ही रख छोड़ी है. पिछले दिनों हमें हमारी ही एक कविता की सच्चाई देखने को मिली. यह कविता एक पाकिस्तानी कवि हबीब जालिब की उर्दू कविता का तर्जुमा थी, उसी कविता को आगे बढ़ाते हुए, एक मर्सिया चौथे खम्बे के पहरेदारों की गिरवी रखी कलम के नाम:
देश की भलाई का विचार आज टाल दो
राष्ट्र के निर्माण को दिमाग़ से निकाल दो
ध्वज नहीं, सवाल है, जवाब तो उछाल दो.
गर्त्त में है आत्मा ये क्या हुआ है हाल रे
अब तो अपनी लेखनी से नाड़ा ही तू डाल रे!
अप्रवासी भारतीय प्यार करता देश से
कौन मंत्री बने तो कौन बाहर रेस से
ऐसे काम में मदद करो छिपे ही भेस से
क्या बुरा है इसमें मिलता जेब में जो माल रे
अब तो अपनी लेखनी से नाड़ा ही तू डाल रे!
नीरा की सुरा पिए हैं देश के ये पहरेदार
बरखा नोट की बरस रही है आज बेशुमार
वीर दुम दबाये हुये घूम रहा लगातार
पूरे घटनाक्रम पे क्यों उठा नहीं सवाल रे
अब तो अपनी लेखनी से नाड़ा ही तू डाल रे!
बोलता मुकेश कांगरेस तो दुकान है
दाम दो खरीद लो, ये मंत्री सामान है
बेचकर भी लेखनी बची ये इनकी शान है
दत्त सांघवी पे क्यों मचा नहीं बवाल रे
अब तो अपनी लेखनी से नाड़ा ही तू डाल रे!
अर्थ तो रिलायंस का भरोसा है तू सीख ले
टाटा के नमक से तू नमकहलाली सीख ले
टेलिकॉम के नाम पर करोड़ों की तू भीख ले
पूरे लोकतंत्र पर बिछा है नोटजाल रे
अब तो अपनी लेखनी से नाड़ा ही तू डाल रे!
