सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-र-त बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Saturday, February 27, 2010

होली तो इतिहास में हो ली...




होली का त्यौहार, मची धूम चारों ओर है जी, देख-देख रंग की बौछार मन डरता है.
देश पर  भ्रष्ट  नेताओं  का   है  काला   रंग,  आतंक  की आग में ये देश देखो जरता है.
रंग  सतरंगी,  इन्द्रधनुष  सरीखे  थे  कल,  आज  भगवा  तो  हरा  शोर  कोई  करता  है.
महंगाई ने जो तोड़ रखी है कमर सब की, जनता का पेट आधा चौथाई ही भरता है.

गोरी की कलाई सूनी, चूड़ियाँ नहीं हैं सजी, श्याम भी सहम के कलाई आज धरता है.
फटी हुयी चूनर से झांकता यौवन और रीत गयी गागर से जल भूमि परता है.
माल तो समाप्त हुआ, पूआ बेसवाद हुआ, बालूशाही में से बालू-सा-ही कुछ झरता है
होलिका दहन प्रतिदिन हो रहा है आज, जीवन की चिता में मनुज नित जरता है.
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