बताया जाता है कि यह फिल्म अनुशा रिज़वी ने 2004 में लिखी थी, जब वो NDTV के लिए काम करती थीं. उनकी स्क्रिप्ट ‘द फॉलेन’ आमिर ख़ान को बहुत पसंद आई, मगर वो तब मंगल पाण्डे के निर्माण में व्यस्त थे.इसलिए यह फिल्म उस समय टल गई. छः वर्षों का अंतराल फिल्म को और सामयिक बना गया है, क्योंकि जो समस्याएँ या विचार इस फिल्म के माध्यम से रखे गए हैं, वो आज बड़ी शिद्दत से समाज में महसूस किए जा रहे हैं. यह फिल्म आपसे बात करती है, मगर भाषण नहीं देती. समस्याएँ दिखाती है, मगर हल नहीं सुझाती, क्योंकि हल सुझाना फिल्मकार का काम नहीं. और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी है.
फिल्म के प्रोमोज़ देखकर हमने यानि चैतन्य,सलिल और मनोज ने एक बार फिर एक साथ यह फिल्म देखने का मन बनाया ताकि फिल्म राजनीति पर की गई हमारी परिचर्चा की तर्ज़ पर, इस फिल्म की भी समीक्षा की जाए. फिल्म ग्रामीण भारत का आईना, एक राजनैतिक दस्तावेज़ या फिर कुकुरमुत्ते की तरह फैलती सैटेलाईट छतरी तले मीडिया का मल उत्सर्जन कहा जा सकता है. किंतु इन सबसे आगे जाकर यह फिल्म एक दस्तावेज़ है, एक जाँच समिति की रिपोर्ट की तरह, जिसके मुखिया हैं आमिर ख़ान.
भारत डेड - इण्डिया अलाइवः
सलिलः नत्था और बुधिया दो भाई, कभी गाँजा, कभी कच्ची शराब के नशे में, अपनी बेरोज़गारी की ज़िंदगी और गिरवी रखी ज़मीन, तीन बच्चों की परवरिश और अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह चुराते, पूरे ग्रामीण परिवेश का प्रतिनिधित्व करते हैं.
चैतन्यः ग्रामीण परिवेश नहीं सलिल भाई, भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. फिल्म भारत और इंडिया के विभाजन को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है.और इस फिल्म में यह विभाजन भी खुल कर दिखाई भी देता है. नत्था और बुधिया का पीपली गाँव दिमाग के एक हिस्से में ठहर सा जाता है, भारत बनकर. उसके उलट इंडिया अपने अभिजात्य से भरपूर दार्जिलिंग चाय की चुस्कियाँ लगाता, निश्चिन्त सा लगता यह कहता लगता है कि “आल इज़ वैल!”
मनोजः आप दोनों की बातों के अतिरिक्त भी एक अलग पहलू मुझे दिखा. फिल्म देखते हुए मुझे प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास याद आने लगे । विशेषत: कफन कहानी ।आश्चर्य तो तब होता है कि प्रेमचंद के साहित्य में तो 20 वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में किसान और गरीबों की दशा का यथार्थपरक चित्रण मिलता है, लेकिन आज 21वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भी किसान और गाँवों में बसने वाले किसानों की दशा में कोई अंतर नहीं आया है ।
सलिलः बिल्कुल सही. दरसल भारत की ज़मीनी समस्या ही इस फिल्म की बुनियाद है. ज़मीनें गिरवी, कर्ज़ चुकाने को आय का साधन नहीं. और सरकार अपना दायित्व कृषि मंत्रालय और नौकरशाह पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेती है.
मनोजः आज भारत में प्रति वर्ष कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि पर करीब पंद्रह हज़ार करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन किसान की दशा दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है । उसमें कोई अंतर नहीं आया। फिल्म में इन सभी मुद्दों के लिए जिम्मेवार तत्वों जैसे वोट की राजनीति, सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता आदि का बेहतरीन चित्रण हुआ है.
चैतन्यः फिल्म कई बार यह बात उभारनें में कामयाब होती है कि भारत की 70% आबादी किस क़दर बदतर हालात में गुजर बसर कर रही है. एक पात्र खीझ कर कहता है “बीज और खाद के लिये विदेशी कम्पनियों पर निर्भर हैं और वर्षा के लिये इन्द्र देवता पर.” और वो बीज भी आयातित जिसका ठेका कृषि मंत्री के विदेशी मित्र के पास है.
मनोजः 20वीं शताब्दी का किसान साहूकार के कर्ज से दबा था, तो 21वीं सदी का किसान बैंक के कर्ज से । कर्ज से मुक्ति के लिए किसान किस तरह से भूमिहीन होता है और मुआवजे के रूप में एक लाख रुपए हासिल करने के लिए नत्था को उसका बड़ा भाई बुधिया आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है, ताकि एवज में उसके बच्चों का भविष्य संवर सके ।
सलिलः जब खेती कर नहीं सकता किसान. तो ऐसे में कोई भी आस, दो पैसे की, उन्हें कुछ भी करने को सहर्ष तैयार कर लेती है, यहाँ तक कि आत्महत्या भी, क्योंकि ऐसा उन्होंने सुन रखा है कि इससे उन्हें एक लाख रुपये मिलेंगे. यह एक लाख रुपये उनके सपने पूरे कर सकता है, यह सोच उनकी आँखों में चमक पैदा करती है, लेकिन इसके लिए उसे जान देनी होगी, इस बात से वह चमक ज़रा भी धुंधली नहीं होती. अब इससे मार्मिक घटना तो कभी देखी भी नहीं.
चैतन्यः अरे मार्मिक और करूणा वाली बात छोड़ो सलिल भाई. भारत की दुर्दशा का इससे सटीक चित्रण और क्या होगा कि इंडिया का एक टेलीविज़न पत्रकार अपने कैमरामैन को डाटतें हुये सुबह शौच को जाते हुए ग्रामीणों की तसवीरें खीचनें के लिये उकसाते हुए कहता है कि “अबे, खींच इनकी तस्वीरें, 70% भारत इसी तरह खुले में टट्टी करने जाता है.”
सलिलः नत्था और बुधिया तो हो गए मुख्य चरित्र, लेकिन वह किसान अपनी अलग पहचान रखता है जो चुपचाप बंजर,पथरीली ज़मीन पर फावड़ा चलाता रहता है और वहीं दम तोड़ देता है. सम्वेदनहीनता की हद देखिए कि किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता.
चैतन्यः लोगों की भावनाएँ भी गाँव की ज़मीन की तरह बंजर हो चुकी हैं. और वो फिल्म में एकदम साफ साफ फिल्माया गया है.
मनोज: एक किसान मिट्टी खोदता रहता है, मानो उसका जीवन बस इसी काम के लिए बना है, जीवन के दूसरे रंग और विषय भी हैं, इस सबसे बेखबर वह मिट्टी खोदता रहता है और उसी गड्ढे में दम तोड़ देता है । मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में ही समा जाना, कितना नियतिवादी था वह। किसी को इसकी कोई परवाह नहीं । बस उसके मरने से रिपोर्टर राकेश कुछ द्रवित होता है ।
सलिलः नत्था द्वारा आत्महत्या की बात पर गाँव में लगे मेले से कई बेरोज़गारों को कमाने का अवसर मिलता है और वो यह भूल जाते हैं कि यह मेला किसी की मौत का जश्न मनाने के लिए लगा है. आपको क्या लगता है कि निर्देशक ने कहीं स्पष्ट किया है कि यह भारत और इण्डिया की लड़ाई का क्या नतीजा हो सकता है?
चैतन्यः भारत और इंडिया कि इस लड़ाई का अंजाम क्या हो रहा है उसकी मिसाल है फिल्म का अंतिम दृष्य जिसमें धूल मिट्टी से सना-पुता, नत्था गुड़गाँव की किसी बहुमंज़िला इमारत में नींव खोदते हुए जब थक कर वहीं मिट्टी के ढेर पर बैठ जाता है तो उसकी बेबस आंखे बींध जाती हैं भीतर तक, और यदि आपके अन्दर अभी भी कुछ मनुष्यत्व बचा है तो एक बेचैन कर देनी वाली हूक सी उठती है, मन में भीतर कहीं.
मनोज: भारत की तस्वीर धुंधली है पीपली की तरह, वहीं इंडिया की तस्वीर चुंधिया देने वाली रोशनी में नहाई हुई सी, गुड़गाँव की शीशे वाली बिल्डिंग के जैसी। इंडिया भारत की इस धुंधली तसवीर से पैसा कमाता है और खुद वातानुकूलित भवनों में ऐश्वर्य के सुख भोगता है ।
सलिलः अंत में किसान का गाँव से शहर की ओर पलायन. कब से सुनते आए हैं कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है, यह फिल्म बताती है कि गाँव में बस आत्माएँ ही बसती हैं. भटकती आत्माएँ!! फिल्म ने अंत में सरकारी आँकड़े दिखाए हैं कि पिछले दशक में 80 लाख किसान गाँव से पलायन कर चुके हैं.
चैतन्यः कामनवैल्थ खेल करा कर देश के हुक्मरान देश की जो तस्वीर बदलनें का दावा कर रहें हैं उनपर गोबर की वर्षा कर रही है यह फिल्म पीपली लाइव.
(समीक्षा का अगला अंकः पीपली लाइव में मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन
शनिवार सुबह)
सम्वेदना के स्वर पर पीपली लाईवः
3. BPL बनाम IPL
