सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Friday, February 18, 2011

सात ख़ून माफ़


पिछले दिनों मल्टिप्लेक्स में फ़िल्म नो वन किल्ड जेसिकादेखने गया था. उस फिल्म में एक दूसरी फ़िल्म का ट्रेलर दिखाया गया. वो मेरे लिये उस ट्रेलर का प्रीमियर था, क्योंकि टीवी मैं देखता नहीं, इसलिये टीवी पर दिखाया जाने वाला प्रोमो मैंने नहीं देखा था. ख़ैर ट्रेलर देखते हुये पहले फ्रेम से दूसरे फ्रेम तक जाते जाते मेरे मुँह से निकला कि यह विशाल भारद्वाज की फ़िल्म लगती है. और तब तक ट्रेलर ख़त्म हुआ और पर्दे पर दिखासात ख़ून माफ़” – विशाल भारद्वाज फ़िल्म.
 
तब सोचा था कि फ़िल्म के रिव्यू तो सभी लिखते हैं, मैं प्रिव्यू लिखता हूँ. सारी जानकारी समेट ली, लेकिन व्य्स्तताओं के कारण लिख नहीं पाया. और देखते देखते आज 18 तारीख हो गई, फ़िल्म के रिलीज़ होने का दिन. ऑफिस से छुट्टी की और फर्स्ट डे, फर्स्ट शो देखने चला गया फ़िल्म सात खून माफ़. मकड़ी, मक़बूल, ओंकारा,कमीने और  इश्क़िया के बाद विशाल भारद्वाज की नई फ़िल्म. बीच में एक और फ़िल्म बनाई थी इन्होंने ब्ल्यू अम्ब्रेला,जो रस्किन बॉण्ड की कहानी पर आधारित थी. फ़िल्म सात ख़ून माफ़ भी उन्हीं की कहानी पर बनी है.
 
चार पन्नों की कहानी सुज़ैन्ना सेवेन हस्बैंड्स, को ढ़ाई घण्टे की फ़िल्म में ढ़ालकर एक बेहतरीन कहानी पर्दे प्रस्तुत करना विशाल भारद्वाज के बस की ही बात है. सुज़ैन्ना का किरदार अदा किया है प्रियंका चोपड़ा ने जो उनके साथ फ़िल्म कमीने में पहले भी काम कर चुकी हैं, एक जवान लड़की से लेकर एक प्रौढ़ औरत तक का सफर प्रियंका ने बख़ूबी निभाया है. यहाँ तक कि एक सीन में प्रियंका की सूजी हुई उँगलियाँ उसकी बढ़ती उम्र को एकदम असलियत का रूप देती है. सुज़ैन्ना के इस सफर में उसके पतियों का रोल निभाया है, नील नितिन मुकेश, जॉन अब्राहम, इरफान खान, अन्नू कपूर, नसीरुद्दीन शाह और अलेक्सांद्र द्याचेंको ने.

कहते हैं एक मकड़ी, एक मकड़े को अपना पति बनाने के बाद उसको मार डालती है, और इसी मकड़ी को औरत का रूप दिया है सुज़ैन्ना के किरदार ने. फ़िल्म में एक जगह सुज़ैन्ना के मुँह से यह भी कहलवाया गया है कि हर औरत के ज़हन में अपनी ज़िंदगी में ये ख़्याल कभी कभी ज़रूर आता है कि वो अपने पति का ख़ून कर दे. और इस फ़िल्म में वो यही करती है. प्यार की तलाश उसको हर बार एक नये मर्द से मिलवाती है और उस मर्द का वहशीपन और बे‌ईमानी, उससे उनका ख़ून करवाती है. उसके इस चरित्र के पीछे एक कहानी बताई गई है. बचपन में वो पैदल स्कूल जाती थी और उसके स्कूल जाने के दो रास्ते थे, दोनों बराबर. मगर वो जिस रास्ते से जाती थी उसमें एक पागल कुत्ता रहता था, जो उसे डराता था. सुज़ैन्ना ने किसी के भी कहने से अपना रास्ता नहीं बदला और एक दिन अपने बाप की पिस्तौल छिपाकर ले गई और उस कुत्ते को मार डाला. यही थीम भी है फ़िल्म की. सुज़ैन्ना ख़ुद कहती है कि सारे बुरे और बे‌ईमान मर्द मेरी ही किसमत में क्यों लिखे हैं. और उनको सज़ा देने का पाप भी उसके ही सिर आता है.

फ़िल्म के सारे कलाकार मँजे हुए हैं और अपने रोल में समा जाते हैं. फ़िल्म के लोकेशन, फोटोग्राफ़ी, सेट और इन सबके साथ बैकग्राउण्ड म्यूज़िक ने पूरा माहौल जीवंत कर दिया है. कलाकारों के बीच उषा उठुप, विशाल भारद्वाज और ख़ुद रस्किन बॉण्ड को देखना बड़ा सुखद लगता है. उषा उठुप ने तो एक लम्बी भूमिका निभाई है, लेकिन विशाल और बॉण्ड साहब ने अतिथि कलाकार भर का ही का किया है. नसीरुद्दीन शाह के बेटे विवान शाह ने भी बहुत अच्छा काम किया है, बिल्कुल सहजता से. पूरी फ़िल्म के सूत्रधार यही हैं.

फ़िल्म में सन्गीत का भरपूर इस्तेमाल बैकग्राऊण्ड स्कोर में हुआ है, गीतों की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन फिर भी गुलज़ार साहब के गीत अच्छे बन पड़े हैं. डार्रलिंग.. पहले ही लोकप्रिय हो चुका है.

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी है इसकी प्री रिलीज़ पब्लिसिटी. रिलीज़ के पहले ही फ़िल्म की कहानी सबों की ज़ुबान पर है. इसलिये हॉल में रहस्य का तत्व बिल्कुल मौजूद नहीं. लोग एक नये किरदार के आते ही उसके क़त्ल का इंतज़ार करने लगते हैं. सिर्फ यह देखना बाक़ी रहता है कि मौत के लिये सुज़ैन्ना कौन सा तरीका अख्तियार करती है.

मूल कथा से फ़िल्म का अंत अलग दिखाया गया है. लेकिन ये मानना पड़ेगा कि कहानी का अंत बेहतरीन था, जबकि फ़िल्म का अंत समझौता. रस्किन बॉण्ड की कहानी एक रहस्य पर समाप्त होती है जैसा कि सुज़ैन्ना के हर शौहर की मौत के साथ था. लेकिन फ़िल्म में सुज़ैन्ना  का कनफेशन फ़िल्म को मिस्ट्री से बाहर निकालकर एक समझौते की ज़मीन पर खड़ा कर देता है.

फ़िल्म में मनोरंजन बिल्कुल नहीं है. और पूरी फ़िल्म एक अंधेरे साये की तरह चलती है. कहते हैं सुज़ैन्ना को काला रंग बेहद पसंद था, शायद इसलिये.

Thursday, August 19, 2010

पीपली [लाइव]

बताया जाता है कि यह फिल्म अनुशा रिज़वी ने 2004 में लिखी थी, जब वो NDTV के लिए काम करती थीं. उनकी स्क्रिप्ट ‘द फॉलेन’ आमिर ख़ान को बहुत पसंद आई, मगर वो तब मंगल पाण्डे के निर्माण में व्यस्त थे.इसलिए यह फिल्म उस समय टल गई. छः वर्षों का अंतराल फिल्म को और सामयिक बना गया है, क्योंकि जो समस्याएँ या विचार इस फिल्म के माध्यम से रखे गए हैं, वो आज बड़ी शिद्दत से समाज में महसूस किए जा रहे हैं. यह फिल्म आपसे बात करती है, मगर भाषण नहीं देती. समस्याएँ दिखाती है, मगर हल नहीं सुझाती, क्योंकि हल सुझाना फिल्मकार का काम नहीं. और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी है.


फिल्म के प्रोमोज़ देखकर हमने यानि चैतन्य,सलिल और मनोज ने एक बार फिर एक साथ यह फिल्म देखने का मन बनाया ताकि फिल्म राजनीति पर की गई हमारी परिचर्चा की तर्ज़ पर, इस फिल्म की भी समीक्षा की जाए. फिल्म ग्रामीण भारत का आईना, एक राजनैतिक दस्तावेज़ या फिर कुकुरमुत्ते की तरह फैलती सैटेलाईट छतरी तले मीडिया का मल उत्सर्जन कहा जा सकता है. किंतु इन सबसे आगे जाकर यह फिल्म एक दस्तावेज़ है, एक जाँच समिति की रिपोर्ट की तरह, जिसके मुखिया हैं आमिर ख़ान.

भारत डेड - इण्डिया अलाइवः

सलिलः नत्था और बुधिया दो भाई, कभी गाँजा, कभी कच्ची शराब के नशे में, अपनी बेरोज़गारी की ज़िंदगी और गिरवी रखी ज़मीन, तीन बच्चों की परवरिश और अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह चुराते, पूरे ग्रामीण परिवेश का प्रतिनिधित्व करते हैं.

चैतन्यः ग्रामीण परिवेश नहीं सलिल भाई, भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. फिल्म भारत और इंडिया के विभाजन को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है.और इस फिल्म में यह विभाजन भी खुल कर दिखाई भी देता है. नत्था और बुधिया का पीपली गाँव दिमाग के एक हिस्से में ठहर सा जाता है, भारत बनकर. उसके उलट इंडिया अपने अभिजात्य से भरपूर दार्जिलिंग चाय की चुस्कियाँ लगाता, निश्चिन्त सा लगता यह कहता लगता है कि “आल इज़ वैल!”

मनोजः आप दोनों की बातों के अतिरिक्त भी एक अलग पहलू मुझे दिखा. फिल्म देखते हुए मुझे प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास याद आने लगे । विशेषत: कफन कहानी ।आश्चर्य तो तब होता है कि प्रेमचंद के साहित्य में तो 20 वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में किसान और गरीबों की दशा का यथार्थपरक चित्रण मिलता है, लेकिन आज 21वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भी किसान और गाँवों में बसने वाले किसानों की दशा में कोई अंतर नहीं आया है ।

सलिलः बिल्कुल सही. दरसल भारत की ज़मीनी समस्या ही इस फिल्म की बुनियाद है. ज़मीनें गिरवी, कर्ज़ चुकाने को आय का साधन नहीं. और सरकार अपना दायित्व कृषि मंत्रालय और नौकरशाह पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेती है.

मनोजः आज भारत में प्रति वर्ष कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि पर करीब पंद्रह हज़ार करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन किसान की दशा दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है । उसमें कोई अंतर नहीं आया। फिल्म में इन सभी मुद्दों के लिए जिम्मेवार तत्वों जैसे वोट की राजनीति, सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता आदि का बेहतरीन चित्रण हुआ है.

चैतन्यः फिल्म कई बार यह बात उभारनें में कामयाब होती है कि भारत की 70% आबादी किस क़दर बदतर हालात में गुजर बसर कर रही है. एक पात्र खीझ कर कहता है “बीज और खाद के लिये विदेशी कम्पनियों पर निर्भर हैं और वर्षा के लिये इन्द्र देवता पर.” और वो बीज भी आयातित जिसका ठेका कृषि मंत्री के विदेशी मित्र के पास है.

मनोजः 20वीं शताब्दी का किसान साहूकार के कर्ज से दबा था, तो 21वीं सदी का किसान बैंक के कर्ज से । कर्ज से मुक्ति के लिए किसान किस तरह से भूमिहीन होता है और मुआवजे के रूप में एक लाख रुपए हासिल करने के लिए नत्था को उसका बड़ा भाई बुधिया आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है, ताकि एवज में उसके बच्चों का भविष्य संवर सके ।

सलिलः जब खेती कर नहीं सकता किसान. तो ऐसे में कोई भी आस, दो पैसे की, उन्हें कुछ भी करने को सहर्ष तैयार कर लेती है, यहाँ तक कि आत्महत्या भी, क्योंकि ऐसा उन्होंने सुन रखा है कि इससे उन्हें एक लाख रुपये मिलेंगे. यह एक लाख रुपये उनके सपने पूरे कर सकता है, यह सोच उनकी आँखों में चमक पैदा करती है, लेकिन इसके लिए उसे जान देनी होगी, इस बात से वह चमक ज़रा भी धुंधली नहीं होती. अब इससे मार्मिक घटना तो कभी देखी भी नहीं.

चैतन्यः अरे मार्मिक और करूणा वाली बात छोड़ो सलिल भाई. भारत की दुर्दशा का इससे सटीक चित्रण और क्या होगा कि इंडिया का एक टेलीविज़न पत्रकार अपने कैमरामैन को डाटतें हुये सुबह शौच को जाते हुए ग्रामीणों की तसवीरें खीचनें के लिये उकसाते हुए कहता है कि “अबे, खींच इनकी तस्वीरें, 70% भारत इसी तरह खुले में टट्टी करने जाता है.”

सलिलः नत्था और बुधिया तो हो गए मुख्य चरित्र, लेकिन वह किसान अपनी अलग पहचान रखता है जो चुपचाप बंजर,पथरीली ज़मीन पर फावड़ा चलाता रहता है और वहीं दम तोड़ देता है. सम्वेदनहीनता की हद देखिए कि किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता.

चैतन्यः लोगों की भावनाएँ भी गाँव की ज़मीन की तरह बंजर हो चुकी हैं. और वो फिल्म में एकदम साफ साफ फिल्माया गया है.

मनोज: एक किसान मिट्टी खोदता रहता है, मानो उसका जीवन बस इसी काम के लिए बना है, जीवन के दूसरे रंग और विषय भी हैं, इस सबसे बेखबर वह मिट्टी खोदता रहता है और उसी गड्ढे में दम तोड़ देता है । मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में ही समा जाना, कितना नियतिवादी था वह। किसी को इसकी कोई परवाह नहीं । बस उसके मरने से रिपोर्टर राकेश कुछ द्रवित होता है ।

सलिलः नत्था द्वारा आत्महत्या की बात पर गाँव में लगे मेले से कई बेरोज़गारों को कमाने का अवसर मिलता है और वो यह भूल जाते हैं कि यह मेला किसी की मौत का जश्न मनाने के लिए लगा है. आपको क्या लगता है कि निर्देशक ने कहीं स्पष्ट किया है कि यह भारत और इण्डिया की लड़ाई का क्या नतीजा हो सकता है?

चैतन्यः भारत और इंडिया कि इस लड़ाई का अंजाम क्या हो रहा है उसकी मिसाल है फिल्म का अंतिम दृष्य जिसमें धूल मिट्टी से सना-पुता, नत्था गुड़गाँव की किसी बहुमंज़िला इमारत में नींव खोदते हुए जब थक कर वहीं मिट्टी के ढेर पर बैठ जाता है तो उसकी बेबस आंखे बींध जाती हैं भीतर तक, और यदि आपके अन्दर अभी भी कुछ मनुष्यत्व बचा है तो एक बेचैन कर देनी वाली हूक सी उठती है, मन में भीतर कहीं.

मनोज: भारत की तस्वीर धुंधली है पीपली की तरह, वहीं इंडिया की तस्वीर चुंधिया देने वाली रोशनी में नहाई हुई सी, गुड़गाँव की शीशे वाली बिल्डिंग के जैसी। इंडिया भारत की इस धुंधली तसवीर से पैसा कमाता है और खुद वातानुकूलित भवनों में ऐश्वर्य के सुख भोगता है ।

सलिलः अंत में किसान का गाँव से शहर की ओर पलायन. कब से सुनते आए हैं कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है, यह फिल्म बताती है कि गाँव में बस आत्माएँ ही बसती हैं. भटकती आत्माएँ!! फिल्म ने अंत में सरकारी आँकड़े दिखाए हैं कि पिछले दशक में 80 लाख किसान गाँव से पलायन कर चुके हैं.

चैतन्यः कामनवैल्थ खेल करा कर देश के हुक्मरान देश की जो तस्वीर बदलनें का दावा कर रहें हैं उनपर गोबर की वर्षा कर रही है यह फिल्म पीपली लाइव.

(समीक्षा का अगला अंकः पीपली लाइव में मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन
शनिवार सुबह)

                          सम्वेदना के स्वर पर पीपली लाईवः

                         3. BPL बनाम IPL
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