अमीर खुसरो पर हमारी पहली पोस्ट हमने शुरूआती के दौर में लिखी थी.उसे पसंद भी किया गया. उसी कड़ी में एक और पोस्ट एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत है.
आज आधुनिक कविता में कितने प्रयोग हो रहे हैं,कविता के फॉर्मेट से लेकर भाषाई प्रयोग तक. गुलज़ार साहब ने अपनी एक नज़्मों की सीरीज़ के उंवान ही अंगरेज़ी में दे रखे हैं. उनका कहना है कि फिल्मों की भाषा अंगरेज़ी होने की वज़ह से उनके सोच की भाषा भी अंगरेज़ी हो गई है, लिहाजा कुछ ख़याल वो उसी ज़ुबान में सोचते हैं. और फिर अंगरेज़ी के कई लफ्ज़ उन्होंने अपनी शायरी में यों पिरो दिए हैं कि कोई जो दूसरा लिखे तो दूसरा ही लगे.
लेकिन दो अलग अलग भाषाओं को मिलाकर, एक ही बहर में रखते हुए, किसी ने शायरी करने का हौसला दिखाया है तो वो हैं अमीर खुसरो. मैं साहित्य का विद्यार्थी नहीं, इसलिए मैंने नहीं देखा यह प्रयोग कहीं भी. अमीर खुसरो ने लिखा – फ़ारसी और हिंदवी को मिलाकर. क़ाफ़िया, रदीफ़ और बहर की रुकावट के परे.
आज अपने कान को हाथ लगाते हुए और उस महन आत्मा से माफ़ी की दरख़्वास्त करते हुए, मैंने भी एक मामूली सी कोशिश की है कि उस शायरी को अपने अल्फ़ाज़ का जामा पहना सकूँ.
इसे तर्जुमा न समझकर उस अज़ीम शायर को मेरी श्रद्धांजलि समझें:
ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
दुराये नैना बनाये बतियां
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां
मेरी बदहाली से क्यों तुम बेखबर रहते हो यार
क्यों चुराते हो नज़र और क्यों बनाते बात हो
अब सबर भी हद से बाहर हो गया है मेरी जान
अपनी छाती से लगा लो तब ही कोई बात हो.
%%%
शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां
हिज्र की रातें तो ज़ुल्फों से भी काली आज हैं
दिन विसाल-ए-यार का है ज़िंदगी सा मुख्तसर
देख ना पाऊँ जो अपने प्यारे से मह्बूब को
कैसे काटूँ काले डँसते लम्हे सारी रात भर.
%%%
यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं,
किसे पडी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां
आज दिल पे हाय दो आँखों ने जादू डालकर
सैकड़ों धोखे दिए और लूट ले गये सारा चैन
फिक्र किसको है मेरी, कोई तो जाकर कह भी दे
मेरे उस मह्बूब को, मेरे तड़पते दिल के बैन.
%%%
चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान
हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां
शमाँ सा जलता हुआ, हैरान ज़र्रे की तरह
मैं भटकता हूँ यहाँ पर इश्क में जलता हुआ
नींद आँखों मे नहीं और खो गया है सारा चैन
तुम नहीं आए, तुम्हारा खत भी ना आया मुआ.
%%%
बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, गरीब खुसरौ
सपेट मन के, वराये राखूं
जो जाये पांव, पिया के खटियां
उस विसाल-ए-यार के एक रोज़ की खातिर सनम
जिसने खुसरो को लुभाया है न जाने कितने साल
दिल को अपने क़ाबू में रखा है इस उम्मीद पे
पाँव में जाऊँगा उनकी सेज पर, होगा विसाल.