सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-र-त बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Showing posts with label भारतीय लोकतंत्र. Show all posts
Showing posts with label भारतीय लोकतंत्र. Show all posts

Thursday, October 18, 2012

लोकतंत्र या तंत्रलोक ?



इन दिनों देश में एक के बाद एक हो रहे खुलासों से यह राय सुद्रढ़ हो रही है कि “भारत के सभी संसाधनों" पर चन्द रईसों और ताकतवर लोगों का कब्जा है। रईसों और ताकतवर लोगों के बीच बनें इस “सशक्त गठबन्धन” को हम “सिंडीकेट या माफिया” कह सकते हैं।

रईसों और ताकतवर लोगों  का यह “सिंडीकेट” कुछ “नियम-कायदे” बनाता है ताकि जो लोग रईस और ताकतवर नहीं हैं वह इस (अ)व्यवस्था से हमेशा बाहर ही रहें। यह “सिंडीकेट”, सभी महत्त्वपूर्ण जानकारियों और ज्ञान को अपने नियन्त्रण में रखता है। जानकारियों से यहाँ मतलब धन बनाने, व्यापार और रोजगार की उन सम्भावनाओं से है जिनका पूर्व ज्ञान मात्र कुछ लोगों को ही रहता है। (इसका सीधा मतलब यही है कि कौन सी जमीन महंगी होने वाली है, किस जगह हाई-वे, पावर प्लांट आदि बनाने हैं, किस प्रकार की टेक्नोलोजी या उत्पाद को बढावा देना है। सरकारी और निजी व्यापार और रोजगार की बयार किस तरफ बहेगी और उससे होने वाले लाभ की गंगा किस तरह और किस किस को तरेगी .....यही सब)

उपरोक्त जानकारियों को सीमित पहुंच तक रखने के लिये रईसों और ताकतवरों का यह “सिंडीकेट” बहुत से नियम-कायदों का मकड़जाल बुनता है। नियम-कायदों के इस मकड़जाल का पहला मकसद यही होता है कि “आम आदमी”, रईसों और ताकतवरों के इस वैभवशाली साम्राज्य से दूर रहे और उसे किसी भी तरह से चैलेंज करने की स्थिति में न पहुचें। नियम-कायदों के इस मकड़जाल में बहुत सी सीढ़ियां होती हैं और हर सीढ़ी पर एक गेट कीपर तैनात होता है।

यह (अ) व्यवस्था हर गेटकीपर को कुछ ताकत देती है जिनके द्वारा वह अपनी सीमा में नियत नियम-कायदों को नियंत्रित करता है।......यह बात महत्वपूर्ण है कि गेटकीपर का अहम काम अपने उपर वाली सीढ़ी तक पहुंच को मुश्किल बनाना है, इसके परिणाम स्वरुप प्रत्येक उपर वाले गेटकीपर की ताकत कई गुना बढ़ती जाती है। और अंत में सिंडीकेट महा-शक्तिशाली हो जाता है।

रईसों और ताकतवरों का यह सशक्त गठबन्धन या “सिंडीकेट”, अन्य सहयोगी लोगों के “शातिर नेटवर्क” के द्वारा नियम-कायदों के इस मकड़जाल को नियंत्रित करता है, और यह सुनिश्चित करता है (अ) व्यवस्था की सभी संस्थायें इस “शातिर नेटवर्क” के द्वारा नियंत्रित की जायें। इन संस्थायों के मुखिया के पद पर जब शातिर नेटवर्क के व्यक्ति को बैठाया जाता है तो उसकी ताकत बेहद उंचे दर्जे की हो जाती है क्योकिं उसके कार्य अब विधि और संविधान सम्मत हो जाते हैं और उन्हें चैलेंज करना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन को जाता है। “सशक्त गठबन्धन या सिंडीकेट” इस बात के पूरे इंतजाम करता है कि “शातिर नेटवर्क” के एक- एक व्यक्ति को ताउम्र पूर्ण सरंक्षण दिया जाये।

आप कह सकते हैं कि क्या देश का “वाच डाग” मीडिया और इस “शातिर नेटवर्क” से बाहर हुये लोग क्या इतनी आसानी से इसे काम करने दे सकते हैं?  

तब जबाब यही है कि “मीडिया” जो जनमानस को निरंतर प्रभावित करता है उसे भी इसी “शातिर नेटवर्क” द्वारा येन केन प्रकारेण नियंत्रण में रख कर “वाच डाग” से “लैप डाग” बना दिया जाता है। “शातिर नेटवर्क” में उन लोगों को सहर्ष स्वीकार कर लिया जाता है जो या तो येन केन प्रकारेण, “सशक्त गठबन्धन या सिंडीकेट” को फायदा पहुंचाते हैं या फिर उनका बहुत विरोध करने की स्थिति में पहुंच जाते हैं। बहुत से गेटकीपर जो अपने रसूख और धनबल को बढ़ाने में कामयाब हो जाते हैं उन्हें भी शातिर नेटवर्क में शामिल कर लिया जाता है।

(अ) व्यवस्था के पूरे तन्त्र को लालच रुपी इंजन से चलाया जाता है और इसके सभी कल पुर्जों में काले धन रुपी लुब्रीकैंट को डाला जाता है।

Saturday, November 27, 2010

सौवी पोस्ट - चुनावतंत्र के नए मंत्र

स्मरण होता है कि अपने कार्यकाल में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एम. एस. गिल ने सुझाव दिया था कि “जनप्रतिनिधि कानून” में यदि निम्नलिखित दो संशोधन किये जायें, तो लोकतंत्र को बेहतर बनाने में एक प्रभावी कदम होगा :
1.       प्रत्येक क्षेत्र में दो चरण में चुनाव :  चुनावों को दो चरणों में किया जाये, प्रथम चरण में चुनाव उसी तरह हों जैसे अभी हो रहें हैं. दूसरे चरण के चुनाव, प्रथम चरण में पहले और दूसरे नम्बर पर आये प्रत्त्याशिओं के बीच कराये जायें. इनमें जो 51% वोट हासिल करें उसे ही विजयी घोषित किया जाये. यह स्थिति पहले कि 21% वोट से बेहतर होगी क्योकिं 51% वोट के लिये नेता को और अधिक सर्वमान्य होना होगा. हां यदि उपरोक्त में से कोई नहीं को 51% वोट मिलते हैं तब उस सीट को खाली ही रखा जाये तथा 6 महीने बाद फिर चुनाव हों जिसमे पिछले चरण के सभी प्रत्त्याशी अयोग्य हों

2.       लोकसभा में "अविश्वास प्रस्ताव" के बजाय "विश्वास प्रस्ताव" का प्रावधान :
1977 में जनता पार्टी की 2 साल की सरकार , 1989 में देवगौडा की सरकार, पहले 13 दिन और फिर 13 महीनें की बाजपेयी की सरकार ने देश पर असमय चुनाव थोप दिये थे. ऐसा होने का एक कारण है अविश्वाश प्रस्ताव जिसके कारण बिना किसी विकल्प के पहले तो सरकार गिरा दी जाती है और फिर किसी नाम पर सहमति न होने पर दुबारा चुनाव का सबब बनती है.
इसके विपरीत यदि विश्वास प्रस्ताव लाया जाए, तो इस तरह की स्थिति से निबटा जा सकता है. संसद का कार्यकाल 5 साल रहेगा इस बीच कभी भी किसी के पक्ष में विश्वास प्रस्ताव लाकर उसे सरकार बनाने के लिये आगे लाया जा सकता है. इस तरह बिना विकल्प के कभी भी सरकार नहीं गिर सकती.

इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि इन सुझावों को देने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री एम एस गिल, ने रिटायरमेण्ट के बाद कांग्रेस पार्टी से राज्य सभा के टिकट का जुगाड कर मंत्री पद हासिल कर लिया. फिर सिद्ध हुआ कि सत्ता की मलाई के आगे देश की भलाई और चुनाव सुधार जैसी चीज़े टुच्ची बातें हैं.
भारत और इंडिया के जिस अघोषित युद्द की बात हम करते हैं उसका एक पहलू यह भी है कि देश की संसद पर इंडिया का परोक्ष और अपरोक्ष कब्जा है. संसद में अधिंकांश सदस्य करोड़पति और अरबपति हैं. इन्होनें लोकतंत्र को हाईजैक कर लिया है भारत जाये तो कहां जाये.           

वैकल्पिक व्य्वस्था:
इस गोरखधन्धे को कौन समझेगा कि आज जब अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, आस्ट्रेलिया जैसे देश भी पेपर बैलट का इस्तेमाल करते हैं, तब बीस रुपये रोज़ पर ज़िन्दा 77% आबादी को ईवीएम नाम का हाई-फाई खिलौना देने की क्या मजबूरी हैं.
बहरहाल, यह किस पंडित ने बताया है कि चुनाव एक दिन में ही करवानें हैं? इसके बदले इण्टरनेट का इस्तेमाल करते हुए, क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था स्थापित की जाती, जिसमें वोट डालने की लाइनें महीने भर खुली रहें, कुछ  इस प्रकार:
1.       चुनाव प्रक्रिया लगभग महीनें भर के लिये खुली रहे तथा इसके लिये प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में निश्चित जगह पर चुनाव आयोग द्वारा अनुमोदित साइबर कैफे स्थापित किए जाएँ, जहाँ जा कर कोई भी अपनी वोट डाल सके.
2.       वोटो का संग्रहण ईवीएम में भी हो और चुनाव आयोग के सेंट्रल सर्वर में भी रहे. इससे यह लाभ होगा कि किसी विवाद की स्थिति में वोटों को क्रॉस एक्ज़ामिन किया जा सकता है. चुनाव परिणाम भी सीधे दिल्ली स्थित मुख्य चुनाव आयोग कार्यलय से घोषित हो सकें और पूरे देश मे पागलपन भी न रहे.
3.       विशिष्ट पहचान पत्र को दिखाकर, कोई भी किसी भी नज़दीकी चुनाव आयोग के साइबर कैफे में जाकर, अपने क्षेत्र के लिये वोट डाल सकेगा, और अपने चुनाव क्षेत्र में जाकर ही वोट डालने की बाध्यता से मुक्त हो सकेगा.
4.       चुनाव परिणामों के बाद भी प्रत्येक मतदाता को यह सुविधा होनी चाहिये कि वो इण्टरनेट पर अपनी मतदाता पहचान संख्या पंच  कर, यह जाँच सके कि उसका वोट उसी प्रत्याशी को गया है जिसे उसने वोट दिया था.
5.       दूरदराज़ के इलाकों में मोबाइल साइबर कैफे ले जाकर यह सुविधा उप्लब्ध करायी जा सकती है. वी-सैट और थ्री जी टैक्नोलोजी से सुसज्जित भारत के लिये यह मुश्किल कार्य नहीं होना चाहिये. पूरी कोशिश इसी बात की हो कि लगभग सभी मतदाता के सामने वोट डालने की सुविधा दी जाये. तभी लोकतंत्र का मतलब है. 
लाभ :
1.       महंगी चुनावी सुरक्षा व्यव्स्था से पूरी तरह निजात मिल जायेगी.
2.       ईवीएम के घपले की सम्भावना में कमी.
3.       मतदान के प्रतिशत में अप्रत्याशित उछाल
आमतौर पर कमजोर मतदाता को दबंग दबा कर रखते हैं और उन्हें चुनाव में या तो भाग ही नहीं लेने दिया जाता या अपनी निगरानी में वोट डलवाया जाता है. जब चुनाव पूरे माह चलेंगे और वोटर को देश के किसी भी हिस्से में जाकर वोट डालने का हक होगा तो किसी मतदाता को बरगलाया नहीं जा सकता. 

इस ऋंखला की पिछली पोस्टः

Friday, November 19, 2010

डेमोक्रेसी किडनैप्ड


दो बड़ी मशहूर कहावतें या कहें बड़े संगीन इल्ज़ाम हमेशा लगते रहे हैं लोकतंत्र के ऊपर. पहली बात तो ये कि लोकतंत्र वो प्रक्रिया है, जहाँ जनता के प्रतिनिधि चुनकर आते हैं, उन लोगों के द्वारा, जो मतदान नहीं करते. इस इल्ज़ाम के जवाब में हमने अपनी दलील पिछली पोस्ट पर दी. 
आज बारी है लोकतंत्र से जुड़ी उस दूसरी कहावत की जहाँ कहा गया है कि जम्हूरियत वह तर्ज़ेहुक़ूमत है जहाँ इंसानों को तोला नहीं, गिना जाता है. सच है यह कहावत, और अगर इसे कटाक्ष मानें तो बहुत सच्ची बात है और अगर स्टेटमेण्ट मानें तो एक अर्धसत्य! आइए देखें इंसानों की गिनती का यह खेल.

एक बार फिर आँकड़े निर्वाचन आयोग की वेबसाईट पर उपलब्ध लोकसभा चुनाव 2009 केः 

एक, गिनती में कुल मतदाताओं की संख्या (72 करोड़) के छठवें हिस्से से भी कम (11.91 करोड़) होते हुए भी एक दल 72 करोड़ मतदाताओं और 120 करोड़ जनता के ऊपर राज कर रहा होता है और उस पर तुर्रा ये कि ख़ुद को उसी जनता का सेवक बताता है.


दो, तहलका यह मचा है कि हम मशीनों के सहारे वोटिंग करके / कराके प्रगतिशील हो गए हैं, लेकिन बहुमत की इस छ्द्म अवधारणा का क्या, जो चीख़ चीख़ कर यह एलान कर रही है वह बहुमत सिर्फ एक अल्पमत है (16. 61% कुल मतदाताओं की संख्या का ).

तीन, अगर बहुमत की ही सरकार है, तब तो बहुमत यह कहता है कि 83.39% (कुल मतदाताओं की संख्या का) या 71.45% (कुल मतों का) मत उस दल के पक्ष में हैं ही नहीं. फिर कैसे बनी यह बहुमत की सरकार. यह तो वही बात हो गई कि मुट्ठी भर अंग्रेज़ पूरे भारतवर्ष पर शासन करते रहे, या अल्पसंख्यक गोरे दक्षिण अफ्रीक़ा में.

चार, यदि दो प्रमुख पार्टियाँ, कॉन्ग्रेस और भाजपा के मतों और सीटों पर नज़र डालें तो और भी आश्चर्य होता है. एक ओर 8 करोड़ मतों का अर्थ भाजपा के लिए 116 सीटें है, वहीं दूसरी ओर ओर उनसे सिर्फ 50% अधिक वोटों की मदद से कॉन्ग्रेस को लगभग 100% अधिक सीटें (206) मिल जाती हैं.

तालिका में दिये गए आँकड़े क्या विश्व के इस “महानतम् लोकतंत्र” पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते हैं?
लोकतांत्रिक जनादेश के नाम पर देश के आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक ढ़ाँचे को छिन्न भिन्न करने वालों से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि भारतीय जनता ने यह अधिकार वास्तविक रूप से उन्हें दिया भी है या यह लोकतंत्र का अपहरण है?

एक आवश्यक सूचनाः इन आँकड़ों को गणित के सूत्रों के आधार पर पढना, समय की बरबादी के अतिरिक्त कुछ नहीं है, क्योंकि जहाँ दो और दो पाँच बनाए जाते हों, वहाँ सारी गिनतियाँ बेकार साबित होती हैं.

क्षेत्रीय पार्टियों का गणित और भी चौंकाने वाला है. यह रहे क्षेत्रीय पार्टियों के आँकड़ेः
कैसे 120 करोड़ की जनसंख्या वाले देश मे मात्र कुछ लाख वोटों को हथियाकर, क्षेत्रीय पार्टियाँ लोकतंत्र के इस महाभोज का आनन्द लेने दिल्ली पहुँच जाती हैं, उसकी एक बानगी इस तरह है :-

• बिहार के लालू यादव की आरजेडी को कुल वोट मिले मात्र 50.80 लाख और सीटें मिलीं 4, जबकि नीतिश कुमार की जेडी (यू) को कुल वोट मिलें 59.36 लाख और सीटे मिलीं 20.
यानि वोटों की बढ़त सिर्फ नौ लाख और सीटें बढ़ गयीं पाँच गुना।

• उत्तर प्रदेश में तो स्थिति और मज़ेदार है. मायावती की बसपा जहाँ 2.57 करोड़ वोट लेकर 21 सीटें ला पायी,वहीं मुलायम सिंह की सपा ने 23 सीटें कुल 1.34 करोड़ वोट लेकर ही हासिल कर लीं।
बसपा के लिए वोट ज़्यादा, सीटें कम!

• तमिलनाडु में जयललिता की पार्टी एडीएमके को कुल वोट मिलें मात्र 69.53 लाख और सीटे हासिल की 9 जबकि करूणानिधि की डीएमके कुल 76.25 लाख वोट लेकर भी दो गुना यानि 18 सीटें जीत लीं।
वोटों की गिनती समान, वोटों का मूल्य समान, लेकिन असली मूल्य तो सीटों की संख्या का है. वो बराबर नहीं.

• पश्चिम बंगाल में 1.33 करोड़ वोट लेकर ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी को मिली 19 सीटें तो 2.22 करोड़ वोट लेकर सीपीआई (एम) कुल 16 सीटे ही जीत पायी।
क्या आपको समझ आया कि जनता मैंडेट क्या था!!

• केरल में मुस्लिम लीग मात्र 8 लाख वोट हासिल करके 2 सीटें जीत जाती है तो तेलंगाना में 26 लाख वोट हासिल करने के बाद भी मात्र 2 सीटें पाती है। जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस मात्र 5 लाख वोट लेकर 3 सीटं लोकसभा में पा जाती है। महाराष्ट्र में शिवसेना मात्र 62.87 लाख वोट लेकर 11 सीटें जीत जाती है तो आन्ध्र प्रदेश में 1.04 करोड़ वोट लेकर तेलुगू देशम को मात्र 6 सीटे ही मिल पाती हैं।

यदि देश के संसाधनों पर सबका समान हक है तो फिर ऐसे विरोधभास क्यों?
भारतीय लोकतन्त्र का यह कैसा अबूझ गणित है, जिसमें एक वोट की कीमत अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है. किंतु जैसे ही यह सारे वोट सीटों में परिवर्तित हो दिल्ली पहुँचते हैं, उनके मान बराबर हो जाते हैं और शुरू हो जाती है गिनती, दो और दो पाँच करने की.

बचपन में कितनी दफ़ा पढ़ा है कि अगर आठ घोड़ों की कीमत रु. 500 दी हुई है, तो पाँच घोड़ों की कीमत कैसे निकाली जाती है. आज अगर यही सवाल हल करना हो, तो पसीने छूट जाएँ. क्योंकि ये तो अब समझ में आया है कि एक जैसे दिखने वाले घोड़ों की कीमत हमेशा बराबर नहीं होती, इस सवाल का हल तभी सम्भव है जब यह पता हो कि घोड़ा किस प्रदेश का है, और कौन सी नस्ल का है.
(इस कड़ी में हमारी अगली समापन पोस्ट में चर्चा होगी,  वैकल्पिक समाधानों की, इस सन्दर्भ में आपके विचारों  का इंतज़ार रहेगा )

Tuesday, November 16, 2010

भारतीय लोकतंत्र की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट- (भाग एक)


हमारा देश 1947 में आज़ाद हुआ और फिर 1951 में प्रथम आम चुनाव हुए. तब से अबतक 15 वीं लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा करने को है. इस बीच देखा जाये तो देश ने सभी क्षेत्रों में उत्तरोत्तर प्रगति की है. परंतु जहाँ तक चुनावों पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रश्न है, वह दिनोंदिन गर्त्त की तरफ जाती दिखती है। यह एक गम्भीर स्थिति है, जिसे नज़रअन्दाज़ करना, देश को बहुत महँगा पड़ रहा है। संवैधानिक संस्थाओं के इस क्षरण को यदि रोकना है, तो लोकतंत्र को मजबूत करना होगा, जिसके लिए चुनाव प्रक्रिया को दुरुस्त करने की ज़रूरत है और बगैर चुनाव प्रक्रिया की कमियों को बारीकी से समझे इनका समाधान खोजा भी नहीं जा सकता। इस सन्दर्भ में हमने चुनाव आयोग की वेबसाईट पर उपलब्ध 2009 के ताजे आंकड़ों का अध्ययन किया तो हैरान कर देने वाले सत्य उद्घाटित हुए. एक बानगी देखें :
देश के कुल मतदाताओं की संख्या : 71.69 करोड़
वोट डालने वाले कुल मतदाता : 41.71 करोड़
वोट न डालने वाले कुल मतदाता : 29.98 करोड़

120 करोड से अधिक आबादी वाले देश में जहाँ 72 करोड मतदाता हैं वहाँ मात्र इतने कम वोटों का प्रतिशत लेकर जिस तरह यह राजनैतिक पार्टियाँ हमें लोकतंत्र का पाठ पढाती हैं, उसे देखकर आश्चर्य होता है. परिणाम स्वरूप, देश के सभी संसाधनों पर इन गिरोहों के सरगना ऐश करते हैं. विचारधारा के स्तर पर यह सब राजनैतिक दल एक दूसरे के विरोधी हैं और इनका कुल जमा भी आधे मतदाताओं से भी कम है. हैरान करने वाली बात यह है कि आज़ादी के 60 वर्षो बाद भी हम इस सड़ेगले लोकतंत्र के आसरे अपनी समस्याओं के समाधान ढूंढ रहे हैं, जिसका ढोल एक षड़यंत्र की तरह ज़ोर ज़ोर से बजाया जाता है और उसकी आड़ में लूट का खेल बखूबी चलता रहता है.

आईये देखें कि एक आदर्श चुनाव क्षेत्र में यह खेल किस तरह होता है :-

कुल मतदाता = 100 मतदान करने वाले लोग = 60
कुल गम्भीर उम्मीदवार = 3 (हालाँकि एक पूरी बरात खड़ी होती है चुनावों में) जीतने वाले प्रत्याशी को न्यूनतम वोटों की आवश्यकता = 21 (60/3= 20 से 1 अधिक यानि 21)

मतलब यह कि किसी एक क्षेत्र में औसतन मात्र 21% लोगों को यदि पटा लिया जाये, तो आप उस क्षेत्र से लोकतंत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधि होंगे. यही कारण है कि धन, बल, आरक्षण आदि हथकंडों से 21% वोटों का जुगाड किया जाता है. इस बात को महान लोकतंत्र का बिगुल बजाकर भुला दिया जाता है कि इन 21% वाले महाशय को 79% का समर्थन प्राप्त नहीं है!

वोट न डालने वाले लोग 30 करोड़ ? आज वोट न डालने वाले 30 करोड़ लोगों को अपमानित करने के लिये कहा जाता है कि उनकी वज़ह से लोकतन्त्र की हालत ऐसी है. पर थोड़ा अन्वेषण करें, तो वोट न डालने के प्रमुख कारण इस प्रकार उभर कर सामनें आते हैं :

क) साँपनाथ और नागनाथ में से एक को चुनने से इंकार :

हम स्वयम् को इसी श्रेणी में पाते हैं और इसी कारण पिछले चुनाव में वोट डालने से इंकार कर दिया था. हाँ! अगर “उपरोक्त में से कोई नहीं” चुनने का विकल्प होता या हमारी पसन्द का प्रत्याशी होता तो हम ज़रूर वोट देते. अब जब सामने रखे गये विकल्प में साँपनाथ और नागनाथ में से ही किसी एक का चुनाव करना है, तो हम चुनाव करने से इंकार क्यों न करें. क्योंकि हमारा मानना है कि यदि हम कम जहर वाले साँपनाथ को भी चुनकर संसद में भेजने के कार्य में सहयोग करें, तो कल को सत्ता का दूध पीकर यह साँपनाथ भी नागनाथ बन जाता है.

ख) आज की व्यव्स्था में चुनाव लडने के लिये ज़रुरी है काला धन :

एक अनुमान के अनुसार लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये एक गम्म्भीर प्रत्याशी को कम से कम 10 करोड़ रुपये की दरकार होगी. कोई भी ईमानदार समाज सेवी इतना धन लाने में अक्षम है, इस कारण धनबलियों ने लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है, यह कहना गलत नहीं होगा.

ग) इंकार का अधिकार :

मतदान करते वक्त “इनमें से कोई भी नहीं” विकल्प और “यह वाला तो बिल्कुल नहीं” विकल्प ज़रुर होने चाहिये. इन विकल्पों के बिना मतदाता की राय जानने की घोषणा करना बेमानी है. आखिर इन मतों को लेकर देश की सरकार बनती है और ये लोग देश-दुनिया में मतदाता का नाम लेकर ऐसे ऐसे समझोते कर डालते हैं, जिनकी बात तो मतदाता से कभी हुई भी नहीं थी. चुने जाने के पाँच साल तक इन लोगों को ऐसे कानून बनाने का हक मिल जाता है, जिनका सीधा असर हमारे आपके आर्थिक-समाजिक जीवन पर पड़ता है.

घ) अतिशय गरीब कैसे वोट डालेगा ? और किसे चुनेगा?

अर्जुनसेनगुप्ता रिपोर्ट कहती है कि देश में 77% लोग मात्र 20 रुपये रोज़ की आय पर ज़िन्दा हैं. वोट न डालने वालों का यह हिस्सा अपनी रोज़ीरोटी का इंतज़ाम करें या वोट डाले. ऐसे लोगों में कुछ को या अधिकांश को सिर्फ 500 रुपये का नोट देकर (उनकी लगभग एक माह की कमाई) वोट खरीदना बहुत आम हो चला है, इस महान लोकतंत्र में. अनेक राजनैतिक दलों पर यह इल्ज़ाम पिछले चुनाव में बहुत जोरशोर से लगा था. 5 करोड़ रुपये में 1,00,000 वोट मिल सकते हों, तो पूरा खेल ही बदल जाता है. धन बल का इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा?

च) अपने चुनाव क्षेत्र से दूर लोगों के लिये वोट डालने की कोई व्यव्स्था का न होना ?

रोज़ी-रोटी के लिये जूझता आम आदमी एक शहर से दूसरे शहर ताउम्र भटकता रहता है. ऐसे में चुनाव के रोज़ अपने चुनाव क्षेत्र में जाकर वोट डालना महंगा काम है और यह काम समय भी मांगता है. अब दिल्ली में रहने वाला सीतापुर का आदमी 2000 रुपये खर्च करके अपने परिवार के साथ सीतापुर जाकर वोट डालेगा? उसका मालिक तीन दिन की छुट्टी देगा? तीन दिन का वेतन क्या मालिक या सरकार उसे देगी ?

ननी पालकीवाला ने अपनी पुस्तक “वी, द पिपुल” के समर्पण में कहा है कि यह पुस्तक उन देशवासियों को समर्पित है जिन्होंने ख़ुद को एक विशाल सम्विधान दिया लेकिन उसको सम्भालने की योग्यता नहीं. क्या हम इस अवधारणा को बदल नहीं सकते!

(हमारी अगली पोस्ट में चुनाव आयोग के कुछ और आंकड़ॉ के आधार पर हम विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र की एक और तस्वीर लेकर प्रस्तुत करेंगे।)
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...