सम्वेदना के स्वर

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Tuesday, November 16, 2010

भारतीय लोकतंत्र की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट- (भाग एक)


हमारा देश 1947 में आज़ाद हुआ और फिर 1951 में प्रथम आम चुनाव हुए. तब से अबतक 15 वीं लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा करने को है. इस बीच देखा जाये तो देश ने सभी क्षेत्रों में उत्तरोत्तर प्रगति की है. परंतु जहाँ तक चुनावों पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रश्न है, वह दिनोंदिन गर्त्त की तरफ जाती दिखती है। यह एक गम्भीर स्थिति है, जिसे नज़रअन्दाज़ करना, देश को बहुत महँगा पड़ रहा है। संवैधानिक संस्थाओं के इस क्षरण को यदि रोकना है, तो लोकतंत्र को मजबूत करना होगा, जिसके लिए चुनाव प्रक्रिया को दुरुस्त करने की ज़रूरत है और बगैर चुनाव प्रक्रिया की कमियों को बारीकी से समझे इनका समाधान खोजा भी नहीं जा सकता। इस सन्दर्भ में हमने चुनाव आयोग की वेबसाईट पर उपलब्ध 2009 के ताजे आंकड़ों का अध्ययन किया तो हैरान कर देने वाले सत्य उद्घाटित हुए. एक बानगी देखें :
देश के कुल मतदाताओं की संख्या : 71.69 करोड़
वोट डालने वाले कुल मतदाता : 41.71 करोड़
वोट न डालने वाले कुल मतदाता : 29.98 करोड़

120 करोड से अधिक आबादी वाले देश में जहाँ 72 करोड मतदाता हैं वहाँ मात्र इतने कम वोटों का प्रतिशत लेकर जिस तरह यह राजनैतिक पार्टियाँ हमें लोकतंत्र का पाठ पढाती हैं, उसे देखकर आश्चर्य होता है. परिणाम स्वरूप, देश के सभी संसाधनों पर इन गिरोहों के सरगना ऐश करते हैं. विचारधारा के स्तर पर यह सब राजनैतिक दल एक दूसरे के विरोधी हैं और इनका कुल जमा भी आधे मतदाताओं से भी कम है. हैरान करने वाली बात यह है कि आज़ादी के 60 वर्षो बाद भी हम इस सड़ेगले लोकतंत्र के आसरे अपनी समस्याओं के समाधान ढूंढ रहे हैं, जिसका ढोल एक षड़यंत्र की तरह ज़ोर ज़ोर से बजाया जाता है और उसकी आड़ में लूट का खेल बखूबी चलता रहता है.

आईये देखें कि एक आदर्श चुनाव क्षेत्र में यह खेल किस तरह होता है :-

कुल मतदाता = 100 मतदान करने वाले लोग = 60
कुल गम्भीर उम्मीदवार = 3 (हालाँकि एक पूरी बरात खड़ी होती है चुनावों में) जीतने वाले प्रत्याशी को न्यूनतम वोटों की आवश्यकता = 21 (60/3= 20 से 1 अधिक यानि 21)

मतलब यह कि किसी एक क्षेत्र में औसतन मात्र 21% लोगों को यदि पटा लिया जाये, तो आप उस क्षेत्र से लोकतंत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधि होंगे. यही कारण है कि धन, बल, आरक्षण आदि हथकंडों से 21% वोटों का जुगाड किया जाता है. इस बात को महान लोकतंत्र का बिगुल बजाकर भुला दिया जाता है कि इन 21% वाले महाशय को 79% का समर्थन प्राप्त नहीं है!

वोट न डालने वाले लोग 30 करोड़ ? आज वोट न डालने वाले 30 करोड़ लोगों को अपमानित करने के लिये कहा जाता है कि उनकी वज़ह से लोकतन्त्र की हालत ऐसी है. पर थोड़ा अन्वेषण करें, तो वोट न डालने के प्रमुख कारण इस प्रकार उभर कर सामनें आते हैं :

क) साँपनाथ और नागनाथ में से एक को चुनने से इंकार :

हम स्वयम् को इसी श्रेणी में पाते हैं और इसी कारण पिछले चुनाव में वोट डालने से इंकार कर दिया था. हाँ! अगर “उपरोक्त में से कोई नहीं” चुनने का विकल्प होता या हमारी पसन्द का प्रत्याशी होता तो हम ज़रूर वोट देते. अब जब सामने रखे गये विकल्प में साँपनाथ और नागनाथ में से ही किसी एक का चुनाव करना है, तो हम चुनाव करने से इंकार क्यों न करें. क्योंकि हमारा मानना है कि यदि हम कम जहर वाले साँपनाथ को भी चुनकर संसद में भेजने के कार्य में सहयोग करें, तो कल को सत्ता का दूध पीकर यह साँपनाथ भी नागनाथ बन जाता है.

ख) आज की व्यव्स्था में चुनाव लडने के लिये ज़रुरी है काला धन :

एक अनुमान के अनुसार लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये एक गम्म्भीर प्रत्याशी को कम से कम 10 करोड़ रुपये की दरकार होगी. कोई भी ईमानदार समाज सेवी इतना धन लाने में अक्षम है, इस कारण धनबलियों ने लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है, यह कहना गलत नहीं होगा.

ग) इंकार का अधिकार :

मतदान करते वक्त “इनमें से कोई भी नहीं” विकल्प और “यह वाला तो बिल्कुल नहीं” विकल्प ज़रुर होने चाहिये. इन विकल्पों के बिना मतदाता की राय जानने की घोषणा करना बेमानी है. आखिर इन मतों को लेकर देश की सरकार बनती है और ये लोग देश-दुनिया में मतदाता का नाम लेकर ऐसे ऐसे समझोते कर डालते हैं, जिनकी बात तो मतदाता से कभी हुई भी नहीं थी. चुने जाने के पाँच साल तक इन लोगों को ऐसे कानून बनाने का हक मिल जाता है, जिनका सीधा असर हमारे आपके आर्थिक-समाजिक जीवन पर पड़ता है.

घ) अतिशय गरीब कैसे वोट डालेगा ? और किसे चुनेगा?

अर्जुनसेनगुप्ता रिपोर्ट कहती है कि देश में 77% लोग मात्र 20 रुपये रोज़ की आय पर ज़िन्दा हैं. वोट न डालने वालों का यह हिस्सा अपनी रोज़ीरोटी का इंतज़ाम करें या वोट डाले. ऐसे लोगों में कुछ को या अधिकांश को सिर्फ 500 रुपये का नोट देकर (उनकी लगभग एक माह की कमाई) वोट खरीदना बहुत आम हो चला है, इस महान लोकतंत्र में. अनेक राजनैतिक दलों पर यह इल्ज़ाम पिछले चुनाव में बहुत जोरशोर से लगा था. 5 करोड़ रुपये में 1,00,000 वोट मिल सकते हों, तो पूरा खेल ही बदल जाता है. धन बल का इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा?

च) अपने चुनाव क्षेत्र से दूर लोगों के लिये वोट डालने की कोई व्यव्स्था का न होना ?

रोज़ी-रोटी के लिये जूझता आम आदमी एक शहर से दूसरे शहर ताउम्र भटकता रहता है. ऐसे में चुनाव के रोज़ अपने चुनाव क्षेत्र में जाकर वोट डालना महंगा काम है और यह काम समय भी मांगता है. अब दिल्ली में रहने वाला सीतापुर का आदमी 2000 रुपये खर्च करके अपने परिवार के साथ सीतापुर जाकर वोट डालेगा? उसका मालिक तीन दिन की छुट्टी देगा? तीन दिन का वेतन क्या मालिक या सरकार उसे देगी ?

ननी पालकीवाला ने अपनी पुस्तक “वी, द पिपुल” के समर्पण में कहा है कि यह पुस्तक उन देशवासियों को समर्पित है जिन्होंने ख़ुद को एक विशाल सम्विधान दिया लेकिन उसको सम्भालने की योग्यता नहीं. क्या हम इस अवधारणा को बदल नहीं सकते!

(हमारी अगली पोस्ट में चुनाव आयोग के कुछ और आंकड़ॉ के आधार पर हम विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र की एक और तस्वीर लेकर प्रस्तुत करेंगे।)

33 comments:

गिरीश बिल्लोरे said...

मतदान न करना सच दुखद विषय है. उससे भी दु:खद पहलू ये कि अच्छे यानी सदाचारीयों की सियासत से अनुपस्थिति
1. ब्लाग4वार्ता :83 लिंक्स
2. मिसफ़िट पर बेडरूम

गिरीश बिल्लोरे said...

1. ब्लाग4वार्ता :83 लिंक्स
2. मिसफ़िट पर बेडरूम
लिंक न खुलें तो सूचना पर अंकित ब्लाग के नाम पर क्लिक कीजिये

अरुण चन्द्र रॉय said...

बढ़िया विश्लेषण है.. आगे अंकों का इन्तजार रहेगा..

Sonal Rastogi said...

man mein har chunaav se pehle yahi vichaal aate hai..agle bhaag kaa intezaar

Arun said...

महोदय, मैं एक ई-पत्रकार हूँ. मैंने "सकारात्मक पत्रकारिता" और "नॉन-प्राफिट पत्रकारिता" का लक्ष्य रखते हुए और भारतीय मूल्यों से स्वयं तथा समाज को अवगत कराने के लिए " THE POSITIVE PRESS" नाम से एक ई-न्यूजमैगज़ीन आरम्भ की है| साईट का पता है http://www.positivepress.in
मेरी आपसे विनती है की आप मेरे इस अभियान में अपने द्वारा नियमित रूप से कुछ लेख लिखकर सहयोग दें| अथवा यह अनुमति दें की मैं आपके चिठ्ठे (ब्लॉग) के लेख "पौज़िटिव प्रेस" पर प्रकाशित कर सकूँ|
साईट में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेख प्रकाशित होते हैं| साईट में हिंदी लिखने के भी कुछ प्लग-इन या उपकरण लगाए हैं| आपसे पार्थना है की इस पुनीत कार्य में सहयोग दें|

यदि बहुमूल्य समय से कुछ समय निकाल प्रति माह या प्रति सप्ताह एक या दो लेख "पौज़िटिव प्रेस" के लिए दे सकें, तो बहुत आभारी रहूँगा|

उत्तर की अपेक्षा में|

अरुण सिंह

shikha varshney said...

सही पोस्टमार्टम किया है.वह भी आंकड़ों के साथ

imemyself said...

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि आर्थिक सुधारों की बातें तो खूब होती हैं क्योकिं उससे अमीरों का और अधिक विकास होता है
परंतु
चुनाव सुधारों की बात नहीं होती क्योकिं उससे गरीबों को देश के संसाधनों में उनका हक मिलता है।

चुनाव आयोग का काम, देश में मात्र चुनाव करवाना ही नहीं है, हर एक मतदाता, मतदान करने की स्थित में हो यह निश्चित करना भी है।

kshama said...

Inme se koyi nahi ye vikalp bahut zaroori hai.Ye bhi dekha jata hai,ki,padhe likhe,paise wale log,lamba week end manane chale jate hain.Chunaon ke charche haath me peg leke drawing room me hote hain.E-voting shuru ho jaye to shayad in bhagaudon ke vote prapt ho saken!

ZEAL said...

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सही कहा आपने, सापनाथ को दूध पिलाकर नागनाथ बनाने का कोई औचित्य नहीं है । एक कारण यह भी है की विदेश में बैठी देशी जनता भी अधिकार डालने से वंचित हो जाती है ।

वैसे मेरे विचार से मताधिकार का उपयोग जरूर करना चाहिए । हर बार इस अधिकार का उपयोग करके हम नागनाथों को सत्ता के बाहर रखने की एक कोशिश तो कर सकते हैं।

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रचना दीक्षित said...

सर आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ मुद्दा ये है कि मन लो हमारी पसंद का प्रत्याशी खड़ा है और गलती से जीत भी गया तो कोई उसे मन मर्जी से काम करने देगा दो दिन में उखाड़ फैंक दिया जायेगा या फिर वो अपना आचरण बदल लेगा

सुज्ञ said...

चैतन्य जी,

इसीलिये तो जातिवाद मुखर है। किसी भी क्षेत्र में किसी एक जाति के पास 15-20% मत होते है। पार्टियां उसी दबंग जाति का उम्मिदवार खडा करती है। और उनकी गणनाएं सफ़ल होती है।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

Har ek calculation har ek wajah sahi hai... 'inme se koi nahi' is vikalp ki to bahut jyada hi zarurat hai.. Lekin aisa vikalp dene ke liye raji kaun hoga... Sab to chhante chor hain jinko wo vikalp banana hai wo bhi.. :(...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

Aur ye jo koi bhi lota danda le ke nirdaliy ladne khada ho jata hai ye bhi ek gadbad jhala...jeet gaye chunav kshetra se to parti badalte rahe..jitna paisa kharch karke jeete..usse kai guna kama lete hain...

उपेन्द्र said...

बहुत अच्छा विश्लेषण . चुनाव मे बहुत ही गड़बड़झाला है . सुधार की उम्मीद कम ही दिखाई देती है मगर उम्मीद पर दुनिया कायम है..... देखते है. इंकार की बटन जरूर होनी चाहिए .

प्रवीण पाण्डेय said...

झंकृत करता लेख। लोकतन्त्र व चुनाव प्रक्रिया के कड़वे सच।

सतीश सक्सेना said...

बेहतरीन विश्लेषण के लिए बधाई !

ali said...

आपकी अगली कड़ी भी पढ़ लूं तो शायद एक साथ कुछ कह पाऊं ! अभी संकेत सिर्फ इतना कि आलेख सही दिशा में है !

मो सम कौन ? said...

लोकतंत्र के लैक्यूना हैं ये सब, जिनका लाभ सामर्थ्यानुसार सभी राजनैतिक दल उठाते हैं। ध्यान होगा आपको, पंजाब में लगभग ९ प्रतिशत वोटिंग हुई थी एक बार, और सरकार बनी थी।
अगली कड़ी का इंतजार कर रहे हैं।

गिरिजेश राव said...

शानदार आलेख। एकदम सही दिशा में। आवश्यकता आन पड़ी है कि लोकतंत्र के इस मॉडल की चीर फाड़ हो। पोस्टमॉर्टम सही कहा आप ने। हम तंत्र के नाम पर गन्धाते शव को ढोए जा रहे हैं।
बहुत पहले एक कांड हुआ था जिसमें एक मृत ढोंगी बाबा के शव को वर्षों तक अगरबत्तियों, इत्र, फुलेल के सहारे पुजवाया गया था। भंडा बहुत बाद मे फूटा।
हमारा तंत्र वैसा ही हो गया है। गन्धा रहा है लेकिन हम आत्मतोष और प्रशंसा के अगर जला पूजे जा रहे हैं।
इन लेखों को पढ़िएगा। शायद पहले भी आप को बताया होगा। इस तरह के मुद्दे उठाने वालों से यह अनुरोध करता चलता हूँ:
http://girijeshrao.blogspot.com/2009/04/blog-post.html
http://girijeshrao.blogspot.com/2009/04/2.html
http://girijeshrao.blogspot.com/2009/05/blog-post.html

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छा आँखें खोल देने वाला विश्लेषण। अगली कडी का इन्तजार रहेगा। धन्यवाद।

Arvind Mishra said...

एक विचारपूर्ण पोस्ट देश की एक सबसे बड़ी पंचवार्षिक त्रासदी पर

shail said...

acha topic pakada sir,mai aapke sabhi point se sehmat hupar apke 3,4 and 5 point se behad sehmat hu.meri taraf se aapko saare points ke full marks.....aur issi topic ke agle chapter ka intezaar rahega...very goood

मनोज कुमार said...

व्चारोत्तेजक पोस्ट। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-श्री गुरुवे नमः

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है! हार्दिक शुभकामनाएं!
लघुकथा – शांति का दूत

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

लोकतंत्र के नाम पर हमारे तथाकथित देश भक्त नेता लोग जिस तरह देश को लूट रहे हैं वह किसी से छुपा नहीं है !
आँखे खोलने वाली पोस्ट है !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ
www.marmagya.blogspot.com

देवेन्द्र पाण्डेय said...

..वाकई लोकतंत्र की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट है।

..चुनाव आयोग भी पढ़ें, चुनाव समीक्षक भी पढ़ें..क्या इसे यों ही होने दिए जाय ? नेताओं से तो कोई उम्मीद नहीं है..वे तो चाहेंगे ही कि यही व्यवस्था चलती रहे।
...इसे पढ़कर बधाई नहीं, आभार व्यक्त करने की इच्छा हो रही है।

सम्वेदना के स्वर said...

@ देवेंद्र पाण्डेयः
देवेंद्र जी आपके उद्गार सर माथे! आवश्यकता न बधाई की है, न धन्यवाद की… एक सोच पैदा हो तो हम अपनी मिहनत सफल मानेंगे!
@ज्ञान चंद मर्मज्ञः
बस आँखें ही तो खोलनी है ज्ञानचंद जी... हम आँखें बंद किए पड़े रहेंगे तो चोर और ठग तो लूट पाट मचाएँगे ही.
@ अरविंद मिश्रः
अच्छा नामकरण किया है आपने पंडित जी! भविष्य में इसे प्रयुक्त कर सके तो आपकी अनुमति ही समझेंगे!
@गिरिजेश रावः
गिरिजेश जी! आपकी तीनों पोस्ट पढीं. सचमुच आपका दृष्टिकोण हमारी सोच का विस्तार ही है. 120 करोड़ लोग शामिल हैं इस शव यात्रा में, किंतु सड़ांध झेलनी पड़ती है आम आदमी को. कुछ ख़ास लोग हर हाल में एयर कण्डीशण्ड कमरे से ही शव यात्रा का लाइव टेलिकास्ट देखते हैं, आराम कुर्सी पर बैठकर.

सम्वेदना के स्वर said...

@ मो सम कौनः
संजय जी अगली कड़ी इसी अंकगणित को समझने की कोशिश है. जुड़े रहें.
@ अलीः
अली सा! दिशा के साथ साथ, दशा भी सही हो जाए यही दुआ है..आमीन!!
@ उपेंद्रः
उपेंद्र जी, हमने तो पत्थर उछाला है, देखें कब आकाश में सुराख़ होता है!!
@ स्वप्निलः
स्वप्निल ! देश के सम्विधान की प्रस्तावना में देश की जनता ने ही सम्विधान सौंपा है देश को. “वी द पिपुल” मात्र शब्द नहीं शक्ति है!!
@ सुज्ञः
सुज्ञ जी! बहुत ही खरी बात कही है आपने. जाति आधारित वोटॉं के लिए पैसे भी नहीं खर्चने पड़ते.
@ ज़ीलः
दिव्या जी! यह तभी सम्भव है जब उन्हें नकारा जाए. यहाँ पर लाईन छोटी करने के लिए उसका काटा जाना ज़रूरी है, क्योंकि दूसरी बड़ी लाइन है कहाँ!

सम्वेदना के स्वर said...

@ I-me-myself:
आपका नाम होता तो सम्बोधन की सुविधा होती. विडम्बना यही तो है देश की कि यहाँ सब कुछ है, पर उसमें वो नहीं है जिसके लिए वो है. चुनाव आयोग भी अपवाद नहीं!!
@ अरुण सिंहः
कृपया अपना ई मेल दें ताकि आपसे इस विषय पर अलग से चर्चा की जा सके.
@शिखा वार्ष्णेयः
करना पड़ता है शिखा जी! त्रासदी तो यह है कि इसपर भी लोग आँखें मूँदे पड़े रहते हैं.
@ गिरीश बिल्लोरेः
सड़े गले नोट अच्छे नोटों का चलन रोक देते हैं, एक पुरानी कहावत है!
@ शैल, राजभाषा हिंदी, मनोज कुमार, निर्मला कपिला, सतीश सक्सेना, प्रवीण पाण्डेय, रचना दीक्षित, क्षमा, सोनल रस्तोगी, अरुण चंद्र रॉयः
ध्न्यवाद!

सम्वेदना के स्वर said...

अंत में बस इतना ही कि नेताओं से तो कोई उम्मीद नहीं है..वे तो चाहेंगे ही कि यही व्यवस्था चलती रहे।
अब हम लोगों को ही “लोकतन्त्र के इस अपहरण” की सूचना जन जन को देने के इस महति कार्य में अपना-अपना योगदान देना होगा।

दिगम्बर नासवा said...

सटीक विश्लेषण ... दोषी कौन .... हम ... सरकार ... ये व्यवस्था .... बदलाव कौन लाएगा ... सरकार ... ये व्यवस्था या हम ... पर सबसे बड़ा सवाल है कैसे ....

ks rakshit said...

बिलकुल सही तस्वीर रखी थी अपने। शायद चुनाव आयोग ने आपकी कुछ बातों को समझा और इस बार के चुनावों में NOTA का भी option दिया है।

ajoyipsbhr85 said...

Solid hai boss

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