सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Saturday, August 21, 2010

पीपली [लाइव]: मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन

अपनी इस श्रृंखला में नारी चरित्रों पर चर्चा के लिए हमने किसी महिला ब्लॉगर को आमंत्रित करने की सोची. जो नाम सबसे पहले दिमाग़ में आया वो था सोनी गर्ग का.. तीखा बोल. जब उन्होंने हमारा कॉनसेप्ट सुना तो बाकी की सारी कड़ियों से जुड़ने की पेशकश की. और आज इस चर्चा में शामिल हैं सोनी गर्ग.

पूरी फिल्म में मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन किया गया है और जमकर छाया हुआ है. अनुशा ने अपने मीडिया अनुभव का भरपूर इस्तेमाल किया है. मीडिया कर्मियों के जार्गन से लेकर, कार्यशैली, गलाकाट स्पर्धा, नैतिकता का निम्नतम स्तर, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा, मुद्दों का दिवालियापन, टीआरपी की होड़, अपने काम से अधिक दूसरा क्या कर रहा है उसपर नज़र, ख़बरों की मैंयूफैक्चरिंग, राजनीतिज्ञों से साँठ गाँठ और जनता की आवाज़ बनने का दिखावा. पूरी फिल्म एक मीडियाकर्मी के कैमेरे से लिखी दास्तान लगती है.

चैतन्यः देश के घटिया टेलिविज़न मीडिया पर जबर्दस्त प्रहार किये हैं इस फिल्म ने, प्रख्यात महिला पत्रकार जो सत्ता के बेहद करीब हैं, पहले तो यह कहकर गाँव की खबरों को तरजीह देने से मना कर देती हैं कि “दिस इज़ नाट माइ फोर्टे” और अगले ही पल टीआरपी की होड़ में कूद पड़ती है, पीपली की एडवंचर ट्रिप पर!
सलिलः इसके पीछे छिपी मानसिकता तो देखिए. इनके हिसाब से गाँव की ख़बरों मे ख़बर बनने जैसी कोई बात ही नहीं है. भले ही ख़बर किसी किसान की आत्महत्या जैसे सम्वेदनशील मुद्दे से जुड़ी हो. क्योंकि इन बातों में इनको कोई थ्रिल नहीं दिखाई देता.
सोनीः बल्कि मैं तो कहूँगी कि एक जोरदार चाँटा जड़ा है इस फिल्म ने उन मिडिया वालों पर जो ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते है ! फिल्म के एक सीन में जब भारत लाइव का एक रिपोर्टर बताता है कि सैफ ने एक लड़की को ‘किस’ किया है तो फ़ौरन उस पर ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने के लिए उस लड़की का इंटरव्यू लेने की बात होती है, न मिले तो उसकी माँ के इंटरव्यू की तैयारी ताकि डिफेन्स में सैफ सामने आए और फिर करीना और फिर कोई और. फिर जाकर एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ बन सके!
मनोजः मीडिया के हथकण्डों को बड़ी ही बारीकी से दिखाया गया है इस फिल्म में । कैसे स्ट्रिंगर से न्यूज उठाई जाती है, कैसे उसे अगड़ी खबर (लीड न्यूज) बनाने की होड़ लगी रहती है, कैसे बाइट्स बनाई जाती हैं, कैसे फुटेज़ तैयार की जाती हैं और कैसे कोई न्यूज़ साधारण होते हुए भी राष्ट्रीय महत्व की बन जाती है. साथ ही कैसे कोई संवेदनशील मुद्दा व विषय भी मीडिया के कैमरे से बचा रहता है, क्योंकि उसमें कोई सनसनी नहीं है, जैसा की सलिल जी ने कहा।… कोई दृश्य जो आप लोगों को याद रह गया हो, या जिसकी आप चर्चा करना चाहेंगे!

चैतन्यः फिल्म के वह सीन बेहतरीन थे, जिसमें लोकल प्रिंट मिडिया के पत्रकार राकेश में वह सम्वेदनशीलता कुनमुनाती दिखायी पड़ती है, परंतु फिल्म साथ-साथ इसका भी एहसास कराती जाती है कि “लोकल प्रिंट मिडिया का पत्रकार, कितनी हसरत भरी निगाह से टेलिविज़न चैनलों के चाकलेटी चेहरों को देखता है! एक अदद माईक और सैटेलाइट छतरी की छाँव के लिये रिरियाता फिरता है वो टेलिविज़न चैनल की तुर्रम खां पत्रकार “नंदिता जी” के पीछे. मैड़म! उसे प्रोफेशनल आउटलुक का जो मतलब समझाती हैं जिसका लब्बो-लुआब हमने तो ऐसे लिया कि, खबर बनाओ, प्राइम टाइम की आंच पर जोर-शोर से पकाओ, बेचो और जेब में माल डालकर दूसरी खबर पकड़ो..आखिर नम्बर वन चैनल और “इनामी जर्नलिस्ट” जो बनना है!
सलिलः राकेश प्रिंट मीडिया का वह मध्यमवर्गीय पत्रकार है जो दिखता तो है ज़मीनी मुद्दों और सरोकारों से जुड़ा, पर सपने देखता है एलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चमक दमक के. लेकिन उसे उसकी जीवित सम्वेदनाओं के कारण अनफ़िट दिखाया गया है. और अंत में उसकी मौत पत्रकारिता की मौत का प्रतीक प्रस्तुत करती है.
सोनीः हालाँकि इस टीआरपी की रेस में एक और रेस भी देखने को मिली, जो थी चैनल के रिपोर्टरों के बीच में ! जहां हर एक रिपोर्टर दूसरे रिपोर्टर को पछाड कर अपनी न्यूज़ आगे करना चाहता है ! जिससे की टीवी पर उसकी न्यूज़ को ज्यादा से ज्यादा फुटेज मिले! इस फिल्म में "भारत लाइव" के "दीपक" तो फिल्म के अंत तक खुद को अपने न्यूज़ चैनल में उम्दा रिपोर्टर दिखाने की कोशिश में लगे रहे ! उनका एक डायलोग है फिल्म के अंत में "भईया न्यूज़ को उतना खिचो जितना उसमे दम है" और फिल्म की शुरुआत में उनके अनुसार इस नत्था की न्यूज़ में दम नहीं था !
मनोजः सही कहा... मीडियाकर्मी नंदिता मलिक, जो एक स्ट्रिंगर के हवाले से आई खबर को राष्ट्रीय मह्त्व का बनाने के लिए नत्था की आत्महत्या के लाइव प्रसारण के लिए सोचती है और राकेश से संपर्क कर पीपली पहुँच जाती है । इस की सूचना विरोधी चैनलों को लगते ही पीपली गाँव मीडिया कर्मियों का गढ़ बन जाता है और फिर शुरु होता है समाचार गढ़े जाने का सिलसिला। समाचार गढ़ने के इस सत्य को फिल्म ने उजागर कर मिडिया कर्मियों की संवेदनहीनता को बखूबी चित्रित किया है और जब नत्था की तथाकथित आत्महत्या का लाइव प्रसारण थमता है, तो किस कदर गाँव में अपने पीछे गंदगी के ढ़ेर छोड़ चले जाते हैं, फिर किसी नई लीड के चक्कर में । फिल्म में आज के निजी मिडिया चैनल्स की कार्यपद्धति पर सटीक व्यंग्य है।

चैतन्यः मुझे तो फिल्म में कोई व्यंग्य नहीं लगा बल्कि ऐसा ही लगा जैसे कोई वास्तविक न्यूज़ टेलिविज़न देख रहा हूं. कोई नत्था के कपड़ों को लेकर अपनी एक्स्क्लूसिव रिपोर्ट दे रहा था तो कोई नत्था के मल-मूत्र की मनोवैज्ञानिक चर्चा कर रहा था. कोई महिलाओं को एकत्र कर, उनसे भूत-पिशाचों के स्वांग करवा कर एक्स्क्लूसिव रिपोर्ट तैयार कर रहा है.
सलिलः हा! हा!! हा!!! ये तो मीडिया का दिवालियापन है.
सोनीः फिल्म की ब्रेकिंग न्यूज़ थी "नत्था आत्महत्या करने वाला है" अब सिर्फ इस एक लाइन को तो पूरी फिल्म में किसी चालीसा की तरह जपा नहीं जा सकता था, इसलिए नए नए मसाले डाले गए! मसलन नत्था से जुड़े हर शख्स को ज़बर्दस्ती दिखाया गया. उसके बचपन के साथी जिनके साथ वो चिलम पीता था! नत्था की जोरू, जिससे जब भी किसी रिपोर्टर ने बात करनी चाही तो उसने उसे तबियत से हड़का दिया! नत्था की माँ जिसे अपने कैमरे में कैद करने से पहले रिपोर्टर को उसे बीडी पिलानी पड़ती थी! ये सब वो मसाले थे जो खुद भी नत्था के साथ हीरो बन गए ! या यूँ कहें कि जिन्होंने नत्था की न्यूज़ को बढाने में मदद की! और तो और फिल्म के आखिर में जब नत्था गायब हुआ तो उसका मल भी दर्शकों को दिखाया गया!
मनोजः चलो व्यंग्य न सही पर इस बात का तो पता ही चलता है कि हमारे चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल्स के पास खबरों कि कितनी कमी है, और इस बात का हास्यास्पद खुलासा तब होता है जब नत्था के गायब होने पर मीडिया कर्मियों को उसके मल-मूत्र का विश्लेषण करने की नौबत आ जाती है।नत्था के ग़ायब होने पर जो एस.एम.एस. पोल करवाई गई उसके नतीजे या जवाबके ऑप्शन याद हैं किसी को..
सोनीः नत्था गायब हुआ है या मर गया है, और जो सबसे अनोखा कारण जो लगभग हर बेवकूफी भरी खबर में सामने आता है वो था इसमें अमेरिका का हाथ होना. ये थे इन चैनल वालों के बुद्धि प्रदर्शन! लेकिन जो सबसे बड़ी कमअक्ली का प्रदर्शन था वो ये की जब नत्था की तथाकथित लाश मिली तब उस लाश के हाथ के ब्रेसलेट पर किसी कैमरे की नज़र नहीं पड़ी! ये थी वो समझदार(?) मीडिया!

आख़िरी मे:

सलिलः मुझे तो लगा कि मैं आज तक मंच पर समाचार देखता था, लेकिन नेपथ्य का दृश्य कितना घिनौना है यह इस फिल्म में दिखाई दिया.
सोनीः नत्था के न्यूज़ में आते ही चैनल वालों ने जो मेला नत्था के घर पर लगाया उससे उस घर की प्राइवेसी ख़त्म हो गयी! और ये खीझ नत्था की जोरू ने कई बार दिखाई! जब मीडिया ने एस.एम.एस. पोल द्वारा लोगों की राय दिखा दी, तो एक सबसे बड़ी कमी जो रही वो थी सट्टेबाजी की, वो भी दिखा ही देते! अक्सर ऐसी खबरों पर सट्टा जल्दी लगता है!
मनोज: पर हकीकत तो यही है कि जहाँ सम्वेदनाएँ जड़ हो चुकी हों और पैसा ही मूलभूत सत्य हो गया हो, वहाँ कुछ किया भी जाए तो क्या?
चैतन्य: दरअसल मीडिया है कहाँ? जो दिखता है वह व्यावसायिक प्रतिष्ठानों या सत्ता के दलालों की दुकानें भर है. फिक्की-केपीएमजी की 2008 की एक रिपोर्ट के अनुसार रु.240.50 बिलियन का बाज़ार है, भारतीय टेलीविज़न मीडिया और यह लगभग 14% सालाना रफ्तार से बड़ रहा है. बहसबाजों के इस हूजूम में यह फिल्म भी अगर माल कमा कर निकल जाये और किसी के कान पर जूं तक न रेंगे, तो यकीन जानिए कि भारतीय समाज का बन्ध्याकरण हो चुका है.

यह फिल्म कई मायनों में रामगोपाल वर्मा की फिल्म “रण”या आर.वाल्की की फिल्म “पा”में टेलीविज़न मीडिया के चित्रण को पीछे छोड़ती लगती है.फिल्म में व्यंग्य को ढाल बनाकर मीडिया को जिस तरह लतियाया गया है,वो अनुशा रिज़वी के लिये ही नहीं हम सभी के लिये भी कैथार्टिक अनुभव था.
(अगला अंक मंगलवार सुबहः पीपली लाइव एक राजनैतिक दस्तावेज़)

सम्वेदना के स्वर पर पीपली लाइवः
 1. मदारी
 2. ख़बरों का आतंक
 3. ढोंगी बाबा, लालची मीडिया और लाचार जनता
 4. चौथे खम्बे में लगी दीमक भाग 1
 5. चौथे खम्बे में लगी दीमक भाग 2
 6. मुर्ग़ा लड़ाई
 7. किरण खेर
 8. एसएमएस की खोलो पोल
 9. चौथे खम्बे की ढपोरशंखी
10. धोनी की शादी में दीवाना मीडिया

Friday, July 9, 2010

धोनी की शादी में, दीवाना मीडिया !

बचपन में कन्हैया लाल नन्दन जी की एक कहानी पढी थी, जो कुछ इस तरह थीः
शहर में एक सड़क के किनारे एक मज़दूर महिला पत्थर तोड रही थी. अचानक वहां कुछ लोगों की भीड़ इकट्टी हो गयी और ज़ोर ज़ोर से से बोलने लगी “ देखो औरत पत्थर तोड़ रही है!... देखो औरत पत्थर तोड़ रही है! ”

वह औरत एकदम सकपका गयी और उठ कर चल दी. भीड़ उसके पीछे पीछे चलने लगी और अब बोल रही थी कि देखो! औरत जा रही है... देखो! औरत जा रही है...औरत भागने लगी और एक गली में बने अपने घर में घुस गयी....भीड़ गली में आ गयी और उस औरत के घर के सामने खड़े होकर वस्तुत: चीखने लगी, देखो! औरत घर में घुस गयी... देखो औरत घर में घुस गयी... औरत कमजोर दिल की थी.... उसने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली....अगले दिन दरवाज़ा तोड़ा गया तो यह हादसा सबके सामने था.

भीड़ अब खुसर पुसर कर रही थी...देखो औरत ने आत्महत्या कर ली.. ...देखो औरत ने आत्महत्या कर ली....

इसके बाद भीड़ अगले शिकार पर निकल गयी..

यह कहानी क्या आपको जानी पहचानी नहीं लगती? भीड़ को आज के इलेक्ट्रोनिक मीडिया से बदल दीजिये और देखिये यह गन्दा खेल आज भी जोर शोर से चालू है..



माओवादी हमले में मारे जवानों की खबर को भूल कर सानिया-शोहिब की शादी के पीछे पड़ गये. मीडिया की तब बहुत छीछालेदर हुई थी. परंतु टी.आर.पी. के भूखे भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया को न जाने किसने समझा दिया है कि अगर राजश्री प्रोडक्शन शादी की फिल्में बनाकर नोट कमा सकता है, तो वो क्यों नहीं.

अब देखिये न! धोनी की शादी में अपनी कैसी गत बना रहा था यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया. धोनी समझदार है. उसे पता था कि यदि शादी की खबर इस अपरिपक्व और बाज़ारु मीड़िया को पहले से बताई गयी तो यह कुछ न कुछ बखेड़ा खड़ा कर देगा और अपना साबुन तैल अलग से बेचेगा. लानत है! कि खबर हर कीमत पर खोजने वाला तुर्रम खाँ मीडिया चैनलों को पता ही तब चला जब धोनी की सगाई हो चुकी थी...फिर खबर आई कि शादी अक्टूबर में होगी. लेकिन रात होते होते पता चला कि शादी अगले दिन होने वाली है.

धोनी ने मीडिया को विवाहस्थल के अन्दर घुसने ही नहीं दिया, तो भी ये लोग बेशर्मी से अपना और देश का समय बरबाद करते हुए दिखाते रहे...कभी शादी में जाने वाली घोड़ी को, कभी घोड़ीवाले को, स्टूडियो में बैठे भाड़े के ज्योतिषियों को, एक चैनेल वाले तो भाड़े की दुल्हन भी पकड़ लाए कि उत्तरांचल की दुल्हन के लिबास में धोनी की दुलहन ऐसी लगेगी. देहरादून के उस होटल से जब धोनी अपनी नवविवहिता के साथ उड़न छू हो गया तब भाई लोग बेवकूफों की तरह होटल में घुस गए और बताने लगे कि यह देखिये यहाँ धोनी की शादी हुई थी, इनसे मिलिए ये हैं होटल के वेटर...जी हाँ! हमारे दर्शकों को बताइये क्या हुआ था?

कितना अभद्र था, जब IBN7 नाम के एक बाज़ारु चैनल नें यह खबर चलाई - “इधर शादी उधर तलाक” लेकिन कार्यक्रम देखने के दौरान यह पता चला कि तलाक से इन मूर्खों का मतलब उन लोगों से था, जिन्हें शादी में नहीं बुलाया गया था. धोनी की खबरों की कमाई खाने वालों की, यह शर्मनाक नमकहरामी थी !

यह सूरत है इस देश के चौथे खम्भे की. इनका काम था सत्ता और सत्ता तंत्र पर पैनी नज़र रखना, ताकि देश की व्यवस्था का कोई भी ज़िम्मेवार व्यक्ति या संस्थान शोषण न कर सके. परंतु अब लगता है कि बाड़ ही खेत को खा गयी. देश की एक मशहूर महिला टेलीविज़न पत्रकार और अंग्रेजी के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के मुख्य सम्पादक के द्वारा किसी खास व्यक्ति को मंत्री पद दिलाने की कोशिशों की बातें भी चर्चा में हैं. यदि इस धुँए के पीछे लगी आग सही है, तो पत्रकारों का दलालों की इस भूमिका में होना, राम गोपाल वर्मा की फिल्म “रण” में अमिताभ बच्चन के उस डायलॉग को सही ठहराता है कि पैसे के लिये मीडिया ने सत्त्ता से हाथ मिला लिया है... जो उंगली बेईमानों पर उठनी चाहिये थी, उसने उन लोगों से हाथ मिला लिया.

सेलेब्रिटीज़ की शादियों से ईतर, समूचा भारत तरस रहा है कि इंडिया के यह टेलीविज़न पत्रकार कभी उसकी भी खबर लेने आयें. कभी देखा है आपने कि महंगाई और बदहाली से हलकान किसी गाँव या शहर में जाकर इन्होंने आम लोगों से उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही हो? अब इन्हें ये समझाने की ज़रूरत तो है नहीं कि बड़े शहरों के अलावा भी देश के बाक़ी हिस्से में लोग रहते हैं. लेकिन जो जागते हुए भी सोने का नाटक कर रहा हो उसे कौन जगा सकता है!

चकाचौंध से भरे इंडिया का प्रतिनिधित्व करते टेलीविज़न जगत के यह पत्रकार, बॉलीवुड, क्रिकेट और फूहड़ हास्य से परे शायद किसी और दुनिया को जानते ही नहीं.

क्या नक़ाबपोशों की इस भीड़ में कोई सच्चा पत्रकार नहीं बचा!! और अगर कुछ अच्छे लोग इनमें अभी भी बचें हैं तो वो एक्सपोज़ क्यों नहीं करते इस बेशर्म खेल को? कैसे चुपचाप सह सकते हैं वो यह सब? एक समानान्तर और स्तरीय बीबीसी जैसा मीडिया क्या नहीं बना सकते हम?



Thursday, March 11, 2010

ढोंगी बाबा , लालची मीडिया और लाचार आदमी

पिछले कुछ दिनों से हमारे सारे समाचार चैनेलों, जिन्हें आज के संदर्भ में News Entertainment Channels कहना उचित होगा, ने भारतीय समाज में फैले ढोंगी बाबाओं के स्टिंग ऑपरेशन किये और साबुन तेल के विज्ञापनों का तडका लगाकर इन समाचारों की जम कर बिक्री की. “सी” ग्रेड मुम्बैया फिल्मों की तर्ज़ पर बनी इन खबरों का एकमात्र उद्देश्य सनसनी फैलाना भर है.

ज़रा ग़ौर करें उन खबरों की हेडलाईन पर –
“बाबा की रंगरलियाँ”, “अय्याश बाबा”, “पाखंड का पर्दा फाश”, “लडकियाँ सप्लाई करने वाला बाबा” .

इतना ही नहीं, इसके बाद दिखाई जाती हैं अश्लील तस्वीरें और शानदार background music. पूरा “सी” ग्रेड फिल्मी महौल तैयार. ऐसे में यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि असली पाखंडी कौन है, आस्थाओं के साथ खिलवाड करने वाला वो अय्याश बाबा या सुधारक के वेश में जनता के विश्वास के साथ खिलवाड करने वाला समाचार मनोरंजन चैनेल.

तनिक ध्यान दें इन तथ्यों परः

  •  कृपालु जी महाराज के आश्रम में हुई भगदड में “खबर हर कीमत पर” दिखाने का दावा करने वाले एक चैनेल ने बहुत हाय तोबा, चीख पुकार मचाई. बिखरी चप्पलें, लाशें और खून दिखाया... टी.आर.पी.बढी, विज्ञापन बढे, कमाई बढी... लेकिन मोटी कमाई करने वाले इन चैनेलों ने सौ रुपये के लिये जान देने वाली जनता (जिनका दर्द वो परोस रहे थे) के कफन पर दो रुपये भी डालने का एलान नहीं किया.

  • इच्छाधारी बाबा के पूरे धंधे का पर्दाफाश किया, बताया कि ये 600 कॉल गर्ल्स का रैकेट था. बाबा का असली नाम हमारे खोजी मीडिया ने खूब उछाला, लेकिन उन मजबूर लडकियों के ग्राहकों की तरफ से सबों ने आँखें मूँद लीं जो इस अनाचार में बराबर के भागीदार थे. इसे शर्मनाक ही कहा जाएगा कि दक्षिण दिल्ली और नोएडा में केंद्रित इन मीडिया घरानों की नाक के नीचे ये कारोबार बरसों से चलता रहा और “खबर हर कीमत पर” दिखाने वाले चैनेल को कानोंकान खबर भी ना हुई. पर्दाफाश का जो काम दिल्ली पुलिस का था, चंडूखाने की खबर के मुताबिक वो काम बाबा के किसी विरोधी दलाल ने किया.

  • स्वामी नित्यानंद की कहानी भी अजीब है. इस स्वामी के एक तमिल अभिनेत्री के साथ अवैध सम्बंधों की सी.डी. लगातार दिखायी जाती रही. बिना यह सोचे कि  ना तो पीडिता की कोई शिकायत कहीं दर्ज की गई,  ना तो इन सबूतों का न्यायालय ही कोई संज्ञान लेता है और सबसे महत्वपूर्ण कि समाचार चैनेलों पे लगातार वो दृश्य दिखाना जो लोग परिवार के साथ देखते हैं, बच्चों पर क्या असर डालता है.
बहरहाल इस घटना ने ढोंगी बाबाओं के काले कारनामों में तो मात्र एक और अध्याय ही जोडा है, लेकिन मीडिया के रोल पर एक बडा सवाल खडा किया है, जिस पर एक बार ग़ौर करने की आवश्यकता है. सवाल ये कि

1. समाचार मनोरंजन नहीं, बी.बी.सी. जैसा कोई सम्वेदनशील मीडिया तंत्र है जहाँ खबरें हर कीमत पर नहीं, वरन सामाजिक सम्वेदनशीलता की बुनियाद पर चुनी जाती हैं.

2. ढोंगी बाबाओं की घटना को पार्श्व में रखकर, एक सार्थक बहस की जाती कि आज का आम आदमी जहाँ झूठे विज्ञापन से धोका खा जाता है वहाँ कैसे नहीं वो अकेला, निराशा का सलीब उठाये बाबाओं के चमत्कार पर भरोसा करे.

मीडिया देश की आवाज़ बन सकता था, घर घर प्राथमिक शिक्षा पहुँचाने का माध्यम बन सकता था, उस गूंगी जनता का मसीहा बन सकता था, अंधविश्वास का चक्रवयूह तोडने में सहायक हो सकता था और बन सकता था एक सम्वेदनशील अभिव्यक्ति का माध्यम.

लेकिन मीडिया बाँट रहा है क्रिकेट और बॉलीवुड की मसाला खबरों की अफीम, कर रहा है झूटे विज्ञापनों के नकली उत्पादों द्वारा जेब काटने का कारोबार, हर कीमत पर खबर दिखाने का दावा करके हर खबर की कीमत वसूल कर रहा है.
तभी तो मुकेश अम्बानी का अपनी पत्नी को साल गिरह पर दिया जाने वाला 400 करोड का हवाई जहाज तो खबर बनता है,लेकिन सौ रुपये के थाली, लोटे और आधा पेट भोजन के लिए जान देने वाले आम लोग सिर्फ सुर्खियों तक ही सीमित रह जाते हैं, क्योंकि इन सुर्खियों से ही 400 करोड बटोरे जा सकते हैं.

Tuesday, February 16, 2010

खबरों का आतंक


कलम का जादूगर या कलम का सिपाही जैसे लफ्ज़ आज अपना मतलब खो चुके हैं. पत्रकारिता से क्रांति का गवाह रहा है हमारा देश. फिर एक लम्बा इतिहास रहा स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष समाचारपत्रों का. और आज का दौर है इलेक्ट्रोनिक मीडिया का. ये समाचार "देता" नहीं "दिखाता और सुनाता" है. ऐसे में चुनने का हक नहीं आपको, जहाँ जाओ, जिस चैनल को देखो चीखो-पुकार मची है. खामोश अखबार की जगह चीखता हुआ, आपके कानों में बार बार हथोड़े की तरह वार करता, ये मीडिया और इसके समाचार चैनल, मानो विवश कर रहे हों आपको कि जो वो कह रहे हैं वही सच है। कुछ पुरानी कहावतें आज याद आ रही हैं।

कलम तलवार से ज्यादा ताक़तवर होती है.
बड़ी ताक़त के साथ बड़ी जिम्मेवारी भी आती है.
ताक़त इंसान को भ्रष्ट करती है और बेशुमार ताक़त बेशुमार भ्रष्ट कर देती है।

ये तीनों बातें कलम के तलवार बन जाने का सफ़र बयां करती हैं. इसमें कलम की जगह इलेक्ट्रोनिक मीडिया की तलवार ने ले ली. जो तलवार क्रांति ला सकती थी, वो आतंक फ़ैलाने लगी. और आज आतंक के बदलते चेहरे में ये पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि कौन कितना बड़ा आतंकवादी है.
आतंक की परिभाषा बड़ी मुश्किल है. लेकिन हर वो काम जिससे लोगों में डर का माहौल पैदा हो - आतंकवाद है. अगर इस परिभाषा पर ग़ौर करें तो आतंकवादी संगठन और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में कोई फर्क नहीं रह जाता. फर्क सिर्फ खून खराबे का हो सकता है.
एक मौत के सौदागर हैं - दूसरे लाशों के तमाशाई. एक चोरी छुपे करता है - दूसरा खुले आम.
दोनों का मकसद
ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी (गलत) बात पहुँचाना.
सिर्फ और सिर्फ सनसनी फैलाना
अपने अहंकार का डंका पीटना - भला उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे (हो सके तो उसकी कमीज़ पर पान थूक दो).
अपना मतलब साधना और दिखाना कि बहुत बड़ा सामाजिक मकसद छिपा है उसके पीछे.
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा.
और भाषा - फलां पार्टी के सांढ़ खुल्ले घूम रहे हैं सडकों पर; कुचल डाला भारत ने बंगला देश को (क्रिकेट मैच में); ख़तम हो जाएगी ये दुनिया...
कॉलेज के दिनों में मैं कहा करता था कि अगर फिल्मों में नंगापन दिखाना हो तो यौन शिक्षा पर फिल्म बनाओ. किसी को ऐतराज़ भी नहीं होगा और तुम्हे आज़ादी होगी कि फिल्म में आधे घंटे की शिक्षा और बाकी के ढाई घंटे में नंगापन दिखाओ. और यह बात गलत भी नहीं है. अन्धविश्वास दूर करने के लिए चमत्कार दिखाए जा रहे हैं और नतीजा ये निकालते हैं कि ये सब अन्धविश्वास है. अपराध से आगाह करने के नाम पर घटनाओं के नाट्य रूपांतर दिखाते हैं, जो वास्तविक घटना से ज्यादा भयानक होते है. और नतीजा ये निकालते हैं कि हम आपको इस तरह के अपराध से आगाह कर रहे हैं. समाचारों में अपराध को जगह देने के बदले अपराध के विशेष कार्यक्रम दिखाए जाने लगे. रामसे बंधुओं की फिल्मों की तरह बैक ग्राऊंड संगीत से लैस, पूरी तरह आपको आतंकित करने को तैयार सीरियल. और उसपर तुर्रा ये कि ये सब आपको आगाह करने के लिए किया जा रहा है.
२६/११ की घटना के समय आतंकवादी सैटलाइट फ़ोन से संपर्क में थे, ए टी एस के लोग घेराबंदी कर रहे थे और मीडिया घेराबंदी की खबर लाइव दिखा रहे थे. उनकी ये "सबसे तेज़" खबर आतंकवादियों तक उनके आकाओं की मदद से पहुँच रही थी सैटलाइट फ़ोन से.
चैन से सोना है तो जाग जाइये... बाहर के आतंकवादियों से हमारी बहादुर पुलिस और सेना लड़ाई करने में समर्थ हैं. लेकिन घर के अन्दर , बल्कि आपके बेड-रूम में छिपे आतंकवादी से तो आपको ही लड़ना होगा. एक आम आदमी की मौत की खबर को सुर्खियाँ बनाकर ये आतंक का ऐसा खेल खेलते हैं जिसमें न वो आम आदमी होता है कहीं; न कहीं मौत होती है, बस होता है एक आतंक. बकौल जनाब मुनव्वर राना
लिक्खी गयी हमारे लहू से ही सुर्खियाँ
लेकिन हमीं खबर से अलग कर दिए गए।

(नवीन जी की प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर)

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