सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Tuesday, February 16, 2010

खबरों का आतंक


कलम का जादूगर या कलम का सिपाही जैसे लफ्ज़ आज अपना मतलब खो चुके हैं. पत्रकारिता से क्रांति का गवाह रहा है हमारा देश. फिर एक लम्बा इतिहास रहा स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष समाचारपत्रों का. और आज का दौर है इलेक्ट्रोनिक मीडिया का. ये समाचार "देता" नहीं "दिखाता और सुनाता" है. ऐसे में चुनने का हक नहीं आपको, जहाँ जाओ, जिस चैनल को देखो चीखो-पुकार मची है. खामोश अखबार की जगह चीखता हुआ, आपके कानों में बार बार हथोड़े की तरह वार करता, ये मीडिया और इसके समाचार चैनल, मानो विवश कर रहे हों आपको कि जो वो कह रहे हैं वही सच है। कुछ पुरानी कहावतें आज याद आ रही हैं।

कलम तलवार से ज्यादा ताक़तवर होती है.
बड़ी ताक़त के साथ बड़ी जिम्मेवारी भी आती है.
ताक़त इंसान को भ्रष्ट करती है और बेशुमार ताक़त बेशुमार भ्रष्ट कर देती है।

ये तीनों बातें कलम के तलवार बन जाने का सफ़र बयां करती हैं. इसमें कलम की जगह इलेक्ट्रोनिक मीडिया की तलवार ने ले ली. जो तलवार क्रांति ला सकती थी, वो आतंक फ़ैलाने लगी. और आज आतंक के बदलते चेहरे में ये पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि कौन कितना बड़ा आतंकवादी है.
आतंक की परिभाषा बड़ी मुश्किल है. लेकिन हर वो काम जिससे लोगों में डर का माहौल पैदा हो - आतंकवाद है. अगर इस परिभाषा पर ग़ौर करें तो आतंकवादी संगठन और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में कोई फर्क नहीं रह जाता. फर्क सिर्फ खून खराबे का हो सकता है.
एक मौत के सौदागर हैं - दूसरे लाशों के तमाशाई. एक चोरी छुपे करता है - दूसरा खुले आम.
दोनों का मकसद
ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी (गलत) बात पहुँचाना.
सिर्फ और सिर्फ सनसनी फैलाना
अपने अहंकार का डंका पीटना - भला उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे (हो सके तो उसकी कमीज़ पर पान थूक दो).
अपना मतलब साधना और दिखाना कि बहुत बड़ा सामाजिक मकसद छिपा है उसके पीछे.
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा.
और भाषा - फलां पार्टी के सांढ़ खुल्ले घूम रहे हैं सडकों पर; कुचल डाला भारत ने बंगला देश को (क्रिकेट मैच में); ख़तम हो जाएगी ये दुनिया...
कॉलेज के दिनों में मैं कहा करता था कि अगर फिल्मों में नंगापन दिखाना हो तो यौन शिक्षा पर फिल्म बनाओ. किसी को ऐतराज़ भी नहीं होगा और तुम्हे आज़ादी होगी कि फिल्म में आधे घंटे की शिक्षा और बाकी के ढाई घंटे में नंगापन दिखाओ. और यह बात गलत भी नहीं है. अन्धविश्वास दूर करने के लिए चमत्कार दिखाए जा रहे हैं और नतीजा ये निकालते हैं कि ये सब अन्धविश्वास है. अपराध से आगाह करने के नाम पर घटनाओं के नाट्य रूपांतर दिखाते हैं, जो वास्तविक घटना से ज्यादा भयानक होते है. और नतीजा ये निकालते हैं कि हम आपको इस तरह के अपराध से आगाह कर रहे हैं. समाचारों में अपराध को जगह देने के बदले अपराध के विशेष कार्यक्रम दिखाए जाने लगे. रामसे बंधुओं की फिल्मों की तरह बैक ग्राऊंड संगीत से लैस, पूरी तरह आपको आतंकित करने को तैयार सीरियल. और उसपर तुर्रा ये कि ये सब आपको आगाह करने के लिए किया जा रहा है.
२६/११ की घटना के समय आतंकवादी सैटलाइट फ़ोन से संपर्क में थे, ए टी एस के लोग घेराबंदी कर रहे थे और मीडिया घेराबंदी की खबर लाइव दिखा रहे थे. उनकी ये "सबसे तेज़" खबर आतंकवादियों तक उनके आकाओं की मदद से पहुँच रही थी सैटलाइट फ़ोन से.
चैन से सोना है तो जाग जाइये... बाहर के आतंकवादियों से हमारी बहादुर पुलिस और सेना लड़ाई करने में समर्थ हैं. लेकिन घर के अन्दर , बल्कि आपके बेड-रूम में छिपे आतंकवादी से तो आपको ही लड़ना होगा. एक आम आदमी की मौत की खबर को सुर्खियाँ बनाकर ये आतंक का ऐसा खेल खेलते हैं जिसमें न वो आम आदमी होता है कहीं; न कहीं मौत होती है, बस होता है एक आतंक. बकौल जनाब मुनव्वर राना
लिक्खी गयी हमारे लहू से ही सुर्खियाँ
लेकिन हमीं खबर से अलग कर दिए गए।

(नवीन जी की प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर)

5 comments:

naveen said...

Samvedana ke Swar me media ka satik chitran kiya hai aapne. I think Ram Gopal Varma ki film ne media ke is commercial swaroop ko halke-fulke andaaze me he sahi expose to kiya he hai! If I can use the lines from this film ….. “ 5 year ka test match khailte lagte hain News Entertainment Channels. Ammersih Kakkar banne ke race me hain ye sab.....

Actually the word media has been deliberately made sacrosanct; if you say anything against them they unite like anything, and will start demeaning you… because mike and camera is in their hand. They have got right to say the last world. They have mastered the art of news manufacturing and news trading. The Sutradhaar has become a obvious party in the “news game” because stakes are too high....

But then the question is who real media is? These paid anchors of various channels are only mask, they are directors’ actor…for money they change channels like politician changes parties….some big brother is working behind them......somebody is there who is on psychological exploitation of Indian Masses…..they want to keep the middle class drunk with the opium of Bollywood obscenity, cricket frenzy and in between some news entertainment……,the poor villagers (said to be the real Bharat) are long forgotten….the viewers are not citizens for them but consumers…

Amitabh said in Rann : Earlier Money was a means and purpose was to give news and make people aware….now News are the means and purpose is to make money, attain supreme power…

There is no corrupt person in Media ( I have never seen a news or sting operation on them)…they have the last word…they have got every right to seek transparency in every matter but their own…(do you know who are their owner ? what salary and perks the anchor and other persons are getting ? what is their criteria of selecting news? How advertisements from companies are received? )…

when democracy is remote controlled...whether we will know the truth ?”
… endless….sir!... endless..
….shameless…. sir!.... shameless…
the damage is un repairable now!
It’s stupid to hope!

ABHIVYAKTI said...

the invasion of media in our bedroom.. insensitivity towrads social issues.. the objective is to mint money by hook or by crook.. aur paise banane ke liye chahe kitni hi lashon par se guzarna pade.. lashein kai nirdosh logon ki, lashein logon ke vishwas ki jo ye maante hain ki media is the fourth pillar of democracy..
kudos to you!! keep posting.. all the best!!!

vinod said...

बस कुछ देर पहले ही
हुआ था एक धमाका
और उसकी मौत
हो गयी थी
पर क्यों उसे लग रहा था
कि इस नयी दुनिया में भी
कुछ अलग नहीं है
वैसे ही भावहीन
खुद में लींन
लोगों की भीड़ के बीच
बेबस सा खड़ा था वह
एक मुर्दा

विनोद कुमार

SAMVEDANA KE SWAR said...

बहुत खूब विनोद जी,
आज ज़रूरत है अपने अन्दर छिपे मुर्दा इंसान को दोबारा जिंदा करने की. कब तक तमाशाई बने देखते रहेंगे हम. क्या आने वाली पीढ़ी को हम कायरता की विरासत सौंपने वाले हैं! आखिर कब सोचेंगे!!

Apanatva said...

sabhee apanee apanee jindagee ko le vyst hai.........
koi ek aawaz uthae to sath dene wale kum dabane wale jyada milenge..........par ab frustration nazar aa raha hai....shayad kuch change aae .
ummeed rakhee ja saktee hai .

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