सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Friday, February 19, 2010

आओ सारे पहन लें आईने

कई बार किसी कहानी, नाटक, कविता या सिनेमा को देखते-सुनते हुए ऐसा लगता है कि हम इनके किरदारों से कहीं मिल चुके हैं. कुछ किरदार हमसे इतने करीब होते है कि उनसे अपनापन सा हो जाता है. एक ऐसा रिश्ता सा बन जाता है कि उनकी चर्चा हम अपने परिवार के सदस्यों कि तरह करने लगते हैं. रोज़मर्रा की बातचीत में भी हम उनका नाम ऐसे लेते हैं मानो किसी अपने की बात कर रहे हों. आज की तारीख में कोमलिका, सिंदुरा, कावेरी, मोहिनी, जिज्ञासा जैसे नाम सुनकर हो सकता है आपकी भवें तन जाएँ या आप गुस्से में गालियाँ तक बक दें इनके नाम सुनकर. वज़ह....सिर्फ इतनी कि ये औरतें बानी, प्रेरणा, सलोनी, कशिश या फिर अनुराग, नाहर या वालिया की दुश्मन हैं. लेकिन इनमें से न तो आपकी किसी से दोस्ती है - न दुश्मनी. फिर ऐसा क्यूँ?

देवदास-रोमेओ, रॉबिनहुड-हातिमताई, शेर्लोक होम्स-फेलु दा, गब्बर-मोगाम्बो वगैरह कई ऐसे नाम हैं जो किसी परिचय के मोहताज नहीं. अपने आस पास दोस्तों-रिश्तेदारों की पिछली पीढ़ी पर नज़र डालें तो हमें शम्भू, कृष्ण, राम, मुरारी, तुलसी या मीरा तो कई मिल जायेंगे लेकिन कंस, रावण, मंथरा या कैकेयी शायद ढूंढे से न मिलें. ऐसा क्यूँ?

दरसल साहित्य और फिल्मों ने हमें कुछ ऐसे किरदार दिए हैं जो किसी न किसी तरह हमसे ऐसे जुड़ गए हैं कि जाने पहचाने से लगते हैं. इनकी चर्चा बिना किसी भूमिका के हम कर लेते हैं. इनसे हम मोहब्बत या नफरत भी करते हैं जैसे आम ज़िन्दगी में किसी के साथ हो सकती है. लेकिन क्या आपने किसी ऐसे किरदार के बारे में सुना है जो पूरी फिल्म में था ही नहीं? पूरी फिल्म में एक बार भी वो परदे पर दिखाई नहीं दिया, सिर्फ उसका नाम लिया जाता रहा. अगर कहानी में ट्विस्ट पैदा करूँ तो ये वो किरदार है जो फिल्म कहीं भी नहीं है और कई चेहरे में नज़र भी आता है.

सस्पेंस हमेशा सूखी रोटी पर अचार कि तरह होता है. इसलिए अगर थोड़ी पहेली और बुझाते हुए ये कहूँ कि उसकी तुलना आप चारखाने वाली कमीज़ और धोती पहने उस आदमी के साथ कर सकते हैं, जो बरसों से रोज़ सुबह सुबह आपके सामने हाज़िर हो जाता है लेकिन कभी कुछ नहीं कहता. और तो और फैंटम या मैन्ड्रेक की तरह उसका कोई नाम भी नहीं है. लोगों ने आर. के. लक्ष्मण के उस चरित्र का नाम "आम आदमी" रख छोड़ा है.

फिल्मों में अगर कोई ऐसा चरित्र गढ़ सकता है तो वो है सिर्फ एक आदमी- स्व. हृषिकेश मुख़र्जी. और जिस चरित्र के लिए मैंने इतना शब्दजाल बुना है वो है फिल्म आनंद का "मुरारीलाल". डा. भास्कर उर्फ़ बाबु मोशाय और आनंद जैसे सशक्त चरित्रों के बीच मुरारीलाल की एक अलग पहचान है जो फिल्म में अलग अलग शक्लों में मौजूद है और शायद कहीं भी नहीं है.

मुरारीलाल नाम है एक तलाश का जो हर किसी को है, जिसको पाकर उसकी तलाश पूरी हो सके. आनंद की मानें तो हर आदमी एक ट्रांसमिटर की तरह है, जिस किसी ने इस ट्रांसमिटर की तरंगों को पकड़ लिया वही मुरारीलाल है. या डा. मुन्ना भाई की जादू की झप्पी किसी भी इसा भाई सूरतवाला को मुरारीलाल बना सकती है. लेकिन इस खोज के लिए ज़रूरी है कि हर किसी का दिल टटोल कर देखा जाये. सच है

इक आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखिये.

4 comments:

ABHIVYAKTI said...

a great tribute to a greatest film maker..

Guddu said...

I have always believe.. Reel life and Real life are inter-related.. ek dusre se sikhte hain aur sikhate hain..

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

abhi abhi aapka comment dekha apne blog par aap ki umar bahdhane /ghatane wala ( pata nahi hai na ..ki aap 40 se kam ke hain ya jyada:P) comment dekha jisme 13 feb ki post pe apne cooment ko padhne chala aayaa.. yahaan aayaa to ye post pe nazar pad gayi ...gulzaar saab ki baat se shuru hoti aur nida saab ki baat per khatm hoti ...kya dhansu pahlei bujhai hai aapne.. :) wakai me murari laal ko har koi gadh nahi sakta par kho jarur sakta hai ...jai ho..aam aadmi ..jai ho hrishi daa.... :)

Apanatva said...

film kee story jeevan se judee hotee hai to swabhavik hai kirdaro ko apane ittraf hee dhoond lenaa...........
acchee post.......
Aabhar .

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