सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Sunday, February 14, 2010

मदारी

होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे

इसके पहले कि वो सम्भलता या समझता; सामने से आती कार के अगले पहिये उसके सर के ऊपर थे। कार चलाने वाले ने पूरी कोशिश की थी रोकने की, लेकिन पहियों की चीख के तले उस आदमी की चीख दब कर रह गयी। दोनों बदकिस्मत थे, एक की जान गयी - दूसरे की जान निकली जा रही थी।

देखते ही देखते सड़क पर लोगों का समंदर उमड़ पड़ा। पुलिस केस कहकर लोगों ने यह देखने की भी ज़हमत नहीं उठाई कि वो इन्सान जिंदा भी था या मर गया। पुलिस आदतन देर से आने वाली थी, क्योंकि ये फैसला करना मुश्किल हो रहा था कि वो लाश जिस ज़मीन पर पड़ी थी वो भारतवर्ष के किस थाने में आतीहै।

लोगों ने लाश को घेर रखा था और आज किसी को कोई जल्दी नहीं थी। आज ऑफिस देर से पहुंचे तो एक सच्ची कहानी होगी बताने को कि बस ज़रा सी किस्मत अच्छी थी वरना उस आदमी कि जगह उनकी लाश सड़क पर पड़ी होती।" आज तो ऑफिस के हीरो बने होंगे वो। एक सनसनीखेज़ हादसे के लाइव द्रष्टा। सबसे तेज़। खबर के केंद्र में होगा वो मरने वाला आदमी , लेकिन हीरो होंगे वो सब लोग जो आज ऑफिस देर से पहुंचे होंगे "बस बाल बाल बचकर।"

खैर, वहीँ सड़क पर एक और आदमी खड़ा है। दो दिनों से कुछ खास नहीं कमाया बेचारे ने। जानवरों के तमाशे तो मेनका गाँधी ने बंद करवा दिए और जादू का खेल सड़क पर घूमने वाले योगेश सरकार ने। अब उसकी पुकार पर लोग रुकते तक नहीं। आज एक साथ इतने लोगों की भीड़ देखकर, उसकी दो दिनों की भूख बर्दाश्त से बाहर हो गयी। उसने बिना वक़्त जाया किये वहीँ पर अपनी चादर बिछा दी। उसका बेटा थाली पर चम्मच से ताल देने लगा। और वो चिल्ला चिल्ला कर आवाज़ लगाने लगा," मेहरबान! कदरदान!! साहेबान!!! हिन्दू को राम राम, मुसलमानों को सलाम! अभी आपके सामने, मैं अपने बच्चे का सर काटकर उसे दुबारा जिंदा कर दूंगा। ये हैरत अंगेज़ तमाशा देहिये साहेबान और इस गरीब की चादर पर आठ आना-एक रूपया देते जाइये। उपरवाला आपके बच्चों को सलामत रखेगा।"

*****

१३ फ़रवरी २०१०-पुणे : शाम ७:०० बजे। एक विस्फोट जिसमे कुछ लोग मारे गए और कई घायल हुए। टीवी पर ये खबर छाई हुयी है । लाशों और खून के दृश्य के ऊपर कैमरा फिसल रहा है। लोग अपने अपने परिजनों के बारे में जानकारी के लिए क़तर में खड़े हैं पागलों की तरह।

तभी अचानक एक पुलिसवाला आता है और सामने खड़े व्यक्ति से कहता है," आपने रूपा फ्रंट लाइन पहना है तो आगे जाइए।"

लोगों की चीख पुकार और रोने की आवाजें गूँज रही हैं टीवी पर ,"डोकोमो ..को को मो मो ..इया आयो॥"

संवेदनहीनता की पराकाष्ठ है ये। क्या इतनी दुखद घटनाओं के बीच मदारीगिरी आवश्यक हैं? सच है...

अब नयी तहज़ीब के पेशेनज़र हम

आदमी को भून कर खाने लगे हैं॥

5 comments:

vivek said...

hum sabko in tv channels aur unki bachkaani news peshi ko nakaarna hoga..ye hamein ek hi visual baar baar dikha kar samvedanheen bana rahe hain...

phir prabhaat feriyan nikalni hongi..

buddham sharanam gachchami...

vivek sharma

aapoo said...

Apni ek adhlikhi ghazal ka sher arz karna chahta hoon Poona blast ke victim aur culprit ke liye,
"Aadmi ne aadmi ka shikar kiya,
Cheel kawwon ne khoob daavat udayi."
Sharad Joshi ya Parsai ka kaha sach hai inke liye ki,"Ishvar inhe kabhi maaf mat karna ye jaante hai ye kya kar rahe hai."
Shanti...Shanti...Shanti

naveen said...

uff....kitna pagalpan hai is dunia me. Terrorist aur News Entertainment Channels of India are no different!?
...ek masoomo ko mar kar apna point prove kar rahe hain..doosre maaut ko tamasha bana ker..bazaar mein baich rahe hain..("sabun tail" ke addvertisements ke beech!)

Both (Terrorist and News Entertainment Channels of India) are in constant worry of fall in their TRP!!....
Both aim to grab maximum "Eye Bolls"!
Both have inflated egos behind them !
Both belive in sensationlisation !
Both appears to have political agenda behind their "so called nobel cause"
Both took up some social works and try to give impression of being social crusader...
Both are insenstive to human feelings...

Now a days even the language of Media is terrorising one :

Thaakre ke Gunde...kule saand ke tarah Ghum rahe hain...(IBN7..what is the difference between u and them..? don't we know that you have got your personal fight also with these people?)

Khatam ho jayege Prathvi....Mar jayege Janta?? (What kind of Language is this?)

Kuchal do Bangla desh Ko (never seen such a language for a cricket match..)

During NDA regime these News Entetatinment Channels were Sarcastical about Astrolgy being introduce in few universities and now each of them has two or three astrologer on their pay role....talking all the rubbish in the name of Astrology....

India need freedom from Terrorism as well as freedom from these News Entertainment Channels also....

Vivek Sharma Ji is right....
phir prabhaat feriyan nikalni hongi..

God Save the Country!!

vinod said...

संवेदनशील होना मनुष्यता का गुण है पर उसकी अभिव्यक्ति
के लिए शब्द का होना एक विशेष गुण
शब्द जो बाहर आ रहें हैं तो आने दीजिये
शायद शब्दों की ताकत किसी को संवेदित कर उसे मनुष्य बनने में मदद करे
-विनोद कुमार

Apanatva said...

samvedana jaha hai vaha vyapar kanha ho paega.........

logo ko bhee manoranjan hee chahiye.......
kis keemat par isakee parvaah nahee.........

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