सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Tuesday, June 22, 2010

राजस्व की लालची सरकार

मेरा एक मित्र सचिवालय में नौकरी करता है, मैं चाहता तो सचिवालय में काम करता है, भी लिख सकता थ. लेकिन मुझे पता नहीं वो काम करता भी है या नहीं, इसलिए नहीं लिखा. हाँ, नौकरी करता है ये बात पक्की है. ख़ैर, एक दिन मुझे सचिवालय में कोई काम था. सोचा दोस्त है तो मिल लूँ, अगर आवश्यकता हो तो उसकी मदद भी ली जा सकती है. किंतु इतने बड़े सरकारी महाजाल में मैं अपने मित्र को कहाँ खोज पाउँगा, इसलिए उससे मैं ने पूछ लिया, “यार, तेरा डिपार्टमेंट है कहाँ पर, कैसे मिलूँगा तुझसे?”
मेरे मित्र ने पूरा नक्शा मेरे सामने रख दिया. ज़रा आप भी ध्यान दें. मेरे मित्र ने कहा, “बहुत आसान है. तुम गाड़ी लेकर सामने वाले गेट से मत आना. बगल वाला गेट, जिसपर लिखा होगा ‘प्रवेश निषेध’ उधर से अंदर चले आना. एकदम नाक की सीध में, एक दीवार दिखेगी जिसपर लिखा होगा ‘यहाँ गाड़ी खड़ी न करें’, वहाँ गाड़ी पार्क कर देना. बिल्कुल पास में ऊपर जाती सीढियाँ दिखाई देंगी, साथ में एक बोर्ड लगा होगा, जिसपर लिखा होगा ‘अनाधिकार प्रवेश वर्जित’, वहाँ से ऊपर चले आना. सामने कई कमरे होंगे, एक के सामने लिखा होगा ‘गोपनीय कक्ष’, उसके अंदर चले आना. सीधे हाथ पर एक गलियारा दिखेगा. वहाँ दो कदम चलते ही एक हॉल मिलेगा, जहाँ लिखा होगा ‘कृपया शांति बनाए रखें’, वहाँ ज़ोर से मेरा नाम लेकर पुकारना. मैं आकर ले जाऊँगा तुझे अपने कमरे में.
लब्बोलुआब ये कि इस तरह की हिदायतें सिर्फ लिख दी जाती हैं, ताकि सनद रहे और ज़िम्मेदारियों से छुटकारा मिले. स्व. शरद जोशी के शब्दों में हमारे देश सब कुछ है, मगर वो नहीं है,जिसके लिए वो हैं. आखिर जनता का राज है, और जनता समझदार है, पढी लिखी है. सच तो यह है कि ऐसी चेतावनी लिखने/लिखवाने वाले चाहते ही नहीं कि इन चेतावनी पर कोई अमल करे, क्योंकि लिखना सिर्फ रस्म अदाई है.

(चित्र साभार: कालीकट नेट.कॉम)
अब सिगरेट और शराब को ही ले लें. सिगरेट की डिब्बी पर लिखवा दिया “सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” और काम खतम. अगर ये इतनी ही हानिकारक है तो रोक लगा दें इनपर. लेकिन राजस्व के लालच में शराब और तंबाखू के सेवन पर सरकारें रोक लगाने से हमेशा बचती रही हैं और इसके विकल्प में महज वैधानिक चेतावनी लिख कर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेती हैं. सवाल ये उठता है कि क्यों ऐसे उत्पाद बाज़ार मे रहें, जो नागरिकों के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हैं?
लेकिन ऐसा नहीं कि उन्हें आपकी फ़िक्र नहीं है. दुपहिया वाहन चालकों से हेल्मेट न पहनने और कार चालकों की सीट बेल्ट न बँधी होने पर वहीं का वहीं जुर्माना कर दिया जाता है? आख़िर क्यों?? क्यों नहीं इन वाहनों पर भी धूम्रपान और मद्यपान करने वालों की तरह, वैधानिक चेतावनी लिखकर, वाहन चालक के विवेक पर बात छोड़ दी जाती है? वाहन चालक चाहें तो हेल्मेट न पहनकर या सीट बेल्ट न बाधंकर, अपनी जान जोखिम में डालें, सरकार को क्या? सरकार ने तो वैधानिक चेतावनी (जैसे “बिना हेल्मेट दुपहिया वाहन चलाना या बिना सीट बेल्ट बांधे गाड़ी चलाना, जान जोखिम में डालना है”) प्रत्येक दुपहिया वाहन और कार पर लिखवाना अनिवार्य करके, आपको पहले ही सचेत कर दिया है. और अगर आप ऐसा नहीं लिखवाते हैं अपने वाहन पर, तब आपको जुर्माना हो सकता है. वैधानिक चेतावनी लिखवाईए और काम पे चलिए!
इन दोनों परिस्थितियों में जनसाधारण के जीवन का प्रश्न जुड़ा है, किंतु उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था को सचमुच नागरिकों के प्राणों की चिंता है? उत्तर स्पष्ट है कि सर्वोच्च प्राथमिकता सिर्फ अपने राजस्व की है?
पहले उदाहरण में राजस्व के लोभ में शराब और तंबाखू का उत्पादन जारी रखा जाता है, नागरिकों की जान से बेपरवाह होकर. वह राजस्व जिसका एक हिस्सा नागरिकों को दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च होता है, जो इन पदार्थों के सेवन से उत्पन्न होती हैं.
दूसरे उदाहरण में हेल्मेट उद्योग से मिलने वाले राजस्व के लोभ में व्यवस्था, नागरिकों के जान की परवाह करती हुई दिखाई देती है. वही सरकार, वही नागरिक, वही देश… लेकिन यहां आम आदमी के जीवन की किसे चिंता है
                  ज़िंदगी सिगरेट की है मानिंद
                  देती है धुँआ तब तक
                  कि जबतक खत्म हो जाती नहीं!!

19 comments:

soni garg said...

शुरुआत में नक्षा पढ़ कर लगा कोई संता-बंता जोक पढ़ रही हूँ ! लेकिन यही आजकल के सरकारी कामो का सच है जो कहा जाता है या लिखा जाता है वो होता नहीं और जो होता है वो कहा नहीं जाता !!! अरे भई आखिर सरकारी कमाई तो ऐसे ही होती है ना .........वैधानिक चेतावनी लिखकर !!!!!!!! वैसे आपका काम हुआ या नहीं ???

सम्वेदना के स्वर said...

@Soni Garg:
काम… !!! क्या बात करती हैं आप! अभिमन्यु बेचारा भी चक्रव्यूह में फँस कर रह गया था...क्योंकि कलयुग में चक्रव्यूह भेदन का रहस्य मेरे माता पिता ने नहीं सिखाया. अपने पिता जी के लिए बस इतना ही “well done! Abbaa!!”..

बेचैन आत्मा said...

उम्दा पोस्ट.
आपकी लेखनशैली काफी रोचक है.

Manoj Bharti said...

विचारणीय पोस्ट

kshama said...

Jab yah sab padhti hun,to sir peet lene ka man karta hai!
Aapki lekhan shaili gazab hai!

soni garg said...

ha ha ha ha gr8..........

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत उम्दा पोस्ट...विचारणीय....मित्र तक पहुँचने का रास्ता बहुत अच्छी तरह बयां किया है

Sonal Rastogi said...

यही बात कई बार महसूस हुई,ज़हर बेच रहे है पर कहते है जहर मत पियो ... गुजरात सरकार में कम से कम इतनी हिम्मत तो है की मदिरा से होने वाले राजस्व का लालच छोड़ कर उसे निषेध करने की हिम्मत दिखाई .
रही बात सरकारी कार्यशैली की तो भाई भुक्तभोगी है ....जिसका वास्ता एक बार पड़ जाए वो कभी नहीं भूलता

रचना दीक्षित said...

अच्छा लगा मित्र और उस तक पहुँचने का रास्ता, अच्छी पैनी नज़र

देवेश प्रताप said...

वाह !!! आपके मित्र ने बहुत अच्छे ढंग से अपने ऑफिस का रास्ता बतलाया ......बहुत बढ़िया पोस्ट .

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

bilkul sahi bat kahi aapne... aur aap logon ne jin udahranon ko iostemal karte hue apni bat yahana rakhi hai ..wo kamaal hai.. dost se milne ka naksha to zabardast tha,...sach much chetawaniyaan sirf aiven types hi likhi hoti hain...

Apanatva said...

chitran sajeev ho utha hai......
lekhan shailee ko naman.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब लिखा है ... आपकी बात रखने का तरीका भी कमाल का है ...
ये सच है सरकार राजस्व कमाना चाहती है ... उसे असल चिंता बस अपनी कमाई की है ... तभी तो पता नही कितने ही राज्यों ने शराब बंदी करी पर फिर पाबंदी हट ली ..... सिर्फ़ चेतावनी दे कर पल्ला झाड़ लेती है सरकार हमेशा....

सर्प संसार said...

सही फरमाया सरकार।
---------
क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

Divya said...

kyunki likhna ek rasm adayegi ho gayee hai...

people are indifferent towards a number of things.

Dukhad .

सुमित प्रताप सिंह said...

nice post...

Apanatva said...

mai to aapkee post ke sath sath aapkee tippaniya bhee sarahtee hoo.aap swayam lekhak kee soch se jud jo jate ho..........
bahut kum ye dekhne me aata hai......
Aabhar.

Avinash Chandra said...

Baat to sahi kahi aapne, naksha behtareen hai.

par sarkar ham hi hain na, matlab mango man, aam aadmee.... Kahne ka matlab ye nahi ki sarkar bahut dhawal hai, par ham kitne jaagruk hai...
Yahan tak ki so called buddhijivi bhi..??

Aapke blog par pahli baar aaya, vicharon se rubaroo hua, achchha laga :)

Harsh said...

nice post..

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