सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Tuesday, June 1, 2010

क्यों पुलकित है ज़लज़ला???

पूरे मधुमक्खियों के छत्ते में
एक रानी होती है
लेकिन जब सभी रानी बनकर
टूट पड़ें किसी एक पर तो ज़लज़ला आता है!
कोई शक्ल नहीं होती उसकी
नाम नहीं, जाति नहीं, लिंग भेद नहीं.
रक्तबीज की तरह हर पल एक नया रूप धरकर आता है वो सामने.
जानते हो क्यों...
क्योंकि एक बार अपमानित किया था तुमने
इसलिए अपनी हतक का बदला लेने
तुम्हारे जैसा ही बनकर आया है वो
एक रानी मक्खी जैसा
वादे के मुताबिक़
दिन, तारीख, महीना और समय सब निश्चित
कल तुम्हारे साथ थे जो, आज पाला बदल चुके हैं
ग़ौर से देखो उसका रूप
उसे अब सिर्फ आँखें दिखाई देती हैं
जो कभी तुमने कहा था कि तुम्हें घूरती हैं
अपमान का ज़लज़ला, नया रूप धर कर खड़ा है
तुम्हारे सामने.
पहचान सको तो पहचान लो
तुम्हारी शकल में, तुम्हारे सामने, सारी दुनिया के सामने
खोल रहा है वो अपने वस्त्र
और अपमानित हो रही हो तुम
उसकी पलकों को ग़ौर से देखो एक बार
पलकों पर अश्क़ का क़तरा नहीं
एक सैलाब, एक ज़लज़ला है
क्यों नहीं होगा वो पुलकित
नंगा वो नहीं, तुम्हें नंगा किया है उसने
याद रखना
हतक हमेशा ज़लज़ला ही पैदा करता है!

(हतक: तिरस्कार)

8 comments:

kshama said...

Haan..jabtak ham har cheez ko 'personally'lete rahenge,apmanit mahsoos karte rahenge..mujhe aajtak is 'zalzala' ka prakaran ka ugam aur aasaar poori tarah samajh me nahee aaye..khair! Jo baat rachna me kahi gayi hai,wo bhaav samajh rahi hun..

मनोज कुमार said...

बेहतरीन!

पलक said...

थैंक्‍यू है सर। मैं एक कविता आपको भी समर्पित करूंगी। पर नंबर कब आएगा अभी बतला नहीं सकती। बहुत लंबी बुकिंग है, वेटिंग चल रही है। आप लघु बैठक में आना मेरे घर पर। कल नीशू सर को चेयरपर्सन बनाकर एक बैठक कर रहे हैं। आपका इंतजार रहेगा। संवेदना के स्‍वर सर।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

baap re baap ...kitni tapish hai is nazm me... sach much ..hatak jaljala hi paida karta hai ..itihaas me iske kai udaharan mauzood hain ...bahut pasand aayi yah rachna..aur madhumakhhion ko jab bhi maine use kiya kisi kavita me..bade pyaare anubhav ke sath ..inka bhayanak roop..( jo ki asali hai ) aap ki hi kavita me dekh raha hun ...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

aur haan .."hatak " se manto ki ek zabardast kahani bhi yaad aa gayi .... agar usi ke charecter ..sugandhi ko dekhen to ek hatak ne usse vidroh karwa diya...sach ko wo kitni aasani se maan gayi...

soni garg said...

पिछले कई दिनों से जलजला के बारे में बहुत कुछ अन्य ब्लॉग पर पदने को मिल रहा है, लेकिन ये उन सब से अलग रहा खैर जलजले का जो चित्रण किया वो इसे समझने के लिए अच्छा है ! आकिरी लाइन "हतक हमेशा जलजला ही पैदा करता है" बहुत सही है !

Apanatva said...

ye aakrosh uttejana pratishodh ka jajba kisee ke hit me nahee.jaljala jaljalaa hee hai....

Apanatva said...

Email i d theejiyega sampark avashy karungee .
kabhee bangalore aae to avashy bataiyega.......
khushkismat hai aap kee aapko apanee manzil ka pata malum hai....
P S
samay par sonaa swasthy ke liye labhkaaree hai .
comment ka samay dekha iseeliye.............

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