मेरा एक मित्र सचिवालय में नौकरी करता है, मैं चाहता तो सचिवालय में काम करता है, भी लिख सकता थ. लेकिन मुझे पता नहीं वो काम करता भी है या नहीं, इसलिए नहीं लिखा. हाँ, नौकरी करता है ये बात पक्की है. ख़ैर, एक दिन मुझे सचिवालय में कोई काम था. सोचा दोस्त है तो मिल लूँ, अगर आवश्यकता हो तो उसकी मदद भी ली जा सकती है. किंतु इतने बड़े सरकारी महाजाल में मैं अपने मित्र को कहाँ खोज पाउँगा, इसलिए उससे मैं ने पूछ लिया, “यार, तेरा डिपार्टमेंट है कहाँ पर, कैसे मिलूँगा तुझसे?”
मेरे मित्र ने पूरा नक्शा मेरे सामने रख दिया. ज़रा आप भी ध्यान दें. मेरे मित्र ने कहा, “बहुत आसान है. तुम गाड़ी लेकर सामने वाले गेट से मत आना. बगल वाला गेट, जिसपर लिखा होगा ‘प्रवेश निषेध’ उधर से अंदर चले आना. एकदम नाक की सीध में, एक दीवार दिखेगी जिसपर लिखा होगा ‘यहाँ गाड़ी खड़ी न करें’, वहाँ गाड़ी पार्क कर देना. बिल्कुल पास में ऊपर जाती सीढियाँ दिखाई देंगी, साथ में एक बोर्ड लगा होगा, जिसपर लिखा होगा ‘अनाधिकार प्रवेश वर्जित’, वहाँ से ऊपर चले आना. सामने कई कमरे होंगे, एक के सामने लिखा होगा ‘गोपनीय कक्ष’, उसके अंदर चले आना. सीधे हाथ पर एक गलियारा दिखेगा. वहाँ दो कदम चलते ही एक हॉल मिलेगा, जहाँ लिखा होगा ‘कृपया शांति बनाए रखें’, वहाँ ज़ोर से मेरा नाम लेकर पुकारना. मैं आकर ले जाऊँगा तुझे अपने कमरे में.
लब्बोलुआब ये कि इस तरह की हिदायतें सिर्फ लिख दी जाती हैं, ताकि सनद रहे और ज़िम्मेदारियों से छुटकारा मिले. स्व. शरद जोशी के शब्दों में हमारे देश सब कुछ है, मगर वो नहीं है,जिसके लिए वो हैं. आखिर जनता का राज है, और जनता समझदार है, पढी लिखी है. सच तो यह है कि ऐसी चेतावनी लिखने/लिखवाने वाले चाहते ही नहीं कि इन चेतावनी पर कोई अमल करे, क्योंकि लिखना सिर्फ रस्म अदाई है.
(चित्र साभार: कालीकट नेट.कॉम)
अब सिगरेट और शराब को ही ले लें. सिगरेट की डिब्बी पर लिखवा दिया “सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” और काम खतम. अगर ये इतनी ही हानिकारक है तो रोक लगा दें इनपर. लेकिन राजस्व के लालच में शराब और तंबाखू के सेवन पर सरकारें रोक लगाने से हमेशा बचती रही हैं और इसके विकल्प में महज वैधानिक चेतावनी लिख कर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेती हैं. सवाल ये उठता है कि क्यों ऐसे उत्पाद बाज़ार मे रहें, जो नागरिकों के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हैं?
लेकिन ऐसा नहीं कि उन्हें आपकी फ़िक्र नहीं है. दुपहिया वाहन चालकों से हेल्मेट न पहनने और कार चालकों की सीट बेल्ट न बँधी होने पर वहीं का वहीं जुर्माना कर दिया जाता है? आख़िर क्यों?? क्यों नहीं इन वाहनों पर भी धूम्रपान और मद्यपान करने वालों की तरह, वैधानिक चेतावनी लिखकर, वाहन चालक के विवेक पर बात छोड़ दी जाती है? वाहन चालक चाहें तो हेल्मेट न पहनकर या सीट बेल्ट न बाधंकर, अपनी जान जोखिम में डालें, सरकार को क्या? सरकार ने तो वैधानिक चेतावनी (जैसे “बिना हेल्मेट दुपहिया वाहन चलाना या बिना सीट बेल्ट बांधे गाड़ी चलाना, जान जोखिम में डालना है”) प्रत्येक दुपहिया वाहन और कार पर लिखवाना अनिवार्य करके, आपको पहले ही सचेत कर दिया है. और अगर आप ऐसा नहीं लिखवाते हैं अपने वाहन पर, तब आपको जुर्माना हो सकता है. वैधानिक चेतावनी लिखवाईए और काम पे चलिए!
इन दोनों परिस्थितियों में जनसाधारण के जीवन का प्रश्न जुड़ा है, किंतु उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था को सचमुच नागरिकों के प्राणों की चिंता है? उत्तर स्पष्ट है कि सर्वोच्च प्राथमिकता सिर्फ अपने राजस्व की है?
पहले उदाहरण में राजस्व के लोभ में शराब और तंबाखू का उत्पादन जारी रखा जाता है, नागरिकों की जान से बेपरवाह होकर. वह राजस्व जिसका एक हिस्सा नागरिकों को दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च होता है, जो इन पदार्थों के सेवन से उत्पन्न होती हैं.
दूसरे उदाहरण में हेल्मेट उद्योग से मिलने वाले राजस्व के लोभ में व्यवस्था, नागरिकों के जान की परवाह करती हुई दिखाई देती है. वही सरकार, वही नागरिक, वही देश… लेकिन यहां आम आदमी के जीवन की किसे चिंता है
ज़िंदगी सिगरेट की है मानिंद
देती है धुँआ तब तक
कि जबतक खत्म हो जाती नहीं!!
