सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Friday, May 6, 2011

देश का अगला राष्ट्रपति- अन्ना हज़ारे ?

एक संसदीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ हर कोई एक लिखित संविधान से बंधा है और उसके पालन को बाध्य है. इसके अंतर्गत उनके ऊपर सबसे बड़ा दायित्व है देश का जिनपर देश की नीतियां और आचरण निर्भर है. लेकिन जैसा कि एक प्रचलित मुहावरा है कि सता व्यक्ति को भ्रष्ट कर देती है और अपरिमित सत्ता सम्पूर्णता से भ्रष्ट कर देती है. ऐसे में आवश्यकता है अपनी शक्ति को पहचानने की ताकि सत्ता में बैठे व्यक्ति को भटकने से रोका जाए.

देश का प्रथम नागरिक राष्ट्रपति होता है. वैसे तो अपने देश में संसदीय प्रजातंत्र है और राष्टपति की भूमिका बहुत सीमित है. यह भी कहा जाता रहा है यह पद मात्र एक रबर की मुहर है और इसका काम सिर्फ विन्दुओं की रेखा पर हस्ताक्षर करना ही है. किन्तु देश का सर्वोच्च पदाधिकारी मात्र एक कठपुतली हो, ऐसा नहीं हो सकता. हनुमान भी मात्र एक वानर ही थे जब तक उन्हें उनकी शक्ति का भान नहीं कराया गया.

पूर्व राष्ट्रपति श्री ऐ पी जे अबुल कलाम ने इस पद को जो गरिमा और सम्मान दिलाया वो आसानी से नहीं भुलाया जा सकता. हमारे जैसे कई लोगों का तो यह भी मानना है कि स्कूलों और कालिज में जाकर राष्ट्रपति अबुल कलाम ने जो माहौल बनाया, यह उसी का परिणाम है कि वो किशोर, अब युवा होकर प्रजातंत्र पर “जंतर-मंतर” करने की स्थिति में आ गये हैं।

आइये अब आगे की चर्चा से पहले, वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल की गोवा यात्रा का समाचार पत्र में छपा यह विवरण देखिये :

अगर उनकी बात सही मान लें कि यह एक सरकारी यात्रा थी, तो क्या यात्रा का खर्च चौंकाने वाला नहीं है? इतनी कीमती रबर की मुहर देखकर आँखें नहीं चुंधिया जाती है आपकी!! ऐसे में एक बारगी ख्याल आता है उस व्यक्ति का जिसने अपनी भविष्य निधि और पेंशन का सारा पैसा, घर बार सब त्याग दिया और बना लिया मंदिर के अहाते को अपना घर, जो सही अर्थों में भारत के अधिकांश नागरिक का स्थायी आवास है. अगर वह आदमी देश का राष्ट्रपति होता तो क्या जनता पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स के पैसे पर इस तरह के आनन्द करने की स्थिति में होता??

बापू के सादा जीवन और उच्च विचार के आचरण को जीवन में उतार कर जीने वाले अन्ना हजारे का नाम इस पद के लिये सोचकर ही हमें बहुत अच्छा लगा। जरा सोचिये अन्ना हज़ारे जैसी सादगी वाला व्यक्ति यदि इस देश के राष्ट्रपति भवन में रहने चला जाये तो क्या होगा?

मामूली सी सोच हमारे सामने जो तस्वीर पेश करती है वो यह है:

1. ब्रिटिश कालीन राजसी ठाठबाट से निकल राष्ट्रपति भवन गाँव के सरपंच की चौपाल बन जायेगा जो सच्चे भारत का प्रतिनिधित्त्व करता दिखेगा, न कि इंडिया का.

2. उपभोक्ता संस्कृति में भटक रहे, आधुनिक बंधुआ मजदूर बने इस देश के युवा को सादगी से जीवन जीने की जीवनदायनी प्रेरणा मिलेगी और युवा चेतना असली सृजनशीलता के नये आयाम रचेगी।

3. जब अन्ना एक राष्ट्र्पति के तौर पर बार-बार जिक्र करेंगे तो चुनाव सुधार और सत्ता के विकेन्द्रीकरण जैसे बड़े मुद्दे अपने आप सरकार की प्राथमिकताऑं में आ जायेंगे?

4. हिन्दी और मराठी भाषा में अपनी बात कहने वाले राष्ट्रपति अन्ना हजारे, उस अंग्रेजीयत के आवरण में भी छेद करने की स्थिति होंगे जिसके पीछे अब तक इस देश के हर पाप छिपा लिये जाते रहे हैं।

5. राष्ट्रपति अन्ना हजारे, रबर की मुहर न होकर, देश के प्रधानमंत्री और सरकार के सर पर उस खौफ की तरह सवार होंगे जिसके डर से ही सरकार सीधा रास्ता चलने को हमेशा बाध्य होगी।

आज देश में सरकार और विपक्ष दोनों ही विफल साबित हो चुके हैं. इन्हें यदि अगले चुनाव में एक अवसर दे भी दिया जाये तो इसकी प्रारंभिक शर्त यह होनी चाहिए कि “जुलाई 2012” में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव के लिए यह सुनिश्चित करें कि देश को अगले राष्ट्रपति के रूप में अन्ना हजारे चाहिये ही चाहिये, किसी भी कीमत पर!

हम दोनों तो देश के अगले राष्ट्रपति के रूप में अन्ना हज़ारे का नाम प्रस्तावित करते हैं। आप क्या कहते हैं?  

25 comments:

सम्वेदना के स्वर said...

अन्ना हज़ारे, अचानक जिस तरह देश के राजनैतिक मंच पर उभरें हैं वह चमत्कार ही है।

अन्ना का गैर राजनैतिक चरित्र देखते हुये, आज की व्यव्स्था में उनके लिये राष्ट्रपति पद ही सर्वोत्तम है। इंडिया की लगाम भारत के हाथों में प्रतीक स्वरूप ही देनी है तो भी अन्ना ही सही व्यक्ति लगते हैं।

सम्वेदना के स्वर said...

एक बात और...

सत्ता के गलियाओं की खबर रखनेवाले के एक व्यक्ति से सुना है कि : जुलाई 2012 में मनमोहन सिहँ को राष्ट्रपति और राहुल बाबा को प्रधानमंत्री बनाने की कवायद हो सकती है, क्योकिं यह समझा जा रहा है कि राहुल शायद 2014 का चुनाव जीतने की स्थिति अब नहीं ला सकते। दूसरी उम्मीदवारी लोकसभा अध्यक्ष श्रीमति मीरा कुमार की है,जिनकी स्वामीभक्ति भी निर्विवाद है ।

nilesh mathur said...

काश ये सच हो जाये, अन्ना जैसे व्यक्ति की ज़रूरत है देश को और नयी पीढी को!

shikha varshney said...

Not a bad Idea.

विशाल said...

पूरी तरह से समर्थन करता हूँ.
आभार सार्थक प्रयास के लिए.

Arvind Mishra said...

निश्चय ही यह तो गौरव की बात होगी -मगर इन्हें कौन सी पार्टी टिकट देगी ?

मनोज कुमार said...

महत्वपूर्ण बात लिखी है आपने। ऐसे लोग इस पद को सुशोभित करें तो देश का कल्याण ही होगा।

मनोज भारती said...

इस संदेश को राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतम प्रसारित किया जाना चाहिए ...हम भी अन्ना को देश का राष्ट्रपति देखना चाहेंगे और यह वास्तविक भारत का प्रतिनिधित्व होगा । आपका विचार विस्तार पाए ...शुभेच्छा !!!

Deepak Saini said...

mera vote aapke(anna ji) ke saath hai

kshama said...

Jaisa aap sochte hain,kaash,waisa hee ho jaye!

हरीश प्रकाश गुप्त said...

आपसे पूर्णतया सहमत हूँ। हाँ देश की जनता को अगर सीधे राष्ट्रपति चुनने का अवसर हो तो यह सम्भव होता दिख सकता है, वर्ना सब मिलकर साँठगाँठ करके उन्हें सत्ता से बाहर ही रखेंगे। अपनी खाट अपने ही हाथों कौन खड़ी कराना चाहता है।

संजय @ मो सम कौन ? said...

’दिल को बहलाने को गालिब, ये ख्याल अच्छा है’

पूरे देश को और नेताओं को यह विदित करवाने वाले कि चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त का भी लोकतंत्र में कुछ रोल है, शेषण साहब भी राष्ट्रपति पद के लिये चुनाव लड़े थे। नतीजा क्या निकला था, हम सब जानते हैं।
वैसे ख्याल आपका बहुत अच्छा है, हम तो ’आमीन’ भी कहते हैं।

Rahul Singh said...

क्‍या कहें- मामला राष्‍ट्रपति का है, राष्‍ट्र हित का ही होगा. अन्‍ना, आभासी क्रांति का स्‍पर्श सुख तो दे ही रहे हैं.

anshumala said...

राष्ट्रपति का चुनाव जनता नहीं करती है इसलिए कोई भी बस नामांकन भर कर निर्दलीय इस पद के लिए नहीं खड़ा हो सकता है उसके लिए एक बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन की जरुरत पड़ेगी जो उन्हें कभी भी नहीं मिलेगा | एक ज़मीन पर काम करने वाले के हाथ बांध कर कुर्सी पर बैठा कर उसे बेकार बना देने के किसी भी आन्दोलन में मै सहयोग नहीं दूंगी वो वह सिर्फ काम करने का आभास दिला सकते है कर कुछ भी नहीं सकते है | एक ईमानदार व्यक्ति को पद पर बैठाने के बजाये उन्हें हर पदों पर बैठे सभी लोगो को ईमानदार बनाने पर मजबूर करने का काम ही करने दे वो ज्यादा सही है |

VICHAAR SHOONYA said...

अगर बात सिर्फ सपने देखने की हो तो अन्ना हजारे सिर्फ राष्ट्रपति क्यों प्रधानमंत्री क्यों नहीं ?

सुशील बाकलीवाल said...

विचार तो उत्तम है.

सतीश सक्सेना said...

हम तो आप दोनों के पीछे खड़े हैं , बेशक अन्ना से अच्छे राष्ट्रपति नहीं मिल सकते ...वे जनता के राष्ट्रपति कहलायेंगे !
हार्दिक शुभकामनायें !!

प्रवीण पाण्डेय said...

राष्ट्रपति पर किया गया खर्च संभवतः उनकी गरिमानुकूल ही था।

honesty project democracy said...

अगर ऐसा हो जाता है तो देश व समाज का तक़दीर बदल जायेगा......

देवेन्द्र पाण्डेय said...

न तो वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था ऐसा होने देगी न स्वयम् अन्ना हजारे ही अभी ऐसा चाहेंगे। वे जहाँ हैं वहीं से अच्छा अलख जगा सकते हैं जरूरत है उनके साथ ईमानदार लोग जुड़ें। उनके प्रयास सफल हो। भष्टाचार पर नियंत्रण,चुनाव सुधार के द्वारा राजनैतिक व्यवस्था में सुधार हो चुकने के पश्चात ही यह संभव लगता है।

ZEAL said...

क्रांतिकारी , किसी पद के मोहताज नहीं होते।

Patali-The-Village said...

निश्चय ही यह तो गौरव की बात होगी| धन्यवाद|

Erina Das said...

Maine kuch din pehle tv pe ek program dekha tha, Anna Ji jis desh ki corruption ko mitane ke lie itni mehnat kar rahe hain, bhook hadtaal kar baithe... us desh ke young generation ki soch kuch aur hi hai...

2400 youths across 13 cities, between age of 18-25 years, M Tv found in a survey that around 53% of people din’t have any objection to paying bribe as long as they get what they want and 39% found that is was perfectly ok to take bribes!

I was ashamed of being one amongst such young generation.. But certainly don't belong to the 53% of them..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Hamara bhi samarthan.

............
तीन भूत और चार चुड़ैलें।!
14 सप्ताह का हो गया ब्लॉग समीक्षा कॉलम।

Naveen Rawat said...

acha he

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...