सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Saturday, June 18, 2011

अमृत दिया ज़हर पाया - 2

उसने बिना कुछ कहे दरवाजा बंद कर दिया। नाश्‍ता कोई बहुत ज्‍यादा नहीं था, सिर्फ किसी अनजाने सॉस में भिगोये हुए ब्रेड के दी टुकड़े और वह सॉस क्‍या था मैं पहचान नहीं पाया—स्‍वादहीन, गंधहीन। पिछले अंक से आगे 

अब डा. अमृतो यह महसूस करता है कि मुझे जहर दिया गया था। शायद सभी छह कैद खानों में मुझे जहर दिया गया था। मुझे जमानत न देने के पीछे यही कारण था और छह घंटे की यात्रा के लिए बारह दिन लगा देने के पीछे यहीं उदेश्य था: एक धीरे-धीरे कमजोर कर देगा। और उसने मुझे कमजोर कर दिया है।

अमरीका कैद खानों में वे बारह दिन बिताने के बाद मेरी सारी निंद्रा खो गई है। मेरे शरीर में कई ऐसी चीजें होने लगी जो पहले नहीं होती थी। भूख बिलकुल गायब हो गई, भोजन एकदम बेस्वाद लगने लगा। पेट मरोड़ने लगा, जी मिलाने लगा, उलटी करने का भाव, प्यास भी खो गई। और एक जबरदस्त अहसास….जैसे मेरी जड़ें उखड रही है।

लगता था जैसे स्नायु तंत्र में भी कुछ प्रभावित हो गया था। कभी-कभी पूरे शरीर में झुनझुनी सी फैलने लगती, जो खास कर मेरे दोनों हाथों में बड़ी प्रगाढता से महसूस होती। और पलकें भी ऐंठ जाती।

जिस दिन मैंने कैद खाने में प्रवेश किया उस दिन मेरा वजन 150 पौंड था। और आज मेरा वजन केवल 130 पौंड है। मेरा भोजन वहीं है लेकिन मेरा वजन बिना किसी कारण के घट रहा है। और एक सूक्ष्म कमजोरी….ओर तीन महीने पहले मेरे दाहिने हाथ की हड्डी में भयंकर पीडा होने लगी।

ये सब एक खास किस्मा के जहर के लक्षण है। मेरे बाल गिर गए है। मेरी आंखें कमजोर हो गई है। और मेरी दाढ़ी के बाल इतने सफेद हो गए है जितने के मेरे पिता के पचहत्तर साल की आयु में थे। अमरीका में, उन्होंने मेरी जिंदगी के करीब-करीब बीस साल कम कर दिए।

डा. अमृतो ने तत्क्षण सभी संन्यामसी डॉक्टरों को सूचित किया कि विष-प्रयोग संबंधी विश्व के जो भी विशेषज्ञ है उनसे संपर्क बनाएँ और उनमें से एक डा. ध्यान योगी ने तत्क्षण मेरे खून और पेशाब के नमूना लिये, कुछ बाल लिए और वे लंदन तथा जर्मनी के सर्वश्रेष्ठश विशेषज्ञों के पास गए। यूरोप के विशेषज्ञों का सुझाव यह था कि ऐसा कोई जहर नहीं है जो दो सालों के बाद शरीर में पाया जाए। लेकिन सारे लक्षण बताते है एक खास किस्म का जहर दिया गया है।

बीमारी के कारण कोई प्रतिरोधक न होना। अकारण वज़न कम होना, समय से पहले बालों का सफेद हो जाना,अकारण बालों का गिरना,झनझनाहट जैसी संवेदना का अतिरेक,भूख न लगना, स्वादहीनता, मितली, मेरे दाहिने हाथ की हड्डी का दर्द……जर्मनी के एक कुशल डाक्टार दो बार मेरे हाथ की जांच करने आए थे और उनकी समझ में नहीं आया था कि यह किस तरह की बीमारी है। क्योंकि जो मुझसे कोई बीमारी ही नहीं है। यहां के विशेषज्ञ डा. हार्डी कर जो मुझे प्रेम करते है। वे यहां आते रहे है। और तीन महीनों तक सतत निरीक्षण करते रहे है। लेकिन वे भी कुछ समझ नहीं पाए कि यह दर्द क्यों होता है।

इंग्लैंड और जर्मनी के विशेषज्ञों के एक विशिष्ट् जहर के नाम का सुझाव दिया है, थैलीयम, भारी धातुओं के जो जहर होते है, उस वर्ग का यह जहर है। वह शरीर के भीतर से आठ सप्ताह में निकल जाता है। लेकिन अपने परिणाम छोड़ जाता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्ति है उसे नष्ट कर देता है। और मैंने तुम्हें जो भी लक्षण बताये है ये सब थैलीयम जहर के परिणाम है।

अमेरिकन विशेषज्ञों ने एक अलग ही जहर की और संकेत किया है, जो उनके विचार में,शासन विद्रोही व्यऔक्तिहयों के लिए उपयोग करता रहा है। उस जहर का नाम है, ‘’सिंथटिक हेरोइन।‘’ यह साधारण हेरोइन से हजार गूण ज्यादा खतरनाक है। और दो साल के बाद इसके कोई निशान पाये जाने की संभावना नहीं होती।

जापानी विशेषज्ञ जो रेडियोधर्मी ता के संबंध मे हिरोशिमा और नागासाकी में अन्वेषण कर रहे थे। उनका कहना है कि ये लक्षण रेडियोधर्मी प्रभाव से बड़े परिष्कृत ढंग से पैदा किए जाते है।

डा. अमृतो का अपना अन्वेषण…..ओर वह चिकित्सा विज्ञान का अत्यंत प्रतिभाशाली डाक्टर है। उसके पास सारी उच्चरतम उपाधियां हैं। उसके एक चौथे जहर की खोज की है जिसका विरले ही उपयोग किया जाता है। उस जहर का नाम है ‘’फ्रुरोकार्बन।‘’ यह कुछ मिनटों के भीतर ही विलीन हो जाता है। खून में या पेशाब में उसके कोई निशान नहीं मिलते लेकिन ये सारे लक्षण उसी की और इंगित करते है।

यह सवाल नहीं है कि मुझे कौन सा जहर दिया गया है लेकिन यह सुनिश्चित है कि रोनाल्ड रीगन के अमरीकी शासन ने मुझे जहर दिया है।
                                                                                                                        (अगले अंक में समाप्त)

ओशो
(सत्यम् शिवम् सुंदरम् पुस्तक से)

Tuesday, February 15, 2011

पाचवें खम्बे की अदालत में “सदरे रियासत आई.एम.एफ. सिंह”

अदालत… न्यायालय… कचहरी... प्रजातंत्र का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण खम्बा. लेकिन आम आदमी की राय यही है कि भैय्या थाना और अदालत के चक्कर बड़े ख़राब होते हैं. इनसे तो भगवान बचाए. इसके उलट देश के ख़ास लोग अदालत से ज़रा भी नहीं घबराते. मुस्कुराते हुए जाते हैं और हँसते हुए बाहर आ जाते हैं. पूछिये तो कहते हैं कि मुझे देश की न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है. साल भर पहले हलफनामा दायर करके एक बात कहते हैं और और एक साल बाद दूसरा हलफनामा दाखिल करके बताते हैं कि पहला हलफनामा ग़लत है. साथ में एक घिसा पिटा मुहावरा कि मुझे देश की न्यायपलिका पर पूरा भरोसा है.

आम आदमी पर लौटें तो उसे न्यायालय का मतलब सिनेमा और टीवी पर दिखाई जाने वाली ड्रामाई अदालत लगता है. सिनेमा में बी आर चोपड़ा और टीवी पर रजत शर्मा. आप की अदालत नामक घण्टे भर के प्रोग्राम से इण्डिया टीवी तक का सफर बड़ा लम्बा रहा है.

आईये इस तीसरे खम्बे के बारे में, चौथे खम्बे पर लगा रजत शर्मा का पोस्टर देखकर अब बारी है पाँचवें खम्बे की अदालत की. तो पेश है पाचवें खम्बे की अदालत.

आज का मुक़दमा हम चलाने जा रहे हैं अंधेर नगरी के सदरे रियासते आई.एम.एफ. सिंह पर. आप बहुत ही कम बोलने वाले और बिना इजाज़त नहीं बोलने वाले शासक हैं, दरसल हमारा यह एपिसोड सिर्फ इसलिये लम्बित रहा कि इन्हें बोलने की परमिशन नहीं मिली थी. और अब चुँकि यह बोलने लगे हैं, इसलिये अपनी सफ़ाई ख़ुद देंगे.

तो शुरु होता है “सदरे रियासते अंधेरनगरी IMF सिंह” पर आज का मुक्द्दमा

आरोप नम्बर : 1

आपकी कोई नहीं सुनता ?

डेविल्स ऐडवोकेट : जनता को आपसे सबसे बड़ी शिकायत यह है कि आपके दीवानेख़ास में ही आप की कोई नहीं सुनता? आपके नवरतन भी नहीं! कोई 15% पर सौदा कर रहा है (लोटसनाथ), कोई बेईमानी से लाइसेंस बेच रहा है (स्पेक्ट्रम आजा), कोई मंहगाई में आग लगाने के लिये भड़काऊ बयान दे रहा है (गर्द गंवार)... लोग माल गड़प रहे हैं और आप GDP-GDP का जाप कर रहें हैं, गायत्री मंत्र की तरह।

आई.एम.एफ. सिहं: ना जी ना! ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं कमजोर बिल्कुल नहीं हूं. पिछले चुनाव में एल के बागवानी ने मुझे कमजोर सदर कहा था, अब वो खुद बागवानी करता घूम रहा है। आप समझने की कोशिश करो! अर्थव्यव्था का जब वैश्वीकरण हुआ है तो भ्रष्टाचार भी तो ग्लोबल होगा न ! तुस्सी इतना तो समझदे होंगे। मनीटेक आलूवाला ने एक रिसर्च की है, जिसमें उसने बताया है कि लाखों करोड़ रुपयों के करप्शन का मतलब है 1.5 ट्रिलियन डालर की GDP तो पक्के की हो गयी और तुस्सी समझों की इतनी ही कच्चे की!

हो रहा भारत निर्माण! हो रहा भारत निर्माण!

आरोप नम्बर : 2

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आप निष्क्रिय रहे हैं ?

डेविल्स ऐडवोकेट : देश का लाखों करोड़ रुपया विदेशी बैंकों में जा रहा है, देश में लाखों करोड़ रुपयों के घोटाले हर रोज़ सामने आ रहे हैं, और तो और घोटालों के तार आपके दफ्तर से भी जोड़े जा रहें हैं। रिआया दबी ज़ुबान में यह भी कह रही है कि आप जब मुल्क के वज़ीरेख़ज़ाना थे तब भी रिकार्ड तोड़ शेयर घोटाला हुआ था। इस बार तो जीरा भांडिया के टेप सरकार के पास 2009 से ही थे तब आप क्यों मौनी बाबा बनकर बैठे हैं?

आई.एम.एफ. सिंह: हो रहा भारत निर्माण! हो रहा भारत निर्माण!

डेविल्स ऐडवोकेट : कमाल है क्या कह रहें है आप?

आई.एम.एफ. सिंह: अब मैं कुछ कहता हूं तो आप कहते हैं कि क्या कह रहें है आप? चुप रहता हूं तो मौनी बाबा! मनीटेक आलूवाला की पहली रिसर्च के बारे में तो मैंने बताया ही है. फिर अर्थशास्त्र की किताबों में भी यही लिखा है। मनीटेक आलूवाला की दूसरी रिसर्च कहती है कि “इंडिया स्टोरी” को कामयाब करने के लिये, अपनी पूंजी को अमेरिका और यूरोप घुमा कर इसी तरह से वाया मारिशस वापस लाया जा सकता है। जिसे आप भ्रष्टाचार कह रहे है, वैश्विक परिदृष्य़ मे उसे अपार्चुनिटिस् कहा जाता है। फिर सबसे बड़ी बात यह है कि “अमेरिका की तरक्की में ही हम सब की तरक्की है।“ ऐसा समझो की जिस तरह सामरिक दृष्टि से कमजोर पाकिस्तान हमारे लिये नुकसानदेह है उसी तरह आर्थिक रूप से कमजोर अमेरिका हमारे लिये ठीक न होगा! “अमेरिका की तरक्की में ही हम सब की तरक्की है।“

आरोप नम्बर : 3

देश में मंहगाई आपके अनर्थ शास्त्र की देन है ?

डेविल्स ऐडवोकेट : विदेशी पूंजी निवेश की जिस औषधि से आप इस देश की गरीबी दूर करने की चिकित्सा कर रहें हैं उसके परिणाम स्वरूप एक दशक में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं, बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रहा ही, शिक्षा और स्वास्थ तो छोड़िये साग-सब्ज़ियां, दूध आदि जरुरत की चीज़े भी आम आदमी की पहुँच से दूर हो गयीं हैं।

आई.एम.एफ. सिहं : देखिये ऐसा दुष्प्रचार हमारे विरोधीयों की चाल है, किसानों के हमने कर्जे माफ करें है, खेती में होने वाले घाटे को देखते हुये किसानों सलाह दी जाती है कि अपनी जमीन किसी बिल्डर को बेच वह मजदूरी करे। इससे उनका स्वास्थ भी बना रहेगा और हमारे उधोगों को सस्ते मजदूर मिलते रहेंगे। हमारी मरेगा स्कीम इसी दूरदर्शी योजना का परिणाम है! हो रहा भारत निर्माण! हो रहा भारत निर्माण!

आरोप नम्बर : 4

आप की आंखों पर अमेरिका का चश्मा चड़ा है ?

डेविल्स ऐडवोकेट : आप पर इलजाम है कि देश की अर्थनीति का सारा जोर इस बात पर है कि 20 करोड़ मध्यमवर्गीय भारतीयों का बाज़ार अमेरिका को कैसे उपलब्ध हो। पहले सीधा गेहूं अमेरिका से आता था वो बन्द हुआ तो अब खाद, बीज और कीटनाशक दवायें सब बहुराष्ट्रीय कंपनियों से खरीदा जा रहा है, देश में शोर मचा है कि हम आत्म निर्भर हो गये। और तो और उस नाभकीय संधि पर आपने सरकार दाव पर लगा दी जो अमेरिका को कई बिलियन डालर का बाजार उपल्ब्ध करायेगी।

आई.एम.एफ. सिहं : देखिये मेरी बात समझने की कोशिश कीजिये। आर्थिक सुधारों की “इंडिया स्टोरी” का सीधा सीधा मतलब है भारत को इंडिया बनना है, आगे चलकर खेती बाड़ी जैसे तुच्छ कामों को अफ्रीकी देशों से करवाना है। ऐसे समझिये कि देश के हर गाँव का सपना क्या है? उसे शहर बनना है। और हर छोटे शहर को दिल्ली-मुम्बई और दिल्ली-मुम्बई को न्यूयार्क-वाशिंगटन! इसीलिये बात घूम फिर के वहीं आ जाती है कि अमेरिका हमारा रोल माडल है, और “अमेरिका की तरक्की में ही हम सब की तरक्की है।“

आरोप नम्बर : 5

आप गरीब आदमी को अनाज बाटने जैसे सवाल पर सुप्रीम कोर्ट से क्यों भिड़ गये ?

डेविल्स ऐडवोकेट : सुप्रीम कोर्ट नें जब यह कहा कि अनाज को गोदाम में सड़ाने से अच्छा है कि उसे गरीबों में मुफ्त बाँट दिया जाये इस बात पर आप सुप्रीम कोर्ट तक से भिड़ गये। क्या आम आदमी सिर्फ वोट माँगने और पोस्टर पर लगने की चीज़ बन कर रह गया है?

आई.एम.एफ. सिंह: इस सवाल का जबाब थोड़ा टेक्निकल है, जिसे एक अर्थशास्त्री ही समझ सकता है न्यायशास्त्री नहीं। जब न्यूनतम समर्थन मूल्य पर हम अनाज खरीदते हैं, तो वह मूल्य सरकार की बैलेंस शीट में जस का तस ही रहता है. बस उसका स्वरूप नकद रुपये से बदलकर वस्तु का मूल्य हो जाता है। लेकिन जैसे ही उसे सस्ते में या मुफ्त में बेचा जाता है तब सरकारी बैलेंस शीट में उस घाटे को लिखना पड़ता है. जिस कारण सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ जाता है।

डेविल्स ऐडवोकेट : अब सरकार के वित्तीय घाटे के बढ़ने से आप हलकान हुये जा रहें है और गरीब भूखों मर रहा है उसकी कोई चिंता नहीं?

आई.एम.एफ. सिहं : देखिये विश्व बैंक में काम कर चुके एक अर्थशास्त्री के लिये वित्तीय घाटा सबसे बड़ी चिंता का कारण है, वित्तीय घाटा बड़ा दिखेगा, तो विदेशी पूंजी देश में नहीं आयेगी और यदि विदेशी पूंजी नहीं आयेगी तो हम अमेरिका कैसे बनेगें?

डेविल्स ऐडवोकेट : पर विदेशी पूंजी तो यहां नोट कमाने के लिये ही आयेगी कौन सी हमारे देश की गरीबी दूर करने आयेगी ।

आई.एम.एफ. सिहं : हमें नही भूलना चाहिये कि “अमेरिका की तरक्की में ही हम सब की तरक्की है।“ अब राजमाता से बड़ा तो कोई नहीं हो सकता इस दुनिया में! वो तक मानती हैं कि, हो रहा भारत निर्माण! हो रहा भारत निर्माण!

डेविल्स ऐडवोकेट : हद है, आपकी चाटुकारिता की ! देश का मीडिया जो अभी तक आप पर लट्टू था वह तक आप की नीतियों पर सवाल कर रहा है, ऐसे में अब आप क्या करेंगे?

आई.एम.एफ. सिहं : हमें पता है कि मीडिया को भी अमेरिका बनना है, उनका GDP पीछे कुछ कम हो गया था पर अभी हमने उन्हें कई सौ करोड़ के सरकारी विज्ञापन जारी किये हैं। आल इज़ वैल! हो रहा भारत निर्माण! हो रहा भारत निर्माण!

आज की सुनवाई पर जज साहब का निर्णय :

इस मुक़दमे का फ़ैसला सुनाने के लिये कोई न्यायाधीश नहीं है अदालत में. डेविल्स ऐडवोकेट के अभियोग एवम श्री आई.एम.एफ.सिंह की दलील सुनकर फ़ैसला आपको लेना है. ध्यान रहे कि आपका फ़ैसला मुल्क की सूरत बदल सकता है. और प्रेमचंद जी की मानें तो पंच के पद पर बैठकर न तो कोई किसी का मित्र होता है न शत्रु. तो रखिये हाथ अपने अपने दिल पर और सुनाइये फ़ैसला आज के मुक़दमे पर !
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