कुछ काम मिल बाँटकर कर लिये जाते हैं. जैसे हमारे पड़ोस में, शर्मा जी की पत्नी जबतक बर्तन मांजती हैं, शर्मा जी दाँत मांज लेते हैं. वो बेचारी बिछावन करती हैं और शर्मा जी सो जाते हैं. पूछिये तो बताएँगे कि वो अपनी पत्नी के साथ मिल बाँटकर घर का सारा काम करते हैं. बचपन में घर पर माँ को चूल्हे पर खाना बनाते देखा है. बुआ रोटी बेलती थीं और माँ रोटियाँ सेंक लेतीं. और इस तरह सारा काम बातों बातों में कब निपट जाता, पता ही नहीं चलता था.
पुराने समय में ऐसी जोड़ियाँ बहुत होती थी. क्लास में दिलीप के साथ बैठना, घर पर राकेश के साथ बाज़ार जाना, कैरम में पप्पू के साथ पार्टनर बनकर खेलना और बैडमिंटन में नवीन के साथ. गानों में जोड़ियों वाले गाने को विविध भारती पर कहते थे, अब आप लता और रफ़ी का गाया दो गाना सुनिये. बहुत परेशानी होती थी यह सोचकर कि गाना तो वो एक ही बजाते थे पर कहते थे दोगाना सुनिये. बाद में पापा ने बताया कि जोड़ी में गाया जाने वाला गाना युगल गीत यानि दो गाना कहलाता है.
यहाँ तक तो सब ठीक था, लेकिन फिर आया गाने की धुन बनाना. अब ये काम तो एक अकेला इंसान ही कर सकता है. दो जने मिलकर एक गाने की धुन बनाएँ, बात कुछ अटपटी सी लगती है. लेकिन हमारी फ़िल्मी दुनिया में तो 1944 में संगीतकारों की पहली जोड़ी आई पं. हुसनलाल भगतराम की. और उसके बाद शंकर जयकिशन, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, बासु मनोहरी, सोनिक ओमी, नदीम श्रवण, साजिद वाजिद, जतिन ललित,विशाल शेखर और तिकड़ी शंकर एहसान लॉय. राम लक्षमण ने तो अकेले होते हुए भी जोड़ियों वाला नाम रख लिया था अपना. पहले सोचता था ये दो लोग कैसे एक गाने की धुन बनाते होंगे.शंकर जयकिशन मेरे फेवरिट थे, इसलिए बाद में फर्क करना आ गया कि कौन सा गाना शंकर ने बनाया है और कौन सा जयकिशन ने. बहरहाल, नतीजा ये निकला कि ये काम अलग अलग कर लेते हैं, लेकिन नाम दोनों का ही लिया जाता है.
फिर आए सलीम जावेद. इस जोड़ी ने तो ऐसा धमाका किया कि जिसकी गूँज आज भी कानोंमें बसी है. कथा, पटकथा और सम्वाद लेखन के साथ इनका नाम ऐसा जुड़ा कि हॉलमार्क होकर रह गया. अमिताभ, प्रकाश मेहरा, जी पी सिप्पी… डॉन, ज़ंजीर और शोले. ये सब के सब मील का पत्थर हैं, भारतीय सिनेमा के. ये जोड़ी टूटी भी ऐसी कि बस बिखरकर रह गई. उसके बाद कम से कम कथा, पटकथा और सम्वाद लेखन में दूसरी कोई भी जोड़ी इस तरह सफलता का पर्याय बनकर नहीं आई. अब यहाँ फिर दिमाग़ में एक सवाल पैदा हुआ कि आख़िर ये दोनोंअलग अलग कैसे लिखते होंगे! यह तो संगीत भी नहीं कि सुनकर बता दें.
दस महीने पहले तक तो वाक़ई इस सवाल का जवाब नहीं था हमारे पास. लेकिन अब बता सकते हैं कि दो लोग कैसे मिलकर लिख लेते होंगे. अव्वल तो दोनों की सोच एक जैसी होनी चाहिए. अगर न हो, तो कम से कम इतना तो निश्चित तौर पर पता हो कि उन दोनों की सोच कहाँ पर मिलती है. कुछ दिनों बाद तो ऐसा लगने लगता है कि किसी भी मुद्दे पर दोनों एक जैसा सोचते हैं. एक ने सोचा, दूसरे ने आगे बढ़ाया, एक ने आधा लिखा दूसरे ने पूरा किया. कई बार पूरा का पूरा आलेख एक ने लिखा, लेकिन फर्क करना मुश्किल कि किसका लिखा है
(चैतन्य - सलिल)
जी मैं बात कर रहा हूँ ब्लॉग जगत की जोड़ी सलिल और चैतन्य की. हमारे आलेख और टिप्पणियों को पढ़कर कई मर्तबा लोगों के कमेंट आए जिनमें हमें नाम से सम्बोधित किया गया. लेकिन यह तो हम ही जानते हैं कि वो कमेंट या लेख सलिल का लिखा था और उसपर कमेंट चैतन्य को सम्बोधित करके किया गया, या फिर चैतन्य के लिखे पर शाबाशी सलिल ले गए. हाँ, हमने कभी इन बातों पर ग़ौर नहीं किया. मतलब पोस्ट के पसंद आने से है, तारीफ किसी को मिले,पहुँचनी तो दोनों को ही है. ख़ुशी तब होती है जब कोई सम्वेदना के स्वर बंधुओं या संवेदना के स्वर द्वय लिखता है.
हमने टेलिकॉम घोटाले की जितनी भी निंदा की हो, आभारी हैं हम इस सेवा के जिसने दो अलग अलग शहरों में (नोएडा/दिल्ली और चंडीगढ़) रहते हुए भी हमें जोड़े रखा है. समय की कोई परवाह नहीं, जब भी किसी के दिमाग़ में कोई बात आई जिसपर पोस्ट लिखी जा सके, तुरत फोन पर ख़बर की, प्रारम्भिक इनपुट पर चर्चा की और लिखने बैठ गए. मेल में आदान प्रदान किया नोट्स का, और फिर बहस कि कौन सा हिस्सा कैसे रखना है. हम ख़ुद अपने समीक्षक बनकर अपने अलेख की इतनी चीर फाड़ करते हैं कि जब वह पेश होता है तो दुनिया की हर आलोचना झेलने को तैयार रहता है.
अब तो ये हाल है कि कभी कभी लगातार दोनों के फोन एक दूसरे को व्यस्त मिलते हैं, जब बात होती है तो पता चलता है कि हम एक दूसरे को फोन लगा रहे थे. सोच भी एक जैसी हो गई हैं, और नज़रिया भी. ऐसे में पढ़कर यह कहना कि ये उसने लिखा है बड़ा मुश्किल होता है.
कल मॉल में एक प्यारे बच्चे को देखकर उसे प्यार करने लगा. तब तक उसकी माँ आ गई और मुझे देखकर मुस्कुराने लगी. मैंने पूछा कि आपका बच्चा है. वो बोली ‘हमारा’ बच्चा है और उसने अपने पति की ओर उँगली से इशारा कर दिया! वो औरत तो अपने बच्चे की उंगली पकड़े आगे निकल गई. मैं गुम हो गया पास ही एक म्यूजिक स्टोर से आती हुई एक सूफी धुन के जादू में:
प्रेम गली अति साँकरी जा में दो न समाएँ!!
