कुछ साल पहले, जनाब तुफ़ैल चतुर्वेदी ने उनकी त्रैमासिक पत्रिका ‘लफ्ज़’ में दो लाईनें दीं और उन्हें 'ऊला' या 'सानी' की तरह इस्तेमाल करते हुए, दो अलग-अलग ग़ज़ल लिखने का एक मुक़ाबला रखा. मैंने भी लिखी थी दो गज़लें और आदतन भेजी नहीं. भूल भी गया लिखकर. आज आप लोगों के सामने रख रहा हूँ. ग़ज़ल का मक़्ता नया लिखा है, जो ‘मेरी’ ग़ज़ल का ‘हमारा’ एडिशन है:
नज़रे-आतिश मेरा मकान भी था,
तब लगा सर पे आसमान भी था.
सारी दुनिया ने ज़ख्म मुझको दिए,
इनमें शामिल तुम्हारा नाम भी था.
मुफलिसी में जो बेच डाले थे,
उनमें यादों का कुछ सामान भी था.
हमने जिसको बिठाया संसद में,
वो तो बहरा था, बेजुबान भी था.
अपनी खादी की सफेदी देखो,
ख़ून का इसपे इक निशान भी था.
जिन गवाहों ने दिलाई है सज़ा,
दोस्त! उनमें तेरा बयान भी था.
होंगे 'संवेदना के स्वर' तेज़ाब,
क्या तुझे ये कभी गुमान भी था?