सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Thursday, April 22, 2010

एक सम्वेदना


चढते हुए पारे ने चालीस का स्तर पार कर लिया है
परिंदे प्यास के मारे दम तोड़ रहे हैं...
आइए...
 अपनी सम्वेदनशीलता को जीवित करें
अपने घर, आँगन, छत, मुंडेर, बाग, बगीचे, कहीं भी
एक बरतन में पानी रखें
उन परिंदों के लिए,
उनके जीवन के लिए
धरोहर हैं ये हमारी... इन्हें जीवन दान दें!!

आज पृथ्वी दिवस है - २२ अप्रैल २०१०:  हरियाली ही खुशहाली है!!
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