आज स्वप्निल कुमार आतिश से लम्बी साहित्यिक चर्चा होती रही. एक जैसा सोचने वाले मिल जाएँ तो ये फैसला मुश्किल हो जाता है कि विचार किसके हैं और आए किसके दिमाग़ में हैं. बात मण्टो से शुरू हुई और राही मासूम रज़ा पर खतम हुई. अब खतम हुई कि एक नए सिलसिले की शुरुआत हुई, ये तो वक़्त ही बताएगा, बहरहाल, मैंने ये क़बूल किया कि मैं ख़ुशकिस्मत हूँ कि मुझे मेरे पिताजी ने उस उम्र में मण्टो पढने को दिया जिस उम्र में लोग प्रेमचंद पढते हैं ( वो मैं पढ चुका था). फिर ज़िक्र आया मण्टो के अदालती चक्करों का और उनपर लगने वाले अश्लीलता के इल्ज़ाम का.
अब जब ज़िक्र निकला ही है तो डा. राही मासूम रज़ा की बात न हो, हो ही नहीं सकता. क्योंकि साहित्य में धड़ल्ले से गालियाँ लिखने की रवायत इन्होंने ही शुरू की है. और इस बारे में मैं अभी तक कन्फ्यूज़ हूँ कि मैं क्या कहूं। अपने गुरु डा. राही मासूम रज़ा के उपन्यास " ओस की बूँद" से उनकी भूमिका यहाँ पर कोट करना चाहूँगा। उनकी कलम से निकले शब्द, मेरे शब्दों से ज्यादा वज़नदार साबित होंगे।
"बड़े बूढों ने कई बार कहा कि गालियाँ न लिखो, जो आधा गाँव में इतनी गालियाँ न होतीं तो तुम्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार अवश्य मिल गया होता. परन्तु मैं यह सोचता हूँ कि क्या मैं उपन्यास इसलिए लिखता हूँ कि मुझे साहित्य अकादेमी का पुरस्कार मिले? पुरस्कार मिलने में कोई नुकसान नहीं, फायदा ही है. परन्तु मैं साहित्यकार हूँ. मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूंगा. मैं कोई नाज़ी साहित्यकार नहीं हूँ कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊँ और हर पात्र को एक शब्दकोश थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द भी अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा. कोई बड़ा बूढा यह बताये कि जहाँ मेरे पात्र गाली बकते हैं वहां मैं गालियाँ हटाकर क्या लिखूं? डोट डोट डोट. तब तो लोग अपनी तरफ से गालियाँ गढ़ने लगेंगे और मुझे गालियों के सिलसिले में अपने पात्रों के सिवा किसी पर भरोसा नहीं.
गालियाँ मुझे भी अच्छी नहीं लगती. मेरे घर में गाली की परंपरा नहीं है. परन्तु लोग सडकों पर गालियाँ बकते हैं. पड़ोस से गालियों की आवाज़ आती है. और मैं अपने कान बंद नहीं करता, यही आप भी करते होंगे. यदि मेरे पात्र गालियाँ बकते हैं तो आप मुझे क्यों दौड़ाते हैं.? वे पात्र अपने घरों में गालियाँ बक रहे हैं. वे न मेरे घर में हैं - न आपके घर में. इसीलिए साहब, साहित्य अकादेमी के इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जुबान नहीं काट सकता। "
आखिर में निदा फाजली साब के कलाम के साथ ये स्वीकार करना चाहता हूँ कि
कभी कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है,
जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है।