सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-र-त बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Friday, June 4, 2010

वातानुकूलित कक्ष से ग्लोबल वार्मिंग की रपटः विश्व पर्यावरण दिवस 2010

धरती माँ का बढ़ता बुख़ार, और सारे ईलाज बेकार. मर्ज़ लाईलाज तो नहीं, लेकिन पहल कौन करे. समाज में आज भी ऐसे बच्चे कम हैं, जो माँ बाप के हुक़्म पर चौदह साल के लिए बिना कुछ सोचे जंगल चले जाते हैं, या फिर अंधे माँ बाप को कंधे पर लादे सारे तीरथ घुमा लाते हैं. आज धरती माँ बीमार है, बुख़ार है कि कम होने का नाम ही नहीं लेता. और सारे ईलाज बेकार.
ईलाज की एक नई तरकीब निकाली है बच्चों ने. और उसी तरकीब पर सन 1972 से अमल करते जा रहे हैं. बड़ी असान सी तरकीब है, इस तपती हुई धरती के माथे पर गीले कपड़े की पट्टियाँ रखने का. और इस गीली पट्टी का नाम है ‘विश्व पर्यावरण दिवस’. यह ईलाज सुझाया यूनाईटेड नेशंस ने और दुनिया के तकरीबन 100 से ज़्यादा मुल्क़, अपने अपने हिस्से की ख़िदमत का ज़िम्मा लेकर बैठ गए. यह गीली पट्टी हर साल 5 जून के दिन, धरती माँ के तपते जिस्म को ठंडक पहुँचाने के ख़याल से रखी जाती है. आज 38 साल बीत गए हैं, लेकिन बीमारी कम होने का नाम नहीं लेती, बल्कि बढ़ती ही जा रही है.
इस दिन हर मुल्क के लोग बैठ कर प्रोग्राम बनाते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग कैसे रोकी जाए, दुनिया को रहने के लायक़ कैसे बनाया जाए, आने वाली नस्ल को एक बेहतर दुनिया सौंपने के बारे में एक नई सोच कैसे पैदा की जाए. हमारे देश में भी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ज़िम्मेदारी है कि ये सारे प्रोग्राम सही तरीके से लागू हों. बच्चों के स्कूलों में पेंटिंग और ड्राइंग कम्पीटीशन के ज़रिए उनके दिमाग़ में यह बात बैठाने की कोशिश की जाती है कि वे देश का भविष्य हैं और अगर उन्हें एक बेहतर कल और एक बेहतर धरती चाहिए तो उनको ही कोशिश करनी पड़ेगी.
जो फ़ैसला कर सकते हैं, उन्होंने तो जंगलों को कटवाकर वहाँ फैक्टरियाँ लगवा दी हैं,क्योंकि इनसे वो आँकड़े बढ़ते दिखाई देते हैं जिन्हें जी.डी.पी. कहते हैं और ये आँकड़ा जितना ऊपर जाता है, देश उतना तरक्कीमंद माना जाता है. भले ही इससे प्रदूषण बढता है. क्योंकि इसका भी ईलाज है. ईश्वर है न, हम अपने कितने ही पापों को क़बूल करके मंदिर में प्रसाद चढाते हैं या मज़ार पर चादर. ईश्वर दयालु है माफ कर ही देता है.
ग्लोबल वार्मिंग यानि धरती के बुख़ार को बढाने में जंगलों के कटने को देश की तरक़्क़ी से जोड़कर, विश्व पर्यावरण दिवस पर भाषण होंगे, और हमारा मीडिया बताएगा, तरह तरह के ग्राफ़िक्स के ज़रिए कि ग्लोबल वार्मिंग कितनी बड़ी समस्या है, इसके क्या क्या कारण हैं और इसका हल क्या है. कुछ और बड़े लोग, उनके स्टुडिओ में बैठे बहुत सीरियस सा चेहरा बनाए बहुत बड़ी बड़ी बातें बताएंगे और ऐसा लगेगा कि प्रोग्राम ख़तम होते ही ग्लोबल वार्मिंग भी ख़तम हो जाएगी.
कभी ग़ौर कीजिएगा कि जब ये सारी बहस चल रही होगी तब जून के महीने में भी वे सारे लोग टाई और सूट में होंगे. क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग पर ये बहस उस जगह हो रही होगीजहाँ का टेम्परेचर 18 डिग्री पर वातानुकूलित किया गया होगा. मेरा ख़ुद का एक शेर
ठंडे घरों में करता पसीने का वो हिसाब,
तपती सड़क पे लम्हा एक गुज़ार तो आए!
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