सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Tuesday, September 20, 2011

आज की ताज़ा खबर - चचा अखबारी की गप्प्शाला -२


वो क्या है कि हम भी आज अपनी नवाबी के किस्से याद करते हुए हज़रतगंज से अमीनाबाद और चारबाग से गोमती के किनारे टहल रहे थे. तभी हमारी नज़र पडी एक जाने पहचाने चेहरे पर. जब तक पहचानने की कोशिश करें, वो जनाब लोगों की भीड़ में गुम हो गए. अचानक मुंह से निकला चचा अखबारी यहाँ शहर-ए-नखलऊ में. भागे उनके पीछे और जाकर बरामद किया चचा अखबारी को अमीनाबाद में. जब हमारी नज़र और कान उन तक पहुंचे तो पाया कि चचा यहां भी बाज नहीं आ रहे थे और लम्बी-लम्बी छोड़े जा रहे थे. और उसके बाद जो शीरीं तब्सिरा सुनने को मिला, पेश-ए-खिदमत है उसका एक जायजा... नहीं-नहीं एक जायका:

क्या बताएं बरखुरदार! इतवार को राजपथ पर टहल रहे थे हम. जिस वक्त दिल्ली में ज़लज़ला आया, उस वक्त ईमानदार सिंह अपने दफ्त्तर में कुर्सी पर आलथी-पालथी मारकर, राजमाता की बीमारी के बिल क्लियर कर रहे थे. और जब पैरों तले ज़मीन हिली तो ईमानदार सिंह अपनी महीन आवाज़ में चीखने लगे, कितना भी हिला कर देख लो मेरी कुर्सी को. मुझे राजमाता के इलावा कोई भी कुर्सी से नीचे नहीं उतार सकता!

प्रश्न : चचा सुना आपने, युवराज गूगल पर बैन लगवाने जा रहे हैं. लोगों ने कानाफूसी से आगे बढकर खुल्लेआम राजघराने के बारे में ऐसी-ऐसी बातें कहानी शुरू कर दी हैं, जो पहले कभी नहीं सुनी. नतीजा युवराज बहुत परेशान हैं!

अमाँ ये तो सौ फी सदी घबराने की बात है. तारीख गवाह है कि भला पहले किसी की जुरत थी, जो राजघराने के बारे में अच्छा न बोले! सारे भोंपुओं के मालिक, न सिर्फ राजदरबार का खाते थे बल्कि राजमाता से खौफ भी खाते थे. मगर जब से ये कमबख्त कम्पयूटर का खेल चला है ना, ससुरा हर शख्स, वो क्या कहते हो तुम लोग, पत्रकार बना बैठा है. राजघराने की बहुत ही बदनामी हो रही है. जिसे देखो वही मिट्टी पलीद करने पर तुला है.  

प्रश्न : तो अंदर की खबर क्या है चचा, क्या गूगल पर बैन लग ही जायेगा?

अरे मेरे प्यारे भतीजो, वो दिन हवा हुए जब खलील मियाँ फाख्ता उड़ाया करते थे. युवराज के चाहने भर से अब चीज़े नहीं होतीं. दरअसल सोचने वाली बात ये है कि गूगल मुई क्या चीज़ है, सुरक्षा-मंत्री चाहे तो अन्धेर नगरी की हवा-पानी पर पाबंदी लगा दें,  मगर जनाब सुरक्षा-मंत्री के साथ उनका अपना मसला है. अगर गूगल पर बैन लगा दिया तो वह हमलावर दहशतगर्दों को कहां खोजेगा.

प्रश्न : चचा एक सवाल अलग हट के. बड़े भइया लम्बू बचपन इतने दिनों बाद छोटे भइया जहर सिंह से मिलने हस्पताल गये? आखिर इसकी क्या वज़ह हो सकती है?
  
लो कल्लो बात!! भाईजान उसे भी हमारी तरह समझ आ गया है कि लाईफ में हर एक फ्रेंड जरुरी होता है.

इतना बाँच कर चचा तो सरक लिए किसी गली, चौराहे, नुक्कड़, सड़क, मोड़ की तरफ. और हमारे हिस्से छोड़ गए 
अन्दर की खबर:
राजमाता की बीमारी में उनका विदेश में पूरा ख्याल रखने वाले बड़े साहब पालक बटरजी, ईमानदार सिंह के दफ्तर में 3 अक्तूबर से तैनात किये जायेंगे. ईमानदार सिहं को नवरात्रों में माता का प्रसाद!!   

 चचा का परिचय:
किसी बड़े शहर के पार्क में टहलते हुए, कस्बे की चाय की दुकान पर ठल्ले बैठे, गाँव के चौपाल पर सजी महफिल में या फिर काशी के अस्सी में, एक शख्स अक्सर मिल जाते हैं, जो इन सबों के केंद्र में बैठे होते हैं.  उनका सामान्य ज्ञान बड़ा असामान्य सा लगता है. सुनने वालों में कोई उनकी बातों को ‘कांस्पिरेसी थ्योरी’ कहकर खारिज कर देता है, तो कोई राजनीति के पीछे की कूटनीति कहकर सम्मानित. उन्हें देखकर कोई कहता लीजिये आ गये ताजा समाचार, तो कोई कहता कि अब शुरु होता है हमारा असली न्यूज़ चैनल. अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ऑप्टिमम इस्तेमाल करते इन शख्स को हम चचा अखबारी कहते हैं. चचा अखबारी हर शहर, हर गाँव और हर समाज में दिखाई दे जाते हैं. इनकी बातें अविश्वसनीय होकर भी न जाने कब सच्ची लगने लगतीं हैं, वह तो कोई चचा अखबारी की गप्पशाला में शामिल होकर ही जान सकता है. इनकी बातों में कभी राजनीतिक मंच के नेपथ्य की हलचल सुनाई देती है तो कभी राजनैतिक बयान के बिटवीन द लाइन्स अर्थ.

10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

चचा के जासूस और कहाँ कहाँ हैं।

Arvind Mishra said...

चच्चा की बातें बच्चा की ज़ुबानी:चचा कहिन!

रूप said...

जोर का झटका हाय, जोरों से लगा ! चचा अखबारी तो बड़े माकूल हैं भाई ! नख्लौए में रहते हैं का!बस इन्हें छोड़ियेगा नहीं ! बड़ी कमाल चीज़ हैं

kshama said...

Aapkee bhasha aur vishay,dono bade zaykedaar hain! Maza aa jata hai!

Anonymous said...

The biggest shift is that journalism is no longer the exclusive preserve of journalists. Ordinary people are playing a more active role in the news system, along with a host of technology firms, news start-ups and not-for-profit groups. Social media are certainly not a fad, and their impact is only just beginning to be felt. “It’s everywhere and it’s going to be even more everywhere,” says Arianna Huffington. Successful media organisations will be the ones that accept this new reality. They need to reorient themselves towards serving readers rather than advertisers, embrace social features and collaboration, get off political and moral high horses and stop trying to erect barriers around journalism to protect their position. The digital future of news has much in common with its chaotic, ink-stained past.”

Ravinar said...

If ever Bill Gates made a business error, the biggest one has to be his refusal or failure to see the potential of the Internet when it came about. Since that failure, his company has only been playing catch up. Google now reports that India will add 200Mn more net users by 2014. That’s a good sign for the nation but a serious warning for the Main Stream Media.

मनोज कुमार said...

चच्चा की गप्पशाला में आकर अति चकित हुं।

Apanatva said...

:)

अरुण चन्द्र रॉय said...

चचा की गप्प्शाला की खबर जो जनपथ और राजपथ तक पहुंची तो सनसनी फ़ैल जाएगी.. गप्प्शाला का गप्प जारी रहे

ajit gupta said...

हर फ्रेण्‍ड जरूरी होता है, इसी तर्ज पर हर ब्‍लागर जरूरी होता है। वाह आज तो सारे ही रिकोर्ड तोड़ डाले। क्‍या अंदाज है?

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