सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-र-त बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Monday, May 16, 2011

सिसक-सिसक गेहूं कहे, फफक-फफक कर धान

एक फ़िल्मी कहानी की तरह लगता है जब हम कहें कि एक आदमी दुसरे को उसकी ज़मीन बेच देने को कहता है और उस ज़मीन की कीमत भी देता है. दूसरा हाथ जोड़ता है, पैर पड़ता है कि उसे नहीं बेचनी ज़मीन, लेकिन पहला उसे ज़बरदस्ती कीमत देकर वो ज़मीन खरीद लेता है. जान देने से कीमत ले लेना उसे उचित लगता है. हज़ारों में उसे दाम मिलता है और कुछ ही समय में पहला उस ज़मीन को करोड़ों में बेच रहा होता है.

आप कहेंगे कि इस कहानी में नया कुछ नहीं है. दरसल इसी चरित्र को तो भू माफिया कहते हैं और लगभग हर बड़े छोटे शहर में यह किरदार पाया जाता है. मगर इस कहानी में यह पहला आदमी है सरकार. और उसके हाथ में १८९४ मॉडल का एक हथियार है जिसका नाम है भू अधिग्रहण क़ानून. इसी हथियार के जोर पर वो किसी किसान की ज़मीन औने पौने भाव में हथिया सकती है और बदले में उसकी झोली में कुछ सौ रुपये देकर (न देकर) उस ज़मीन को सोने के भाव बेच सकती है.
इस पूरे गोरखधंधे में बताया ये जाता है कि ज़मीन उनके लिए सड़क, हस्पताल, स्कूल बनाने के लिए ली जा रही है, लेकिन उन सडकों के आस पास एक पूरा सीमेंट का साम्राज्य बन जाता है, और उस हुकूमत के मालिक होते हैं राजा मिडास जिनके हाथ लगते ही वो सीमेंट सोना बन जाता है.
फिर शुरू होता है किसान आंदोलन, पुलिस की लाठियां, धारा १४४, नेताओं के स्वार्थ की रोटियां, उनकी नकली गिरफ्तारियां, मीडिया में खबरों की दुकान और बेचारे शायर की सोच:

सिसक-सिसक गेहूं कहे, फफक-फफक कर धान
खेतों में फसलें नहीं, उगने लगे मकान!/ (डा. कुंवर बेचैन)

Thursday, August 19, 2010

पीपली [लाइव]

बताया जाता है कि यह फिल्म अनुशा रिज़वी ने 2004 में लिखी थी, जब वो NDTV के लिए काम करती थीं. उनकी स्क्रिप्ट ‘द फॉलेन’ आमिर ख़ान को बहुत पसंद आई, मगर वो तब मंगल पाण्डे के निर्माण में व्यस्त थे.इसलिए यह फिल्म उस समय टल गई. छः वर्षों का अंतराल फिल्म को और सामयिक बना गया है, क्योंकि जो समस्याएँ या विचार इस फिल्म के माध्यम से रखे गए हैं, वो आज बड़ी शिद्दत से समाज में महसूस किए जा रहे हैं. यह फिल्म आपसे बात करती है, मगर भाषण नहीं देती. समस्याएँ दिखाती है, मगर हल नहीं सुझाती, क्योंकि हल सुझाना फिल्मकार का काम नहीं. और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी है.


फिल्म के प्रोमोज़ देखकर हमने यानि चैतन्य,सलिल और मनोज ने एक बार फिर एक साथ यह फिल्म देखने का मन बनाया ताकि फिल्म राजनीति पर की गई हमारी परिचर्चा की तर्ज़ पर, इस फिल्म की भी समीक्षा की जाए. फिल्म ग्रामीण भारत का आईना, एक राजनैतिक दस्तावेज़ या फिर कुकुरमुत्ते की तरह फैलती सैटेलाईट छतरी तले मीडिया का मल उत्सर्जन कहा जा सकता है. किंतु इन सबसे आगे जाकर यह फिल्म एक दस्तावेज़ है, एक जाँच समिति की रिपोर्ट की तरह, जिसके मुखिया हैं आमिर ख़ान.

भारत डेड - इण्डिया अलाइवः

सलिलः नत्था और बुधिया दो भाई, कभी गाँजा, कभी कच्ची शराब के नशे में, अपनी बेरोज़गारी की ज़िंदगी और गिरवी रखी ज़मीन, तीन बच्चों की परवरिश और अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह चुराते, पूरे ग्रामीण परिवेश का प्रतिनिधित्व करते हैं.

चैतन्यः ग्रामीण परिवेश नहीं सलिल भाई, भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. फिल्म भारत और इंडिया के विभाजन को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है.और इस फिल्म में यह विभाजन भी खुल कर दिखाई भी देता है. नत्था और बुधिया का पीपली गाँव दिमाग के एक हिस्से में ठहर सा जाता है, भारत बनकर. उसके उलट इंडिया अपने अभिजात्य से भरपूर दार्जिलिंग चाय की चुस्कियाँ लगाता, निश्चिन्त सा लगता यह कहता लगता है कि “आल इज़ वैल!”

मनोजः आप दोनों की बातों के अतिरिक्त भी एक अलग पहलू मुझे दिखा. फिल्म देखते हुए मुझे प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास याद आने लगे । विशेषत: कफन कहानी ।आश्चर्य तो तब होता है कि प्रेमचंद के साहित्य में तो 20 वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में किसान और गरीबों की दशा का यथार्थपरक चित्रण मिलता है, लेकिन आज 21वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भी किसान और गाँवों में बसने वाले किसानों की दशा में कोई अंतर नहीं आया है ।

सलिलः बिल्कुल सही. दरसल भारत की ज़मीनी समस्या ही इस फिल्म की बुनियाद है. ज़मीनें गिरवी, कर्ज़ चुकाने को आय का साधन नहीं. और सरकार अपना दायित्व कृषि मंत्रालय और नौकरशाह पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेती है.

मनोजः आज भारत में प्रति वर्ष कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि पर करीब पंद्रह हज़ार करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन किसान की दशा दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है । उसमें कोई अंतर नहीं आया। फिल्म में इन सभी मुद्दों के लिए जिम्मेवार तत्वों जैसे वोट की राजनीति, सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता आदि का बेहतरीन चित्रण हुआ है.

चैतन्यः फिल्म कई बार यह बात उभारनें में कामयाब होती है कि भारत की 70% आबादी किस क़दर बदतर हालात में गुजर बसर कर रही है. एक पात्र खीझ कर कहता है “बीज और खाद के लिये विदेशी कम्पनियों पर निर्भर हैं और वर्षा के लिये इन्द्र देवता पर.” और वो बीज भी आयातित जिसका ठेका कृषि मंत्री के विदेशी मित्र के पास है.

मनोजः 20वीं शताब्दी का किसान साहूकार के कर्ज से दबा था, तो 21वीं सदी का किसान बैंक के कर्ज से । कर्ज से मुक्ति के लिए किसान किस तरह से भूमिहीन होता है और मुआवजे के रूप में एक लाख रुपए हासिल करने के लिए नत्था को उसका बड़ा भाई बुधिया आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है, ताकि एवज में उसके बच्चों का भविष्य संवर सके ।

सलिलः जब खेती कर नहीं सकता किसान. तो ऐसे में कोई भी आस, दो पैसे की, उन्हें कुछ भी करने को सहर्ष तैयार कर लेती है, यहाँ तक कि आत्महत्या भी, क्योंकि ऐसा उन्होंने सुन रखा है कि इससे उन्हें एक लाख रुपये मिलेंगे. यह एक लाख रुपये उनके सपने पूरे कर सकता है, यह सोच उनकी आँखों में चमक पैदा करती है, लेकिन इसके लिए उसे जान देनी होगी, इस बात से वह चमक ज़रा भी धुंधली नहीं होती. अब इससे मार्मिक घटना तो कभी देखी भी नहीं.

चैतन्यः अरे मार्मिक और करूणा वाली बात छोड़ो सलिल भाई. भारत की दुर्दशा का इससे सटीक चित्रण और क्या होगा कि इंडिया का एक टेलीविज़न पत्रकार अपने कैमरामैन को डाटतें हुये सुबह शौच को जाते हुए ग्रामीणों की तसवीरें खीचनें के लिये उकसाते हुए कहता है कि “अबे, खींच इनकी तस्वीरें, 70% भारत इसी तरह खुले में टट्टी करने जाता है.”

सलिलः नत्था और बुधिया तो हो गए मुख्य चरित्र, लेकिन वह किसान अपनी अलग पहचान रखता है जो चुपचाप बंजर,पथरीली ज़मीन पर फावड़ा चलाता रहता है और वहीं दम तोड़ देता है. सम्वेदनहीनता की हद देखिए कि किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता.

चैतन्यः लोगों की भावनाएँ भी गाँव की ज़मीन की तरह बंजर हो चुकी हैं. और वो फिल्म में एकदम साफ साफ फिल्माया गया है.

मनोज: एक किसान मिट्टी खोदता रहता है, मानो उसका जीवन बस इसी काम के लिए बना है, जीवन के दूसरे रंग और विषय भी हैं, इस सबसे बेखबर वह मिट्टी खोदता रहता है और उसी गड्ढे में दम तोड़ देता है । मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में ही समा जाना, कितना नियतिवादी था वह। किसी को इसकी कोई परवाह नहीं । बस उसके मरने से रिपोर्टर राकेश कुछ द्रवित होता है ।

सलिलः नत्था द्वारा आत्महत्या की बात पर गाँव में लगे मेले से कई बेरोज़गारों को कमाने का अवसर मिलता है और वो यह भूल जाते हैं कि यह मेला किसी की मौत का जश्न मनाने के लिए लगा है. आपको क्या लगता है कि निर्देशक ने कहीं स्पष्ट किया है कि यह भारत और इण्डिया की लड़ाई का क्या नतीजा हो सकता है?

चैतन्यः भारत और इंडिया कि इस लड़ाई का अंजाम क्या हो रहा है उसकी मिसाल है फिल्म का अंतिम दृष्य जिसमें धूल मिट्टी से सना-पुता, नत्था गुड़गाँव की किसी बहुमंज़िला इमारत में नींव खोदते हुए जब थक कर वहीं मिट्टी के ढेर पर बैठ जाता है तो उसकी बेबस आंखे बींध जाती हैं भीतर तक, और यदि आपके अन्दर अभी भी कुछ मनुष्यत्व बचा है तो एक बेचैन कर देनी वाली हूक सी उठती है, मन में भीतर कहीं.

मनोज: भारत की तस्वीर धुंधली है पीपली की तरह, वहीं इंडिया की तस्वीर चुंधिया देने वाली रोशनी में नहाई हुई सी, गुड़गाँव की शीशे वाली बिल्डिंग के जैसी। इंडिया भारत की इस धुंधली तसवीर से पैसा कमाता है और खुद वातानुकूलित भवनों में ऐश्वर्य के सुख भोगता है ।

सलिलः अंत में किसान का गाँव से शहर की ओर पलायन. कब से सुनते आए हैं कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है, यह फिल्म बताती है कि गाँव में बस आत्माएँ ही बसती हैं. भटकती आत्माएँ!! फिल्म ने अंत में सरकारी आँकड़े दिखाए हैं कि पिछले दशक में 80 लाख किसान गाँव से पलायन कर चुके हैं.

चैतन्यः कामनवैल्थ खेल करा कर देश के हुक्मरान देश की जो तस्वीर बदलनें का दावा कर रहें हैं उनपर गोबर की वर्षा कर रही है यह फिल्म पीपली लाइव.

(समीक्षा का अगला अंकः पीपली लाइव में मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन
शनिवार सुबह)

                          सम्वेदना के स्वर पर पीपली लाईवः

                         3. BPL बनाम IPL

Saturday, May 1, 2010

दो बीघा ज़मीन – एक वायबिलिटी रिपोर्ट

पिछ्ले दिनों जब पंजाब के फरीदकोट ज़िले में जाना हुआ, तो ज़हन में बस एक ही बात कौंध रही थी “पंजाब में  किसान की आत्महत्या”. कोई और वक्त होता तो शायद मैं अख़बार मे पढी इस खबर को राजनैतिक प्रपंच या मीडिया की प्लांटेड ख़बर मान कर, अख़बार का पन्ना पलट लेता, या फिर इस ख़बर मे पंजाब की जगह, विदर्भ का यवतमाल ज़िला होता तो भी, मेरी बुद्धिजीविता व्यवस्था को एक भद्दी गाली देकर, अपनी तरह का पश्चाताप कर लेती. पर न जाने क्यों इस खबर में ऐसा कुछ था, जो मेरे हलक़ मे अटक सी गयी, ये खबर!
बीते वक्त से अलग, अब, बात कुछ और है. अपना मूल पेशा, अर्थ-व्यवस्था के एक तंत्र से जुडा होने के कारण “इंडिया की समृद्धि” और “भारत की विपन्नता” के नित नये रहस्योदघाटन हमारे बीच होते रह्ते हैं.
कैसे कोई मामूली दलाल “दोगली-सरकारी-नीतियों ” की सीढी चढ़कर, कुछ ही बरसों में एक “प्रतिष्ठित उद्योगपति” हो जाता है...यह तमाशा रोज़ अपनी आंखों के सामने हम देखते हैं और मन मसोस कर रह जाते हैं. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में विकास के नाम पर दी गयी टैक्स माफ़ी की सरकारी योजनाओं ने, जिस तरह काले धन को सफेद करने का एक पूरा तंत्र विकसित किया है, वो किसी भी मायने में मॉरीशस या साइप्रस जैसे देशों से आने वाले काले धन के सफेदीकरण से कम नहीं है. देश भर मे 1000 से अधिक विशेष सुविधाप्राप्त “सेज़” (SEZ) हों या हाल ही में सम्पन्न हुआ IPL का हो-हल्ला: सब काले को सफेद करने के इस दलाल तंत्र का हिस्सा भर नज़र आता है.
ख़ैर ! “इंडिया” की दलाल-स्ट्रीट से फलते-फूलते इस दलाल-तंत्र से इतर, भीतर का “भारत” सरीखा कोई हिस्सा ही था जो “पंजाब मे किसान की आत्महत्या” की खबर की तह मे जाना चाहता था. हमने निश्चय कर लिया था खेती-बाड़ी के उस अर्थतंत्र को समझने का जिस पर हमारे भारत की 65% आबादी निर्भर है, जिसका देश के सकल घरेलु उत्पाद मे योगदान मात्र 18% है, जिसकी विकास दर -0.25% है.
फ़रीदकोट के कोटकपुरा क़स्बे में, इत्तेफ़ाक़न वहाँ के किसान बछत्तर सिंह से मुलाकात हुई, तो देर तक खेती-बाड़ी की बात होती रही. और फिर उसके बाद, जो बैलेंस शीट बनकर सामने आयी, वो इन ग्रामीणों की उलझी हुई जिन्दगियों से एकदम उलट, सीधी सपाट थी.



दो बीघा ज़मीन – एक वायबिलिटी रिपोर्ट

मूल आँकड़े
ज़मीन का क्षेत्रफल = दो बीघा
फसल = गेहूँ
फसल का समय-काल = लगभग 6 माह (नवम्बर से अप्रैल माह)

आय सम्बन्धी तथ्य :
1. औसत उत्पादन = 8 कुंतल
2. गेहूँ का सरकारी खरीद मूल्य = रू0 1100 प्रति कुंतल
                                                                                                        कुल आय = रू.1100 x 8 = रू. 8,800

व्यय-सम्बन्धी तथ्य :
बीजखरीद                                                                              = रू0 700
(40 किलोग्राम के बीज की कीमत लगभग
रू. 1400 प्रति कि.ग्रा. के हिसाब से)
खरपतवार नाशक                                                                     = रू0 500
कीटनाशक दवाई                                                                       = रू0 250
खाद
1 बोरी यूरिया (प्रारम्भ में)                                                       = रू0 300
1 बोरी यूरिया (मध्यकालमें)                                                     = रू0 300
½ बोरी डीएपी खाद                                                                    = रू0 250
जुताई
खेत की औसतन 4 बार जुताई (ट्रैक्टर का
किराया तैल-पानी-मज़दूरी सहित)                                             = रू0 750
मज़दूरी खर्च विवरणः
खरपतवार नाशक दवा के छिड़काव का खर्च                             = रू0 100
कीटनाशक दवा के छिड़काव का खर्च                                        = रू0 100
बुआई का खर्च                                                                           = रू0 300
कटाई का खर्च                                                                         = रू0 1200
बिजली तथा पानी का खर्च
पूरे खेत को फसल के दरम्यान 6 बार
लगाये गये पानी का खर्च                                                        = रू0 1500
(बिजली और पानी का सम्मिलित खर्च
रू0 250 की दर से)
थ्रेशर का खर्च                                                                         = रू0 450
मंडी तक ले जाने का खर्च                                                        = रू0 500
                                                                              कुल खर्च = रू0 7200
कुल आमदनी (रू0 8,800 - रू0 7200)                                   = रू0 1500

यानी 6 महीने हाड़-माँस गलाने के बाद दो बीघा खेत के मालिक किसान को कुल आमदनी होती है रू0 1500 मात्र.

  • यह नरेगा स्कीम में मिलने वाली 100 रुपये प्रति दिन की आय के हिसाब से 15 दिन की मज़दूरी के बराबर है.

  • इसमे यदि खाद और बीज के लिये गये कर्ज़ के ब्याज को जोड लिया जाये तो किसान का सब कुछ स्वाह हो जायेगा.

  • इन्द्र देव की कृपा भी इस फसल को चाहिये होगी वरना फिर और कर्ज़ का बोझ होगा.

  • हाँ, यही ज़मीन अगर शहर में होती या किसी बिल्डर के पास, तो कम से कम रू0 10,000 का प्रतिमाह का किराया ही दिला रही होती.
“किसान की आत्महत्या” के इस रह्स्य का पर्दाफाश हो चुका था.
फिर ख्याल आया कि जब यह सब इतना सब कुछ स्पष्ट है तो देश का अर्थशास्त्री नेतृत्व क्यों अनभिज्ञ बना बैठा है ? पिछले उन्नीस वर्षों में, आर्थिक सुधार हुआ तो किसका? क्या सारा भारत धीरे- धीरे आत्महत्या कर लेगा? जीत जायेगा इंडिया और हार जायेगा भारत? और सबसे बड़ा सवाल क्या बचेगा भी भारत?
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