सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

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सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Thursday, August 19, 2010

पीपली [लाइव]

बताया जाता है कि यह फिल्म अनुशा रिज़वी ने 2004 में लिखी थी, जब वो NDTV के लिए काम करती थीं. उनकी स्क्रिप्ट ‘द फॉलेन’ आमिर ख़ान को बहुत पसंद आई, मगर वो तब मंगल पाण्डे के निर्माण में व्यस्त थे.इसलिए यह फिल्म उस समय टल गई. छः वर्षों का अंतराल फिल्म को और सामयिक बना गया है, क्योंकि जो समस्याएँ या विचार इस फिल्म के माध्यम से रखे गए हैं, वो आज बड़ी शिद्दत से समाज में महसूस किए जा रहे हैं. यह फिल्म आपसे बात करती है, मगर भाषण नहीं देती. समस्याएँ दिखाती है, मगर हल नहीं सुझाती, क्योंकि हल सुझाना फिल्मकार का काम नहीं. और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ख़ूबी है.


फिल्म के प्रोमोज़ देखकर हमने यानि चैतन्य,सलिल और मनोज ने एक बार फिर एक साथ यह फिल्म देखने का मन बनाया ताकि फिल्म राजनीति पर की गई हमारी परिचर्चा की तर्ज़ पर, इस फिल्म की भी समीक्षा की जाए. फिल्म ग्रामीण भारत का आईना, एक राजनैतिक दस्तावेज़ या फिर कुकुरमुत्ते की तरह फैलती सैटेलाईट छतरी तले मीडिया का मल उत्सर्जन कहा जा सकता है. किंतु इन सबसे आगे जाकर यह फिल्म एक दस्तावेज़ है, एक जाँच समिति की रिपोर्ट की तरह, जिसके मुखिया हैं आमिर ख़ान.

भारत डेड - इण्डिया अलाइवः

सलिलः नत्था और बुधिया दो भाई, कभी गाँजा, कभी कच्ची शराब के नशे में, अपनी बेरोज़गारी की ज़िंदगी और गिरवी रखी ज़मीन, तीन बच्चों की परवरिश और अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह चुराते, पूरे ग्रामीण परिवेश का प्रतिनिधित्व करते हैं.

चैतन्यः ग्रामीण परिवेश नहीं सलिल भाई, भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. फिल्म भारत और इंडिया के विभाजन को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है.और इस फिल्म में यह विभाजन भी खुल कर दिखाई भी देता है. नत्था और बुधिया का पीपली गाँव दिमाग के एक हिस्से में ठहर सा जाता है, भारत बनकर. उसके उलट इंडिया अपने अभिजात्य से भरपूर दार्जिलिंग चाय की चुस्कियाँ लगाता, निश्चिन्त सा लगता यह कहता लगता है कि “आल इज़ वैल!”

मनोजः आप दोनों की बातों के अतिरिक्त भी एक अलग पहलू मुझे दिखा. फिल्म देखते हुए मुझे प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास याद आने लगे । विशेषत: कफन कहानी ।आश्चर्य तो तब होता है कि प्रेमचंद के साहित्य में तो 20 वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में किसान और गरीबों की दशा का यथार्थपरक चित्रण मिलता है, लेकिन आज 21वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भी किसान और गाँवों में बसने वाले किसानों की दशा में कोई अंतर नहीं आया है ।

सलिलः बिल्कुल सही. दरसल भारत की ज़मीनी समस्या ही इस फिल्म की बुनियाद है. ज़मीनें गिरवी, कर्ज़ चुकाने को आय का साधन नहीं. और सरकार अपना दायित्व कृषि मंत्रालय और नौकरशाह पर छोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेती है.

मनोजः आज भारत में प्रति वर्ष कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि पर करीब पंद्रह हज़ार करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन किसान की दशा दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है । उसमें कोई अंतर नहीं आया। फिल्म में इन सभी मुद्दों के लिए जिम्मेवार तत्वों जैसे वोट की राजनीति, सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता आदि का बेहतरीन चित्रण हुआ है.

चैतन्यः फिल्म कई बार यह बात उभारनें में कामयाब होती है कि भारत की 70% आबादी किस क़दर बदतर हालात में गुजर बसर कर रही है. एक पात्र खीझ कर कहता है “बीज और खाद के लिये विदेशी कम्पनियों पर निर्भर हैं और वर्षा के लिये इन्द्र देवता पर.” और वो बीज भी आयातित जिसका ठेका कृषि मंत्री के विदेशी मित्र के पास है.

मनोजः 20वीं शताब्दी का किसान साहूकार के कर्ज से दबा था, तो 21वीं सदी का किसान बैंक के कर्ज से । कर्ज से मुक्ति के लिए किसान किस तरह से भूमिहीन होता है और मुआवजे के रूप में एक लाख रुपए हासिल करने के लिए नत्था को उसका बड़ा भाई बुधिया आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है, ताकि एवज में उसके बच्चों का भविष्य संवर सके ।

सलिलः जब खेती कर नहीं सकता किसान. तो ऐसे में कोई भी आस, दो पैसे की, उन्हें कुछ भी करने को सहर्ष तैयार कर लेती है, यहाँ तक कि आत्महत्या भी, क्योंकि ऐसा उन्होंने सुन रखा है कि इससे उन्हें एक लाख रुपये मिलेंगे. यह एक लाख रुपये उनके सपने पूरे कर सकता है, यह सोच उनकी आँखों में चमक पैदा करती है, लेकिन इसके लिए उसे जान देनी होगी, इस बात से वह चमक ज़रा भी धुंधली नहीं होती. अब इससे मार्मिक घटना तो कभी देखी भी नहीं.

चैतन्यः अरे मार्मिक और करूणा वाली बात छोड़ो सलिल भाई. भारत की दुर्दशा का इससे सटीक चित्रण और क्या होगा कि इंडिया का एक टेलीविज़न पत्रकार अपने कैमरामैन को डाटतें हुये सुबह शौच को जाते हुए ग्रामीणों की तसवीरें खीचनें के लिये उकसाते हुए कहता है कि “अबे, खींच इनकी तस्वीरें, 70% भारत इसी तरह खुले में टट्टी करने जाता है.”

सलिलः नत्था और बुधिया तो हो गए मुख्य चरित्र, लेकिन वह किसान अपनी अलग पहचान रखता है जो चुपचाप बंजर,पथरीली ज़मीन पर फावड़ा चलाता रहता है और वहीं दम तोड़ देता है. सम्वेदनहीनता की हद देखिए कि किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता.

चैतन्यः लोगों की भावनाएँ भी गाँव की ज़मीन की तरह बंजर हो चुकी हैं. और वो फिल्म में एकदम साफ साफ फिल्माया गया है.

मनोज: एक किसान मिट्टी खोदता रहता है, मानो उसका जीवन बस इसी काम के लिए बना है, जीवन के दूसरे रंग और विषय भी हैं, इस सबसे बेखबर वह मिट्टी खोदता रहता है और उसी गड्ढे में दम तोड़ देता है । मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में ही समा जाना, कितना नियतिवादी था वह। किसी को इसकी कोई परवाह नहीं । बस उसके मरने से रिपोर्टर राकेश कुछ द्रवित होता है ।

सलिलः नत्था द्वारा आत्महत्या की बात पर गाँव में लगे मेले से कई बेरोज़गारों को कमाने का अवसर मिलता है और वो यह भूल जाते हैं कि यह मेला किसी की मौत का जश्न मनाने के लिए लगा है. आपको क्या लगता है कि निर्देशक ने कहीं स्पष्ट किया है कि यह भारत और इण्डिया की लड़ाई का क्या नतीजा हो सकता है?

चैतन्यः भारत और इंडिया कि इस लड़ाई का अंजाम क्या हो रहा है उसकी मिसाल है फिल्म का अंतिम दृष्य जिसमें धूल मिट्टी से सना-पुता, नत्था गुड़गाँव की किसी बहुमंज़िला इमारत में नींव खोदते हुए जब थक कर वहीं मिट्टी के ढेर पर बैठ जाता है तो उसकी बेबस आंखे बींध जाती हैं भीतर तक, और यदि आपके अन्दर अभी भी कुछ मनुष्यत्व बचा है तो एक बेचैन कर देनी वाली हूक सी उठती है, मन में भीतर कहीं.

मनोज: भारत की तस्वीर धुंधली है पीपली की तरह, वहीं इंडिया की तस्वीर चुंधिया देने वाली रोशनी में नहाई हुई सी, गुड़गाँव की शीशे वाली बिल्डिंग के जैसी। इंडिया भारत की इस धुंधली तसवीर से पैसा कमाता है और खुद वातानुकूलित भवनों में ऐश्वर्य के सुख भोगता है ।

सलिलः अंत में किसान का गाँव से शहर की ओर पलायन. कब से सुनते आए हैं कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है, यह फिल्म बताती है कि गाँव में बस आत्माएँ ही बसती हैं. भटकती आत्माएँ!! फिल्म ने अंत में सरकारी आँकड़े दिखाए हैं कि पिछले दशक में 80 लाख किसान गाँव से पलायन कर चुके हैं.

चैतन्यः कामनवैल्थ खेल करा कर देश के हुक्मरान देश की जो तस्वीर बदलनें का दावा कर रहें हैं उनपर गोबर की वर्षा कर रही है यह फिल्म पीपली लाइव.

(समीक्षा का अगला अंकः पीपली लाइव में मीडिया का स्टिंग ऑपरेशन
शनिवार सुबह)

                          सम्वेदना के स्वर पर पीपली लाईवः

                         3. BPL बनाम IPL

19 comments:

शिवम् मिश्रा said...

बेहद उम्दा चर्चा चलाई आप लोगो ने इस फिल्म को ले कर .............अभी तक देख नहीं पाया हूँ पर अब ललक और बढ़ गयी है ! आभार !

मनोज कुमार said...

बेहतरीन चर्चा।
फ़िल्म नहीं देखी है। पर चर्चा काफ़ी उच्चस्तरीय है।

shikha varshney said...

क्या बात है ..अनोखा अंदाज समीक्षा का ..रोचक लगा.

मो सम कौन ? said...

फ़िल्म देखने की इच्छा और बढ़ा दी है जी आप लोगों की चर्चा ने।
गोबर वर्षा वाली उक्ति एकदम सटीक है, लेकिन इन लोगों के पास रेनकोट, छाता सब कुछ है।
अब तो ओलंपिक की मेजबानी मिलनी चाहिये।

Udan Tashtari said...

एक अलग अंदाज में की है समीक्षा...

राजेश उत्‍साही said...

फिल्‍म अभी तक देख नहीं पाया हूं। सो ज्‍यादा नहीं कह सकता। पर आप लोगों की बातचीत से फिल्‍म के निहितार्थ समझ आ रहे हैं। बहरहाल मेरे लिए तो यह फिल्‍म इसलिए भी उत्‍सुकता है क्‍योंकि इसके मश्‍ाहूर गीत महंगाई डायन खाए जात की मंडली पास होशंगाबाद के से सटे रायसेन जिले की ही है। और कलाकार भी हबीब तनवीर के नया थियेटर ग्रुप के हैं।
मौका मिलते ही देखूंगा और फिर आपकी इस समीक्षा में शामिल होऊंगा।
वैसे ब्‍लाग पर आपका यह प्रयास बहुत अच्‍छा लगा। ऐसे प्रयासों के माध्‍यम से कुछ सार्थक विमर्श आगे बढ़ाया जा सकता है।

Arvind Mishra said...

पहले फिल्म देख लूं फिर पढता हूँ नहीं तो मजा किरकिरा जाएगा ! :)

प्रवीण पाण्डेय said...

जो स्थिति है, आने वाले 20 वर्षों में भी फिल्म सामयिक रहेगी।

kshama said...

Review behad achha kiya hai...padhke film dekhne kaa man ho raha hai.
Haan! Review padhte samay waqayi Premchand kee kahaniyaan yaad aa gayeen. Bharat kee buniyaad hee ye badhaal kisaan hain. Afsos ke globalisation kee daud me ham inhen kuchalke aage nikalne kee koshish me jute hain..

VICHAAR SHOONYA said...

मैं फिल्मे नहीं देखता क्योंकि इसमें तीन घंटे खर्च हो जाते हैं पर फिल्मों की समीक्षा जरुर पढता हूँ. आपने पीपली लाइव की समीक्षा एकदम नए व रोचक अंदाज में की है. अच्छी लगी.

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

कविता रावत said...

Peeple live abhi to dekhi nahi lekin thodi jhalkiya hi TV par dekhi hai,.. bahut charcha hai. aaj aapne charcha ka film kee sarthakta batyee aapka andaaj bahut hi achha laga... Bharat Bhawan bhopal mein Charan Das Chor Naatak dekha tha... Charan Das kee bhumika nibhane wale kalakar ko dekha to behad khushi huyee. kyukin unke dwara natak jo jeewant bana diya gaga tha. naatak se ek pal ko bhi nazar idhar udhar nahi gayee.
Sundar prastuti ke liye aabhar

अरुणेश मिश्र said...

समीक्षा उत्सुकता बढ़ाती है ।

Rahul Singh said...

सजीव, सार्थक चर्चा, बधाई. एक अलग कोण से पीपली को akaltara.blogspot.com पर देखने का प्रयास है.

boletobindas said...

पड़ा नहीं है पहले देखना है कि मीडिया की छिछालेदारी की है सही में ..या नहीं...फिल्म देखने के बाद आपकी समीक्षा देखूंगा। सौरी पोस्ट नहीं पढ़ने के लिए....

दिगम्बर नासवा said...

छै वर्ष लगे इस फिल्म को बनाने में ...... मतलब पिछले छै वर्षों में मीडीया में कोई सुधार नही आया ....
मुझे तो लगता है सुधार नही ... बल्कि और भी घटिया हो गया है मीडीया पिछले ६ वर्षों में ... बस सनसनी के अलावा कुछ नही रह गया ....

Arvind Mishra said...

आज देख ही आया -रील पर रियल्टी !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

dekh aaaya mai bhi ye film .... amir anusha badhai ke patra hain .... bharat kee vivashta dikhati hui film hai ye ..aap logon ne bahut sahi tareeke se bareeki se film ko dekha hai .... premchand ke ek charutra hori ko bhi jinda kar gayi hai film .... aur rakesh ke andar jab daya bhavna uthti hai to wo doosri patrakar ladki use kahti hai ki tum galat profession me ho ...yani ki is hindustan me agar aap apne peshe me kisi ke prati daya bhavna dikhayenge to aap wrong profession me hain .....is film ke bare me na jane kitna kuch kaha ja sakta hai ...sochta hun shayd do chr aur log ani aankhen kholenge aur is tarah ek cinema ko badhava milega...dharshak varg bhi india ko samrudhha karne ki bajaay bharat ko tarkki karwana chahega...

शोभना चौरे said...

बहुत अच्छी समीक्षा |मिटटी खोदता किसान कर्म को दर्शाता है जिसपर कोई गाँव में हो रही हलचल कोई असर नही |
पिपली लाइव का हर पात्र हमारा ही तो प्रतिनिधित्व करता है |वो कोई अलग दुनिया के नहीं है ?
हमारे समाज के हमारे आसपास के ही लोग है जिनमे , नेता है पत्रकार है ,किसान है ,मंत्री है |
पिपली लाइव हर जगह विद्यमान है |

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