इस साल गर्मी ने तो रिकार्ड ही तोड़ दिया था! बीच बीच में बदरा बरसे भी तो उमस ने जीना मुहाल कर दिया. ऐसे में चंडीगढ़ जैसी जगह के बहुत फायदे हैं. 111 वर्ग किलोमीटर में फैला यह केन्द्रशासित प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा कि राजधानी भी है, शायद इसी कारण यहाँ बिजली का ऐसा टोटा नहीं है. महीनों बिजली नहीं जाती और जाती भी है तो बस ये गई वो आई (देखिये, जलभुन कर बद्दुआ मत दीजिये!).
तभी दो साल पहले जब नोएडा से यहाँ स्थानांतरित होकर आया, तो इनवर्टर पहली ही फुर्सत में निकाल दिया. खैर! पीछे एक रविवार को किसी ख़ैरख्वाह की बद्दुआ असर कर गयी और खबर आयी कि सब-स्टेशन की मैंटीनैंस के चलते, आज हमारे सेक्टर में 10 घंटे बिजली नदारद रहेगी. पहले तो इस खबर को एक समझदार नागरिक की तरह महँगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद और देश विदेश की अन्य खबरों की तरह हमने हल्के में ही लिया, परंतु जब ठीक 11 बजे बिजली चली गयी, तो आधे घंटे में ही हम बेहाल हो गये.
सलिल भाई को नोएडा फोन लगाया, तो पता चला भाई साहब पहले से ही शीतताप नियंत्रित “द ग्रेट इंडिया प्लेस” में घुसे, किताबों की दुकान में मंटो, राही मासूम रज़ा और गुलज़ार साहिब के बचे-खुचे लेखन को समेटने में लगे हैं और इसके बाद उनका लगे हाथ फिल्म देखने का भी विचार है.
मैंने बिजली के जुल्म की कहानी बताई तो छूटते ही बोले “दो साल में ही भूल गये सब? हम तो आज भी अपनी उसी पुरानी ट्रिक पर कायम हैं. जब हमारे “भारत” में बिजली नहीं आती, तो हम मॉल में घुस कर “इंडिया” के मज़े लेते हैं.” और तब उन्होंने याद दिलाया कि कैसे एक बार हमने अपने सेक्टर के सामने स्थित निठारी गाँव के लोगों को मुफ्त में एक आइडिया दिया था कि जब बिजली न आये, तो इन मॉल की ओर कूच करो. इसी कारण एक बार “सेंटर-स्टेज़ मॉल” वालों ने तो देहाती और ग़रीब दिखने वालों को गेट पर ही रोकने का इंतज़ाम कर दिया था, यह कहकर कि क्या काम है? अन्दर बहुत भीड़ है.
सलिल भाई का आइडिया ऑल टाईम हिट था. पत्नी और बेटी ने तुरत उसका अनुमोदन किया और कहा कि खाना भी मॉल में ही जा कर खायेंगे. तय हुआ कि चंडीगढ़ से लगे ज़ीरकपुर के “पारस डाउन-टाउन मॉल” चला जाये. बस, आधे घंटे से भी कम समय में हम डाउन टाउन मॉल के अन्दर थे. आदतन पत्नी और बेटी को दुकानों की सैर करने और कोई बात हो तो मोबाईल पर सम्पर्क करने को कहकर, मैं एक बेंच पर जम गया, इन महलनुमा गलियारों के वातानुकूलित माहौल का लुत्फ उठाने.
(पारस डाउन-टाउन मॉल)
उसी बेंच के दूसरे कोने पर एक देहाती टाईप व्यक्ति भी बैठा था. मैं सोचने लगा कि यह महाशय भी बिजली की कटौती से हलकान आसपास के किसी गाँव से मेरे जैसे ही यहाँ आये होंगे. नज़र दूसरी ओर गयी तो चकमक दुकानों में अन्दर बाहर होते सुन्दर और सजे हुए लोगों को देखकर प्रधान मंत्री के आर्थिक सुधारों की, अपने भारत और इंडिया के कैनवास पर समीक्षा करने का बार-बार मन हुआ. फिर अपने दिमाग की खुजली पर यह कह्कर ‘रिंग कटर’ लगा दिया कि सलिल भाई से चर्चा करते वक्त इस मॉल कल्चर पर भी चर्चा होगी और हुआ तो कोई पोस्ट भी ठेल दी जायेगी (कई ब्लॉग महापुरुषों से सीखा मुहावरा पहली बार प्रयोग किया है).
विचार-श्रंखला टूटी, तो नज़र फिर लौटकर अपनी बेंच पर बैठे महाशय पर पड़ी. इस बार मैं चौंक गया, जनाब के हाथ में मेरी पसंदीदा किताब “द मोंक हू सोल्ड हिज़ फरारी” थी. अचानक हुए इस घटनाक्रम से, मुझे इन महाशय के प्रति, अपनी पहले वाली सोच, निहायत ही घटिया लगी. मात्र बाहरी वस्त्रों से किसी के पूरे व्यक्तित्व का आकलन क्या ठीक है? और तुरत मेरे मन ने पुनः मुझे दुत्कारा कि यह भी ग़लत है कि वस्त्रों से नहीं, तो उनके हाथ में जो किताब है, अब उससे मैं उनके पूरे व्यक्तित्व को आँकने की कोशिश कर रहा हूं. फ़र्क क्या हुआ?
अंतर्द्वद जब झेलना मुश्किल होने लगा, तो मैंने उन महाशय से बातचीत का सिलसिला शुरु करने के अन्दाज़ में कहा, रोबिन शर्मा की यह किताब बहुत अच्छी है! जनाब भी शायद बातचीत के मूड में थे. किताब लगभग बन्द करके मेरी ओर देखते हुए बोले, “हां! पश्चिमी संस्कारों को पूरब का ध्यान सिखाना है, तो इसी तरह उसके लाभ बताये जा सकते हैं, जैसा इस पुस्तक में हैं.” दो लाईनों में किताब की इतनी सटीक समीक्षा सुन कर, मैं गदगद हो गया. फिर तो जनाब के साथ जैसे जैसे बातें होती रही, मैं उनका मुरीद होता गया.
बातों बातों में हमने मह्सूस किया कि सेंट्रल एअर-कंडीशंड होने के कारण मॉल के अंदर ठंड बहुत ज़्यदा हो गई थी और हमें भी कुछ सर्दी सी लगने लगी थी. उन्होंने कहा, “बाहर जितनी गर्मी है, अन्दर उतनी ही सर्दी, कितनी बिजली पीते होंगे ये मॉल?” मेरी तो दुखती रग पर उन्होंने हाथ रख दिया था अनजाने में, बस मैं शुरु हो गया अपना भारत और इंडिया का ज्ञान बाँचने. बिजली पैदा होती है, भारत के गाँवों में; नदियों पर बाँध बनाकर या कोयले की खानें खोदकर. लोग विस्थापित होते हैं और ज़िन्दगी भर संघर्ष करते हैं, उचित मुआवजे के लिये. बदले में मिलता क्या है इनको, न यहाँ पैदा होने वाली बिजली का लाभ, न खोई ज़मीन का उचित मुआवजा. शिक्षा आदि तो इन क्षेत्रों से हमेशा दूर रही है. बहुत हुआ तो चौकीदार, रसोईया या माली आदि की नौकरी मिल जाती है इन्हें वहाँ स्थापित होने वाले बिजलीघरों के दफ्तरों या अधिकारियों के घरों में. विकास के नाम पर यही बिजली इंडिया के बड़े शहरों की इन आलीशान दुकानों में खर्च होती हैं जहाँ पड़ते चरण (फुट फाल्स) गिनती के हैं सारे दिन में, या आईपीएल जैसे दूधिया रोशनी में होने वाले क़िकेट के आयोजनों में. देखा जाये तो भारत के संसाधनों का अनुचित शोषण कर रहा है इंडिया.
मुझे लगा मेरे भाषण पर वो बड़े इम्प्रेस्ड हुए होंगे. लेकिन मेरी बात पर अर्ध-सहमति सी देते हुए उन्होंने कहा, “यह विभाजन तो स्पष्ट है और आज से नहीं सदियों से. हां, उपभोक्तावाद की इस आँधी को अब सरकारी प्रश्रय भी मिलने लगा है, जिससे हालात मुश्किल होते जा रहे हैं! भारत जीवन की मूलभूत ज़रुरतों के लिये भी तरस रहा है और टकटकी लगाये देख रहा है इंडिया को? उसकी बुनियादी ज़रुरतें, शिक्षा और स्वास्थ सब इंडिया के हाथ में है! उधर इंडिया अपने ही लालच में फंसा है. “दो और दो पाँच” का नया गणित जो सीखा है उसने. उसे अब फुर्सत कहाँ भारत के बारे में सोचने की. और फिर गाहे बगाहे वो भारत को नरेगा-मरेगा जैसे डोनेशन देता ही रहता है. इससे अधिक ख़ैरात, भारत को निकम्मा बना देगी, ऐसा इंडिया के मैनेजमेंट की किताबों मे लिखा है.
इतना कहते हुए, वे अपना सामान समेटने लगे, तो मैंने उनकी ओर अपना प्रश्न दाग ही दिया, “अब आगे क्या होगा?” उन्होंने अपना सामान समेटा और कन्धे उचका कर कहा, “आगे क्या होगा पता नहीं! वैसे इंडिया में रहने वाले भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो भारत की सोच रहे हैं. कई बार बाज़ार की ज़रुरतें भी कुछ भारतीय को इंडियन बना देती हैं. ऐसे लोगों को मै “भांडिया” कहता हूँ.” हंसते हुए उन्होंने आगे कहा, “हम और आप भी “भांडिया के भांड” हैं. अपनी सुविधाभोगी वैचारिक जुगाली से इतर, कुछ ठोस करें तभी तो कुछ उम्मीद जगेगी!”
एक ओर तो मैं भांडिया के भांड वाले जुमले के हमले से सम्भलने की कोशिश में था और दूसरी ओर यह आकर्षक व्यक्तित्व, मॉल से बाहर जाने की मुद्रा में आ चुका था. कुछ न सूझा तो मैंने अपना विज़िटिंग कार्ड उन्हें देते हुए, उनसे उनका परिचय मांग लिया. उन्होंने भी अपना कार्ड मुझे देते हुए फिर मिलने को कहा और चले गये.
मैं विस्मित सा उनका कार्ड पढ़ रहा था जिस पर लिखा थाः
डॉ. पायाति चरक, मकान नम्बर 151 ए, पटियाला रोड, ज़ीरकपुर, पंजाब
(इसके बाद पी. सी. बाबू यानि डॉ. पायाति चरक जी से कुछ दिलचस्प मुलाकातें हुई हैं, जिनका ज़िक्र हम अपनी अगली पोस्ट में करेंगे)
