सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

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सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Friday, September 3, 2010

भांडिया के भांड

इस साल गर्मी ने तो रिकार्ड ही तोड़ दिया था! बीच बीच में बदरा बरसे भी तो उमस ने जीना मुहाल कर दिया. ऐसे में चंडीगढ़ जैसी जगह के बहुत फायदे हैं. 111 वर्ग किलोमीटर में फैला यह केन्द्रशासित प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा कि राजधानी भी है, शायद इसी कारण यहाँ बिजली का ऐसा टोटा नहीं है. महीनों बिजली नहीं जाती और जाती भी है तो बस ये गई वो आई (देखिये, जलभुन कर बद्दुआ मत दीजिये!).

तभी दो साल पहले जब नोएडा से यहाँ स्थानांतरित होकर आया, तो इनवर्टर पहली ही फुर्सत में निकाल दिया. खैर! पीछे एक रविवार को किसी ख़ैरख्वाह की बद्दुआ असर कर गयी और खबर आयी कि सब-स्टेशन की मैंटीनैंस के चलते, आज हमारे सेक्टर में 10 घंटे बिजली नदारद रहेगी. पहले तो इस खबर को एक समझदार नागरिक की तरह महँगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद और देश विदेश की अन्य खबरों की तरह हमने हल्के में ही लिया, परंतु जब ठीक 11 बजे बिजली चली गयी, तो आधे घंटे में ही हम बेहाल हो गये.

सलिल भाई को नोएडा फोन लगाया, तो पता चला भाई साहब पहले से ही शीतताप नियंत्रित “द ग्रेट इंडिया प्लेस” में घुसे, किताबों की दुकान में मंटो, राही मासूम रज़ा और गुलज़ार साहिब के बचे-खुचे लेखन को समेटने में लगे हैं और इसके बाद उनका लगे हाथ फिल्म देखने का भी विचार है.

मैंने बिजली के जुल्म की कहानी बताई तो छूटते ही बोले “दो साल में ही भूल गये सब? हम तो आज भी अपनी उसी पुरानी ट्रिक पर कायम हैं. जब हमारे “भारत” में बिजली नहीं आती, तो हम मॉल में घुस कर “इंडिया” के मज़े लेते हैं.” और तब उन्होंने याद दिलाया कि कैसे एक बार हमने अपने सेक्टर के सामने स्थित निठारी गाँव के लोगों को मुफ्त में एक आइडिया दिया था कि जब बिजली न आये, तो इन मॉल की ओर कूच करो. इसी कारण एक बार “सेंटर-स्टेज़ मॉल” वालों ने तो देहाती और ग़रीब दिखने वालों को गेट पर ही रोकने का इंतज़ाम कर दिया था, यह कहकर कि क्या काम है? अन्दर बहुत भीड़ है.

सलिल भाई का आइडिया ऑल टाईम हिट था. पत्नी और बेटी ने तुरत उसका अनुमोदन किया और कहा कि खाना भी मॉल में ही जा कर खायेंगे. तय हुआ कि चंडीगढ़ से लगे ज़ीरकपुर के “पारस डाउन-टाउन मॉल” चला जाये. बस, आधे घंटे से भी कम समय में हम डाउन टाउन मॉल के अन्दर थे. आदतन पत्नी और बेटी को दुकानों की सैर करने और कोई बात हो तो मोबाईल पर सम्पर्क करने को कहकर, मैं एक बेंच पर जम गया, इन महलनुमा गलियारों के वातानुकूलित माहौल का लुत्फ उठाने.
 (पारस डाउन-टाउन मॉल)
उसी बेंच के दूसरे कोने पर एक देहाती टाईप व्यक्ति भी बैठा था. मैं सोचने लगा कि यह महाशय भी बिजली की कटौती से हलकान आसपास के किसी गाँव से मेरे जैसे ही यहाँ आये होंगे. नज़र दूसरी ओर गयी तो चकमक दुकानों में अन्दर बाहर होते सुन्दर और सजे हुए लोगों को देखकर प्रधान मंत्री के आर्थिक सुधारों की, अपने भारत और इंडिया के कैनवास पर समीक्षा करने का बार-बार मन हुआ. फिर अपने दिमाग की खुजली पर यह कह्कर ‘रिंग कटर’ लगा दिया कि सलिल भाई से चर्चा करते वक्त इस मॉल कल्चर पर भी चर्चा होगी और हुआ तो कोई पोस्ट भी ठेल दी जायेगी (कई ब्लॉग महापुरुषों से सीखा मुहावरा पहली बार प्रयोग किया है).

विचार-श्रंखला टूटी, तो नज़र फिर लौटकर अपनी बेंच पर बैठे महाशय पर पड़ी. इस बार मैं चौंक गया, जनाब के हाथ में मेरी पसंदीदा किताब “द मोंक हू सोल्ड हिज़ फरारी” थी. अचानक हुए इस घटनाक्रम से, मुझे इन महाशय के प्रति, अपनी पहले वाली सोच, निहायत ही घटिया लगी. मात्र बाहरी वस्त्रों से किसी के पूरे व्यक्तित्व का आकलन क्या ठीक है? और तुरत मेरे मन ने पुनः मुझे दुत्कारा कि यह भी ग़लत है कि वस्त्रों से नहीं, तो उनके हाथ में जो किताब है, अब उससे मैं उनके पूरे व्यक्तित्व को आँकने की कोशिश कर रहा हूं. फ़र्क क्या हुआ?

अंतर्द्वद जब झेलना मुश्किल होने लगा, तो मैंने उन महाशय से बातचीत का सिलसिला शुरु करने के अन्दाज़ में कहा, रोबिन शर्मा की यह किताब बहुत अच्छी है! जनाब भी शायद बातचीत के मूड में थे. किताब लगभग बन्द करके मेरी ओर देखते हुए बोले, “हां! पश्चिमी संस्कारों को पूरब का ध्यान सिखाना है, तो इसी तरह उसके लाभ बताये जा सकते हैं, जैसा इस पुस्तक में हैं.” दो लाईनों में किताब की इतनी सटीक समीक्षा सुन कर, मैं गदगद हो गया. फिर तो जनाब के साथ जैसे जैसे बातें होती रही, मैं उनका मुरीद होता गया.

बातों बातों में हमने मह्सूस किया कि सेंट्रल एअर-कंडीशंड होने के कारण मॉल के अंदर ठंड बहुत ज़्यदा हो गई थी और हमें भी कुछ सर्दी सी लगने लगी थी. उन्होंने कहा, “बाहर जितनी गर्मी है, अन्दर उतनी ही सर्दी, कितनी बिजली पीते होंगे ये मॉल?” मेरी तो दुखती रग पर उन्होंने हाथ रख दिया था अनजाने में, बस मैं शुरु हो गया अपना भारत और इंडिया का ज्ञान बाँचने. बिजली पैदा होती है, भारत के गाँवों में; नदियों पर बाँध बनाकर या कोयले की खानें खोदकर. लोग विस्थापित होते हैं और ज़िन्दगी भर संघर्ष करते हैं, उचित मुआवजे के लिये. बदले में मिलता क्या है इनको, न यहाँ पैदा होने वाली बिजली का लाभ, न खोई ज़मीन का उचित मुआवजा. शिक्षा आदि तो इन क्षेत्रों से हमेशा दूर रही है. बहुत हुआ तो चौकीदार, रसोईया या माली आदि की नौकरी मिल जाती है इन्हें वहाँ स्थापित होने वाले बिजलीघरों के दफ्तरों या अधिकारियों के घरों में. विकास के नाम पर यही बिजली इंडिया के बड़े शहरों की इन आलीशान दुकानों में खर्च होती हैं जहाँ पड़ते चरण (फुट फाल्स) गिनती के हैं सारे दिन में, या आईपीएल जैसे दूधिया रोशनी में होने वाले क़िकेट के आयोजनों में. देखा जाये तो भारत के संसाधनों का अनुचित शोषण कर रहा है इंडिया.

मुझे लगा मेरे भाषण पर वो बड़े इम्प्रेस्ड हुए होंगे. लेकिन मेरी बात पर अर्ध-सहमति सी देते हुए उन्होंने कहा, “यह विभाजन तो स्पष्ट है और आज से नहीं सदियों से. हां, उपभोक्तावाद की इस आँधी को अब सरकारी प्रश्रय भी मिलने लगा है, जिससे हालात मुश्किल होते जा रहे हैं! भारत जीवन की मूलभूत ज़रुरतों के लिये भी तरस रहा है और टकटकी लगाये देख रहा है इंडिया को? उसकी बुनियादी ज़रुरतें, शिक्षा और स्वास्थ सब इंडिया के हाथ में है! उधर इंडिया अपने ही लालच में फंसा है. “दो और दो पाँच” का नया गणित जो सीखा है उसने. उसे अब फुर्सत कहाँ भारत के बारे में सोचने की. और फिर गाहे बगाहे वो भारत को नरेगा-मरेगा जैसे डोनेशन देता ही रहता है. इससे अधिक ख़ैरात, भारत को निकम्मा बना देगी, ऐसा इंडिया के मैनेजमेंट की किताबों मे लिखा है.

इतना कहते हुए, वे अपना सामान समेटने लगे, तो मैंने उनकी ओर अपना प्रश्न दाग ही दिया, “अब आगे क्या होगा?” उन्होंने अपना सामान समेटा और कन्धे उचका कर कहा, “आगे क्या होगा पता नहीं! वैसे इंडिया में रहने वाले भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो भारत की सोच रहे हैं. कई बार बाज़ार की ज़रुरतें भी कुछ भारतीय को इंडियन बना देती हैं. ऐसे लोगों को मै “भांडिया” कहता हूँ.” हंसते हुए उन्होंने आगे कहा, “हम और आप भी “भांडिया के भांड” हैं. अपनी सुविधाभोगी वैचारिक जुगाली से इतर, कुछ ठोस करें तभी तो कुछ उम्मीद जगेगी!”

एक ओर तो मैं भांडिया के भांड वाले जुमले के हमले से सम्भलने की कोशिश में था और दूसरी ओर यह आकर्षक व्यक्तित्व, मॉल से बाहर जाने की मुद्रा में आ चुका था. कुछ न सूझा तो मैंने अपना विज़िटिंग कार्ड उन्हें देते हुए, उनसे उनका परिचय मांग लिया. उन्होंने भी अपना कार्ड मुझे देते हुए फिर मिलने को कहा और चले गये.

मैं विस्मित सा उनका कार्ड पढ़ रहा था जिस पर लिखा थाः

डॉ. पायाति चरक, मकान नम्बर 151 ए, पटियाला रोड, ज़ीरकपुर, पंजाब

(इसके बाद पी. सी. बाबू यानि डॉ. पायाति चरक जी से कुछ दिलचस्प मुलाकातें हुई हैं, जिनका ज़िक्र हम अपनी अगली पोस्ट में करेंगे)

19 comments:

अरुणेश मिश्र said...

कितना मजेदार और वास्तविक लिखा है । लिखने वाले अपने आप तय करें कि वे किस कोटि के हैं ।

सम्वेदना के स्वर said...

@ अरुणेश मिश्र जी
पायाति चरक जी ने खुद से और हम से भी बहुत तीखा सवाल पूछां है!

हाँ या न के स्तर पर तो जबाब बहुत आसान है, पर जबाब का समग्रता से उत्तर तलाशने के प्रयास में और भी न जाने कितने सवाल खड़े हो जाते हैं. हमें तो यह सवाल आज सारे सम्वेदंशील मध्यमवर्ग का भी लगता है?

सुज्ञ said...

दुविधाजनक स्थिति:भांडिया के भांड

मनोज कुमार said...

बाक़ी टिप्पणी त बाद में। पहले ऊ किताब बाला बात पर अपना सन्समरन सुना दें।

आपका ई पोस्ट पढकर आज हमरा बुझाया कि ऊ दिन लोग हमरा बेबकूफ़ समझ कर काहे घूर रहे थे।

हुअ ई कि पिछलका सपताह दिल्ली गए रहे। सलील जी से भेट्मुलाकातो हुआ बाराख्म्भा मेटरो पर! उहां से ऊ अप्पन राह हम अप्पन राह! हम अप्पन आदत के मुताबिक कोनो टुट्पुजिया टाइप बुकस्टॉल से अपना फ़ेबरेट राइटर सुरेनदर मोहन पाठक के पैंसठ लाख की डकैती लेकर चल दिए हबाईजहाज पकरने हबाई अड्डा। ऊहां हमरे हाथ में ई किताब देख लोग हंस रहे थे, सायद बेबकूफ़ो भी बूझ रहे हों।

सम्वेदना के स्वर said...

@ मनोज कुमार जी

तनिक निरपेक्ष होकर सोचें तो अपनी ही इन छवियों में कैद होकर ही तो रह जाते हैं हम सब. दूसरे के बारे में इस तरह के सतही आंकलन हम सब जब-तब करते ही रहते हैं.

भारत भूमि के एक और महान विचारक जे.
कृष्णमूर्ति भी अपनी कई हवाई यात्राओं में इसी तरह के "तथाकथित" सस्ते जासूसी उपन्यास पड़ॅते देखे गये थे !! (अब क्या कहते हैं आप?)

मनोज कुमार said...

एक बहुत ही अच्छा संस्मरण।
मुझे तो अपने चंडीगढ के बिताए दिनों की याद दिला गया।
चंडीगढ के और भी दृश्य और संवेदनाएं बटोर कर अपने स्वर हम तक पहुंचाइए यही निवेदन है।

ali said...

आपके यहां बिजली जाती ही नहीं ,हमारे यहां यूं समझिये कि आती ही नहीं ! आपके यहां माल हैं सिर छुपाने के लिये हमारे पास ? ? ?...चरक बाबू का इंडिया , जहां आप रहते हैं , कुछ नग भारतीयों को भी तस्कीन दे जाता है ,और हम ?

जलन तो है पर बद्दुआ नहीं देंगे :)

मो सम कौन ? said...

चैतन्य जी,
अगली पोस्ट का और भी बेसब्री से इंतज़ार रहेगा। ऐसे व्यक्तित्व संख्या में ज्यादा नहीं होते और हो भी नहीं सकते। लालन, हंसन, सिंहन और साधु।
और हमारी बद्दुआ की चिंता मत कीजियेगा, हम तो अकेले रहने पर कई बार वैसे भी पंखा वगैरह बंद कर देते थे ताकि आदत खराब न हो जाये। बस ये आबाद होने के चक्कर में आदतें खराब कर लीं, हा हा हा।

Divya said...

.
चैतन्य जी,
अगली पोस्ट का और भी बेसब्री से इंतज़ार रहेगा। ऐसे व्यक्तित्व संख्या में ज्यादा नहीं होते और हो भी नहीं सकते। लालन, हंसन, सिंहन और साधु।
और हमारी बद्दुआ की चिंता मत कीजियेगा, हम तो अकेले रहने पर कई बार वैसे भी पंखा वगैरह बंद कर देते थे..

I fully agree with 'mo sam kaun,' I also turn off the fan quite often.

Eagerly waiting for the next episode.

Regards,
.

shikha varshney said...

अरे आपने तो नॉएडा से लेकर चंडीगढ़ तक सब घुमा दिया ..वैसे सच्ची बात ये है कि नॉएडा में बिजली जाने पर हम भी मॉल का ही रुख करते हैं :) ..अब एक और बहाना मिल गया ..क्या पाता कोई विद्द्वान हमें भी मिल जाये कभी यूँ ही तो थोडा ज्ञान वर्धन हमारा भी हो जाये.:)...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

नोएडा से चडीगढ़ तक की सैर और ऊपर से विद्ववान से बात चीत ...अच्छा संस्मरण है ...

यह बात सटीक लगी ...

ऐसे लोगों को मै “भांडिया” कहता हूँ.” हंसते हुए उन्होंने आगे कहा, “हम और आप भी “भांडिया के भांड” हैं. अपनी सुविधाभोगी वैचारिक जुगाली से इतर, कुछ ठोस करें तभी तो कुछ उम्मीद जगेगी!”

डा० अमर कुमार said...


पायाति जी का थप्पड़ निशाने पर है,
पर जाने क्यों ऎसे लोग हाशिये पर हैं ।

boletobindas said...

हाहाहाहाहाहाहाहाहा
चरक जी सही कहते हैं......यही बात कहता आ रहा हूं कि कब तक कोसते रहेंगे हम लोग.....कुछ करेंगे भी कभी...नहीं कर सकते तो कुछ करने वाले हाथों की मदद तो करें..पर क्या करें......खैर भांड़िया तो नहीं बनूंगा में ..हाहाहाहहा

नोए़डा में रह रहा हूं चंढ़ीगढ़ दस बार गया....पहले तो उसकी हर थोड़ीदूर पर गोल चक्कर का चक्कर फिर एक जैसे मकान देखकर बोर हो गया था। पर बाद में काफी मजा आया।....


ईवीएम वाली पोस्ट लिखने वाला था..मगर कुछ तथ्यों, कुछ तर्कों का प्रत्यूतर नहीं मिला सो रोक दी वो पोस्ट..क्योंकी प्रहार करना हो तो तलवार की धार और भाले के नोक पैनी होनी चाहिए न ....

प्रवीण पाण्डेय said...

यथार्थ दिखा दिया भांडिया का। बहुत अच्छा आलेख।

राजेश उत्‍साही said...

आपकी इस पोस्‍ट से एक नया मुहावरा मिला। भांडिया के भांड। इस ब्‍लाग की दुनिया में भी बहुत सारे हैं।
मैं जहां रहता हूं वहां बिजली तो नहीं जाती। पर हां घर में टीवी नहीं है। क्रिकेट का शौक है। सो जब कोई मजेदार मैच आ रहा होता है तो पास के मॉल में घुस जाते हैं मैच देखने। या कि छुट्टी के दिन गर्मी लगे तो एक बस पास लेकर एसी बस में बैठ जाओ और सो भी लो। असल में हम भांडिया सब भांड जुगाडू टाइप के ही हैं न।
पर कुल मिलाकर आपकी पोस्‍ट ने भांडिया की सैर तो करा ही दी।
और हाथ में या साथ में किताब रखने के दोनों फायदे हैं।

VICHAAR SHOONYA said...

आशा है की 'भंडिया के भांड' जैसा रोचक जुमला देने वाले चरक साहब व्यक्तित्व भी मजेदार होगा. उनके साथ आपकी मुलाकातों के वर्णन का इंतजार रहेगा.

मनोज भारती said...

डॉ. पायाति चरक बहुत ही दिलचस्प किस्म के व्यक्ति लगे जी । इनकी अगली मुलाकातों का इन्तजार रहेगा । भांडिया के भांड वाला जुमला पसंद आया ।

soni garg said...

"जब हमारे भारत में बिजली नहीं आती तो हम मोल में घुस कर इंडिया के मज़े लेते है " वाह क्या खूब कहा है लेकिन हमें ऐसे आइडिया की ज़रूरत नहीं पड़ी ! अब देखिये नज़र ना लगाईयेगा !

सम्वेदना के स्वर said...

सरिता दी अपनत्व का ई मेल से प्राप्त टिप्पणीः
dear busy personalities
kaise ho thouno ?
Ek to garmee se pareshaan aur doosareka kya haal hai?
mamatv se badee dhanrashi aur kya ho saktee hai?
ek Tajmahal kya all tha wonders of world feeke hai mamatv ke aage .
kavita suee see chubhan chod gayee .
Chaitany se kahna judgemental hona theek nahee........
maine write up pada hai.
vaise unhe khud ko bhee samjh aa hee gaya.
Arna 2 wks kee ho gayee hai.....
Nanee ko vyst rakhane me mahir hai .
s sneh
sarita di

धन्यवाद सरिता दी!!

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