सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Thursday, September 16, 2010

बच्चों से बातें करना


बच्चों से बातें करना
वेद पुराण उपनिषद का पढ़ना.
दिल की कहना दिल की सुनना
उन्मुक्त निडर नदिया सा बहना.
दुनिया को पैरों में रखना
पैरों को सर पर रख लेना,
सर को फिर ज़मीन पर रख कर
एक कलाबाज़ी खा जाना.
गोल गोल दुनिया के चक्कर

उनसे सदा सहज ही बचकर
अपनी दुनिया अलग बसाना
बच्चों ने बचपन से जाना.
ज़रा ग़ौर से देखें हम जो
बच्चों की नन्हीं दुनिया को
सहज भाव से भरी हुई है.
प्रेम सहज है, क्रोध सहज है
जीवन का हर छन्द सहज है
प्रीत का एक धागा ऐसा है
रोते रोते वो हँस पड़ता.

बच्चों के भावों में खोजें
एक अलौकिक ज्ञान मिलेगा
कर्ता-कर्म का द्वंद्व न होगा
पल पल का विस्तार मिलेगा.
हम सब भी तो बच्चे ही थे
इसी भाव में रचे बसे थे
फिर हमको क्या हो जाता है
वो बच्चा क्यों खो जाता है.
तत्व प्रश्न जीवन का यह है
इसका उत्तर कठिन है मिलना

बच्चों से बातें करना
वेद पुराण उपनिषद का पढ़ना.

36 comments:

kshama said...

Ek khaas umr ke bachhon ke saath samay bitana mano lagta hai,eeshwar ke saath bita rahe hain..badon kee duniya me bachha aage chalkar kho jata hai...bada jo ho jata hai..

वीना said...

बहुत ही प्यारी रचना

हम सब भी तो बच्चे ही थे
इसी भाव में रचे-बसे थे
फिर हमको क्या हो जाता है
वो बच्चा क्यों खो जाता है
सच है अपना बचपन हम भूल जाते हैं

shikha varshney said...

परेशानी तो यही है कि फिर से बच्चा नई बना जा सकता .
बहुत प्यारी रचना.

Arvind Mishra said...

जी बहुत पते की और प्यारी बात की आपने ...बच्चों से बातें किसी उपनिषद से कम आनन्द नही देती -और आश्चर्य उन्हें सब मालूम रहता है -बस उन जैस्सा बन के देखिये सुनिएतब !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

waah ..soch samajah walon ko thodi nadani de maula....:)

aaj to aap nadaan hue ghum rahe hain ...kitni meethi hai ye rachna ...dil bachha ho gaya ise padhte padhte ...:)

bahut bahut bahut pyari post lagi ...:)

मनोज कुमार said...

अगर वर्ड्सवर्थ की मानें तो स्वर्ग बचपन के आस-पास रहता है।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

अभिलाषा की तीव्रता एक समीक्षा आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

अनामिका की सदायें ...... said...

आप की रचना 17 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
http://charchamanch.blogspot.com


आभार

अनामिका

प्रवीण पाण्डेय said...

बच्चों से बतियाना मुझको भाता है,
ज्ञान भरा है, कितना उनको आता है।

Apanatva said...

:)

रचना दीक्षित said...

बहुत सुन्दर बात, फिर कुछ पलों के लिए बचपन लौटा दिया आपने. यकीं ही नहीं होता की कभी बचपन भी था इस आपा धापी में सब कुछ जैसे छूट ही गया

ali said...

मासूमियत की फिर से वापसी की उम्मीद करना अच्छा लगा ! इस बहाने कुछ लम्हे बेहतर गुज़रे !

lokendra singh rajput said...

बच्चे मन के सच्चे...... सबकी आंख के तारे।
मन भा गई कविता।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सच है ..बच्चों से बात करना मन को शांति देता है ...सुन्दर अभिव्यक्ति

शिवम् मिश्रा said...

बेहद उम्दा रचना .....एकदम सही कहा है आपने .....बच्चों से बातें करना वेद पुराण उपनिषद का पढ़ना|

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

Udan Tashtari said...

बहुत प्यारी रचना.

रानीविशाल said...

Bade hokar hi pata chalata hai bachapan ka mol...varana to bachpan me bade hone ki chah rahati hai
bahut sundar rachana.
ye dusari bar comment ki try kar rahi hun pahale ho nahi paya...

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

बहुत सुन्दर...बच्चों से बतियाना मन को बड़ा सुकून देता है|
ब्रह्माण्ड

Mahendra Arya said...

किसी शायर ने अच्छा कहा है - " बड़ो की देख कर दुनिया मेरे अन्दर का एक बच्चा बड़ा होने से डरता है ." बहुत ही सहज विवरण - एक अच्छी कविता !

वन्दना said...

वाह्…………बच्चों के माध्यम से हर इंसान की चाहत बयान कर दी…………………बहुत ही सुन्दर रचना।

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत ही सुन्दर रचना !

सतीश सक्सेना said...

काश हम बच्चों की मुस्कान से कुछ सीख सकें ....

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही पसंद आई आपकी यह रचना

Dr. Ashok palmist blog said...

बच्चोँ को समर्पित बहुत ही सार्थक लेखन। बधाई! -: VISIT MY BLOG :- जिसको तुम अपना कहते हो...........कविता को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ।

Coral said...

बहुत सुन्दर

सच कहा है....

दीपक 'मशाल' said...

हाय बचपन... किते खो गए तुम???

हमारीवाणी.कॉम said...

बहुत बढ़िया कोशिश है यह.

हमारीवाणी को और भी अधिक सुविधाजनक और सुचारू बनाने के लिए प्रोग्रामिंग कार्य चल रहा है, जिस कारण आपको कुछ असुविधा हो सकती है। जैसे ही प्रोग्रामिंग कार्य पूरा होगा आपको हमारीवाणी की और से हिंदी और हिंदी ब्लॉगर के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओँ और भारतीय ब्लागर के लिए ढेरों रोचक सुविधाएँ और ब्लॉग्गिंग को प्रोत्साहन के लिए प्रोग्राम नज़र आएँगे। अगर आपको हमारीवाणी.कॉम को प्रयोग करने में असुविधा हो रही हो अथवा आपका कोई सुझाव हो तो आप "हमसे संपर्क करें" पर चटका (click) लगा कर हमसे संपर्क कर सकते हैं।

टीम हमारीवाणी


हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

मो सम कौन ? said...

इसी बचपन को लौटाने के बदले दौलत, शोहरत और जवानी तक देने को तैयार हो गये थे जगजीत सिंह, और फ़िर भी ये डील महंगी नहीं।

boletobindas said...

जी वैसे हम तो खुद ही बच्चे हैं जी। सो बच्चों के साथ मजा आता है जी। पर जब लोग बड़ा कर बना देते हैं तो ऐसी ही खूबसूरत कविता को पढ़कर फिर से बच्चा बन जाते हैं या बचपन की यादों में को जाते हैं....

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

प्रिय बंधुवर चैतन्य जी
नमस्कार !
बहुत समय बाद आपके यहां पहुंचने पर बहुत कुछ खोने की अनुभूति के मध्य " बच्चों से बातें करना " सुखद् अनुभव रहा ।
वो बच्चा क्यों खो जाता है ? इस मा'सूम प्रश्न का उत्तर खोजा जा सके तो समूची मानव जाति पर उपकार होगा ।

एक श्रेष्ठ रचना के लिए बधाई स्वीकार करें ।

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

राजेश उत्‍साही said...

सचमुच कभी कभी अपने अंदर के बच्‍चे से भी बात कर लेना चाहिए।

मनोज भारती said...

वेद,पुराण,उपनिषद पढ़ने जैसा ही है बच्चों से बातें करना । बच्चों की सरलता को फिर से पा लेना ही तो हमें ये सब सिखाते हैं । एक अति सुंदर रचना ।

दिगम्बर नासवा said...

सच है अगर हम सब भी बच्चे बन सकें तो कितना अच्छा हो ....
वैसे हर बड़े में एक बच्चा छुपा है बस उसे निकालने की ज़रूरत है ....

अरुणेश मिश्र said...

कमाल कर दिया ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत मुश्किल सवाल उठाया है आपने. हो सकता है कि हम कभी अलसाए से भूल जाते हैं कि बच्चे को बचाए रखना कितना ज़रूरी है

Anonymous said...

kise fursat h.sab dam aur nam ke pichhe bag rahe hain sant bhi

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