सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-र-त बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Showing posts with label वीडियो पत्रकारिता. Show all posts
Showing posts with label वीडियो पत्रकारिता. Show all posts

Saturday, April 24, 2010

SMS पोल की खोलो पोल


सन 1975 के पहले तो सब यही सोचते थे कि एक सिक्का हवा में उछाला जाए तो उसके ‘चित्’ या ‘पट’ आने की सम्भावना 50% है यानि आधी आधी. लेकिन 1975 की फिल्म शोले ने तो उस सम्भावना में भी नई सम्भावनाएँ जगा दीं, अगर सिक्का किनारे पर खड़ा हो जाए… फिर तो न ‘चित्’ न ‘पट’… और कहीं सिक्का दोनों तरफ से एक सा हुआ तो 100% सम्भावना है कि ‘पट’ ही आएगा.

इधर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस विज्ञान में महारत हासिल कर ली है. एक से बढकर एक आँकड़े और उनसे निकाले गए नतीजे इस तरह परोस रहे हैं जैसे फ़ायदा न हो तो पैसे वापिस. कौन सी पार्टी चुनाव में आगे रहेगी, कौन अपराधी है, किसे सज़ा मिलनी चाहिए, देश की नीति और दिशा कैसी होनी चहिए वगैरह वगैरह... लब्बो लुआब ये कि हर मर्ज़ का ईलाज है हक़ीम लुक़्मान के पास... और गोली सिर्फ एक … आँकड़े, यहाँ वहाँ से इकट्ठा किए हुए. इस थेरेपी का नाम दिया “ओपिनियन पोल” और चुनाव के संदर्भ में “एक्ज़िट पोल”.

इलेक़्ट्रोनिक मीडिया के इसी भ्रामक और निहित स्वार्थ द्वारा प्रायोजित “ओपिनियन पोल” के कारण पिछ्ले लोक-सभा चुनाव में चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान “एक्ज़िट पोल” या “ओपिनियन पोल” को प्रतिबन्धित कर दिया था. यह प्रतिबन्ध सिद्ध करता है कि इन हथकंडों के द्वारा इलेक्ट्रोनिक मीडिया लोगों के ओपिनियन को प्रभावित करने की स्थिती मे रह्ता है और यह बात भारत सरकार और चुनाव आयोग दोनों मानते है.

इसी ऋंखला में एक नई कड़ी है समाचर मनोरंजन चैनेलों द्वारा किए जाने वाले SMS पोल. देश दुनिया की ब‌ड़ी से बड़ी समस्या का कारण और निदान, आधे घण्टे के प्रोग्राम में नेता और जनताके सामने. दूसरे शब्दों में, ये समाचर मनोरंजन चैनेल सम-समायिक विषयों के कार्यक्रमों के दौरान SMS पोल कराते हैं. दर्शकों को बताया यह जाता है कि कार्यक्रम के दौरान इतने प्रतिशत SMS द्वारा जनता ने अपनी राय ज़ाहिर की. कार्यक्रमों के अंत में, इन SMS पोल मे हां या नहीं का प्रतिशत बता कर कार्यक्रम का एंकर, उस विषय पर देश की राय की घोषणा भी कर देता है.

जहाँ तक विश्वस्नीयता का सवाल है, इन चैनलों की तरह, इन SMS पोल की विश्वसनीयता भी खोखली है. NDTV के न्यूज़ पाइंट कार्यक्रम के एंकर अभिज्ञान प्रकाश तो कार्यक्रम शुरू होते ही हां या नहीं का प्रतिशत बताते है. यह प्रतिशत कार्यक्रम के दौरान आये SMS के साथ बदलते हुए, कार्यक्रम के अंत तक एकदम बदल जाता है.

अब अगर इस पूरी प्रक्रिया का सतही विश्लेषण करें तो यह पता चलता है कि कार्यक्रम की लोकप्रियता का आलम ये है कि कार्यक्रम के शुरू होने से पहले ही लोग, सिर्फ चैनल पर दिखाई जाने वाली स्क्रोल लाइन को पढकर ही, दनादन SMS दागने लगते हैं! और परिचर्चा में भाग लेने वाले महापुरुषों की अमृत वाणी से प्रभावित होकर कार्यक्रम के दौरान भी सिर्फ और सिर्फ SMS ही करते रहते हैं. और अंत में एंकर के प्रभावशाली व्यक्तित्व से, उसके देश के प्रति उत्तरदायित्व  बोध से, महापुरुषों के चिंता व्यक्त करने तथा उनकी समस्या के प्रति सोच से प्रभावित होकर देश के लोग अपना फैसला बता देते हैं, जो कभी कभी उनकी पूर्व धारणा या पूर्वाग्रह से अलग होता है. क्या बात है! वॉट ऐन आइडिया सर जी!!

क्या किसीने किसी एल्क्ट्रोनिक मीडिया पत्रकार से ये सवाल पूछने का साहस नहीं किया कि इस तरह के SMS पोल में ये क्यों नहीं बताया जाता कि:

क) कुल प्राप्त SMS की संख्या कितनी थी?
ख) एक मोबाइल नम्बर से एक से ज़्यादा प्राप्त हुए SMS मान्य होते हैं या नहीं? (यदि हां तो क्यों?)
ग) क़्या चैनल से जुड़े लोगों को इस SMS पोल मे भाग लेने से वंचित किया गया है या नहीं?
      (वे तो वैसे भी भाग नहीं लेते होंगे … क्यों पैसे बरबाद करें...उनको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त)
घ) देश के किन किन भागों से कितने SMS प्राप्त हुए?

मान लीजिये कि “मीडिया बकवास परोसता है?” इस विषय पर मात्र 5 SMS प्राप्त हुए जिसमे 3 ‘हां’ और 2 ‘नहीं’ हैं (जबकि 2 “नहीं” वाले SMS चैनेल ने स्वयं भेजे हैं) तो “मीडिया बकवास परोसता है” इस विषय पर देश की राय “हां” मे होगी - 60%. बस हो गया फ़ैसला, 5 लोगों ने 125 करोड़ लोगों की राय जता दी.

अब अगर हम कहें कि SMS पोल के परिणामों के साथ उन प्रश्नों के उत्तर भी दिए जाएँ जो हमने ऊपर पूछे हैं, तो SMS पोल की पोल खुल जायेगी! परंतु यह बताकर ख़ुद समाचार व्यापारी समाचार का धन्धा क्यों मन्दा करना चाहेगें ?

Thursday, March 25, 2010

चौथे खम्बे में लगी दीमक-भाग 1

एलेक्ट्रोनिक मीडिया का प्रादुर्भाव भारतीय समाज में मात्र दो दशक पुराना है. ऐसे में आज का मीडिया 20-22 वर्ष का वो दिग्भ्रमित शहरी युवा प्रतीत होता है जो मात्र और मात्र उत्तेजना से भरा है. न तो उसे भान है अपनी 5000 वर्षों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का और न ही कर्तव्यबोध है, आने वाली पीढियों के लिये. समय की रेत पर अपने पद चिह्न छोड़ जाने का.

इन वीडियो पत्रकारों के रंग ढंग देखकर बस यही लगता है कि इनके लिये देश का इतिहास तभी से शुरू होता है; जब से इन्होंने टेलिवीज़न की नौकरीशुरू की. इनके लिये संस्कृति गली-मुहल्लों की चाट-पकौड़ों की दुकानों, आदिवासी नृत्यों तक ही सीमित है. बहुत हुआ तो गाहे-बगाहे काव्यात्मक भाषा में ग़रीबी का चित्रण कर कोई डॉक्यूमेंटरी बना डाली और उसे क्रिकेट और बॉलिवुड के प्रायोजित कार्यक्रमों के बीच दिखाकर अपनी सम्वेदनशीलता के दायित्व का निर्वाह करने की ख़ानापूर्ति भर कर ली.

जैसे इस देश के राजनेताओं के लिये राजनीति खालिस व्यवसाय है, उसी तरह देश में पत्रकारिता – विशेषतः टेलीविज़न पत्रकारिता - एक लाभप्रद व्यवसाय बन चुका है. IPL जैसे आयोजन इस धारणा को निर्विवाद रूप से सत्य सिद्ध करते हैं. इस आयोजन में बॉलिवुड और क्रिकेट की खिचड़ी, मीडिया की थाली में सजा कर पूरे देश को परोसी जा रही है. तनिक ध्यान दें, पिछले साल IPL की सारी टीमें रू.2300 करोड़ में नीलाम हुई थीं लेकिन अभी हाल ही में सिर्फ दो टीमें, पुणे और कोच्चि, रू.3200 करोड़ में बिकीं. हज़ारों करोड़ के इस खेल में एलेक्ट्रोनिक मीडिया की चांदी है, क्योंकि IPL की खिचड़ी का स्वाद चखाने और पैसों की चमक से उत्पन्न उत्तेजना जगाने का मुख्य दायित्व इनके ऊपर ही है. देश भले ही महँगाई, बेरोज़गारी, अशिक्षा और गिरती स्वास्थ्य सुविधाओं की समस्या से पीड़ित होकर त्राहिमाम कर रहा हो, तगड़ी व्यावसायिकता की होड़ में “चौथा स्तम्भ” स्वर्ण मंडित हो रहा है.

ऐसे में जनजीवन को प्रभावित करने वाले राजनैतिक मुद्दे हाशिये पर आ गये लगते हैं. सत्तापक्ष खुश है कि क्रिकेट, बालीवुड और मसाला खबरों की अफीम खाकर, जनता पगलाई हुई है और उनकी कुर्सी सुरक्षित है. विपक्ष हैरान-परेशान है, नक्कार खाने मे हर कोई अपनी अपनी तूती बजा रहा है. मुझे याद आता है, एक मशहूर टेलीविज़न पत्रकार (जो अब पद्म पुरस्कार से सम्मानित और मीडिया सम्राट की श्रेणी मे आ चुके हैं) का वो बिखरे बाल और बदहवासी से भरा, जुझारुपन को बयां करता चेहरा, जो उन्होनें गुजरात दंगो की NDTV के लिये की गयी रिपोर्टिगं करते हुए देश के सामने पेश किया था. बाद में NDTV की ही एक मशहूर महिला पत्रकार ने कारगिल युद्द में अपनी वैसी ही छवि पेश की. देखते ही देखते....खबरें पार्श्व में चली गयीं.....और ये व्यक्तित्व फोकस में आ गये.

आज जब एलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बॉलिवुडीकरण को हम देखते हैं तो लगता है वो सारा जुझारुडीपन झूठा था, मात्र एक कुशल अभिनय भर. कहीं कुछ भी तो नहीं बदला, हां! वो समाचार वाचन का अभिनय करनेवाले रातोंरात एलेक्ट्रानिक मीडिया के स्टार बन गये. एक चैनल से दूसरे चैनल के लिये बिकते ये चेहरे, किसी भी चैनल की व्यावसायिक सफलता की गारंटी बन गये. आज आलम ये है कि जुझारु पत्रकारिता मात्र एक कुशल अभिनय बन कर रह गयी है और व्यवसायिक तथा राजनैतिक स्वार्थो को साधने वाली खबरें टेलीविज़न स्टूडियों मे ही special Effects के साथ तैयार की जाने लगीं हैं..

पिछले दिनों अर्थशास्त्र का एक नया नियम पढने को मिला, SAY’S LAW :
जो कहता है कि Supply Creates its own Demand..यानि सप्लाई अपने द्वारा एक तरह की मांग तैयार करती है.
चौथे खम्भे मे भले ही दीमक लगी हो, पर आज इस दीमक के भी ख़ूब दाम मिल रहे हैं......Supply IS creating its own demand.
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...