सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

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Sunday, November 21, 2010

मीडिया की मौत पर शोक

कल की एक खबर के बाद मीडिया का मौन मौत के सन्नाटे से कम नहीं था. हमने भी इस मौत पर मातम का एलान कर दिया है.





(चित्र साभार: गूगल)

Saturday, May 29, 2010

बुद्धू बक्से का बुद्ध – “लोक-सभा चैनल”

                 
टीवी समाचार चैनलों को हम इस ब्लॉग पर हमेशा समाचार मनोरंजन चैनल नाम से ही सम्बोधित करते रहे हैं. लखनऊ ब्लॉगर्स एसोसिएशन के मित्रों ने तो अपनी एक पोस्ट ही “मीडिया की भड़वागिरी” नाम से छाप डाली.
बहरहाल, आज हमारे देश का टेलिविज़न मीडिया, साबुन-तेल-शैम्पू के विज्ञापनों के बीच, पागलों की तरह चीखता चिल्लाता एक ऐसा मूर्ख बन्दर है, जिसे किसी ने मदिरा पिला दी है और फिर उसे किसी बिच्छू ने काट खाया है. तत्पश्चात उसकी उछल कूद से प्रभावित होकर पीपल के पेड़ से उतर कर एक भूत इसके सर पर चढ़ बैठ गया है.

अपनी इस बात का जब हमने अपने एक संजीदा पत्रकार मित्र से ज़िक्र किया, तो उन्होने तपाक से अपनी टिप्पणी दे डाली, “सच! टेलिविज़न मीडिया एक मूर्ख बन्दर है, जो अपनी विश्वस्नीयता खो चुका है. इस मूर्ख बन्दर ने विज्ञापनों के अंगूरी पैसों से बनी मदिरा पी रखी है, “सर्वशक्तिमान होने के अहंकार” के बिच्छू ने इसे डँस लिया है और अब हालात इतने खतरनाक हो चुके हैं, कि “भ्रष्ट नेताओं तथा उद्योगपतियों” का भूत इसकी सवारी कर रहा है.”
पहले तो हम दोनों ख़ूब हँसे, फिर अपने इस मज़ाक का इतना यथार्तपरक चित्रण सुनकर हम सहम भी गये. पत्रकार मित्र ने हमारी स्थिति भाँपकर आगे कहा, “जानते हो इस बुद्धू बक्से में एक बुद्ध भी है ? कभी लोकसभा चैनल देखा है ? नहीं देखा है तो 1-2 हफ्ते देखो, फिर मेरी बात का मतलब समझ आयेगा.”

इस घटना को तकरीबन तीन माह से ज़्यादा हो चुके हैं और हाल ये है कि हम लोकसभा चैनल के मुरीद हो चुके हैं. लोकसभा चैनल एक ऐसा मंच है जहाँ भारत, इंडिया से बेझिझक होकर सवाल पूंछता है. न विज्ञापनों का झूठा तिलिस्म है, न समाचार से भी बड़े “एंकर जी”, न चीख-चिल्लाहट, न प्रायोजित मुर्गा-लड़ाई, न प्रलय की उद्घघोषणा, न बाबाओं का पर्दाफाश और न भविष्य बांचती कोई जादूगरनी.

लोक सभा चैनल एक आदर्श समाचार चैनल है. इसके कुछ प्रमुख कार्यक्रमों की एक झलक आपके लिएः

1. विचार मंथन: स्वामी अग्निवेश द्वारा प्रस्तुत यह कार्यक्रम, देश और समाज की वास्तविक एवं मूलभूत समस्याओं को संजीदगी से समझता और समझाता है.
2. आप की आवाज़: एक अनूठा कार्यक्रम, जिसमे एंकर दिखता ही नहीं है. माइक्रोफोन और कैमरे का काम आम जनता के बीच घूमते हुए, जनता से जुड़े विषयों पर, जनता की आवाज़ को रिकार्ड भर करना है.
3. बातों बातों में: मृणाल पाण्डे द्वारा प्रस्तुत इस कार्यक्रम में हर हफ्ते एक मशहूर हस्ती से मुलाकात करवायी जाती है. विदुषी मृणाल पाण्डे का शालीन अन्दाज़ आमंत्रित अतिथि को, कब स्टूडियो से आपकी बैठक में ले आता है पता ही नहीं चलता.
4. लोक मंच: सम-सामयिक विषयों के अलावा, संसद मे रखे गये महत्वपूर्ण बिलों पर बिना किसी चीख चिल्लाहट के गहन चर्चा- हिन्दी में और अंग्रेज़ी कार्यक्रम में भी.
5. ए पेज फ्रोम हिस्ट्री: यह एक गम्भीर कार्यक्रम है, जिसमें इतिहास का कोई एक पन्ना खोलकर, उस एतिहासिक घटना का, आमंत्रित बुद्धिजीवियों द्वारा आकलन प्रस्तुत किया जाता है.
6. एकला चलो: उन संसद सदस्यों से बातचीत, जो छोटी पार्टियों से आते हैं. उनकी राजनीति और विकास की अवधारणओं से रुबरु कराता, एक अच्छा कार्यक्रम. जिसका मूलमंत्र है “लोकतन्त्र बहुमत की तानाशाही नही है.”
7. साहित्य संसार: ज्ञानेन्द्र पाण्डे द्वारा साहित्यकारों से साक्षात्कार, पुस्तक मेलों तथा साहित्य-गोष्ठियों की रिपोर्ट, कवि-सम्मेलनों की झलकियाँ आदि. साहित्यिक गतिविधियों का ऐसा नियमित कार्यक्रम किसी चैनल पर देखा नहीं जा सकता.
8. अस्मिता: मूलत: स्त्रीयों के विषय उठाता यह कार्यक्रम इतने सहज फार्मेट में प्रस्तुत किया जाता है जैसे अपनी मित्र मंडली ही मिल बैठ कर बतिया रहें हों.
9. वीकेंड-क्लासिक: मिर्ज़ा ग़ालिब, पोथेर पांचाली, शतरंज के खिलाड़ी जैसी दुर्लभ फिल्में जब भी लोक सभा चैनल के इस कार्यक्रम पर देखने को मिलती हैं, हम अपने प्रियजनों को फोन खटका कर बताते रह्ते हैं.
और अंत में लोक सभा चैनल की The Hindu- Business line समाचार पत्र द्वारा की गई समीक्षाः

Guess which channel is slowly but surely going up the TRP ladder – our very own Lok Sabha TV (LSTV).
In Delhi, LSTV recently equalled the television ratings (TVR) of prominent news channels such as CNBC 18, Headlines Today and CNN-IBN, according to TAM India rating agency.
With a TRP of .01, LSTV's viewership was higher than several international channels such as BBC and CNN. Similar ratings were recorded in Mumbai, where LSTV matched popular news channel NDTV 24X7. Going by the ratings, people are warming up to LSTV, which is said to be the world's only channel to be owned and operated by a House of Parliament.
Publicity campaigns in 2009-10 fetched Rs.4.6 crore, whereas the total capital expenditure for the same period was a meagre Rs. 1.5 crore. It is currently run from the Parliament Library Building and boasts of a modern Production Control room with 10 robotic cameras.
But the channel is not all about the Lok Sabha sessions. It has an array of value-added programmes which are aired after the House sessions and when the Lok Sabha is not meeting. These programmes cover areas relating to democracy, governance, people's issues, gender discourse, constitutional aspects and economy.
Paranjoy Guha Thakurta said: “It is highly unfortunate that it has been without a Head since the past few months and that it could be due to plain bureaucratic lethargy.”
With the recent optimistic TVR levels, industry watchers feel that LSTV must aim to achieve higher figures and resolve the current bureaucratic issues plaguing the channel. While some analysts believe attractive feature stories on entertainment and sports can result in a huge boost in TRPs, others say the channel should continue to build on its USP of a serious news channel.

Saturday, April 24, 2010

SMS पोल की खोलो पोल


सन 1975 के पहले तो सब यही सोचते थे कि एक सिक्का हवा में उछाला जाए तो उसके ‘चित्’ या ‘पट’ आने की सम्भावना 50% है यानि आधी आधी. लेकिन 1975 की फिल्म शोले ने तो उस सम्भावना में भी नई सम्भावनाएँ जगा दीं, अगर सिक्का किनारे पर खड़ा हो जाए… फिर तो न ‘चित्’ न ‘पट’… और कहीं सिक्का दोनों तरफ से एक सा हुआ तो 100% सम्भावना है कि ‘पट’ ही आएगा.

इधर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस विज्ञान में महारत हासिल कर ली है. एक से बढकर एक आँकड़े और उनसे निकाले गए नतीजे इस तरह परोस रहे हैं जैसे फ़ायदा न हो तो पैसे वापिस. कौन सी पार्टी चुनाव में आगे रहेगी, कौन अपराधी है, किसे सज़ा मिलनी चाहिए, देश की नीति और दिशा कैसी होनी चहिए वगैरह वगैरह... लब्बो लुआब ये कि हर मर्ज़ का ईलाज है हक़ीम लुक़्मान के पास... और गोली सिर्फ एक … आँकड़े, यहाँ वहाँ से इकट्ठा किए हुए. इस थेरेपी का नाम दिया “ओपिनियन पोल” और चुनाव के संदर्भ में “एक्ज़िट पोल”.

इलेक़्ट्रोनिक मीडिया के इसी भ्रामक और निहित स्वार्थ द्वारा प्रायोजित “ओपिनियन पोल” के कारण पिछ्ले लोक-सभा चुनाव में चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान “एक्ज़िट पोल” या “ओपिनियन पोल” को प्रतिबन्धित कर दिया था. यह प्रतिबन्ध सिद्ध करता है कि इन हथकंडों के द्वारा इलेक्ट्रोनिक मीडिया लोगों के ओपिनियन को प्रभावित करने की स्थिती मे रह्ता है और यह बात भारत सरकार और चुनाव आयोग दोनों मानते है.

इसी ऋंखला में एक नई कड़ी है समाचर मनोरंजन चैनेलों द्वारा किए जाने वाले SMS पोल. देश दुनिया की ब‌ड़ी से बड़ी समस्या का कारण और निदान, आधे घण्टे के प्रोग्राम में नेता और जनताके सामने. दूसरे शब्दों में, ये समाचर मनोरंजन चैनेल सम-समायिक विषयों के कार्यक्रमों के दौरान SMS पोल कराते हैं. दर्शकों को बताया यह जाता है कि कार्यक्रम के दौरान इतने प्रतिशत SMS द्वारा जनता ने अपनी राय ज़ाहिर की. कार्यक्रमों के अंत में, इन SMS पोल मे हां या नहीं का प्रतिशत बता कर कार्यक्रम का एंकर, उस विषय पर देश की राय की घोषणा भी कर देता है.

जहाँ तक विश्वस्नीयता का सवाल है, इन चैनलों की तरह, इन SMS पोल की विश्वसनीयता भी खोखली है. NDTV के न्यूज़ पाइंट कार्यक्रम के एंकर अभिज्ञान प्रकाश तो कार्यक्रम शुरू होते ही हां या नहीं का प्रतिशत बताते है. यह प्रतिशत कार्यक्रम के दौरान आये SMS के साथ बदलते हुए, कार्यक्रम के अंत तक एकदम बदल जाता है.

अब अगर इस पूरी प्रक्रिया का सतही विश्लेषण करें तो यह पता चलता है कि कार्यक्रम की लोकप्रियता का आलम ये है कि कार्यक्रम के शुरू होने से पहले ही लोग, सिर्फ चैनल पर दिखाई जाने वाली स्क्रोल लाइन को पढकर ही, दनादन SMS दागने लगते हैं! और परिचर्चा में भाग लेने वाले महापुरुषों की अमृत वाणी से प्रभावित होकर कार्यक्रम के दौरान भी सिर्फ और सिर्फ SMS ही करते रहते हैं. और अंत में एंकर के प्रभावशाली व्यक्तित्व से, उसके देश के प्रति उत्तरदायित्व  बोध से, महापुरुषों के चिंता व्यक्त करने तथा उनकी समस्या के प्रति सोच से प्रभावित होकर देश के लोग अपना फैसला बता देते हैं, जो कभी कभी उनकी पूर्व धारणा या पूर्वाग्रह से अलग होता है. क्या बात है! वॉट ऐन आइडिया सर जी!!

क्या किसीने किसी एल्क्ट्रोनिक मीडिया पत्रकार से ये सवाल पूछने का साहस नहीं किया कि इस तरह के SMS पोल में ये क्यों नहीं बताया जाता कि:

क) कुल प्राप्त SMS की संख्या कितनी थी?
ख) एक मोबाइल नम्बर से एक से ज़्यादा प्राप्त हुए SMS मान्य होते हैं या नहीं? (यदि हां तो क्यों?)
ग) क़्या चैनल से जुड़े लोगों को इस SMS पोल मे भाग लेने से वंचित किया गया है या नहीं?
      (वे तो वैसे भी भाग नहीं लेते होंगे … क्यों पैसे बरबाद करें...उनको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त)
घ) देश के किन किन भागों से कितने SMS प्राप्त हुए?

मान लीजिये कि “मीडिया बकवास परोसता है?” इस विषय पर मात्र 5 SMS प्राप्त हुए जिसमे 3 ‘हां’ और 2 ‘नहीं’ हैं (जबकि 2 “नहीं” वाले SMS चैनेल ने स्वयं भेजे हैं) तो “मीडिया बकवास परोसता है” इस विषय पर देश की राय “हां” मे होगी - 60%. बस हो गया फ़ैसला, 5 लोगों ने 125 करोड़ लोगों की राय जता दी.

अब अगर हम कहें कि SMS पोल के परिणामों के साथ उन प्रश्नों के उत्तर भी दिए जाएँ जो हमने ऊपर पूछे हैं, तो SMS पोल की पोल खुल जायेगी! परंतु यह बताकर ख़ुद समाचार व्यापारी समाचार का धन्धा क्यों मन्दा करना चाहेगें ?

Saturday, April 10, 2010

किरन खेर : मुर्गा-लड़ाई मे घुसी शेरनी



अचानक इस विषय पर लिखना पड़ेगा, ऐसी हमारी तैयारी भी न थी और योजना भी नहीं. लेकिन एक घटना ने हमें विवश कर दिया लिखने पर. पिछली रात, पौने ग्यारह का समय था ! बुद्दू बक्से के रिमोट पर उंगली क़िकेट खेल रहा था कि अचानक NDTV 24 X 7 पर चल रही मुर्गा-लडाई दिखाई दी. आगे बढने को ही था कि खास मुर्गों पर नज़र पड़ी. स्टूडियो में थे कॉंग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी, भा.ज.पा. के रवि शंकर प्रसाद और मुम्बई से अप्रत्यक्ष रूप से इस मुर्ग़ा लड़ाई में शामिल थीं बॉलिवुड अभिनेत्री और भा.ज.पा. की नेत्री किरण खेर. दूसरी तरफ NDTV ने अपने प्रतिद्वंद्वी चैनेल से बिठा रखा था IBN7 के आशुतोष को.

किरण के बारूदी तेवर पहले देख चुका था और NDTV पर IBN-7 के आशुतोष को देखकर लगा कि बैकग्राउंड में “मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है” बज रहा होगा. बात चौंकने वाली थी. उस पर मुर्गा लडाई का शीर्षक था “ क्या मीडिया को सेलेब्रिटीज़ के व्यक्तिगत जीवन मे इस कदर दखल देना चाहिये जैसा शोएब–आयशा-सानिया विवाद मे हुआ?”

इतना आकर्षण बहुत था उंगलियों को रिमोट से हटाकर आराम देने के लिये और हमारी वैचारिक खुजली मिटाने के लिये. और इस मुर्ग़ा लड़ाई में तो पीछे बैठने वाला सयाना स्वयम चोंचबाज़ी करने आया था, तो सोचा कुछ देर यहीं ठहर कर तफरीह की जाये.

इस संक्षिप्त सी मुर्ग़ा लड़ाई की उससे भी संक्षिप्त सी झलकी प्रस्तुत है. भीड़ की प्रतिक्रिया कोष्ठक में दी गई हैः

निधि राज़दान : हमारे प्रतिद्वन्दी चैनल के आशुतोष जी आज के विषय पर पहला सवाल है कि क्या शोएब–आयशा-सानिया विवाद का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ज़रुरत से ज़्यादा एक्स्पोज़र किया है ?

(बहिन जी! ये 'जरुरत भर' भी आप ही बताती हैं और 'जरुरत से ज़्यादा भी'....पब्लिक तो बस साबुन-तैल-शैम्पू चुनने के लिये ऐसे वहियात कार्यक्रम देखती है)

आशुतोषः (अ....आ....के बीच, अपनी हिन्दी सोच को तुरंत-फुरंत अंग्रेज़ी के कपड़े पहिनाते हुए) देखिये! यह कहना गलत होगा कि इस विवाद को मीडिया ने जरुरत से ज़्यादा एक्स्पोज़र दिया है. अ....आ..... आखिर सेलेब्रिटीज़ को इसके लिये तैयार रहना ही चाहिये, सेलिब्रिटीज़ पब्लिक आइकोन हैं, तो मीडिया ये सब दिखायेगा ही...

निधि राज़दान:  हां, बिल्कुल ठीक, सेलेब्रिटीज़ मीडिया का इस्तेमाल करके पब्लिसिटी के द्वारा ही तो सेलिब्रिटीज़ बनते हैं.

(जैसे ये मीडिया पब्लिसिटी फ्री मे चैरिटी के नाम पर करता होगा, है न??? भैय्या हमको मालूम है जन्नत की हकीकत...लेकिन.....)

आशुतोष : अ....आ....प्रिंट मीडिया ने भी खूब छापा है इस विषय पर. दरअसल इलेक्ट्रानिक मीडिया एक अलग तरह का माध्यम है जो 24 घण्टे काम करता है. अ...आ...अभी हम भी, इसे पूरी तरह से समझ नहीं पाये हैं?

(हा.. हा.. हा....हमें पता है ! आप ही देर से समझे ,आशुतोष भाई. वास्तव में “ये बन्दर के हाथ उस्तरा लगने वाली कहानी है !!)

इसके साथ ही रविशंकर प्रसाद ने भी टी.आर.पी. की बात उछाली और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी क्लिष्ट सी विधि की भाषा में कुछ कहा, जिनका सारांश ये था कि मीडिया ये सारे एक्स्पोज़र सस्ती लोकप्रियता यानि टी.आर.पी. के लिए करता है.

(सत्य वचन महाराज. विरोधियों की सीडियाँ दिखवाकर आप भी तो अपनी टी.आर.पी. इनके माध्यम से ही बढवाते हैं और आज रत्नाकर से वाल्मीकि बने रामायण बाँच रहे हैं...धन्य प्रभु, वाह वाह!!)

आशुतोष : ऐसा आप नहीं कह सकते कि हम सिर्फ सेलेब्रिटी के एक्स्पोज़र ही दिखाते हैं. हमने तो महिला आरक्षण बिल पर भी सुबह 9 बजे से देर रात तक परिचर्चा दिखाई थी.

(लो कल्लो बात!! हम भी हफ्ता भर झूठ बोलने और रिश्वतखोरी करने के बाद मज़ार पर चादर और मंदिर में सवा किलो लद्दू चढा देते हैं. अब इसका ढिंढोरा क्या पीटना)

निधि राज़दान : किरण खेर जी आपका इस विषय़ पर क्या कहना है ?

किरण खेर : आज संस्क्रति Guilt और Shame को केन्द्र मे रखकर चल रही है. इंसान Guilt झेल लेता है क्योंकि वह उसके अंदर होता है. लेकिन Shame एक सामजिक पीड़ा है, जो अधिक कष्ट पहुँचाती है. अभी हाल ही में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्राध्यापक द्वारा की गई आत्महत्या इस बात का सबूत है. वह आदमी अपने guilt के साथ रह रहा था, लेकिन मीडिया ने एक्स्पोज़ करके उसे shame के दलदल में धकेल दिया. नतीजा आपके सामने है. वह अपराधी था या नहीं, ये बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन उसके अपराध की सज़ा कम से कम मौत तो नहीं ही हो सकती.
फिर ये कहना भी गलत होगा कि सेलेब्रिटीज़ बहुत ताकतवर हैं, जबकि इस देश मे “सरकार” और “मीडिया” ही सर्वशक्तिशाली हैं. मैं आप से पूछती हूँ कि क्या मीडिया पर्सनालिटीज़ सेलेब्रिटीज़ नहीं हैं? क्या निधि राज़दान, आशुतोष, बरख़ा दत्त, राजदीप सरदेसाई सेलेब्रिटीज़ नहीं हैं? फिर ऐसा क्यों है कि इन पर कोई एक्स्पोज़ करने के कार्यक्रम नहीं होते? इनकी लाइफ स्टाइल की चर्चा क्यों नहीं होती?

(हा...हा...हा... किरण जी आप ने कहाँ के सवाल पूछ लिये. मंदिर में बैठकर भगवान के अस्तित्व का प्रश्न उठा दिया आपने... जिन्होंने अपना सारा जीवन समाज की बुराइयाँ एक्स्पोज़ करने में लगा दिया हो, उनके चरित्र पर प्रश्न चिह्न लगाना आपको शोभा नहीं देता..)

मुर्गा लड़ाई में कोई मुर्गी इस तरह बेतकल्लुफ हो जायेगी, कतई अप्रत्याशित था! बहरहाल... मुर्गा-लडाई का यह खेल थोड़ी देर और चला...घर बुलाए मेहमान, आशुतोष, के घाव पर मरहम पट्टी की गई और बात सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर आ गई यानि कॉमर्शियल ब्रेक.

चंडीगढ की शेरनी ने जो सवाल सबके लिए छोड़ा शायद उसपर कभी चर्चा न हो. लेकिन मन में एक नई सोच लिए, मैंने रिमोट पर उंगली दबाई और IPL की अफीम चाटकर सोने के लिए हमने मोहाली के मैच का रुख किया. चड़ीगढ़ के पठ्ठे इधर भी फट्टे चक रहे थे.

Sunday, March 28, 2010

चौथे खम्बे में लगी दीमक – भाग 2.


बड़ी पुरानी बात है कि आप अगर एक उँगली किसी की तरफ उठाते हैं तो चार उँगलियाँ खुद ब खुद आपकी तरफ उठ जाती हैं. ये भी कहा जाता है कि कमरे के अंदर आराम कुर्सी पर बैठकर आप किसी पर दोषारोपण कर सकते हैं, लेकिन जब वास्तविकता से आपका सामना होता है तो सारे आदर्श धरे के धरे रह जाते हैं.

हमने भी ऐसा ही एक दोषारोपण किया था मीडिया पर, एलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर, प्रजातंत्र के चौथे खम्बे पर जिसमें लगी दीमक बुरी तरह फैलती जा रही है. और ये आरोप सिर्फ आराम कुर्सी पर बैठकर उठाई गई उँगलियाँ नहीं. प्रमाण पिछले सप्ताह के विभिन्न समाचार-मनोरंजन पर दिखाई गई रिपोर्ताज हैं. पेश है एक बानगी... चौथे खम्बे में लगी दीमक – भाग2.

26 मार्च 2010, NDTV इंडिया
रवीश की रिपोर्ट, “दिल्ली का लापतागंज – पहाड़गंज”
वाह! क्या रिपोर्ट थी. देखकर लगा कि एक बार फिर किसी पत्रकार ने किसी गरीब का मज़ाक उड़ाकर अपना उल्लू साधा है. ये रिपोर्ट दिल्ली के पहाड़गंज में रहने वाले लोगों की हक़ीक़त कम, मीडिया का दृष्टिकोण अधिक थी. जिस ठसक के साथ रवीश कुमार पहाड़गंज की बदहाली को आश्चर्य मिश्रित काव्यात्मक शैली मे प्रस्तुत कर रहे थे, वो किसी भी तरह राहुल गाँधी की अमेठी के गावों मे घूम घूम कर गरीबी को समझने के शो से कम नहीं थी.

टी.वी. पर लगातार “25 कमरों में 500 लोग” की कैच लाईन स्क्रोल हो रही थी, लेकिन सुखद लगा कि चीखती हुई ग़रीबी की याद दिलाते उस कैच लाइन के बावजूद भी उन लोगों ने अपनी गुरबत का रोना नहीं रोया. उलटे मुस्कुरा कर इनका स्वागत ही नहीं किया वरन कहा कि हमें कोई तकलीफ नही है.

25 मार्च 2010,
NT अवार्ड्स
IBN7 के कार्यक्रम “ज़िन्दगी लाईव” के उस एपीसोड को ईनाम मिला, जिसमें सन 84 के सिक्ख नरसंहार का विद्रूप चित्रण किया गया था. सिक्ख नरसंहार के आरोपी भले ही आज तक खुले घूम रहे हों, दंगो की त्रास्दी झेलते लोगों की आँखों के आँसू समाचार मनोरंजन फिल्मों को पुरुस्कार दिला रहे है. इस पुरस्कार की सार्थकता तब सिद्ध होती जब उस बिलखती औरत के आँसूओं को न्याय दिलाने में इन्होंने कोई योगदान दिया होता.

26 मार्च 2010, रात 11 बजे की स्टार न्यूज़
जया बच्चन की “इन्डियन महिला प्रेस कोर्प्स” मे हुई पत्रकार-वार्त्ता पर दिखाई गयी रिपोर्ट इस कदर घटिया दर्जे की थी कि मैं चैनल इसी कारण देखता रहा कि देखें पत्रकारिता और कितने निचले स्तर तक जा सकती है.

अपने ज़रूरत भर की भरपूर एडिटिंग के बाद जो कुछ भी दिखाया गया उसमें भी जया बच्चन सही लगीं (जबकि उनको बद्तमीज़ नम्बर वन बताया गया) और चैनल बदतमीज़, बेहूदा और वाहियात लगा. “पा” फिल्म के नायक का सम्वाद कि “हाथ में माइक्रोफोन और पीछे कैमरा लगा लेने से तुम सर्वशक्तिशाली नहीं हो जाते हो” दिमाग़ से गुज़र गया.

मेरे दिल ने कहा, “अपने सर्वशक्तिशाली टी.वी. पत्रकार होने के अहंकार के नशे को उतर जाने दो भाई!”
आखिर कब पूछोगे खुद से ये सवाल कि ऐसे बेवकूफी भरे सवाल कब तक पूछता रहूँगा?”

दैनिक जागरण, 27 मार्च 2010
श्री राजीव शुक्ला का लेख “बस नाम के लोहियावादी” पढ़कर लोहिया जी का कहा याद आ गया कि “क्या बात कही जा रही है, इससे ज़्यादा आवश्यक है कि बात कहने वाला कौन है? और उसका पिछला इतिहास क्या है?”

पत्रकारिता से अपना करियर शुरु कर, भारतीय राजनीति के सबसे मजबूत किले के सेवादार के ओहदे पर विराजमान, क़िकेट सरगना और समाचार मनोरंजन चैनल के मालिक द्वारा लोहिया जी को समाजवादी पार्टी ने याद नही किया इस पर विलाप गम्भीर कथ्य था या व्यंग्य? और वो भी लोहिया जी पर या स्वयं पर?

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प्रजातंत्र का ये चौथा खम्बा किसी टरमाइट प्रूफ लकड़ी का नहीं बना. अगर आपको किसी भी मीडिया में कोई भी ऐसी दीमक दिखाई दे, तो अवश्य लोगों को बतायें. आखिर कब तक गंदगी परोसकर वो हमारा स्वाद बिगाड़ते रहेंगे और हम उनको ऐसा करने देंगे.

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