सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

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सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Sunday, July 25, 2010

गुरू पूर्णिमा पर ओशो नमन !!


रजनीश या ओशो भारत के सर्वाधिक विवादास्पद नामों मे से एक है. परंतु किशोरावस्था से ही इस व्यक्ति से मैं कैसे जुड़ता चला गया, यह सोचकर आज भी अचम्भित हो जाता हूँ. सलिल भाई कि तरह मुझे बचपन में मंटों तो नहीं मिला पढ़ने को, परन्तु जब कभी किताब की दुकान से मैं रजनीश टाइम्स ले आता था पढ़ने के लिये तो घर में हंगामा हो जाता था.उस समय की रवायत के मुताबिक़ ही, मेरे घर में भी ओशो को एक ख़तरनाक एवम् भ्रष्ट सन्यासी के रूप में ही जाना जाता था. बस, जैसा स्वयम् ओशो कहते हैं कि “न या नकार” में बहुत ऊर्जा छिपी होती है और जिस चीज़ के लिए मना किया जाता है, उसके पीछे एक आकर्षण अपने आप चला आता है. शायद यही कारण रहा, मेरा ओशो को छुप छुप कर पढ़ने का.
स्कूल के बाद इंजीनियरिंग कालिज में प्रवेश मिल गया तो माशाअल्लाह!मानो जन्नत हाथ आ गयी!! दस हज़ार एकड़ में फैले, गोविन्द वल्लभ पंत कृषि एवम् प्राद्यौगिकी विश्वविधालय, पंतनगर, नैनीताल का माहौल ही कुछ ऐसा था... हरी भरी वसुन्धरा के बीच गुरुदेव रबींद्र नाथ ठाकुर के शांति निकेतन की तरह...

विश्वविधालय के बीचों बीच स्थित पुस्तकालय (इन्दिरालय नाम है इसका)...मेरे विचार से भारत के बेह्तरीन पुस्तकालयों मे से एक होगा और यहीं मेरा ओशो प्रेम परवान चढता गया.

ओशो के दृष्टिबोध को समझते समझाते जब जीवन के उतार चढाव से दो चार होना पड़ा तब कुछ कुछ समझा कि सुख और दुख से परे, आनन्द की भी एक स्थिति होती है, जहां उत्तेजना का उन्माद नहीं वरन् शुद्ध साक्षीत्व जैसी भी कोई स्थिति होती है. पढे लिखे लोगों की इस दुनिया में हम अपने तथाकथित ज्ञान के बोझ से ही दबे जा रहे हैं.... जबकि ओशो एक ऐसे मौन की तरफ इशारा करते है जो शब्दों के पार... शब्दातीत है, जहां से हम अस्तित्व से जुड़ते हैं...

ओशो कहते हैं...

मैं चाहता हूं तुम्हें निर्भार करना -
ऐसे निर्भार कि तुम पंख खोल कर
आकाश मे उड़ सको.
मैं तुम्हें हिन्दू,मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध
नहीं बनाना चाहता
मैं तुम्हे सारा आकाश देता हूं.

अक्सर ऐसा लगता है कि यह सारी आपाधापी दरअसल एस्केपिज़्म ही है...हम अपने आप से भाग रहें हैं...कभी निर्भार ही नहीं हो पाते हम...स्वयम् को किसी न किसी काम में इंगेज़ कर के ही मानते है हम...क्योंकि अकेलापन सालता है...

मै कौन हूँ? मै क्यों हूँ? यह सवाल कोंचता है भीतर तक...उत्तर माँगता है. फिर शायद इसी सवाल से बचने के लिये हम अपने सपने गढ़ते हैं और मैं फलाना....मै ढिमाका..का किस्सा आगे बढता जाता है.

ओशो कहते है कि “मेडिटेशन इज़ द ओनली मेडीसिन”. ध्यान का प्रारम्भ वस्तुत: बाहर की दौड़ से स्वयम् को भीतर खींच लेना है. ओशो मन के बारे में जो कह रहे हैं, उसका हम सभी को सीधा अनुभव है. मन या तो हमेशा आगे कूदता रह्ता है या पीछे घसीटता रह्ता है, लेकिन वह कभी वर्तमान क्षण में नहीं होता है. मन एक सतत बडबड़ाहट है, यही बडबड़ाहट हमें वर्तमान में होने और जीवन को उसकी पूर्णता में जीने से वंचित कर देती है. हम कैसे समग्रतापूर्वक जी सकते हैं जबकि हमारा मन स्वयम् के साथ ही बड़बड़ा रहा है.

एक छोटा सा प्रयोग करें दस मिनट के लिये आंखे बन्द करके बैठ जायें और अपने चारों ओर होने वाली आवाज़ों को सुनें, अपने शरीर के प्रति बोधपूर्ण होने की कोशिश करें. हम पायेंगे कि एक मिनट के अन्दर ही, मन फिर से बातें करना शुरु कर देता है. आख़िर भीतर चल क्या रहा है हमारे? किसी और को यदि हम ये बातें करते सुनें, तो निश्चित ही उसे विक्षिप्त करार देगें. ओशो बार-बार यही कहते हैं कि ध्यान में डूबो. इस बडबड़ाते मन को सीधे बन्द नहीं किया जा सकता लेकिन ध्यान के द्वारा मन का शोरगुल कुछ धीमा हो जाता है और फिर अंतत: मन विलीन हो जाता है. तब जीवन मे अमन उतरता है.ओशो समझाते हैं,साक्षी का सीधा सरल अर्थ होता है “आग्रह्शून्य तटस्थ अवलोकन : यही है ध्यान का पूरा रहस्य”

वह गुरु पूर्णिमा, मेरे जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिन था, जब तीन दिन ध्यान ऊर्जा में नहाने के बाद मन का अहंकार समर्पण को तैयार हुआ और ओशो परम्परा में अपना यह नाम स्वामी चैतन्य आलोक मुझे मिला. ओशो का नव-सन्यास कई मायनो में अनूठा है, जहाँ आप स्वयम् के लिये अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करते हैं और साधक बनकर जीवन जीना शुरु करते हैं.
ओशो कहते हैं:

                  मैं गुरु इस मायने में ही हूं
                  कि मेरी साक्षी में तुमने
                  स्वयम् को जानने की
                  यात्रा आरम्भ की है,
                  इससे आगे मुझसे उम्मीद मत रखना.

(ओशो के हस्ताक्षर)


उफ!! कितनी गहरी स्वत्रंता है यह!
और कितना गहरा उत्तरदायित्व भी!

अहोभाव प्यारे ओशो !!

19 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

आई आई टी कानपुर के पुस्तकालयों में ज्ञान को खोज में रजनीश की पुस्तकें मिलीं। पढ़ता गया और एक दिन पाया कि सारी पढ़ गया। विचारजगत इतना विस्तृत है जिसमें सभी समा जायें। गूढ़ गहनों की यात्रा इतनी सुगम बना दी है अपनी पुस्तकों से कि वापस आना के बाद बड़ा हल्का सा लगता था।
विवाद पर कुछ नहीं कहूँगा, मैं तो बस अभिभूत हूँ, जो पढ़ा।

Manoj Bharti said...

ओशो मानव की गहन अनुभूतियों का दूसरा नाम है । गुरु पूर्णिमा पर उन्हें स्मरण करने और उन्हें नमन करने का यह ढ़ग पसंद आया ।

महेन्द्र मिश्र said...

गुरु पर्व पर अनेकों शुभकामनाये....

soni garg said...

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाये !

कविता रावत said...

गुरु की महिमा भले ही स्कूल के समय पढ़ी थी लेकिन समय के साथ आज उसकी सार्थकता समझ में आती है . दो पक्तियों .....
"सतगुरु के महिमा अनंत, अनंत कियो उपकार
लोचन अनंत उघाड़ियाँ, अनंत दिखवान हार."
इन्ही शब्दों से गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ

दिगम्बर नासवा said...

मैं गुरु इस मायने में ही हूं
कि मेरी साक्षी में तुमने
स्वयम् को जानने की
यात्रा आरम्भ की है,
इससे आगे मुझसे उम्मीद मत रखना..

ओशो की बात ही निराली है ... उनकी व्याख्या गुरु पूजा के कुछ नये आयाम खोलती है ...
गुरु को समर्पित आपकी पोस्ट सच में कमाल है ....
गुरु पर्व की बहुत बहुत बधाई ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी जानकारी.....ओशो को समझना हर किसी के वश में नहीं ...गुरुपूर्णिमा की बधाई

boletobindas said...

ओशो की खासियत यही है कि वो अपने को आप पर लादते नहीं। अपने साथ रहने को कहते नहीं। अपने को द्वार से ज्यादा महत्व देते नहीं। कहते हैं द्वार पर रुका नहीं जाता उसे पार किया जाता है। मुझ पर रुको मत मुझसे आगे जाओ। यहीं तो मैं उनको पंसद करता हूं। जीवन का पूर्ण आनंद लेने को कहते हैं ओशो। उनमुक्त होना सचमुच में कितना आसान है. पर मुश्किल भी कम नहीं। हम अपने ही बंधन में इतने बंध जाते हैं कि उसे तोड़ नहीं पाते। जब जब बंधन को तोड़ा अंनत आकाश पाया मैने। पर जब जब बंधन में बांधा तो उसे तोड़ पाना मेरे लिए मुश्किल हुआ। लगता है फिर बंधन को तोड़ दूं। आसान है पर कहीं बंधन में न बंध जाउं जिसमें बंधना नहीं चाहता।

मनोज कुमार said...

गुरु को समर्पित आपकी पोस्ट सच में कमाल है! .
इस पावन पर्व की बहुत बहुत बधाई!!

Udan Tashtari said...

जय ओशो..बेहतरीन पोस्ट!

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाये !

Apanatva said...

bahut acchee post..........
unhe samjh pana har ek ke bs kee baat nahee..........
Jeevanchkr par jo comment chodra hai 3 aur 4 pankti se aapatee hai............
ye kaam maine jindagee me kiya nahee aur kalpanaa se bhee pare hai.............

अरुणेश मिश्र said...

गुरु को प्रणाम . जो है उन्ही का दिया है ।

Apanatva said...

maine movie nahee dekhee iseese ye blunder huee....kshamaprarthee hoo.................
chetan bhagat kee book ko le itna hangama huaa tha ki mera mood hee nahee huaa movie dekhane kaa..........sacchaaee to ye hai ki kafee awards bhee gaye hai isekee jholee me par mujhe laga ki chetan ke sath insaaf nahee huaa...........film nahee dekhana mera pratirodh tha..........
ek var fir se mafee mang rahee hoo...........
please.....

Arvind Mishra said...

रजनीश का मूल्यांकन सदियाँ करेगीं -ऐसा वेल रेड ,चिंतनशील समान वयी व्यक्ति शायद ही कोई हुआ हो -उनकी तार्किक खंडनात्मकता तो अद्भुत थी -वे भारत भूमि से बहिष्कृत केवल इसलिए हो गए कि परवर्ती बौद्ध मठों की तरह उन्होंने भी यौन साधनाएं शुरू करकरा दीं -यह सनातंनवादियों का देश है -यहाँ पञ्च मकार वर्जित है ....आप कितनी भी वाजिब बात करें मगर अगर पञ्च मकारों की वकालत की तो फिर त्याज्य हुए -ब्लॉग जगत में मैं खुद यही संघर्ष झेल रहा हूँ -रजनीश मेरे भी गुरु रहें हैं मैंने भी उनकी प्रवचन किताबें चाटी हैं और अपूर्व रसानुभूति प्राप्त की है -सम्भोग से समाधि तक तो उनकी मैग्नम ओपस है ..गुरुपूर्णिमा पर इस विराट बौद्धिक मेधा को मेरा भी तनिक विलम्बित नमन ! और आपका आभार !

रचना दीक्षित said...

माशाअल्लाह!मानो जन्नत हाथ आ गयी!! दस हज़ार एकड़ में फैले, गोविन्द वल्लभ पंत कृषि एवम् प्राद्यौगिकी विश्वविधालय, पंतनगर, नैनीताल का माहौल ही कुछ ऐसा था... हरी भरी वसुन्धरा के बीच गुरुदेव रबींद्र नाथ ठाकुर के शांति निकेतन की तरह... [Image]
विश्वविधालय के बीचों बीच स्थित पुस्तकालय (इन्दिरालय नाम है इसका)..

ओह!!!!!!! क्या कुछ याद दिला दिया वो सरोजिनी हॉस्टल, लतिका वार्डेन हालाँकि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा टीचिंग में जो थी. डाक्टर आर सी पन्त दाढ़ी वाले.कल ही फोन पर गप्पें मारी थीं उनसे. धन्यवाद सब कुछ याद दिलाने के लिए

सम्वेदना के स्वर said...

@रचना दीक्षित
सचमुच पंतनगर जो भी गया है, उम्र भर की यादें लेकर ही लौटा है. आप वहाँ पढ़े हों या पढ़ाया हो..पीले अमलतास और सुर्ख गुलमोहर का लम्बी कतारों ने बिना किसी भेद-भाव के सबका स्वागत प्रेम से ही किया है. लम्बी कतारों में, सीधे खड़े अशोक के वृक्षों ने बिना झुके अपनी ही तरह की सलामी दी है....हरे रंग के जितने शेडस मैने वँहा देखे.. इन कंक्रीट के जंगलों में फिर नहीं मिले.....

गांधी हाल के फिल्म शो हों, दीपक रेस्त्रा की धमा-चौकडी, बड़ी मार्केट की शाम हो, "ढाई नम्बर" होस्टल (सरोजनी भवन, जिसे यह नाम हम पाँच नम्बर होस्टल यानि चितरंजन भवन वालों ने दिया था, हा.हा.हा ) से नगला तक बिना बात देर तक टहलना....अपने बाबा सह्गल को छोड़कर..अली हैदर के शब्दो मे कहें तो.....यादें! बस यादें रह जाती हैं...

इस बहाने पंतनगर को याद करना बहुत अच्छा लगा. आभार!

सतीश सक्सेना said...

आपके ध्यान प्रयोग के बारे में अधिक जानना चाहता हूँ, हो सके तो आचार्य रजनीश के बारे में और लिखें ...
अफ़सोस है कि इस पोस्ट को पहले नहीं पढ़ पाया ...

सम्वेदना के स्वर said...

@ सतीश सर!
ओशो के बारे में और ध्यान प्रयोगों के बारे में बातें होती रहेंगीं.

ओशो कहते हैं सभी ध्यान प्रयोग ट्रिक्स हैं मन के पार जाने की, "कुछ न करना" ध्यान है, इस कारण ज़ब ध्यान में कुछ करने का बोध छूटता है, तब वास्ताविक ध्यान घटित होता है.

Namaskar Meditation said...

ओशो की वाणी ने ऐसा गज़ब ढाया |
खुल गए सूत्र ढह गयी माया ||
द्वार खुला अनंत का बदल गयी काया |
ओशो की वाणी ने ऐसा गज़ब ढाया ||

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