सम्वेदना के स्वर

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Wednesday, October 6, 2010

पायाति चरक – एक (अ) साधारण व्यक्तित्त्व

एक बहुत बड़ी ख़राबी है मुझमें कि सस्पेंस बिल्कुल बर्दाश्त ही नहीं होता. जासूसी उपन्यास भी मैं पहले पिछले पन्नों से शुरू करके सस्पेंस पढने के बाद ही शुरू करता था. या फिर बीच में जब सस्पेंस बढ जाए तो पिछले पन्नों पर जाकर इत्मिनान कर लिया और तब बिना नर्वसनेस के आराम से किताब पढी.

इतनी भूमिका सिर्फ इसलिए कि चैतन्य जी ने पायति बाबू का ऐसा समाँ बाँधा कि बिना उनसे मिले मुझे चैन नहीं पड़ने वाला था. और फोन पर उनका पायाति पुराण सुन सुनकर अपनी तो बस दिल की धड़कन थामे नहीं थम रही थी. लिहाजा हमने रुख़ किया चंडीगढ‌ की ओर.
ज़िरकपुर का मकान नम्बर 151 ए, दरवाज़े पर साधारण सी नेम प्लेट “पायाति चरक”, अहाते में खड़ा पुराना बजाज स्कूटर और पास ही चमचमाती काली पल्सर, सामने बरामदे में पड़े बेंत के सोफ़े और उनपर पड़ा कुशन जिसपर हाथों का बना कवर डला था, दरवाज़े के ठीक ऊपर राजा रवि वर्मा की फ्रेम की हुई पेंटिंग. बेल बजाया तो दरवाज़ा एक प्रौढ महिला ने खोला. और पूछा, “जी!”

“मैं पहले भी आया था पयाति सर से मिलने.” चैतन्य जी ने बताया और उन्होंने पहचान भी लिया. “ये मेरे मित्र हैं, दिल्ली से आए हैं, सर से मिलने.”

“आप लोग अंदर तो आइए. अभी आपको कुछ देर बैठना होगा. यह समय उनके ध्यान का है.”

“कितनी देर पूजा करते हैं वो?”

“पूजा नहीं करते. अच्छा हुआ आपने उनके सामने नहीं कहा. वे बस ध्यान करते हैं. कहते हैं इससे एकाग्रता पैदा होती है और एकाग्रता से मन नियंत्रण में रहता है.”

अब तक हमलोग बैठ चुके थे. कमरे में सजी हुई आलमारियाँ किताबों से भरी हुई, घुसते हुए देख लिया था मैंने कि वे किताबें अलग अलग विषयों की थी, दीवारों पर राजा रवि वर्मा की अन्य पेंटिंग्स, एक कोने में सितार, सामने शो केस में म्युज़िक सिस्टम और करीने से सजी कई सीडी, आश्चर्य इस बात का था कि इनके कमरे में इनकी कोई भी तस्वीर नहीं थी, न व्यक्तिगत जीवन की न सामाजिक और न व्यावसायिक जीवन की.

“अच्छा मैम! मैं पहले भी मिला हूँ सर से, लेकिन कभी पूछने का साहस नहीं हुआ. अगर आप को बुरा न लगे तो पूछूँ कि सर करते क्या थे या करते क्या हैं?” चैतन्य जी ने साहस करके उनकी पत्नी से पूछा (उन्होंने मुझे धीरे से बता दिया था कि ये स्त्री पीसी बाबू की पत्नी हैं).

“इसमें बुरा लगने की कोई बात ही नहीं है. ये सिविल सर्विसेज़ में चुने जने के बाद, भारतीय प्रशासनिक सेवा के दौरान कई जगहों पर काम करते रहे. हमारा विवाह नौकरी में इनके आते ही हो गया था. और विश्वास नहीं होगा आपलोगों को कि उन्होंने ख़ुद यह शर्त रखी थी कि लड़की को एक जोड़ी कपड़े में विदा कर दीजिए. बस तबसे इनके साथ, इनकी अनुगामिनी हूँ.” कहकर वो मुस्कुराने लगीं. उनकी आँखों में एक असीम श्रद्धा का भाव साफ झलकता था.

“तो फिर वो रिटायर कब हुए और यहाँ कैसे आए?”

“रिटायर कहाँ हुए वो!” इतना कहते हुए वो शून्य में ताकने लगीं, जैसे बीते हुए समय को पकड़ने की कोशिश कर रही हों. हमने टोकना उचित नहीं समझा.

वो ख़ुद ही बोल पड़ीं, “ कई जगहों पर काम किया. मगर जहाँ भी काम किया ईमानदारी से, ख़ुद को बिना बॉस समझे और अपने साथ काम करने वाले लोगों को खुश रखकर. फिर भी इनको खुशी नहीं मिली काम में. हमेशा कहते थे कि इस तंत्र को जितना समझता हूँ, उतनी ही मुझे इससे चिढ़ होती जाती है और यह सोचकर ख़ुद से नफरत होती है कि मैं भी इसी तंत्र का हिस्सा हूँ. मैं पढ़ना चाहता हूँ, पढाना चाहता हूँ, एक साधारण आदमी की तरह जीना चाहता हूँ, मुझे पसंद नहीं कि मेरी गाड़ी का दरवाज़ा कोई बढकर खोले, जो मैं ख़ुद भी कर सकता हूँ, मुझे बिलकुल नहीं पसंद कि अंगरेज़ों के ज़माने की तरह कोई मेरे सिर पर रस्सी खींचता पंखा झलता बैठा रहे. और ऐसे ही अचानक ये एक दिन शाम को लौटे और मुझसे बोले कि आज कहीं घूमने चलते हैं. मेरे पूछने पर कि क्या बात है, कहने लगे आज स्वतंत्रता दिवस है. मैंने कहा पागल हैं आप, जून में स्वतंत्रता दिवस. तो ये बोले, मैंने इस्तीफा दे दिया है, अब मैं आज़ाद हूँ.”

“फिर इतना लम्बा समय… मेरा मतलब क्या करते रहे इतने दिन?”

“इन्होंने कहा कि मैं ऐसी जगह रहना चाहता हूँ, जो हिमाचल के हमारे पुश्तैनी गाँव के भी करीब हो और शहर भी न हो. जहाँ ये अपनी किताबों के बीच रह सकें. आयुर्वेद, जैविक खेती, मनोविज्ञान, समाज शास्त्र और न जाने कहाँ कहाँ के रिसर्च पेपर पढते रहे. मुझे तो ऐसा लगने लगा था कि एक साथ दो दो छात्र रह रहे हैं हमारे घर में. पिता और पुत्र.”

“एक और बात मैम! अगर न चाहें तो मत कहें...”

“अरे भाई, ऐसा कुछ भी नहीं है जो छिपाने जैसा या पर्सनल सा है. आप पूछिए.”

“मैम, यह नाम कुछ विचित्र सा है. हिमाचल में भी ऐसे नाम नहीं होते.”

वो मुस्कुराने लगीं. “मैं यही सोच रही थी कि कोई भी सबसे पहले यही पूछता है और आपने अभी तक नहीं पूछा. वास्तव में जब ये पैदा हुए थे तो कोई बौद्ध भिक्षु इनके घर आया और इनको देखते ही इनके पिता जी से कहने लगा कि इसका नाम पायाति होना चाहिए. और इससे अधिक मत पूछो मुझसे कुछ. बस यह नाम रख दिया माता पिता ने. बाद में जाति विरोधी होने के कारण इन्होंने जाति सूचक नाम हटा दिया और आयुर्वेद से जनता की सेवा करने का व्रत लेने के कारण इन्होंने नाम के साथ चरक लगा लिया.”

“अगर इण्टरव्यू समाप्त हो गया हो तो मैं भी बैठ लूँ आपके बीच.” कहते हुए पायति चरक जी कमरे में दाख़िल हुए और हमारे साथ बैठ गए. मुझे देखकर उन्होंने परिचय भी नहीं पूछा, पहचान गए कि चैतन्य जी के साथ मैं ही हो सकता हूँ.

उसके बाद बहुत सी बातें हुईं. कई विषय पर बातें सुनीं उनकी. इतने सुलझे हुए विचार कि किसी को आसानी से समझ में आ जाएँ. अगर सारी बातें लिखने बैठूँ तो न जाने कितनी पोस्ट लिखनी पड़े. मगर कुछ ख़ास बातें तो ज़रूर शेयर करेंगे हम सभी पढने वालों से.

इतने गहरे विचार, अध्ययन और ज्ञान से भरे होने पर भी वो इतने साधारण से आदमी होंगे, कोई सोच भी नहीं सकता. उनके व्यक्तित्व में ऐसा कुछ भी न था जिसे आकर्षक कहा जा सके, लेकिन आवाज़ ऐसी थी कि बाँध लेती थी. कुछ था जो मुझे अंदर तक झकझोर गया. सम्मोहित करने वाली आवाज़. इतनी सहजता व्यवहार में और आत्मीयता कि लगा ही नहीं कि वो मुझसे पहली बार मिल रहे थे.
(अगली पोस्ट में “पी सी बाबू का गणितीय सूत्र यानि अर्थशास्त्र का समाजशास्त्र”)

पी सी बाबू पर कुछ पिछली पोस्ट :

15 comments:

shikha varshney said...

बहुत ही अच्छा लग रहा है पी सी बाबू के बारे में जानना ..अगली कड़ी का इंतज़ार है .

Apanatva said...

Payti charak jee ke bare me pad kar accha laga.
Aabhar.
Tuktuk ko janm din kee bahut bahut badhai .

Many many happy returns of the day.

ha aur aasheesh bhee .

मो सम कौन ? said...

बहुत प्रभावित कर रहे हैं डा. चरक।
चैतन्य जी को हमारी तरफ़ से धन्यवाद कि ऐसे वयक्तित्व से परिचित करवाया।

मनोज भारती said...

पायाति चरक जी तो हमें मोहित किए जा रहें हैं ...इनके बारे में ओर भी जानने की उत्सुकता बढ़ गई है ।

ZEAL said...

.

फल आने पर डालियाँ विनम्रता से झुक जाती हैं। चरक जी और उनकी पत्नी सादगी और विनम्रता की मूर्ति से लगते हैं ।

.

DEEPAK BABA said...

पता नहीं,
पर लगता है,
यहीं - कहीं,
मेरा भी भविष्य है.........
जो मैं सोचता हूँ.........


यहीं कहीं........



आभार और साधुवाद............ ऐसी पोस्ट के लिए... भाई, ऐसे ही व्यक्तित्व से मिलते रहिये.....

kshama said...

Aap likhte itna badhiyaa hain,ki chalat chitr kee bhaanti aankhon ke aage se tasveeren banteen chalee jaatee hain! Yahan tak ki aawaaz bhi sunayi deti hai!Ek hee saans me padh gayi sara ...aur adhik jaan leneki jigyasa liye hue hun.

सतीश सक्सेना said...

अच्छा लगा इनके बारे में जानकार ! शुभकामनायें

प्रवीण पाण्डेय said...

सहज व्यक्तित्व के बारे में जानकर अच्छा लगा।

Sonal Rastogi said...

humara man bhi milne kaa hone laga

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

wah ab bhi hain aise log ....adbhut.... :) padhunga inke bare me sab kuch ... :)

ali said...

आगे की कड़ी लिखिये फिर एक साथ कमेन्ट करते हैं !

Arvind Mishra said...

पी सी बाबू कोई अप्रतिम चरित्र लगते हैं ....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अच्छा लग रहा है ये सब जानना।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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