सम्वेदना के स्वर

यह ब्लॉग उस सनातन उत्सवधर्मिता को जीवित रखने का प्रयास है,

जिसमें भाव रस और ताल का प्रतीक आम आदमी का भा-- बसता है.
सम्वेदनाएँ...जो कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, राजनीति आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं, आम आदमी के मन, जीवन और सरोकार से होकर गुज़रती हैं तथा तलाशती हैं उस भारत को, जो निरंतर लड़ रहा है अपने अस्तित्व की लड़ाई.....

Saturday, April 23, 2011

अली बाबा और 40 चोर

अन्धेर नगरी में इन दिनों एक अनजान सा बूढ़ा साधू न जाने कहाँ से आ गया है. उसके हाथों में एक अजीब सी चीज़ है. जनता से वह कहता फिर रहा है कि यह दीया है. चौपट राजा ने अग्नि को बंदी बना रखा है. एक बार यह दीया उस अग्नि से छू भर जाये तो वह जल उठेगा. फिर उस एक दीये के प्रताप से अन्धेर नगरी में हजारों लाखों दीये जल जायेंगे. हर ओर प्रकाश ही प्रकाश होगा। अन्धेर नगरी की जनता, जिसने बरसों से प्रकाश का अनुभव नहीं किया था, बूढ़े और उसके दीये के इस दावे को सच माने, दीवानी हुयी जाती थी। वे बुजुर्ग, जिन्होने अपने पूर्वजों से रोशनी की दंत कथायें भर सुनीं थीं, वे भी बड़ी आशा से उस बूढ़े को टकटकी लगाये देख रहे थे.

दूसरी ओर अन्धेर नगरी का सबसे बड़ा और अन्धा सच यह है कि चौपट राजा सिर्फ नाम का राजा है। दशकों पहले मरजीना ने बड़ी चालाकी से अली-बाबा और 40 चोरों के साथ सांठगांठ करके, अन्धेर नगरी को अपने कब्जे में ले लिया था. अन्धेरे में जीने की आदी जनता को कुछ दिखाई तो देता नहीं था, बस जो सुनती, उसी पर विश्वास कर लेती। जनता का सच तो यही था कि उसे यदा कदा चौपट राजा और उसके दरबारियों की आवाज़ें ही सुनायी पड़ती थी और वह उसे ही अपना सच मानती। इधर बूढ़े और उसके दीये के स्वप्न को लेकर अन्धेर नगरी के राज दरबार में अचानक डर का माहौल बनने लगा. अन्धेर नगरी में सब तरफ अफवाहों का बाज़ार गर्म हो चला है। खासकर 40 चोरों का गिरोह बहुत भयभीत है, क्योंकि उसे अन्देशा है कि यदि रोशनी आ गयी तो उनका असली चेहरा सबको दिखाई दे जाएगा. वो सब पहचाने जायेंगे। चोरी का धन्धा ही बन्द हो जायेगा।

अली-बाबा और उसके साथी 40 चोरों की बातचीत :-

चोर-१: छीन लो इस बूढ़े का दीया।

चोर-२: अब इस काम के लिये बहुत देर हो चुकी है। बूढ़े के साथियों ने दीये को चारों ओर से घेर कर इंसानी दीवार बना दी है।

चोर-३: तो फिर चौपट राजा का फरमान लेकर आओ. इस बूढ़े और इसके साथ खड़े लोगों को तुरंत काल कोठरी में डाल दो।

चोर-४: नहीं, अभी तो चौपट राजा खुद ही बहुत डरा हुआ है इस पागल जनता से। पता नहीं क्यों अन्धेर नगरी की जनता बूढ़े के दीये को रोशन करने को पगलाई जा रही है।

चोर-५: तो कोई मरजीना को बोलकर इस चौपट राजा से जबरदस्ती फरमान ले लो। और इस बूढ़े और इसके साथ खड़े लोगों को काल कोठरी में डाल दो।

चोर-६: जनता का गुस्सा देखकर मरजीना आगे नहीं आ रही है. ऐसा सुनने मे आया है कि बहुत हुआ तो वह चौपट राजा की बलि देकर जनता से खुद को बचा लेगी।

चोर-७: तो हमारा क्या होगा? क्या हमारी भी बलि चढ़ सकती है।

चोर-८: ये साला बूढ़ा! दीया जलायेगा कैसे? हम इसे अग्नि देंगे तब न?

चोर-९: अबे! इन #@# ने हाथों में पत्थर उठाये हुए है. संयोग से कहीं रगड़ खाकर इनसे चिंगारी निकली तो इनको अग्नि का सारा खेल समझ आ जायेगा और ये हमारी अग्नि के बिना ही दीया जलाने में सफल हो जायेंगे।

दस नम्बरी: मैं अपनी वकील बुद्धि से जनता को समझाने की कोशिश करता हूं कि यह “ज़ीरो प्रकाश शक्ति का दीया” है, इससे रोशनी कभी हो ही नहीं पाएगी।

चोर-११: मैंने अपने ब्लैकमेलिंग के धन्धे में बहुत फोन टैप किये हैं। फोन रिकार्डिंग बता रही है कि जनता रोशनी के ख्याब सजाये बैठी है। फिलहाल उसे समझाकर घर बैठाना बहुत मुश्किल होगा।

चोर-१२: रोशनी आ गयी तो क्या होगा? साला आदमी मालामाल हो जायेगा क्या?

चोर-१३: मरजीना बड़ी तैराक है, लूट का माल लेकर सात समन्दर पार निकल जायेगी।

चोर-१४: फिर हमारा क्या होगा!! हमारी भैंस तो गयी पानी में!!!

चोर-१५: नहीं, कोई ऐसी तरकीब निकालो कि चौपट राजा के दरबार में जब यह बूढ़ा दीया लेकर पहुंचे, तो इसका दीया ही बदल दिया जाये । इसे ऐसा पानी भरा दीया थमा दिया जाये जो कभी जल ही न सके।

चोर-१६(चोर-१७ से): भईय्या! पिता जी से तुमने चोरी चकारी की उच्च शिक्षा प्राप्त की है, कुछ चलाओ अपनी कुटिल बुद्धि का जादू। कोई बिच्छू छोड़ो इस माहौल में।

चोर-१७: नोटों की बारिश कराकर मैं जनता को कुछ देर के लिये तो दूर रख सकता हूं। पर मेरी दुकान का नुकसान हुआ तो याद रखना, जब मैं अपने सगे भाई को नहीं छोड़ सकता, तो यह चौपट राजा और मरजीना क्या चीज़ हैं।

चोर-१८: हूड़ी बाबा! मेरा ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया है। अन्धेर नगरी में रोशनी आ जायेगी तो हम जैसे उल्लू जो सबसे चतुर दरबारी बने बैठे हैं, वो तो उल्लू के पट्ठे साबित हो जायेंगे।

चोर-१९: अन्धेर नगरी की वैल्थ हम चोरों की कामनवैल्थ है।

चोर-२०: पिछली लूट में मेरा हिस्सा पूरा नहीं मिला था, उल्टा मरजीना मेरे खिलाफ हो गयी। मै मदद तभी करूंगा जब मेरी लूट का माल वापस मिलेगा।

चोर-२१: कोई इस अहमक बूढ़े को बताये कि “माना कि पैसा खुदा नहीं पर ये खुदा से कम भी नहीं.”

चोर-२२: रोशनी आ भी गयी तो भी मैं अपना काला चश्मा कभी नहीं उतारुंगा। चोरी और लूट हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और काला चश्मा हम चोरों का प्रतीक.

चोर-२३: चोरी और लूट को इंडस्ट्री का दर्जा हमने दिलाया है, अन्धेर नगरी में चोरी और लूट की शिक्षा के स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों मे धड़ाधड़ रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं।

चोर-२४: अन्धेर नगरी को रोशनी के प्रकोप से हर हाल में बचाया जायेगा।

चोर-२५: मै अपने चैनल पर कुछ सीडी चलाकर इस बूढ़े के खिलाफ माहौल बनाता हूं।

चोर-२६: मै भी अपने चैनल पर कुछ ऐसा ही चक्कर चलाता हूं।

चोर-२७: हम चोरों में एका रहना बहुत जरूरी है, मै अपनी जीरा भांडीया एडं पार्टी को काम पर लगाता हूं।

चोर-२८: अगर ये चौपट राजा इस हंगामे की बलि चढ़ गया तो तुम सब तब मुझे अगला चौपट राजा चुनना।

चोर-२९: चुनाव तो लूट का उत्सव है वह तो चलता रहना ही चाहिये, धन्धे को कोई नुकसान हम न होने देंगें। चोर-३०:अए मुझे औरत जानकर ये मत समझ लेना कि लूट का सब माल तुम्हारा है?

चोर-३१: नहीं बहनजी! चोर-चोर मौसेरे भाई तो पुरानी बात हो गई, नया सुर है चोर-चोर मौसेरे भाई बहन।

चोर-३२: अईय्यो!! एक मोटी बहन इधर भी है।

चोर-३३: वो सब बाद में, पहले ये तो पता करो कि इस दीये का पापा कौन है।

चोर-३४: जहाँ तक इस चौपट राजा का सवाल है इसने तो पूरी ईमानदारी से अपना काम किया है और यही कारण है कि लूट के माल के बंटवारे को लेकर हम लोगों में कभी कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ है।

चोर-३५: हमें जनता को बताना है कि ये मरजीना हमेशा आप लोगों के लिये त्याग करती रही है। आगे भी ऐसा ही होगा, हम लोग और त्याग करेंगे।

चोर-३६: इस येदु-हडप्पा का तो यही कहना है कि कुछ समय के लिये हमें अपने बच्चों को अपने से अलग कर देना चाहिये इससे जनता कुछ शांत हो जायेगी।

चोर-३७: माना कि हम बहुत बड़े चोर हैं, पर छोटे छोटे चोर तो साले सब हैं इस अन्धेरे नगरी में। आने दो रोशनी को.

चोर-३८: अब सिर्फ चोर नहीं हैं हम, लूटेरे हैं। लूट लेंगे इनका दीया। इसकी रोशनी हमारी इज़ाज़त के बगैर कहीं नहीं जा सकती।

चोर-३९: डरने की कोई जरुरत नहीं है. 63 साल से घना अन्धेरा भरा है हमने, इस अन्धेर नगरी में। एक दीया जल भी गया तो क्या होगा?

चोर-४०: अबे मूरख ऐसे तर्क तेरी चोरी की वकालत में तो चल सकते हैं असलियत में नहीं। अन्धेरा चाहे हजारॉ साल पुराना हो, सिर्फ एक दीया काफी है उसे एक पल में भगाने के लिए।

(इसी बीच अली और बाबा का प्रवेश)

अली : सुनों! सुनों ! अब कोई ईडी-याँ नहीं घिसेगा। हमारे हीरो बाबा हैं, बाबा आप ही कुछ करो।

बाबा : मै अपना काम चुपचाप पीछे से करता हूं। मुझे हीरो बनने का कोई शौक नहीं है।

25 comments:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

aadhunik ALIF LAILAA kee daastaan hai...

Mukesh Kumar Sinha said...

bhagwan bachaye in chalis choro se!!

ZEAL said...

Nicely written . I agree with you.

kshama said...

Ha,ha! Ab dekhte hain,ki,diya kab jal uthtaa hai aur janta kee qismat kab khultee hai!

अनुनाद सिंह said...

अति सुन्दर ! कथानक वास्तविका के बहुत निकट है। जय हो 'मरजीना' की।

वन्दना said...

आज इस दीये की बहुत जरूरत है और जलेगा जरूर एक दिन बेशक देर हो…………………कितने ही चोर क्यो ना हों रोशनी होकर रहेगी।

प्रवीण पाण्डेय said...

हमें तो लगा था चोर चोरी ही करते हैं, शब्द भी चुराते हैं ये तो।

मनोज भारती said...

चालिस चोरों पर तो हमारे अन्ना भारी हैं,अब अली बाबा और मरजीना की दाल नहीं गलने वाली है,क्योंकि दीपक बस जलने को है।

समकालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सुंदर प्रहसन रच डाला चैतन्य जी !!! बहुत-बहुत बधाइयाँ इस कार्य के लिए।

सुशील बाकलीवाल said...

चोरों की इस पुरानी फौज में अलीबाबा मरजीना को लेकर कबसे शामिल हो गया ?

Apanatva said...

khulja sim sim mantr ka alternate pata lagana padega.......... :)

कौशलेन्द्र said...

चालिस चोरों के चालिस छाया चोर भी तैयार बैठे हैं कि जब भी रोशनी होगी ...वे झपट कर गपच लेंगे ...जैसा आज़ादी के समय किया था ....अभ्यस्त हैं लोग मलाई चुराने में. मरजीना उनकी सरदार है.

ajit gupta said...

वाह अच्‍छा व्‍यंग्‍य किया है। यह कहानी है दीए की और तूफान की, निर्बल से लडाई बलवान की।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

चालीस होते तो मामला सुलझ ही जाता।

Deepak Saini said...

भेडियों ने एकजुट होकर गाय को घेरने की योजना बनाई है

मनोज कुमार said...

मज़ा आ गया। रोचक, और सुंदर प्रस्तुति।

संगीता पुरी said...

बढिया व्‍यंग्‍य !!

Arvind Mishra said...

रोशनी में आँखे तो चुधिआती है -कंदीलें जलने को फिर बेताब है

Patali-The-Village said...

रोचक, और सुंदर प्रस्तुति।

रचना दीक्षित said...

बहुत करारा व्यंग आज की व्यवस्था पर. सब इसी उम्मीद में हैं कि दिया कब जलेगा. इंतिहा हो चुकी इन्तेज़ार की.

शिवम् मिश्रा said...

हर शाख पर उल्लू बैठा है ... अंजामे गुलिस्तान क्या कहिये ...
हर गली में नेता रहता है ... अंजामे हिन्दुस्तान क्या कहिये ...

संजय @ मो सम कौन ? said...

गये जमाने के चोर तो फ़िर उसूलों वाले थे, नमक खाने से मना कर दिया था उन्होंने कि कहीं नमकहराम न कहलायें।

Poorviya said...

batoo hi batoo main bahut kuch keh diya .....

diya to jalna hi hai aaj nahi to kal...

jai baba banaras......

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

सचमुच जो असल में काम करते हैं वे नीव की ईंट की तरह मौन-मूक और बेनाम रह कर ही करते हैं । अन्यथा--निर्माण में भवन के बस एक ईंट रख कर , अखबार में छपाते वो नाम ...वाले लोग ही अधिक हैं फिर भी नींव की ईंट बनने वाले हैं और यह उम्मीद की बात हैं ।

अरुण चन्द्र रॉय said...

समकालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सुंदर प्रहसन रच डाला चैतन्य जी !!! बहुत-बहुत बधाइयाँ इस कार्य के लिए।

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत ही सटीक और सामयिक भी । ये दिया तो जलेगा ही चोर जो मर्जी कर लें ।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...